इमामे मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम
 




पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजन वास्तविकता व सच्चाई के मार्ग को स्पष्ट करने वाले हैं।



वे मानवता को मुक्ति एवं कल्याण तक पहुंचने के मार्ग को दिखाते हैं।



पवित्र क़ुरआन के साथ-२ इन महापुरुषों के सदाचरण भी धार्मिक शिक्षाओं को पहचाने एवं कल्याण के मार्ग को तय करने के दूसरे साधन व माध्यम हैं।



इसी कारण विभिन्न क्षेत्रों में इनसे संबंध, परिपूर्णता चाहने वालों के ध्यान का केन्द्र है और ज्ञान एवं श्रेष्ठताप्रेमी इसी संबंध की छत्रछाया में अपने ज्ञान व अध्यात्म में वृद्धि करते हैं।



निः संदेह इन महापुरुषों की छोड़ी हुई मूल्यवान धरोहर से संबंध, लोक-परलोक में मनुष्य की भलाई एवं सफलता का कारण बनेगा।



सर्वसमर्थ व महान ईश्वर का धन्यवाद है कि आज पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के पावन जन्म दिन पर आपकी सेवा में उपस्थित हैं



और उसने हमें यह कृपा प्रदान की है कि आज के कार्यक्रम में हम उनके जीवन के महान व्यक्तित्व के कुछ आयामों पर प्रकाश डालें।



सबसे पहले हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर हम आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं और उनके एक कथन से कार्यक्रम का आरंभ कर रहे हैं।



आप कहते हैं" जो भी ईश्वर के लिए विनम्रता करता है, ईश्वर उसे उच्च स्थान प्रदान करता है"



हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का जन्म सात सफ़र सन् १२८ हिजरी क़मरी को मदीना के समीप अबवा नामक क्षेत्र में हुआ था।



हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने सुपुत्र इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के जन्म के अवसर पर कहा था"ईश्वर ने उपहार स्वरुप मुझे सर्वोत्म शिशू प्रदान किया"



हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम ने अपने पिता हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद ३५ वर्षों तक इस्लामी समाज के मार्ग दर्शन का महान ईश्वरीय दायित्व संभाला।



आपकी इमामत अर्थात नेतृत्व का काल उतार- चढ़ाव से भरा रहा और उनके काल में अब्बासी शासकों की सत्ता अपने चरम बिन्दु पर थी।



अब्बासी शासक हारून रशीद जैसे व्यक्तियों ने विदित में धार्मिक मुखौटे के साथ अपनी धूर्ततापूर्ण एवं कुटिल चालों के माध्यम से अपनी ग़लत नीतियों को जारी रखने और अपने अत्याचारों को और विस्तृत करने का प्रयास किया।



अब्बासी शासकों ने विदित में अपने धार्मिक मुखौटे एवं नारों के साथ सत्ता की बागडोर हाथ में ले ली परंतु लोगों पर अत्याचार करके और इस्लामी शिक्षाओं व आदेशों को परिवर्तित करके अपने दावों के विपरीत कार्य किया।



उनका पूरा प्रयास था कि स्वयं को वे पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों का प्रेमी दर्शायें परंतु व्यवहार में उन्होंने इसके बिल्कुल विपरीत किया और



पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के पवित्र परिजनों को बड़ी ही कठिन व दयनीय दशा में रखा।



एक आदर्श इस्लामी समाज की तुलना में इन शासकों का व्यवहार उससे बहुत दूर था जिसकी उनसे अपेक्षा थी।



भव्य महलों का निर्माण और महंगी दावतों जैसे ग़ैर आवश्यक कार्यों में लाखों दिरहम व दीनार ख़र्च किये जाते थे परंतु अधिकांश लोग ग़रीबी व निर्धनता में जीवन व्यतीत करते थे।



हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम का कृपालु हृदय उन लोगों के साथ था जिन्हें अब्बासी शासकों के अत्याचारों एवं भेदभाव का सामना था।



यही कारण था कि लोग भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का पौत्र होने के नाते हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम से अगाध प्रेम करते थे।



क्योंकि ये महापुरुष अपने सदाचरण से लोगों के मस्तिष्क में पैग़म्बरे इस्लाम की याद जीवित करते थे।



इसी कारण अब्बासी शासकों ने हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम से लोगों को दूर करने के लिए उन्हें कई बार गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया।



हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम ने लगभग १४ वर्ष बहुत ही कठिन स्थिति में जेल में व्यतीत किये। कठिनाइयों में धैर्य करने और क्रोध को पी जाने के कारण आपको काज़िम की उपाधि से ख्याति मिली।