ख़ुत्बा -154
 



ख़ुत्बा -154




(इसमे अहले बसरा को मुख़ातब (सम्बोधित)करते हुए उन्हे फ़ितनों(उपदर्वो)से आगाह (अवगत) किया है)

“ जो शख़्स उन फ़ितना अंगाज़ियों के वक़्त अपने नफ़्स के अल्लाह की इताअत (आज्ञा पालन) पर ठहराए रखने की ताक़त रखता हो उसे एसा ही करना चाहिये। अहर तुम मेरी इताअत(आज्ञा का पालन) करोगे तो इन्शाअल्लाह (ख़ुदा ने चाहा तो) तुम्हे जन्नत(स्वर्ग) की राह पर लगा दूँगा। अगरचे वह रास्ता कठिन दुशवारियो और तल्ख़ मज़ों(कड़वे स्वादों) को लिये हुए है। रही फ़लाँ (अमुक) तो उनमें औरतों (स्त्रीयों) वाली कम अक़ली आ गयी है। और लोहार के कढ़ाव की तरह कीना व इनाद उनके सीने में जोश मार रहा है, और जो सुलूक (व्यवहार) मुझ से कर रही हैं अगर मेरे सिवा किसी और से वैसे सुलूक को उनसे कहा जाता तो वह न करतीं। इन सव चीज़ो के बाद भी हमे उनकी साबिक़ा हुर्मत (विगत सम्मान) का लिहाज़ है उनका हिसाब व किताब अल्लाह के ज़िम्मे है ”।

(इस ख़ुत्बे का एक जुज़ (अंश) यह है)

“ वह अपनी क़ब्रों के ठिकानों से उठ खड़े हुए और अपनी आख़िरत (परलोक) के ठिकाने की तरफ़ पलट पड़े। हर घर के लिये उसके अहल (स्वामी) हैं कि न वह उसे तबदील कर सकेंगे और न उससे मुन्तक़िल (स्थानान्तरित) हो सक़ेगें। नेकियों का हुक्म देना और बुराइयों से रोकना ऐसे दो काम हैं जो अख़लाक़े ख़ुदावंदी (ईश्वरीय सदाचार) में से हैं। न उनकी वजह से मौत क़ब्ल अज़ वक़्त ( समय से पूर्व) आ सकती है, और न जो रिज़्क़ मुक़र्रर (जीविका निर्धारित) है उसमें कोई कमी हो सकती है। तुम्हे किताबे ख़ुदा पर अमल करना चाहिये। इस लिये कि वह एक मज़बूत रस्सी, रौशन व वाज़ेह नूर, नफ़ा बख़्श शिफ़ा, प्यास बुझाने वाली सेराबी (त्रप्ति)तमस्सुक करने वाले के लिये सामाने हिफ़ाज़त और वाबस्ता (सम्बद्द) रहने वाले के लिये नजात (निर्वाण) है। इसमें कजी नही आती कि उसे सीधा किया जाए, न हक़ से अलग होता हि कि उसका रुख़ मोड़ा जाए। कसरत से दोहराया जाना और बार बार कानों में पड़ना उसे पुराना नही करता। जो उसके मुताबिक़ (अनुरूप) कहे वह सच्चा है, और जो उस पर अमल करे वह सबक़त (प्राथमिकता) ले जाने वाला है। इसी असना(बीच) में एक शख़्स (व्यक्ति) खड़ा हुआ और उसने कहा कि हमें फ़ितनों के बारे में कुछ बताइये, और क्या आप ने इसके मुतअल्लिक़ रसूलुल्लाह (स) से दर्याफ़त किया था? आप ने फ़रमाया कि हाँ जब अल्लाह ने ये आयत उतारी कि “ क्या लोगों ने ये समझ रखा है कि उनके इतना कह देने से कि हम ईमान लाय उन्हे छोड़ दिया जायगा और वह फ़ितनों से दोचार नही होंगें ?” तो मैं समझ गया कि फ़ितना हम पर नही आयगा क्येकि रसूलुल्लाह (स) हमारे दरमियान मौजूद हैं। चुनाँचे मैने कहा, “ या रसूलल्लाह (स) यह फ़ितना क्या है कि जिस की अल्लाह ने आपको ख़बर दी है ? ” तो आप ने फ़रमाया कि, ए अली (अ) मेरे बाद मेरी उम्मत जल्दी फ़ितनों में पड़ जायगी।तो मैं ने कहा या रसूलल्लाह! (स) उहद के दिन जब शहीद होने वाले मुसलमान शहीद हो चुके थे और शहादत मुझ से रोक ली गयी थी और मुझ पर गराँ गुज़रा था तो आपने मुझ से नही फ़रमाया था कि तुम्हे बशारत (शुभ सूचना) हो कि शहादत तुम्हे पेश आने वाली है, और यह भी फ़रमाया था कि यह यूं ही हो कर रहेगा, यह कहो कि उस वक़्त तुम्हारे सब्र की हालत क्या होगी? तो मैं ने कहा था कि या रसूलल्लाह! (स) यह सब्र का रोई मौक़ा नही है, यह तो मेरे लिये मुज़दा (ख़ुशख़बरी) और शुक्र का मक़ाम होगा। तो आपने फ़रमाया कि या अली! हक़ीक़त (वास्तविकता) यह है कि लोग मेरे बाद मालो दौलत की वजह से फ़ितनों में पड़ जायेंगे और दीन अख़्तियार कर लेने से अल्लाह पर एहसान (आभार) जतायेंगे। उसकी रहमत (दया) की आरज़ूएं तो करेंगे, लेकिन उसके क़हरो ग़लबे कि गिरफ़्त से बे ख़ौफ़ (निर्भीक) हो जायेगे कि झूट मूट के शुब्हों (शंकाओं) और ग़ाफ़िल कर देने वाली ख़्वाहिशों की वजह से हलाल को हराम कर लेंगें, शराब को अंगूर व ख़ुर्मा का पानी कह कर और रिश्वत का नाम हदिया रख कर और सूद को ख़रीदो फ़रोख़्त क़रार दे कर जाइज़ समझ लेगें। फिर मैं ने कहा , “ या रसूलल्लाह! (स) मैं उन्हे इस मौक़े पर किस मर्तबे पर समझूँ ? ” इस मर्तबे पर कि वह मुर्तद हो गये हैं या इस मर्तबे पर कि वह फ़ितने में मुब्तेला (ग्रस्त) हैं ? तो आप ने फ़रमाया कि फ़ितने के मर्तबे पर ”।

इस हक़ीक़त से इन्कार नही किया जा सकता कि हज़रत आइशा का रवैया आमीरुल मोमिनीन (अ) से हमेशा मुआनिदाना (वैमनस्यतापूर्ण) रहा और अकसर उनके दिल की कुदूरत (ईष्या) उनके चेहरे पर खुल जाती और तर्ज़े अमल (प्रतिक्रिया) से नफ़रत व बेज़ारी (घर्णा एवं रोष) झलक उठती थी। यहाँ तक कि किसि वाक़िये के सिलसिले में हज़रत का नाम आ जाता तो उन की पेशानी पर बल पड़ जाता था, और उसका ज़बान पर लाना भी गवारा न करती थी। चुनांचे उबैदुल्लाह इब्ने अब्दुल्लाह ने हज़रत आइशा की उस रिवायत का कि पैग़म्बर (स) हालते मरज़ में फ़ज़्ल इब्ने अब्बास और एक दूसरे शख़्स का सहारा लेकर उनके यहा चले आए, हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास से ज़िक्र किया तो उन्हों ने फ़रमाया :