ख़ुत्बा-132
 



ख़ुत्बा-132




[जब हज़रत उमर इब्ने ख़त्ताब ने ग़ज़वए रुम में शिर्कत के लिए हज़रत से मशविरा (परामर्श) लिया तो हज़रत ने फ़रमाया]

अल्लाह ने दीन (धर्म) वालों की तक़्वीयत (शक्ति) पहुंचाने और उन की ग़ैर मह्फ़ूज़ (असुरक्षित) जगहों को दुश्मन की नज़र से बचाए रखने का ज़िम्मा ले लिया है। वही ख़ुदा अब भी ज़िन्दा व बाक़ी है कि जिसने उस वक्त उन की ताईद व नुसरत (मसर्थन व सहायता) की थी जब वह इतने थोड़े थे कि दुश्मन से इन्तिक़ाम (बदला) नहीं ले सकते थे, और उन की हिफ़ाज़त (रक्षा) नहीं रख़ सकते थे। तुम अगर ख़ुद उन दुशमनों की तरफ़ बढ़े और उन से टकराए और किसी उफ़्ताद दूर के शहरों के पहले कोई ठिकाना न रहेगा, और न तुम्हारे बाद कोई ऐसी पलटने की जगह होगी कि उस की तरफ़ पलट पर आ सकें। तुम उन की तरफ़ (अपने बजाय) कोई तजरिबाकार (अनुभवी) आदमी भेजो और उस के साथ अच्छी कर्दगी वाले और ख़ैर ख़्वाही करने वाले लोगों को भेज दो। अगर अल्लाह ने ग़लबा (आधिपत्य) दे दिया, तो तुम यही चाहते हो, और अगर दूसरी सूरत (अन्यथा) शिकस्त (पराजय) हो गई, तो तुम लोगों के लिये एक मददगार और मुसलमानों के लिये पलटने का मक़ाम (स्थान) होगा।

अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के बारे में यह अजीब रविश (विचित्र शैली) इख्तियार की जाती है कि एक तरफ़ तो यह कहा जाता है कि आप उमूरे सियासत (राजनीति के सिद्धान्तों) से बेख़बर (अनभिज्ञ) और तरीक़े जहांबानी (शासन पद्धति) से नाआशना (अपरिचित) थे, कि जिस से ग़रज़ (तात्पर्य) यह होता है कि बनी उमैया के हवसे इक़तिदार (सत्ता की लालच) से पैदा की हुई शोरिशों (उपद्रवों) को आप की कमज़ोरिए सियासत (राजनीति से अनभिज्ञता) का नतीजा क़रार किया जाए। और दूसरी तरफ़ ख़ुलफ़ाए वक्त ने मम्लिकत के अहम मुआमलात और कुफ्फ़ार से मुहारिबात (युद्धों) के सिलसिले में जो मुख़्तलिफ़ मवाक़े (विभिन्न अवसरों) पर आप से मशविरे (परामर्श) लिये, उन्हें बड़ी अहम्मीयत (महत्व) दे कर उछाला जाता है। जिस से मक़सद (उद्देश्य) यह नहीं होता कि आप की सेहते फ़िक़्रो नज़र (स्वस्थ चिन्तन), इसाबते राय (सही परामर्श) और तह्रस बसीरत (दूरदर्शीता) को पेश किया जाए, बल्कि सिर्फ़ यह ग़रज़ होती है कि आप और ख़ुलफ़ा में इत्तिहाद (एकता) यगांगत और एकजेहती (भाईचारा एवं एकता) का मुज़ाहिरा (प्रदर्शन) किया जाए ताकि इधर तव्ज्जोह ही मबज़ूल न होने पाए कि आप किसी मर्हले पर उनसे मुतसादिम भी रहे हैं, और बाहम इखतिलाफ़ व मुनाक़िशात (परस्पर विरोध एवं कलह) भी रुनुमा (प्रकट) होते रहे हैं। चुनांचे तारीख़ी हक़ायक़ इस के शाहिद हैं कि आप उन के नज़रीयात (विचारधाराओं) से इख़तिलाफ़ (विरोध) करते थे और उन के हर इक़दाम (कार्यवाही) को दुरुस्त व सहीह न समझते थे। जैसा कि खुत्बए शिक़शिक़ीया में हर दौर (प्रत्येक काल) के बारे में वाशिगाफ़ लफ़्ज़ों (स्पष्ट शब्दों) में तबसिरा (टिप्पणी) करते हुए अपने इखतिलाफ़े राय (मतभेद) और ग़मो ग़ुस्से (दुख एवं आक्रोश) का इज़हार (प्रकट) फ़रमाया है। लेकिन इस इख़तिलाफ़ के मअनी यह नहीं हैं कि इसलामी व इजतिमाई मफ़ाद (सार्वजनिक हितों) के सिलसिले में सहीह रहनुमाई (सही मार्गदर्शन) न की जाय। फिर अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) की सीरत तो इतनी बलन्द थी कि किसी को यह खयाल भी नहीं हो सका कि आप किसी ऐसे मश्विरे से हपलू तेही करेंगे कि जिस से मफ़ादे आम्मा (जनहित) को नुक़सान पहुंचे। इसी लिये नज़रीयात के बावजूद आप से मश्विरे लिये जाते थे जिस से आप के किर्दार की अज़मत (चरित्र की श्रेष्ठता) और सेहते फ़िक्रो नज़र (स्वस्थ चिन्तन व दर्शन) पर रौशनी पड़ती है। और जिस तरह पैग़मबरे अकरम (स.) की सीरत का यह नुमायां जौहर है कि कुफ्फ़ारे क़ुरैश आप को दअवते नुबुव्वत में झुटलाने के बावजूद बेहतरीन अमानतदार समझते थे, और कभी आप की अमानत पर शुब्हा न कर सके बल्कि मुख़ालिफ़त के हंगामों में भी अपनी अमानतें बे खटके आप के सिपुर्द कर देते थे, और कभी यह वह्म (भ्रम) भी न करते थे कि उन की अमानतें खुर्द बुर्द हो जायेंगी। यूं ही अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) भी वुसूक़ और एतिमाद (दृढ़ता एवं विश्वास ) की उस सत्हे बलन्द (शिखर) पर समझे जाते थे कि दोस्त व दुशमन उनकी इसाबते राय (सहीह राय) पर एतिमाद (भरोसा) करते थे। तो जिस तरह पैग़मबर (स.) के तर्ज़े अमल (कार्य पद्धति) से उन के कमाले अमानतदारी का पता चलता है और उस से यह नतीजा निकाला जाता है, कि उन में और कुफ्फ़ार में यगांगत (भाईचारा) थी क्यों कि अमानत अपने मक़ाम पर है और कुफ़्रो इसलाम का टकराव अपने मक़ाम पर उसी तरह अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ख़ुल्फ़ा से इखतिलाफ़ (मतभेद) रखने के बावजूद उन की नज़रों में मुल्की व क़ौमी मफ़ाद के मुहाफ़िज़ और इसलाम की फ़लाह व बहबूद के निगरां समझे जाते थे। चुनांचे जहां नौई मफ़ाद (सार्वजनिक हित) का सवाल पैदा होता था आप से मशविरा लिया जाता था और आप शख़्सी अग़राज़ (व्यक्तिगत हितों) की सत्ह से बलन्द हो कर अपनी बे लाग राय का इज़हार फ़रमा देते थे और हदीसे नबवी “मुशीर अमीन होता है।” के पेशे नज़र कभी ग़ुलो ग़श गवारा न करते थे। चुनांचे जंगे फ़िलिस्तीन के मौक़े पर जब हज़रत उमर ने अपनी शिर्कत के बारे में उन से मशविरा लिया तो क़त्ए नज़र इस से कि आप की राय उन के जज़बात (भावनाओं) के मुवाफ़िक़ (अनुरूप) हो या मुख़ालिफ़ (प्रतिकूल) आप इसलाम की इज़्ज़तो बक़ा का लिहाज़ करते हुए उन्हें अपनी जगह पर ठहरे रहने का मशविरा देते हैं और महाज़े जंग (युद्ध के मोर्चे) पर ऐसे शख़्स को भेजने की राय देते हैं कि जो आज़मुदा कार (अनुभवी) और फ़ुनूने हर्बो ज़र्ब (रणनीतियों) में माहिर (निपुण) हो। क्यों कि ना तजरिबा कार (अनुभवहीन) आदमी के चले जाने से इस्लाम की कामरानी (विजय) के बजाय शिकस्तो हज़ीमत (पराजय व दुर्गत) के आसार (लक्षण) आप को नज़र आ रहे थे। इस लिये उन्हें रोक देने ही में इस्लामी मफ़ाद नज़र आया। चुनांचे इस का इज़हार इन लफ़्ज़ो में फ़रमाया है कि अगर तुम्हें मैदान छोड़ कर पलटना पड़े तो यह सिर्फ़ तुम्हारी शिकस्त (पराजय) न होगी बल्कि इस से मुसलमान बद दिल हो कर हौसला छोड़ बैठेंगे, और मैदाने जंग से रुगर्दां हो कर तितर बितर हो जायेंगे। क्यों कि रईसे लशकर (सेनापति) के मैदान छोड़ देने से लश्कर के क़दम जम न सकेंगे। और इदर मर्कज़ (केन्द्र) के खाली हो जाने की वजह से यह तवक़्क़ों (अपेक्षा) भी न की जा सकेगी कि अक़ब (पीछे) से मज़ीद (और भी) फ़ौजी कुमक आ जायेगी कि जिस से लड़ने भिड़ने वालों की ढारस बंधी रहे।

यह है वह मशविरा (परामर्श) जिसे बाहमी खाबित (परस्पर सम्पर्क) पर दलील (तर्क) बना कर पेश किया जाता है। हालांकि यह मशविरा सिर्फ़ इसलाम की सर बलन्दी और उस की इज़्ज़तो बक़ा के पेशे नज़र था जो आप को हर मफ़ाद से ज़ियादा अज़ीज़ थी और किसी शख़्से खास (व्यक्ति विशेष) की जान अज़ीज़ न थी कि जिस की बिना (आधार) पर उसे जंग में शिर्कत से रोका हो।