ज़रुरी मसाइल
 



रोज़ा



सवाल: वह लोग जो बग़ैर किसी शरई उज़्र के जान बूझ कर रोज़ा नही रखते उन का क्या हुक्म है?

जवाब:आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: ऐसे लोगों पर क़ज़ा के साथ कफ़्फ़ारा भी वाजिब है और वह कफ़्फ़ारा यह है दो महीने रोज़ा रखे जिन में से इकतीस दिन लगातार रोज़ा रखे और बाक़ी उनतीस दिन का रोज़ा फ़ासले के साथ रख सकता है या साठ फ़क़ीरों को खाना खिलाये या उन सब को एक मुद तआम दे यानी खाने की जगह हर फ़क़ीर को सात सौ पचास ग्राम गेंहू, रोटी या जौ या इस तरह की चीज़ें भी दे सकता है और अगर दूसरे साल के रमज़ानुल मुबारक तक क़ज़ा नही की तो ऐहतेयाते वाजिब की बेना पर हर रोज़ के बदले एक मुद तआम दे।

सवाल: अगर किसी को याद न रहे कि कितने रोज़े रमज़ान में छूटे हैं तो उस का क्या फ़रीज़ा है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: सबसे कम मिक़दार पर इकतेफ़ा कर सकता है यानी जितने रोज़े के छूटने का यक़ीन है उस की क़ज़ा की जाये और उस से ज़्यादा ज़रूरी नही है।

सवाल: माहे मुबारके रमज़ान में सफ़र की वजह से रोज़े छोड़ने वाला क्या क़ज़ा के साथ कफ़्फ़ारा भी देगा?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: सिर्फ़ रोज़े की क़ज़ा वाजिब है कफ़्फ़ारा नही है अलबत्ता अगर रोज़ों की क़ज़ा को आईन्दा साल रमज़ान तक न बजा लाये तो ताख़ीर की वजह से हर दिन के बदले एक मुद (750 ग्राम) तआम कफ्फ़ारे के तौर पर देगा।

सवाल: जो शख़्स ज़ोहर से पहले सफ़र पर जाना चाहता है उस के रोज़े का क्या हुक्म है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी: अगर ज़ोहर से पहले सफ़र करे तो ऐहतेयाते वाजिब की बेना पर उस का रोज़ा सही नही है लेकिन हद्दे तरख़्ख़ुस तक पहुचने से पहले कोई भी ऐसा काम नही कर सकता जो रोज़े को बातिल करता है।

आयतुल्लाह ख़ामेनई: अगर ज़ोहर से पहले सफ़र करे तो उस का रोज़ा सही नही है लेकिन हद्दे तरख़्ख़ुस तक पहुचने से पहले कोई भी ऐसा काम नही कर सकता जो रोज़े को बातिल करता है।

सवाल: नौ साल की लड़की के लिये रोज़ा रखना सख़्त होता है तो क्या वह कमज़ोरी, ना तवानी की वजह से रोज़ा छोड़ सकती है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: सिर्फ़ कमज़ोरी व ना तवानी की वजह से रोज़ा नही छोड़ सकती, हां अगर तकलीफ़ ना क़ाबिले बर्दाश्त हो तो रोज़ा छोड़ सकती है। (अलबत्ता उसकी क़ज़ा वाजिब है।)

सवाल: पढ़ाई और इम्तेहानात की वजह से कमज़ोरी व सुस्ती हो जाती है तो क्या रोज़ा छोड़ा जा सकता है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: कमज़ोरी और सुस्ती आम तौर पर हर रोज़ेदार को पेश आती है लिहाज़ा इस सूरत में रोज़ा नही छोड़ा जा सकता लेकिन अगर ना क़ाबिले बर्दाश्त कमज़ोरी हो तो रोज़ा छोड़ा जा सकता है। (अलबत्ता क़ज़ा वाजिब है।)

सवाल: अगर कोई रमज़ान में जान बूझ कर अपना रोज़ा इस्तिमना के ज़रिये बातिल करे तो उस का क्या हुक्म है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: इस्तिमना (जान बूझ कर मनी निकालना) हर सूरत में हराम है और रोज़े की हालत में ऐसा करने से क़ज़ा के अलावा कफ़्फ़ारा (ऐहतेयाते मुसतहब की बेना पर साठ रोज़े रखे और साठ मिसकीनों को खाना खिलाये) भी वाजिब है।

सवाल: किसी शख़्स को शक या यक़ीन हो कि अगर रोज़े की हालत में सो गया तो मनी ख़ारिज हो जायेगी तो उस के सोने का क्या हुक्म है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: सोने में कोई हरज नही है और अगर मनी ख़ारिज भी हो जाये तब भी रोज़ा सही है।

बीमारी में रोज़ा

सवाल: अगर डाक्टर ने रोज़ा रखने से मना किया हो लेकिन वह ख़ुद जानता हो कि रोज़ा उस के लिये नुक़सानदेह नही है तो क्या वह रोज़ा रख सकता है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: अगर जानता है कि रोज़ा उस के लिये ज़रर नही रखता तो रोज़ा रखना ज़रुरी है।

सवाल: अगर रोज़ा रखने की वजह से मरज़ देर में ठीक हो तो रोज़ा रख सकता है या नही?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: रोज़ा नही रख सकता।





वुज़ू



सवाल: क्या करते वक़्त कोई चीज़ खाने से वुज़ू बातिल हो जाता है?

जवाब: तमाम मराजे ए केराम: वुज़ू बातिल नही होता लेकिन बेहतर है कि वुज़ू करते वक़्त ऐसे कामों से परहेज़ किया जाये।

सवाल: क्या अब्दुल्लाह व हबीबुल्लाह जैसे नामों को बग़ैर वुज़ू के मस किया जा सकता है?

जवाब: आयततुल्लाह सीस्तानी: कोई हरज नही है लेकिन बेहतर है कि मस न करे।

आयतुल्लाह ख़ामेनई: अल्लाह के नाम को बग़ैर वुज़ू के मस करना जायज़ नही है चाहे किसी का नाम ही क्यों न हो।





नमाज़े जुमा



सवाल: क्या नमाज़े जुमा में सूर ए जुमा पढ़ना वाजिब है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: नही, वाजिब नही है बल्कि कोई दूसरा सूरह भी पढ़ा जा सकता है अगर चे मुसतहब है कि नमाज़े जुमा में सूर ए जुमा पढ़ा जाये।

सवाल: अगर एक इलाक़े में शरई फ़ासले से कम पर दो नमाज़े जुमा हो रही हों तो कौन सी नमाज़ सही है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी: अगर एक साथ शुरू हों तो दोनो बातिल हैं लेकिन अगर एक की तकबीर पहले हुई हो तो दूसरी बातिल है।

आयतुल्लाह ख़ामेनई: पहले शुरु होने वाली सही और दूसरी बातिल है।

सवाल: नमाज़े जुमा के लिये कम से कम कितने लोगों को होना शर्त है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी व ख़ामेनई: कम से कम पांच अफ़राद का होना ज़रूरी है।

सवाल: नमाज़े जुमा के ख़ुतबों के दरमियान बात करना कैसा है और अगर कोई ख़ुतबों के बाद नमाज़ में पहुचे तो नमाज़ का क्या हुक्म है?

जवाब: आयतुल्लाह सीस्तानी: नमाज़ सही है और ज़ोहर पढ़ने की ज़रुरत नही है लेकिन नमाज़ में हाज़िर होने की सूरत में ऐहतेयात की बेना पर ख़ुतबा सुनना वाजिब है।

आयतुल्लाह ख़ामेनई: नमाज़े जुमा, नमाज़े ज़ोहर से किफ़ायत करती है चाहे नमाज़ के ख़ुतबों के दरमियान बात की हो या ख़ुतबों में न पहुचा हो, लेकिन ख़ुतबों के दरमियान बात करने से अगर ख़ुतबे का फ़ायदा ख़त्म हो रहा हो तो जायज़ नही है।