ख़ुत्बा-140
 



ख़ुत्बा-140



जो शख़्स ग़ैर मुस्तहक़ (कुपात्र) के साथ हुस्ने सुलूक (सद व्यवहार) बरतता है, और ना अहलों (अयोग्यों) के साथ एह्सान करता है, उस के पल्ले यही पड़ता है कि कमीने और शरीर (दुष्ट) उस की मद्हो सना (प्रशंसा) करने लगते हैं, और जब तक वह देता गिलाता रहे जाहिल कहते रहते हैं कि इस की हाथ कितना सख़ी (दानी) है। हालांकि अल्लाह के मुआमले में वह बुख़्ल (कंजूसी) करता है। चाहिये तो यह कि अल्लाह ने जिसे माल दिया है वह उस से अज़ीज़ो (सम्बंधियों) के साथ अच्छा सुलूक (व्यवहार) करे। खुश उसलूबी (अच्छे ढंग) से मेह्मान नवाज़ी (अतिथि सत्कार) करे। क़ैदियों (बन्दियों) और ख़स्ताहाल (बुरे हाल) असीरों (गिरफ्तारों) को आज़ाद (स्वतंन्न) कराए। मोहताजों और क़र्ज़दारों को दे और सवाब कि ख्वाहिश (पुण्य की इच्छा) में हुक़ूक़ का अदायगी और मुख़्तलिफ़ ज़हमतों (विभिन्न कष्टों) को अपने नफ्स (प्राण) पर बर्दाश्त (सहन) करे। इसलिये कि इन ख़सायल (गुणों) व आदात (स्वभावों) से आरास्ता (सुसज्जित) होना दुनिया की बुज़ुर्गियों (प्रतिष्ठाओं) से शरफ़याब (सम्मानित) होना और आख़िरत (परलोक) की फ़ज़ीलतों (प्रतिष्ठाओं) को पा लेना है। इंशाअल्लाह (खुदा ने चाहा तो)।