सूरए बक़रा का अनुवाद
 


सूरए बकरा आयत 1_91



शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो रहमान व रहीम (दयालु व कृपालु) है।

1. यह अक्षर, अल्लाह व पैग़म्बर (स.) के मध्य एक रहस्य है।

2. यह (महान) किताब जिसके (हक़) होने में कोई संदेह नहीं है, मुत्तक़ी (नेक) लोगों का मार्ग दर्शन करती है।

3. (मुत्तक़ी) वह लोग हैं जो ग़ैब पर ईमान रखते हैं, नमाज़ को क़ाइम करते हैं और जो धन हमने उन्हें दिया है उसमें से अल्लाह के नाम पर ख़र्च करते हैं।

4. वह लोग, उस पर भी ईमान रखते हैं जो आप पर नाज़िल हुआ है और उस पर भी जो आप से पहले (नबियों पर) नाज़िल हुआ था और वह क़ियामत पर भी यक़ीन रखते हैं।

5. वह सभी अपने रब की तरफ़ से हिदायत पर हैं तथा वही सब सफलता पाने वाले हैं।

6. जिन लोगों ने कुफ़्र को अपना लिया है, चाहे आप उन्हें डरायें या न डरायें, उनके लिए समान है, वह ईमान नहीं लायेंगे।

7. अल्लाह ने उनके दिलों व कानों पर मुहर लगा दी है तथा उनकी आँखों पर पर्दा पड़ा है और उनके लिए बहुत बड़ा अज़ाब है।

8. इंसानों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह और क़ियामत पर ईमान ले आये हैं, परन्तु वह मोमिन नहीं हैं।

9. (मुनाफ़िक़ यह समझते हैं कि) वह अल्लाह व मोमिनों को धोका दे रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि वह स्वयं को धोका देते हैं, लेकिन वह इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं।

10. मुनाफ़िक़ों के दिलों में बीमारी है बस अल्लाह उनकी बीमारी को बढ़ाता है और उनके लिए दुखदायी अज़ाब है इस लिए कि वह झूट बोलते हैं।

11. जब उन (मुनाफ़िक़ों) से कहा जाता है कि तुम ज़मीन पर बुराई न फैलाओ तो वह कहते हैं कि हम तो केवल सुधारक हैं।

12. जान लो कि निःसंदेह वह बुराईयाँ फैलाने वाले हैं, परन्तु वह इस बात को नहीं समझते।

13. जब उन (मुनाफ़िक़ों) से कहा जाता है कि जिस प्रकार अन्य लोग ईमान ले आये हैं तुम भी ईमान ले आओ तो वह (घमंडित स्वर में) कहते हैं कि क्या हम मूर्ख लोगों की तरह ईमान ले आयें ? समझ लो कि वही मुर्ख हैं, परन्तु वह (अपनी मुर्खता) को नहीं जानते।

14. वह (मुनाफ़िक़) जब मोमिनों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान ले आये और जब अपने (हम फ़िक्र) शैतानी लोगों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो केवल ईमानदारों का मज़ाक़ बना रहे हैं।

15. अल्लाह उनका मज़ाक़ बनाता है और उन्हें उनकी सरकशी में मोहलत देता है ताकि वह इधर उधर भटकते फिरें।

16. यह सब लोग, वह हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही को ख़रीदा, परन्तु उन्हें इस व्यापार ने लाभ नहीं पहुँचाया (क्योंकि वह) हिदायत प्राप्त करने वालों के गिरोह में सम्मिलित न हो सके। (या वह अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सके)

17. उन (मुनाफ़िक़ों) की मिसाल ऐसी है जैसे किसी ने (रौशनी के लिए) आग रौशन की और जब आग ने चारों ओर रौशनी फैलादी तो अल्लाह ने उनकी रौशनी छीन ली और उनको अँधेरे में छोड़ दिया, उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता।

18. यह लोग (हक़ को सुनने के लिए) बहरे, (हक़ कहने के लिए) गूँगे और (हक़ को देखने के लिए) अँधे हैं। बस यह लोग (हक़) की ओर वापस नहीं पलटेंगे।

19. या उनके समान हैं जो आसमान से बरसने वाली ऐसी तेज़ बारिश में घिरे हों, जिस में अंधेरा, बादलों की गरज और बिजली की चमक हो और उन्होंने बिजली के डर व मौत के भय से अपनी उंगलियाँ अपने कानों में दे रखी हों, अल्लाह काफ़िरों को चारों ओर से घेरे है।َ

20. जल्दी ही, बिजली उनकी आँखों की रौशनी को ख़त्म करने वाली है, (जब उस बारिश व अँधेरे में आसमानी बिजली) चमकती है तो वह उसकी रौशनी में चलने लगते हैं और जब अंधेरा छा जाता है तो खड़े हो जाते हैं। अगर अल्लाह चाहे तो इनकी आँखों की रौशनी और सुनने की शक्ति को समाप्त कर सकता है, अल्लाह हर काम करने में सक्षम है।

21. ऐ इंसानों ! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें और तुम से पहले वाले लोगों को पैदा किया, ताकि तुम मुत्तक़ी बन सको।

22. वह अल्लाह जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को फ़र्श बनाया व आसमान को ऊँचा किया और आसमान से पानी बरसाया फिर उससे तुम्हारे रिज़्क़ फलों को उगाया। अतः किसी को अल्लाह का शरीक न बनाओं इसलिए कि तुम स्वयं जानते हो कि (न किसी बुत ने तुम्हें पैदा किया है और न ही वह तुम्हें रिज़्क़ देते हैं यह तो केवल अल्लाह के कार्य हैं।)

23. अगर तुम्हें उसमें कोई संदेह है जिस (कुरआन) को हमने अपने बन्दे पर नाज़िल किया है तो तुम उसके समान एक सूरः ले आओ और इस कार्य के लिए अल्लाह के अतिरिक्त अपने अन्य गवाहों को निमन्त्रित करो, अगर तुम सच्चे हो।

24. फिर अगर तुमने यह काम न किया और तुम इसे कदाचित नहीं कर सकते, तो उस आग से डरो जिसका ईंधन (पापी) इन्सान व पत्थर होंगे (और जिसे) काफ़िरों के लिए तैयार किया गया है।

25. जिन लोगों ने ईमान लाने के बाद अच्छे कार्य किये, उनको यह ख़ुश-ख़बरी सुना दो कि उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके (पेड़ो की जड़ों) में नहरे बह रही हैं, जब उनको इन बाग़ों के फ़ल खाने को दिये जायेंगे तो वह कहेंगे कि यह तो वही हैं जो पहले भी हमारा रिज़्क़ थे, जबकि उन्हें उनके समान फल दिये गये है (न कि स्वयं वही फल) और उनके लिए जन्नत में पवित्र जीवन साथी हैं और वह सदैव उसी में रहेंगे।

26. निःसंदेह अल्लाह, मच्छर या उससे (छोटी), बड़ी चीज़ की मिसाल देने में नहीं शर्माता, बस जो लोग ईमान ले आये वह जानते हैं कि उनके रब की ओर से यह मिसाल हक़ (सही) है, परन्तु जो काफ़िर हैं वह कहते हैं कि अल्लाह का इस मिसाल से क्या उद्देश्य है? (हाँ) अल्लाह इस मिसाल के द्वारा अनेक (लोगों) को भटका देता है और अनेक का मार्गदर्शन करता है (परन्तु जानलो कि) अल्लाह केवल व्याभिचारियों को ही भटकाता है।

27. (फ़ासिक़) वह लोग हैं जो अल्लाह को वचन देने के बाद अपने वचन को तोड़ देते हैं और अल्लाह ने जिस सम्बन्ध को बाक़ी रखने का हुक्म दिया है उसको भी तोड़ देते हैं और ज़मीन पर बुराईयाँ फैलाते हैं, वह सब घाटा उठाने वाले हैं।

28. तुम अल्लाह का कैसे इनकार करते हो, जबकि तुम मृत (शरीर) थे उसने तुम्हें जीवन दिया फिर तुम्हें मृत्यु देगा और फिर दोबारा जीवित करेगा, इसके बाद तुम उसकी ओर पलटाये जाओगे।

29. (अल्लाह) वह है, जिसने ज़मीन पर पाई जाने वाली समस्त चीज़ों को तुम्हारे लिए ही पैदा किया, इसके बाद उसने आसमान को पैदा किया तथा सात सुदृढ़ आसमान बनाये, वह प्रत्येक चीज़ का जानने वाला है।

30. जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं ज़मीन पर एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ, तो फरिश्तों ने कहा कि क्या तू ज़मीन पर उनको बसायेगा जो उस पर बुराईयाँ फैलायें व ख़ून बहाये ? जबकि हम तेरी हम्द (स्तुती) करते हैं और तेरी तक़दीस (पवित्रता का बखान) करते हैं। अल्लाह ने कहा जो मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।

31. और अल्लाह ने आदम को समस्त नाम (संसार के रहस्य व वास्तविक्ता) सिखा दिये फिर उनको फ़रिश्तों के सामने रखा और कहा कि अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इन सबके नाम बाताओ ?

32. फ़रिश्तों ने कहा कि (ऐ अल्लाह!) तू पवित्र है, हमे तूने जो सिखाया है, हम उसके अतिरिक्त कुछ नहीं जानते, निःसंदेह तू ज्ञानी व बुद्धिमान है।

33. अल्लाह ने कहा कि ऐ आदम ! फ़रिश्तों को इन (चीज़ो) के नाम बताओ। जब आदम ने फ़रिश्तों को उन (चीज़ो) के नाम बता दिये तो अल्लाह ने कहा कि क्या मैंने तुम से नहीं कहा था कि मैं ज़मीन व आसमान के रहस्यों को जानता हूँ और तुम जो कुछ प्रकट करते या छिपाते हो उसे भी जानता हूँ।

34. जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सबने सजदा किया, परन्तु शैतान ने स्वयं को बड़ा समझा व घमंड (के कारण) सजदा नहीं किया और काफ़िरों में हो गया।

35. हमने आदम से कहा कि तुम अपनी पत्नी के साथ इस जन्नत में रहो और जहाँ से जो चाहो खाओ, परन्तु इस वृक्ष के पास न जाना, वरन् तुम अत्याचारियों में सम्मिलित हो जाओगे।

36. शैतान ने उन दोनों को डगमगाया और वह जिस जन्नत में थे, उनको उससे बाहर किया, (उस समय) हमने उनसे कहा कि नीचे जाओ इस हालत में कि तुम में से कुछ (लोग) एक दूसरे के दुश्मन होगें, अब तुम्हारा ठिकाना ज़मीन है और उसी में एक निश्चित समय तक जीवन लाभ है।

37. बस आदम ने अपने रब से कुछ कलमें सीखे फिर (उन कलमों के द्वारा तौबा की) बस अल्लाह ने अपने लुत्फ़ (कृपा) को उन पर पलटा दिया, निःसंदेह वह तौबा को स्वीकार करने वाला व दयावान है।

38. हमने कहा कि सब इस (जन्नत से ज़मीन पर) नीचे आओ, बस जब तुम्हारे पास मेरा मार्गदर्शन पहुँच जाये तो जो भी मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण करेंगे उन्हें न कोई डर होगा और न वह दुःखी होगें।

39. (परन्तु) जिन्होंने कुफ़्र को अपनाया और हमारी निशानियों को झुटलाया, वह सब जहन्नमी हैं और सदैव उसी में रहेंगे।

40. ऐ इस्राईल की संतानों ! मेरे उन उपहारों को याद करो जो मैंने तुम्हें प्रदान किये हैं और तुम अपने वादे को पूरा करो ताकि मैं भी अपने वादे को पूरा करूँ और केवल मुझसे डरो।

41. और हमने जो (क़ुरआन) नाज़िल किया है उस पर ईमान लाओ, क्योंकि यह उसकी पुष्टि करने वाला है जो (तौरात) तुम्हारे पास है और तुम इसका इनकार करने वालो में प्रथम न बन जाना और मेरी आयतों को सास्ती क़ीमत पर न बेंच देना और केवल मुझसे ही डरना।

42. और हक़ (सत्य) को बातिल (असत्य) से न ढकना और क्योंकि तुम वास्तविक्ता को जानते हो अतः उसे न छिपाना।

43. और नमाज़ क़ाइम करो व ज़कात दो और रुकूअ करने वालों के साथ रुकूअ करो।

44. क्या तुम लोगों को नेकी की शिक्षा देते हो और स्वयं को भूल जाते हो ? तुम तो किताब पढ़ते हो फिर बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते ?

45. सब्र व नमाज़ के द्वारा सहायता प्राप्त करो और यह कार्य ख़ाशे (अल्लाह के आज्ञाकारी व उसके सम्मुख स्वयं को निम्न समझने वाले) लोगो को छोड़ कर अन्य के लिए बहुत कठिन है।

46. ख़ाशे, वह इन्सान हैं जो अल्लाह की ओर पलटने (क़ियामत) और अल्लाह से मुलाक़ात (हिसाब किताब) पर ईमान रखते हैं।

47. ऐ इस्राईल की संतान ! मेरे उन उपहारों को याद करो जो मैंने तुम्हें प्रदान किये हैं और यह भी याद रखो कि मैंने तुम्हें समस्त संसार वासियों पर श्रेष्ठता प्रदान की है।

48. उस दिन से डरो, जिस दिन कोई किसी से (अल्लाह के अज़ाब में से) कोई चीज़ कम नहीं करेगा और न ही किसी की कोई सिफारिश स्वीकार की जायेगी और न ही किसी से कोई तावान लिया जायेगा और न ही कोई सहायता की जायेगी।

49. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुम्हें आले फ़िरौन से मुक्ति दी, वह तुम्हें सदैव यातनाएं देते रहते थे, वह तुम्हारे बेटों को कत्ल कर देते थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित छोड़ देते थे तथा और इस कार्य में तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी कठिन परीक्षा थी।

50. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुम्हारे लिए समुन्द्र को चीरा और तुम्हें मुक्ति प्रदान की और तुम्हारे सामने फिरौनियोँ को डुबा दिया।

51. और उसको भी याद करो जब हमने मूसा से चालीस रातों का वादा किया और तुमने उनके (मीक़ात) में (आने) के बाद, बछड़े की पूज़ा शुरू कर दी, इस स्थिति में तुम ज़ालिम थे।

52. फिर इस (बछड़े की पूजा) के बाद हमने तुम्हें क्षमा कर दिया ताकि शायद तुम (इन उपाहारों) का शुक्र अदा कर सको।

53. और उस समय को भी याद करो जब हम ने मूसा को किताब व फ़ुरक़ान प्रदान किये, ताकि तुम हिदायत प्राप्त कर सको।

54. और उस समय को भी याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम वालो तुमने गाय की पूजा करके अपने ऊपर अत्याचार किया है, बस तुम अपने रब की तरफ़ पलट जाओ और एक दूसरे को क़त्ल करो, यह काम तुम्हारे रब के समीप तुम्हारे लिए उचित है। बस अल्लाह ने तुम्हारी तौबा को स्वीकार कर लिया, क्योंकि वह तौबा स्वीकार करने वाला दयावान है।

55. और उस समय को भी याद करो जब तुमने कहा कि ऐ मूसा ! हम उस समय तक तुम पर ईमान नहीं लायेंगे जब तक अल्लाह को (अपनी आँखों के द्वारा) स्पष्ट रूप से न देख लें, बस तुम पर बिजली गिरी और तुम देखते ही रह गये।

56. फिर हम ने मृत्यु के बाद तुम्हें जीवित किया कि शायद तुम उसका शुक्र अदा करो।

57. हम ने तुम्हारे लिए बादलों का छत्र बनाया और तुम्हारे लिए मन्न व सलवा भेजा, (तथा तुम से कहा कि) हम ने जो पवित्र रिज़्क़ तम्हें प्रदान किया है तुम उसे खाओ (परन्तु तुम ने बहाने बना कर उन उपहारों को हाथों से खो दिया, याद राखो कि) उन्होंने हमारे ऊपर ज़ुल्म नहीं किया बल्कि स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया।

58. और उस समय को भी याद करो जब हम ने कहा कि इस बस्ती (बैतुल मुक़द्दस शहर) में प्रवेश करो और (इसमें मौजूद उपहारों में से) जो चाहो खाओ तथा (बैतुल मुक़द्दस की इबादतगाह के) दरवाज़े में सजदा करते हुए प्रवेश करो और हित्तातुन (अर्थात हमारे गुनाहों को गिरा दे) कहो, ताकि हम तुम्हारी ग़लतियों को माफ़ करें और अच्छे कार्य करने वालों के ईनाम में वृद्धि करें।

59. बस अत्याचारियों ने (इस) बात को उस बात से बदल दिया जो उनसें नहीं कही गई थी। (अर्थात हित्ततुन को बदल कर वह मज़ाक़ उड़ाने के लिए हिन-ततुन (गेहूँ) कहने लगे) अतः हमने उन अत्याचारियों पर उनके गुनाहों की सज़ा में, आसमान से अज़ाब भेजा।

60. और उस समय को भी याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा, तो हमने उनसे कहा कि अपने असा (सोंटे) को पत्थर पर मारो, अचानक उस पत्थर से बारह झरने फूट पड़े, (इस प्रकार कि बनी इस्राईल के बारह के बारह क़बीलों के) हर इन्सान ने अपने पानी पीने के स्थान को पहचान लिया, (हमने कहा) अल्लाह के प्रदान किये हुए रिज़्क़ में से खाओ पियो और ज़मीन पर बुराई न फैलाओ।

61. और उस समय को भी याद करो जब तुमने मूसा से कहा कि हम एक ही प्रकार के भोजन पर सब्र नहीं कर सकते, आप अपने रब से हमारे लिए दुआ कीजिये कि वह हमें वह चीज़ें प्रदान करे जो ज़मीन से उगती हैं जैसे सब्ज़ी, खीरा, लहसुन दाल व प्याज़, मूसा ने कहा कि क्या तुम अच्छे भोजन के बदले निम्न भोजन चाहते हो ? (और अगर ऐसा ही है तो इस बयाबान को पार करने की कोशिश करो ताकि) शहर में प्रविष्ट हो जायें, वहाँ पर वह सभी चीज़ें उपलब्ध हैं जो चीज़े तुम चाह रहे हो, बस उन पर अपमानित व दुःखी (होने) की मुहर लगा दी गई और वह (फिर से) अल्लाह के प्रकोप में फँस गये। यह सब इस लिए हुआ कि उन्होंने अल्लाह की निशानियोँ को झुटलाया और नबियों को निर्दोष क़त्ल किया, उनके साथ यह सब इस लिए हुआ कि वह गुनाहगार, अवज्ञाकारी व विद्रोही थे।

62. वह लोग जो (इस्लाम पर) ईमान ले आये और जो यहूदी, नसारा व साबेईन हो गये उनमें से जो भी अल्लाह व क़ियामत के दिन पर ईमान ले आये और अच्छे कार्य करे उनका प्रतिकार उनके रब के पास है तथा न उन्हें कोई भय है और न ही वह दुःखी होते हैं।

63. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुमसे वचन लिया और तूर पहाड़ को तुम्हारे (सरों के) ऊपर उठाया (और तुमसे कहा कि) हमने तुम्हें जो (अल्लाह की आयतें व आदेश) दिया है उसे मज़बूती से पकड़ लो और उसमें जो कुछ भी है उसे याद करो (और उस पर क्रियान्वित रहो) शायद तुम (इस प्रकार) मुत्तक़ी बन जाओ।

64. तुम, इसके बाद (अर्थात अपने सरों पर तूर नामक पहाड़ को देख कर) फिर पलट गये, अगर तुम्हारे ऊपर अल्लाह की अनुकम्पा, दया व कृपा न होती तो तुम घाटा उठाने वालों में होते।

65. तुम, अपने उन लोगों से भली भाँती परिचित हो, जिन्होंने शनिवार को अवज्ञा की (उस दिन काम की छुट्टि नहीं की और काम किया) हमने (इस अवज्ञा के कारण) उनसे कहा कि तुम धुतकारे हुए बन्दर बन जाओ।

66. हमने इस सज़ा को उपस्थित लोगों और उनके बाद आने वाली पीढ़ी के लिए एक शिक्षा तथा मुत्तक़ी लोगों के लिए एक नसीहत बनाया है।

67. और उस समय को याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि (क़ातिल को पहचानने के लिए) एक गाय को काटो, (तो) उन्होंने कहा कि क्या तुम हमारा मज़ाक़ बना रहे हो ? (मूसा ने) कहा कि मैं अल्लाह से शरण चाहता हूँ इससे बचने के लिए कि मैं मूर्खो में से हूँ।

68. (बनी इस्राईल ने मूसा से) कहा कि अपने रब से हमारे लिए दुआ करो ताकि वह इसकी व्याख्या करे कि यह (गाय) कैसी हो ? (मूसा) ने जवाब दिया कि अल्लाह कहता है कि वह गाय न तो इतनी बूढ़ी हो कि काम न कर सकती हो और न जवान ही हो, बल्कि इन दोनों के बीच की हो। अतः तुम्हें जो आदेश दिया गया है, उसका (अति शीघ्र) पालन करो।

69. उन्होंने (मूसा से) कहा कि आप अपने रब से हमारे लिए दुआ कीजिये कि वह हमारे लिए स्पष्ट करे कि यह गाय किस रंग की हो ? मूसा ने जवाब दिया कि अल्लाह कहता है कि यह गाय तेज़ पीले रंग की हो ताकि देखने वालों को अच्छी लगे।

70. उन्होंने (मूसा से फिर) कहा कि अपने रब से हमारे लिए दुआ कीजिये कि वह हमारे लिए यह स्पष्ट करे कि यह गाय कैसी हो? क्योंकि यह गाय हमारे लिए संदिग्ध हो गई है और अगर अल्लाह ने चाहा तो हम (आपके स्पष्टीकरण से) अवश्य मार्गदर्शित होंगे।

71. (मूसा ने) कहा कि अल्लाह कहता है कि यह गाय ऐसी हो जिससे न ज़मीन जोतने का काम लिया जाता हो और न खेत सीँचने का, ऐब व रोग रहित हो, उसके रंग पर किसी दूसरे रंग का धब्बा भी न हो, उन्होंने कहा कि अब आपने ठीक बात कही है। बस (उन्होंने एक ऐसी गाय तलाश करके) उसे काट ही दिया, जबकि वह ऐसा करने वाले नहीं थे।

72. और उस समय को भी याद करो जब तुम ने एक इन्सान को क़त्ल किया और इसके बाद उसके (क़ातिल) के समबन्ध में झगड़ने लगे, परन्तु अल्लाह उसे प्रकट करने वाला है, जिसको तुम छिपा रहे थे।

73. बस हमने कहा कि कटी हुई गाय का एक टुकड़ा मृतक के शरीर पर मारो (ताकि वह जीवित हो उठे व अपने क़ातिल के बारे में बताये) अल्लाह इस प्रकार मृत्य को जीवित करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है शायद तुम अपनी बुद्धी से काम लेने लगो।

74. फिर इस घटना के बाद तुम्हारे दिल पत्थर के समान या उससे भी अधिक कठोर हो गये! क्योंकि पत्थरों में तो कुछ पत्थर ऐसे हैं जिनसे नहरे बहने लगती हैं और कुछ ऐसे हैं कि अगर फट जाते हैं तो उनसे पानी निकलने लगता है और कुछ पत्थर ऐसे है जो अल्लाह के भय से (पहाड़ों की ऊँचाई से) नीचे गिर जाते हैं, और अल्लाह तुम्हारे क्रिया कलापों से अनभिज्ञ नहीं है।

75. (ऐ मोमिनों! ) क्या तुम्हें उम्मीद है कि (वह पत्थर दिल यहूदी) तुम्हारे (दीन) पर ईमान ले आयेंगे ? जबकि उनमें से कुछ लोगो ने अल्लाह के कलाम (वाणी) को सुनने और समझने के बाद उसमें परिवर्तन किया, जबकि वह वास्तविक्ता को जानते थे।

76. और (यही यहूदी) जब मोमिनों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान ले आये हैं, परन्तु इनमें कुछ लोग जब आपस में मिलते हैं तो कहते हैं कि अल्लाह ने (पैग़म्बरे इस्लाम की विशेषताओं के समबन्ध में) जिन चीज़ों का तुम्हारे लिए (तौरात में) वर्णन किया है, तुम उन्हें मुसलमानों से क्यों बताते हो, (क्या इस लिए कि) वह (क़ियामत के दिन) तुम्हारे रब के सामने, तुम्हारे विरूद्ध इसी को दलील बनायें ? बस तुम बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते ?

77. क्या उन्हें ज्ञात नहीं है कि अल्लाह वह सब कुछ जानता है जिसे वह छिपाते हैं या प्रकट करते हैं ?

78. उन (यहूदियों) में से अशिक्षित लोग हैं, अल्लाह की किताब को अपनी इच्छाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते, वह केवल अपने विचारों के पाबन्द है।

79. धिक्कार है उन लोगों पर जो किताब को अपने हाथों से लिखते हैं और बाद में कहते हैं कि यह अल्लाह की तरफ़ से है ताकि वह उसको कम मूल्य पर बेंच सकें। अतः उस पर भी धिक्कार है जो उन्होंने अपने हाथों से लिखा और उस पर भी धिक्कार जो उन्होंने उसके द्वारा कमाया।

80. और (यहूदी) कहते हैं कि हमें दोज़ख की आग केवल कुछ दिनों के लिए ही छू सकती है,(ऐ पैग़म्बर आप) उन (यहूदियों) से कह दीजिये कि क्या तुमने अल्लाह से कोई अनुबंध किया है कि अल्लाह उस अनुबंध का उलंघन नहीं कर सकता ? या यह कि तुम अल्लाह से उस बात को सम्बन्धित कर रहे हो जिसके बारे में स्वयं नहीं जानते हो !

81. हाँ ! जिन्होंने बुराई की और उनके गुनाहों ने उन्हें घेर लिया (अर्थात गुनाहों के दुष्प्रभावों ने उनके पूरे अस्तित्व को छिपा लिया) वह सब जहन्नमी हैं और सदैव उसी में रहेंगे।

82. और जो लोग ईमान लाये तथा अच्छे कार्य किये, वह समस्त जन्नती हैं और सदैव उसी में रहेंगे।

83. और उस समय को भी याद करो जब हमने बनी इस्राईल से यह वचन लिया था कि तुम अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की इबादत न करना और माँ बाप, संबंधियों, यतीमो व दरिद्रों के साथ अच्छा व्यवहार करना व लोगों से शिष्टता के साथ बात चीत करना और नमाज़ को क़ाइम करना व ज़कात देना, परन्तु कुछ लोगों को छोड़ कर तुम (यह वचन देने के बाद) अपने वचन से फिर गये और तुम तो वचन से फिरने वाले थे ही।

84. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुम से यह मीसाक़ (वचन) लिया था कि तुम आपस में एक दूसरे का ख़ून न बहाना, एक दूसरे को अपने वतन से बाहर न निकालना, तुम सबने इसे स्वीकार किया था और इसके गवाह भी तुम स्वयं ही हो।

85. परन्तु तुम हो कि एक दूसरे को क़त्ल करते हो, अपने में से ही एक गिरोह को उनके वतन से बाहर निकालते हो और उनके विरूद्ध ज़ुल्म में एक दूसरे की सहायता करते हो और अगर उनमें से कोई क़ैदी बनकर तुम्हारे पास आता है तो तुम फ़िदया (बदला) देकर उसे आज़ाद भी करा लेते हो, जबकि (न केवल उनका क़त्ल करना बल्कि) उनका वतन से निकालना (भी) तुम पर हराम था। क्या तुम आसमानी किताब के कुछ आदेशों पर ईमान रखते हो और कुछ का इनकार करते हो? बस तुम में से जो यह कार्य करते हैं उनकी सज़ा यह है कि उन्हें इस संसार में ज़लील किया जाये और क़ियामत में कठिन से कठिन अज़ाब की ओर धकेला जाये, तुम जो भी करते हो अल्लाह उससे अनभिज्ञ नहीं है।

86. यह सब, वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत (परलोक) के बदले दुनिया ख़रीद ली है, अतः न उनके अज़ाब में कोई ढील होगी और न ही उनकी सहायता की जायेगी।

87. निःसंदेह हमने मूसा को किताब (तौरात) दी और उनके बाद निरन्तर नबी भेजे तथा हमने ईसा पुत्र मरियम को स्पष्ट मोजज़े (चमत्कार) प्रदान किये और रूहुल क़ुदुस के द्वारा उनका अनुमोदन किया, फिर जब तुम्हारे पास कोई रसूल तुम्हारी इच्छाओं के विपरीत (पैग़ाम) लेकर आया तो तुमने उसके सामने घमंड किया (और उस पर ईमान लाने के स्थान पर) तुमने कुछ को झुटलाया तथा कुछ को क़त्ल किया, क्यों !?

88. उन्होंने (नबियों) से कहा कि हमारे दिल ग़िलाफ़ में लिपटे हुए हैं (हम तुम्हारी किसी भी बात को नहीं समझते), ऐसा नहीं है, बल्कि अल्लाह ने उनके कुफ़्र के कारण उन्हें अपनी रहमत से दूर कर दिया है (इसी कारण वह किसी भी बात को नहीं समझ पाते) अतः बहुत कम ईमान लायेंगे।

89. और जब उनके पास अल्लाह की ओर से वह किताब (कुरआन) आई, जो उनके पास मौजूद निशानियों की पुष्टि करने वाली है, और जिसके आने से पहले वह स्वयं यह खुशखबरी सुनाते थे कि (नये पैगम्बर व किताब की सहायता से) दुश्मनों पर विजय प्राप्त करेंगे, परन्तु जब वह (किताब व पैग़म्बर जिनको वह पहले से) जानते थे उनके पास आये तो उन्होंने उसका इनकार कर दिया, बस काफ़िरों पर अल्लाह की लानत है।

90. कितनी बुरी है वह चीज़, जिसके बदले में उन्होंने स्वयं को बेंचा, ईर्ष्या के कारण अल्लाह की भेजी हुई (आयतों) का इनकार किया (और कहा) कि अल्लाह अपने फ़ज़्ल (अनुकम्पा) से अपने जिस बन्दे पर चाहता है (आयतों को) क्यों नाज़िल करता है ? बस वह अल्लाह के दोहरे प्रकोप के भागीदार हैं और काफ़िरों के लिए ज़लील करने वाला अज़ाब है।

91. और जब उनसे कहा जाता है कि जो अल्लाह ने नाज़िल किया है उस पर ईमान ले आओ तो कहते हैं कि हम केवल उस पर ईमान लाते हैं जो हमारे (पैग़म्बरों) पर नाज़िल हुआ है और इसके अतिरिक्त सब का इनकार कर देते हैं, जबकि यह (कुरआन) हक़ है और जो (तौरात) उनके पास है उसकी पुष्टी करता है। (ऐ पैग़म्बर) आप उनसे कह दीजिये कि अगर तुम्हारा (उन आयतो पर जो तुम पर नाज़िल हुई थीं) ईमान था तो तुम इससे पहले अल्लाह के नबियों को क्यों क़त्ल करते थे ?
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