ख़ुत्बा-135
 



ख़ुत्बा-135



[ तलहा व ज़ुबैर के बारे में इर्शाद फ़रमाया ]

ख़ुदा की क़सम ! उन्हों ने मुझ पर कोई सच्चा इल्ज़ाम (आरोप) नहीं लगाया, और न उन्हों ने मेरे औप अपने दरमियान (बीच) इन्साफ़ (न्याय) बरता। वह मुझ से उस हक़ का मुतालबा करते हैं जिसे ख़ुद ही उन्हों ने छोड़ दिया, और अब खून का एवज़ चाहते हैं, जिसे उन्हों ने खुद बहाया है। अब अगर मैं इस में उन का शरीक था, तो फिर इम में उन का भी तो हिस्सा निकलता है, औऱ अगर वही उस के मुर्तकिब (कर्त्ता) हुए हैं मैं नहीं, तो फिर उस का मुतालबा सिर्फ़ उन्हीं से होना चाहिये कि वह अपने खिलाफ़ हुक्म लगायें। और मेरे साथ साथ मेरी बसीरत (दर्शनशक्ति) की जलवा गरी (चमत्कार) है, न मैं ख़ुद जान बूझ कर कभी अपने को धोका दिया, और न मुझे वाक़ई (वास्तव में) कभी धोका हुआ। और बिला शुब्हा (निस्सन्देह) यही वह बाग़ी गुरोह है, जिस में एक हमारा सगा (ज़ुबैर) और एक बिच्छू का डंक (हुमैरा) है। और सियाह (काले) पर्रे डालने वाले शुब्हे (शंकायें) हैं। अब तो हक़ीक़ते हाल (वस्तु स्थिति) खुल कर सामने आ चुकी है और बातिल अपनी बुनियादों से हिल चुका है, और शर अंगेज़ी से उस की ज़बान बन्दी हो चुकी है। ख़ुदा की क़सम ! मैं उन के लिये एक ऐसा हौज़ छलकाऊंगा जिस का पानी निकालने वाला मैं हूं कि जिस से सेराब हो कर पलटना उन के बस में न होगा और न उस के बाद कोई गढ़ा खोद कर पानी पी सकेंगे।

[ इसी ख़ुत्बे का एक जुज़ (अंश) यह है ]

तुम इस तरह शौक़ो रग़बत, से, बैअत बैअत पुकारते हुए मेरी तरफ़ बढ़े जिस तरह नई बियाई हुई बच्चों वाली ऊंटनियां अपने बच्चों की तरफ़। मैं ने अपने हाथों को अपनी तरफ़ समेटा तो तुम ने उन्हें अपनी जानिब फैलाया। मैं ने अपने हाथों को तुम से छीनना चाहा, मगर तुम ने उन्हें खींचा। ख़ुदाया ! इन दोनों ने मेरे हुक़ूक़ को नज़र अन्दाज़ किया है, और मुझ पर ज़ुल्म ढ़ाया है, औऱ मेरी बैअत को तोड़ दिया है, और मेरे खिलाफ़ लोगों को उक्साया है, लिहाज़ा जो उन्हों ने गिरहें लगाई हैं, उन्हें खोल दे, और जो उन्हों ने बटा है उसे मज़्बूत न होने दे, और उन्हें उन की उम्मीदों और करतूतों का बुरा नतीजा दिखा। मैं ने जंग के छिड़ने से पहले उन्हें बाज़ रखना चाहा और लड़ाई से क़ब्ल (पहले) उन्हें ढील देता रहा। लेकिन उन्हों ने इस नेमत की क़द्र न की और आफ़ियत को ठुकरा दिया।