ख़ुत्बा-147
 



ख़ुत्बा-147



[मरने से पहले फ़रमाया]

ऐ लोगों! हर शख़्स उसी चाज़ का सामना करने वाला है जिस से वह राहे फ़रार (पलायन मार्ग) इख़तियार कर रहा है और जहां ज़िन्दगी का सफ़र ख़ींच कर ले जाता है वही हयात की मंज़िले मुन्तहा (जीवन की अंतिम सीमा) है। मौत से भगना उसे पा लेना है। मैं ने इस मौत के छिपे हुए (गुप्त) भेदों की जुस्कुजू (खोज) में कितना ही ज़माना गुज़रा, मगर मशीयते एज़दी (ईशवर की इच्छा) यही रही कि उस की तफ़सीलात (विवरण) बेनक़ाब न हों। उस की मंज़िल तक रसाई (पहुंच) कहां, वह तो एक पोशीदा इल्म (गुप्त ज्ञान) है। तो हां ! मेरी वसीयत यह है कि अल्लाह का कोई शरीक न ठहराओ, और मोहम्मद (स.) की सुन्नत को ज़ाए व बर्बाद (नष्ट) न करो। इन दोनों सुतूनों (स्तम्भों) को क़ायम व बर्क़रार (स्थापित व स्थिर) रखो और इन दोनों चीराग़ों को रौशन किये रहो (जलाये रहो)। जब तक मुन्तशिर व परागन्दा नहीं होते तुम में कोई बुराई नहीं आयेगी। तुम में से हर शख़्स (प्रत्येक व्यक्ति) अपनी वुस्अत (सामर्थ्य) भर बोझ उठाए. न जानने वालों का बोझ भी हल्का रखा गया है क्यों कि अल्लाह रहम करने वाला (दयालु), दीन सीधा (जिस में कोई उलझाओ नहीं) और पैग़म्बर आलिम व दाना (ज्ञानी व मसझदार) है। मैं कल तुम्हारा साथी था और आज तुम्हारे लिये सामाने इब्रत हुआ हूं, और कल तुम से छूट जाऊंगा। ख़ुदा मुझे और तुम्हें मग़फ़िरत अता करे (मुक्ति प्रदान करे)।

अगर इस फिसलने की जगह पर क़दम जमे रहे तो ख़ैर, और अगर क़दमों का जमाव उखड़ गया तो हम इन्हीं शाख़ों की छांव, हवा की गुज़रगाहों और छाए हुए अब्र (बादल) के सायों में थे। लेकिन उस के तह बतह जमे हुए लक्के छट गए और हवा के निशानात (चिन्ह) मिट मिटा गए। मैं तुम्हारा हमसाया (पड़ोसी) था, कि मेरा जिस्म (शरीर) चन्द दिन तुन्हारे पड़ोस में रहा, और मेरे मरने के बाद मुझे जसदे बे रुह (निर्जीव शरीर) पाओगे कि जो हरकत करने के बाद थम गया, और बोलने के बाद ख़ामोश (मौन) हो गया। ताकि मेरा यह सुकून व ठहराव और आख़ों का मुंद जाना और हाथ पैरों का बेहिसो हरकत (निराभासित एवं निर्गति) हो जाना तुम्हें पन्दो नसीहत (प्रवचन व उपदेश) करे। क्यों कि इब्रत हासिल (शिक्षा ग्रहण) करने वालों के लिये यह मंज़र (दृश्य) बलीग़ कलिमों (सार्थक वचनों) और कान में पड़ने वाली बोतों से ज़ियादा मौइज़त व इबरत (प्रवचन व उपदेश) दिलाने वाला होता है। मैं तुम से इस तरह रुख्सत (विदा) हो रहा हूं, जैसे कोई शख़्स किसी की मुलाक़ात (भेंट) के लिये चश्मबराह (मार्ग पर आंखें बिछाए) हो। कल तुम मेरे इस दौर (काल) को याद करोगे, और मेरी नीयतें ख़ुलकर तुम्हारे सामने आ जायेंगी, और मेरी जगह से ख़ाली (रिक्त) होने और दूसरों को इस मक़ाम (स्थान) पर आने से तुम्हें मेरी क़द्रो मंज़िलत की पहचान होगी।

अर्थात् मनुष्य मृत्यु से बचने के लिये जो हाथ पैर मारता है और उपाय करता है उस में जितना समय बीताता है वह जीवन काल ही है जो कम हो रहा है और ज्यों ज्यों समय गुज़रता है मृत्यु से आलिंगित है जाता है।

ताप्पर्य यह है कि जब यह सारी चीज़ें नष्ट हो जायेंगी तो उन में रहने वाले किस प्रकार मृत्यु से बच सकते हैं। निस्सन्दे उन्हें भी हर वस्तु की भांति एक दिन नष्ट होना है। अस्तु मेरा जिवन कलश छलक जोने पर आशचर्य ही क्या है।