ख़ुत्बा-134
 



ख़ुत्बा-134



तुम ने मेरी बैअत अचानक (अकस्मात्) और बे सोचे समझे नही की थी, और न मेरा और तुम्हारा मुआमला यकसां (समान) है। मैं तुम्हें अल्लाह के लिये चाहता हूं, और तुम मुझे अपने शख्सी फ़वायद (व्यक्तिगत लाभों) के लिये चाहते हो। ऐ लोगों ! अपने नफ्सानी ख्वाहिशात (आत्मा की इच्छाओं) के मुक़ाबिले में मेरी इआनत (सहायता) करो। ख़ुदा की क़सम ! मैं मज़्लूम का उस के ज़ालिम से बदला लूंगा, और ज़ालिम की नाक में नकेल डाल कर उसे सर चश्मए हक़ (सत्य के मुख्य स्त्रोत) तक खींच कर ले जाऊंगा चाहे उसे यह नागवार ही क्यों न गुज़्रे।