किताब- नमाज़ के 114 नुक्ते
 





पाँचवा हिस्सा - नमाज़ के समाजी पहलू


66-नमाज़ और शहादतैन

हर नमाज़ की दूसरी रकत मे तशःहुद पढ़ा जाता है। जिसमे हम अल्लाह की वहदानियत (उसके एक होने) और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की रिसालत की गवाही देते हैं।

हर रोज़ इंसान पर वाजिब है कि वह पाँच मर्तबा अल्लाह की तौहीद व हज़रत मुहम्मद स. की रिसालत का इक़रार करे। और यह इस लिए है ताकि कि इंसान अपने रास्ते से न भटके और दीनो मकतब और उसके साहिब को न भूले। और मुहम्मद वा आलि मुहम्मद पर सलावात भेजे और इस अमल के ज़रिये अल्लाह और फ़रिशतों के साथ हो जाये।

क्योंकि क़ुरआन मे इरशाद होता है कि अल्लाह और फ़रिशते नबी पर सलवात भेजते हैं। जब अल्लाह और फ़रिश्ते नबी पर सलवात भेजते हैं तो फ़िर हम क्यों न भेजें। क्या उन्होने हमको निजात नही दी है? क्या आप नही देखते कि जिन लोगो ने अपने नबीयों को भुला दिया है वह किस तरह ग़फ़लत की खाई मे जा गिरे हैं।

सलाम हो पैगम्बरे अकरम और आप की आले पाक पर जिन्होने हमको निजात अता की।

67- पाबन्दी से नमाज़ पढ़ना इंसान को महफ़ूज़ रखता है

क़ुरआने करीम के सूरए मआरिज की 20 से 23 तक की आयात मे इरशाद होता है कि उन लोगों को छोड़ कर जो अपनी नमाज़ो को पाबन्दी के साथ पढ़ते हैं। दूसरे इंसान जब मुशकिल मे फसतें हैं तो बेसब्रे हो जातें हैं। और जब उनको खैर (नेअमतें) हासिल होता है तो वह कँजूस बन जाते हैं दूसरों को कुछ नही देते।

अल्लाह की बेइन्तिहा ताक़त के साथ हमेशा राबिता रखने से इंसान को ताक़त हासिल होती है। इससे इंसान का तवक्कुल का जज़बा बढ़ता है जिसके नतीजे मे इंसान को ऐसी ताक़त मिलती है कि फिर वह किसी भी हालत मे शिकस्त को क़बूल नही करता। जाहिर सी बात है कि यह सिफ़ात उन लोगों मे पैदा होते हैँ जो अपनी नमाज़ों को तवज्जुह के साथ पाबन्दी से पढ़ते हैं। मौसमी नमाज़ पढ़ने वाले लोगों इन सिफ़ात को हासिल नही कर पाते।



68- नमाज़ और सलाम

अल्लाह के नेक बंदों पर सलाम हो। हर मुसलमान चाहे वह ज़मीन के किसी भी हिस्से पर रहता हो उसे चाहिए कि दिन मे पाँच बार अपने हम फ़िक्र अफ़राद को सलाम करे। जैसे कि नमाज़ मे है अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस्सालिहीन।(हम पर सलाम हो और अल्लाह के तमाम नेक बंदों पर सलाम हो।)



यहाँ पर मालदारों को सलाम करने की तालीम नही दी गयी।
यहाँ पर हाकिमों और ताक़तवरों को सलाम करने की तालीम नही दी गयी।

यहाँ पर रिश्तेदारों को सलाम करने की तालीम नही दी गयी।

यहाँ पर हम ज़बान हम क़ौम हम वतन लोगों को सलाम करने की तालीम नही दी गयी।

बल्कि यहाँ पर है अल्लाह के नेक बंदों को सलाम करने की तालीम दी जा रही है। यहाँ पर मकतबे हक़ के तरफ़दारो को सलाम करने की तालीम दी जा रही है।

हमारी खारजी सियासत(बाह्य नीति) नमाज़ के दो जुम्लों ग़ैरिल मग़ज़ूबि अलैहिम वलज़्ज़ालीन और अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस्सालिहीन से तय होती है।

जो इंसान दिन मे पाँच बार अल्लाह के बंदो को सलाम करता हो वह कभी भी न उनको धोका दे सकता है और न ही उनके साथ मक्कारी कर सकता है।





69-नमाज़ और समाज

नमाज़ की अस्ल यह है कि उसको जमाअत के साथ पढ़ा जाये। और जब इंसान नमाज़े जमाअत मे होता है तो वह एक इंसान की हैसियत से इंसानो के बीच और इंसानों के साथ होता है। नमाज़ का एक इम्तियाज़ यह भी है कि नमाज़े जमाअत मे सब इंसान नस्ली, मुल्की, मालदारी व ग़रीबी के भेद भाव को मिटा कर काँधे से काँधा मिलाकर एक ही सफ़ मे खड़े होते हैं। नमाज़े जमाअत इमाम के बग़ैर नही हो सकती क्योंकि कोई भी समाज रहबर के बग़ैर नही रह सकता। इमामे जमाअत जैसे ही मस्जिद मे दाखिल होता है वह किसी खास गिरोह के लिए नही बल्कि सब इंसानों के लिए इमामे जमाअत है। इमामे जमाअत को चाहिए कि वह क़ुनूत मे सिर्फ़ अपने लिए ही दुआ न करे बल्कि तमाम इंसानों के लिए दुआ करे। इसी तरह समाज के रहबर को भी खुद ग़रज़ नही होना चाहिए। क्योंकि नमाज़े जमाअत मे किसी तरह का कोई भेद भाव नही होता ग़रीब,अमीर खूबसूरत, बद सूरत सब एक साथ मिल कर खड़े होते हैं। लिहाज़ा नमाज़े जमाअत को रिवाज देकर नमाज़ की तरह समाज से भी सब भेद भावों को दूर करना चाहिए। इमामे जमाअत का इंतिखाब लोगों की मर्ज़ी से होना चाहिए। लोगों की मर्ज़ी के खिलाफ़ किसी को इमामे जमाअत मुऐयन करना जायज़ नही है। अगर इमामे जमाअत से कोई ग़लती हो तो लोगों को चाहिए कि वह इमामे जमाअत को उससे आगाह करे। यानी इस्लामी निज़ाम के लिहाज़ से इमाम और मामूम दोनों को एक दूसरे का खयाल रखना चाहिए।

इमामे जमाअत को चाहिए कि वह बूढ़े से बूढ़े इंसान का ख्याल रखते हुए नमाज़ को तूल न दे। और यह जिम्मेदार लोगों के लिए भी एक सबक़ है कि वह समाज के तमाम तबक़ों का ध्यान रखते हुए कोई क़दम उठायें या मंसूबा बनाऐं। मामूमीन(इमाम जमाअत के पीछे नमाज़ पढ़ने वाले अफ़राद) को चाहिए कि वह कोई भी अमल इमाम से पहले अंजाम न दें। यह दूसरा सबक़ है जो अदब ऐहतिराम और नज़म को बाक़ी रखने की तरफ़ इशारा करता है। अगर इमामे जमाअत से कोई ऐसा बड़ा गुनाह हो जाये जिससे दूसरे इंसान बा खबर हो जायें तो इमामे जमाअत को चाहिए कि वह फ़ौरन इमामे जमाअत की ज़िम्मेदारी से अलग हो जाये। यह इस बात की तरफ़ इशारा है कि समाज की बाग डोर किसी फ़ासिक़ के हाथ मे नही होनी चाहिए। जिस तरह नमाज़ मे हम सब एक साथ ज़मीन पर सजदा करते हैं इसी तरह हमे समाज मे भी एक साथ घुल मिल कर रहना चाहिए।

इमामे जमाअत होना किसी खास इंसान का विरसा नही है। हर इंसान अपने इल्म तक़वे और महबूबियत की बिना पर इमामे जमाअत बन सकता है। क्योंकि जो इंसान भी कमालात मे आगे निकल गया वही समाज मे रहबर है।

इमामे जमाअत क़वानीन के दायरे मे इमाम है। इमामे जमाअत को यह हक़ नही है कि वह जो चाहे करे और जैसे चाहे नमाज़ पढ़ाये। रसूले अकरम ने एक पेश नमाज़ को जिसने नमाज़े जमाअत मे सूरए हम्द के बाद सूरए बक़रा की तिलावत की थी उसको तंबीह करते हुए फ़रमाया कि तुम लोगों की हालत का ध्यान क्यों नही रखते बड़े बड़े सूरेह पढ़कर लोगों को नमाज़ और जमाअत से भागने पर मजबूर करते हो।


70- नमाज़ और इत्तिलाते उमूमी(सामान्य ज्ञान)

आज की दुनिया मे बहुत से ऐसे इदारे हैं जो इत्तिलाते उमूमी हासिल करने के लिए इतनी बड़ी बड़ी रक़में खर्च करते हैं कि अगर आम इंसान इस रक़म के बारे मे सुने तो ज़हनी सरसाम मे मुबतिला हो जाये।

नमाज़े जमाअत का क़ियाम, वज़ू कर के अल्लाह के घर मे लोगों का एक बड़ी तादाद (संख्या) मे इबादत के लिए जमा होना, इस्लाम का एक ऐसा निज़ाम है जिसके ज़रिये इंसान को लोगों के खयालात, दुख दर्द, इंसानी समाज की परेशानियों, कमियों और दुश्मनों के दुष प्रचारों और उनसे होने वाले नुक़्सानात को रेकने के तरीक़ों, और ताज़ा खबरों पर आलिम व मुत्तक़ी इमामे जमाअत की ज़बान से तजज़िया वा तहलील सुन कर नयी जानकारी हासिल करने का मौक़ा मिलता है। इसी तरह नमाज़े जमाअत के ज़रिये नमाज़ मे शरीक होने वाले अफ़राद के हालात से आगाही हासिल करने, नमाज़े जमाअत मे शरीक होने वाले मरहूम लोगों के लिए इसाले सवाब करने, समाज के ग़रीब लोगों की मदद व भलाई के लिए क़दम उठाने, समाजिक मुश्किलात के हल के लिए मोमिनीन को आपस मे मिलकर अल्लाह से दुआ करने और मदद माँगने का मौक़ा मिलता है।

और इन तमाम मुक़द्दस कामों को किसी धूम धाम के बग़ैर बिल्कुल सादे तरीक़े से अंजाम दिया जा सकता है।

71- नमाज़ और रहबरी

दूसरे तमाम जलसों की तरह नमाज़े जमाअत के लिए भी एक रहबर (इमाम) की ज़रूरत है। इमामे जमाअत को चुनते वक़्त लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे इमामे जमाअत का चुनाव करे जिनमे इल्म तक़्वा अहलियत व क़ाब्लियत जैसे कमालात पाये जाते हों। और इससे समाज को इस बात की आदत पड़ेगी कि वह हर किसी की रहबरी को क़बूल नही करेगा। और क्योंकि इमामे जमाअत अल्लाह और बंदों के दरमियान वास्ता है। लिहाज़ा इंसान को चाहिए कि वह किसी फ़ासिक़ व फ़ाजिर को अपने और अल्लाह के बीच वास्ता न बनाए। जो इंसान खुद गुनाहों मे मुबतिला हों वह मुझे उस नमाज़ से किस तरह आगाह कर सकते हैं जो बुराईयों और हराम कमों से रोकती है। लिहाज़ा इमामे जमाअत के लिए ज़रूरी है कि वह एक आलिम, मुत्तक़ी, बाकमाल और आज़ाद इंसान हो।



ना हर रस्सी का सहारा लिया जा सकता है और ना हर सीढ़ी से ऊपर चढ़ा जा सकता है।
क्या हमारा इमाम हमारे और अल्लाह के दरमियान राबिता नही है ?
इमामे जमाअत का चुनाव इंसान को हर रोज़ हक़ीक़ी इमामत व रहबरी की तरफ़ मुतवज्जेह करता है। जब मस्जिद मे चंद लोगों की रहबरी के लिए कमालात का होना ज़रूरी है तो फिर पूरी उम्मत की रहबरी के लिए किसी इंसाने कामिल का होना ज़रूरी है। इसी लिए ताकीद की गयी है कि उस इंसान के पीछे नमाज़ पढ़ो जिसके ईमान और अदालत के बार मे इतमिनान हो।

अगर किसी इंसान को इमामे जमाअत बनाकर चंद लोग उस के पीछे नमाज़ पढ़ ले तो इस हालत मे इमामे जमाअत को चाहिए कि वह अपने चाल चलन का दूसरे लोगों से ज्यादा ध्यान रखे। जो शख्स अपने आपको दूसरों का इमाम बनाए उसको चाहिए कि दूसरों से पहले अपनी इस्लाह करे। इस तरह नमाज़े जमाअत के क़ाइम होने से बहुत से लोगों की इस्लाह होगी। और चूँकि मोज़्ज़िन के लिए खुश आवाज़ और इमामे जमाअत के लिए क़राअत से कामिल तौर पर आगाह होना ज़रूरी है। लिहाज़ा अगर नमाज़े जमाअत क़ाइम होगी तो समाज मे अच्छी आवाज़, क़राअत और इमामे जमाअत व मोज़्ज़िन की तरबियत का काम भी शुरू होगा।



72- नमाज़ और बेदारी

इस्लाम समाज मे मानवी (आध्यात्मिक) गर्मी पैदा करना चाहता है। नमाज़ के लिए जल्दी करो और अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ बढ़ो जैसे नारे इस लिए हैं कि अज़ान की मुक़द्दस आवाज़ को सुनने के बाद इस्लामी समाज मे एक खास गर्मी पैदा हो। लोग अपने कामों को छोड़े आपसी इख्तिलाफ़ात को भुला कर वहदत के बंधन मे बंध जायें। और इंसान ग़फ़लत से निकल कर यादे इलाही मे मशग़ूल हो जाये। हक़ीक़ी मोमिन वही है जिसके दिल मे अल्लाह की याद से लरज़ा पैदा हो जाये। जो इंसान अज़ान की आवाज़ सुनने के बाद भी लापरवा रहता है उसकी मिसाल उस बच्चे जैसी है जो अपने बाप की आवाज़ सुन कर भी लापरवाई बरतता है।



73- नमाज़ और नज़्म

नमाज़ के वक़्त का मुऐयन होना, नमाज़े जमाअत की सफ़ों का मुनज़्ज़म, एक साथ सजदा करना, एक साथ उठना बैठना, एक साथ दुआ करना,वक़्त से पहले नमाज़ न पढ़ना, नमाज़ को उसके मुऐयन वक़्त मे ही पढ़ना वग़ैरह नमाज़ की ऐसी बातें हैं जो नमाज़ी की ज़िंदगी को मुनज़्ज़म (व्यवस्थित) बना देती हैं।


74- नमाज़ और क़िबला

नमाज़ी को चाहिए कि वह क़िबले की तरफ़ रुख कर के खड़ा हो। उसे चाहिए कि हर दिन अपनी राह को रोशन करे। उसका क़िबला पाक व सादा होना चाहिए। उसका क़िबला वह होना चाहिए जो अल्लाह ने मुऐयन किया है। अपनी मर्ज़ी से बनाया हुआ या किसी ताग़ूती ताक़त का मुऐयन किया हुआ न हो। क्योंकि हर जगह व हर सिम्त मे क़िबला होने की सलाहियत नही है। क़िबला मुसलमानो की पहचान का ज़रिया है इसी वजह से मुसलमानों को अहले क़िबला ( क़िबले वाले) कहा जाता है। यह मुसलमानों को दूसरों से जुदा करता है। मुसलमान चाहे किसी भी नस्ल से हो वह चाहे किसी भी मकतबे फ़िक्र से ताल्लुक़ रखता हो उसकी जहतो सिम्त एक होनी चाहिए। अगर माल दौलत या मंसब किसी वक़त हमारे दिल को किसी दूसरी तरफ़ खीँच कर ले जाये तो हमे चाहिए कि नमाज़ के वक़्त अपने अपने दिल को हर तरफ़ से हटा कर अपनी राह व सिम्त को मुऐयन कर लें। क्योंकि जिस इंसान ने अपना रुख अल्लाह के घर की तरफ़ कर लिया वह अपने दिलो जान को भी साहिबे खाना (अल्लाह) की तरफ़ तवज्जुह के लिए तैय्यार करता है।

हमारा क़िबला खाना-ए-काबा है। यह ज़मीन का वह हिस्सा है जो सबसे पहले इस लिए बनाया गया कि इंसान यहाँ पर इबादत करें। यह वह घर हैं जिसका तमाम नबियों ने तवाफ़ (चक्कर लगाना) किया। यह वह घर है जिसके स्तूनों को जनाबे इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे जनाबे इस्माईल अलैहिस्सलाम की मदद से बलंद किया। इस घर के तमाम दरवाज़े हमेशा सब के लिए खुले रहने चाहिए। यहां पर कोई भी किसी को रोकने का हक़ नही रखता। यह घर तमाम लोगों के लिए मुक़द्दस है। लिहाज़ा इसमे आने जाने की तमाम लोगों को आज़ादी होनी चाहिए चाहे वह किसी भी मुल्क का रहने वाला हो।


75-नमाज़ और सफ़ाई

नमाज़ी के लिबास और बदन का पाक होना ज़रूरी है। अगर निजासत का एक ज़र्रा भी उसके लिबास या जिस्म पर मौजूद हो तो(कुछ खास हालतों को छोड़ कर) नमाज़ बातिल है। जो नमाज़ी यह जानता है कि अगर नमाज़ पढ़ने से पहले मिस्वाक कर ली जाये तो नमाज़ की हर रकत का सवाब सत्तर रकत के बराबर हो जाता है तो वह कभी भी नमाज़ से पहले मिस्वाक करना नही भूलता। जो नमाज़ी यह जानता है कि जनाबत की हालत मे नमाज़ बातिल है। तो वह नमाज़ से पहले ग़ुस्ल की फ़िक्र करता है। और ग़ुस्ल की फ़िक्र उसको हमाम बनाने की तरफ़ मुतवज्जेह करती है। और हमाम का बन जाना उसके ज़्यादा पाक साफ़ रहने का ज़रिया बनता है।

यह जो नमाज़ीयो से कहा जाता है कि वज़ू के लिए सिर्फ़ 750 मिली लीटर तक पानी इस्तेमाल करो इससे ज़्यादा इसराफ़ है। वह यह समझता है कि वज़ू का पानी एक बार इस्तेमाल होना चाहिए वरना होज़ या किसी बड़े बरतन से वज़ू करने मे इतना पानी सर्फ़ नही होता। इससे इस बात की तरफ़ भी तवज्जुह हो जाती है कि किसी को भी यह हक़ नही है कि वज़ू या ग़ुस्ल के बहाने मुऐयन मिक़दार से ज़्यादा पानी बहाये।


76- नमाज़ और वक़्फ़

नमाज़ की वजह से समाज मे मस्जिद बनाने, मस्जिद बनाने के लिए माली मदद करने, वक़्फ़ करने, और हुनरे मेमारी (बन्नाई) जैसी फ़िक्रे पैदा होती हैं। तारीखे इंसानियत मे लाखो बिघे ज़मीन, दुकाने और दिगर अमवाल (सम्पत्ति) मस्जिदों के लिए वक़्फ़ हुए हैं। यह अल्लाह की राह मे एक ऐसा दाइमी सदक़ा और समाज़ी खिदमत है जो सिर्फ़ नमाज़ और मस्जिद के ज़रिये लोगों को हासिल होता है।

इसके अलावा वक़्फ़ दौलत के तआदुल (समन्वय) मे भी अहम किरदार अदा करता है। वक़्फ़ एक ऐसा चिराग़ है जो इंसान की आखेरत को रौशन करता है। वक़्फ़ के ज़रिये इंसान वह मालकियत हासिल कर लेता है जो उसके मरने के बाद भी बाक़ी रहती है। वक़्फ़ अपनी क़ौम और मस्लक से मुहब्बत की निशानी है।


77- नमाज़ और दोस्त का इन्तिखाब

इंसान को अपनी समाजी ज़िंदगी मे दोस्त की ज़रूरत है। यह बात किसी से छुपी हुई नही है कि इंसान पर दोस्ती के अच्छे और बुरे असरात ज़रूर पड़ते हैं। और मस्जिद अच्छे दोस्त तलाश करने का बेहतरीन मरकज़ (केन्द्र) है। क्योंकि इंसान मस्जिद मे अल्लाह की इबादत के लिए जाते हैं लिहाज़ा छल कपट, धोके दड़ी और खुद नुमाई (अपने व्यक्तित्व का प्रदर्शन) को त्याग कर मस्जिद मे जाते हैं। इंसान को चाहिए कि इन नमाज़ियों मे से अपने लिए एक अच्छे दोस्त का इन्तिखाब करे। अगर एक इंसान नमाज़ी नही है तो हम उससे क्यों दोस्ती करें ? जो अल्लाह के साथ दोस्ती का रिशता न बना सका वह हमारा दोस्त किस तरह बन सकता है। जो अल्लाह की मेहरबानियों को भूल गया वह मेरे नेक सुलूक को किस तरह याद रखेगा। जिसने मोमेनीन के साथ वफ़ादारी न की हो उसके बारे मे आपको कैसे यक़ीन है कि वह आप से वफ़ादारी करेगा ?

हदीस मे है कि नमाज़ और मस्जिद की एक बरकत यह भी है कि इनके ज़रिये अच्छे दोस्त मिलते हैं।



78-नमाज़ और शरीके हयात (जीवन साथी) का इन्तिखाब

इस्लाम मे इस बात की ताकीद की गई है कि अगर कोई इंसान मस्जिद मे नही जाता और जमाअत से नमाज़ नही पढ़ता या उज़्रे शरई() के बगैर इबादत और इत्तेहादे उम्मत को नज़र अंदाज़ करता है। तो ऐसे इंसान का बाय काट करना चाहिए और एक अच्छे शरीके हयात की शक्ल मे उसका चुनाव नही करना चाहिए। अगर सिर्फ़ इसी ताकीद पर अमल कर लिया जाये तो मस्जिदें नमाज़ियों से भर जायेंगीं। क्योंकि जब जवान यह समझ जायेंगें कि मस्जिद और मुस्लेमीन को छोड़ने पर उनको समाज मे जुदागाना ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ेगी तो वह कभी भी मस्जिद को फ़रामोश नही करेंगें।



79- नमाज़ और आपसी इमदाद


नमाज़ की एक बरकत यह भी है कि मस्जिदों मे लोग एक दूसरे की मदद करते हैं। समाज के ग़रीब लोग मस्जिदों मे जाते हैं और अपनी मुश्किलात को लोगों से कहते हैं। और इस मुक़द्दस मकान मे उनकी मुश्किलें हल होती हैं। यह काम रसूले अकरम (स.) के ज़माने से समाज मे राइज (प्रचलित) है। क़ुरआने करीम ने भी इस चीज़ को नक़्ल किया है कि एक फ़क़ीर मस्जिद मे दाखिल हुआ और लोगों से मदद की गुहार की। लेकिन जब किसी ने उसकी तरफ़ तवज्जुह न दी तो उसने रो-रो कर अल्लाह की बारगाह मे फ़रियाद की। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नमाज़ पढ़ रहे थे उन्होने उसको इशारा किया वह आगे आया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने रुकु की हालत मे अपनी अंगूठी उस फ़क़ीर को अता की। इसी मौक़े पर क़ुरआन की यह आयत नाज़िल हुई कि “तुम लोगों का वली अल्लाह उसका रसूल और वह लोग हैं जो नमाज़ को क़ाइम करते हैं और रुकु की हालत मे ज़कात देते हैं।”जब लोगों ने इस आयत को सुना दौड़ते हुए मस्जिद मे आये कि देखें यह आयत किस की शान मे नाज़िल हुई है। वहाँ पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम को देख कर समझ गये कि यह आयत इन्ही की शान मे नाज़िल हुई है।

बहरहाल नमाज़ की बरकत से हमेशा मस्जिदों से महाज़े जंग और ग़रीब फ़क़ीर लोगों की मदद होती रही है और आइंदा भी होती रहेगी। मस्जिदों से ही मुसलमान महाज़े जंग पर गये हैं। ईरान का इस्लामी इंक़िलाब भी मस्जिदों से ही शुरू हुआ था।

लोगों के मस्जिदों मे जमा होने की वजह से हासिल होने वाली बरकतों को चन्द लाईने लिख कर पूरी तरह समझाना मुंमकिन नही है।
क़ुरआन मे कई बार नमाज़ और इंफ़ाक़, नमाज़ और ज़कात, नमाज़ और क़ुर्बानी का एक साथ ज़िक्र किया गया है। और हदीस मे भी आया है कि “ज़कात ना देने वाले की नमाज़ क़बूल नही है।”


80- नमाज़ और हलाल माल

नमाज़ी के लिए ज़रूरी है कि उसका लिबास, नमाज़ पढ़ने की जगह, वज़ू और ग़ुस्ल मे इस्तेमाल होने वाला पानी इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ (अनुसार) हासिल किया गया हो। यानी ये सब चीज़ें हलाल हों। अगर वज़ू या ग़ुस्ल मे इस्तेमाल होने वाले पानी एक क़तरा भी हराम तरीक़े से हासिल किया गया हो या नमाज़ी के लिबास का एक बटन या धागा भी ग़सबी हो तो नमाज़ बातिल है। दिलचस्प बात यह है कि अगर हम यह चाहते हैं कि हमारी दुआ और नमाज़ क़बूल हो तो हमे हलाल ग़िजा खानी चाहिए।

जिस तरह हवाई जहाज़ को उड़ने के लिए मखसूस पैट्रोल की ज़रूरत है। इसी तरह इंसान को मानवी (आध्यात्मिक) उड़ान के लिए हलाल गिज़ा की ज़रूरत है।


81- नमाज़ और बराबरी व यकजहती


नमाज़ मे जिस तरह दिल और ज़बान हमाहंग रहते हैं इसी तरह पेशानी और पैर के अंगूठे आपस मे हमाहंग रहते हैं। दोनों के लिए ज़रूरी है कि सजदा करते वक़्त दोनों खाक़ पर हों।


नमाज़ में औरत और मर्द सभी शिरकत करते हैं। और औरतों को छोड़ कर सभी लोग छोटे हों या बड़े, ग़ुलाम हों या आज़ाद, फ़क़ीर हों या मालदार सब एक सफ़ मे खड़े होते हैं। और यह ईमान की बुनियाद पर इत्तेहाद और बराबरी की एक प्रैक्टिकली नुमाइश है। नमाज़े जमाअत इंसानों में इंसानों के साथ रहने की आदत पैदा कराती है।

नमाज़ के ज़रिये कई क़िसमों की यकजहती व बराबरी वजूद मे आती है। मसलन लोगों की यकजहती, पेशों की यकजहती, रंगों की यकजहती, नस्लों की यकजहती, हुनर और पेशों की यकजहती वग़ैरह वग़ैरह। यानी नमाज़े जमाअत एक बड़े और मानवी मक़सद के लिए मुक़द्दस जगह पर हर रोज़ होने वाला एक सादा मगर अज़ीम (महान) इजतेमा (सम्मेलन) है। और इस इजतेमा की खासियत यह है कि यह बग़ैर कुछ खर्च किये मुंअक़िद (आयोजित) होता है।



82- नमाज़ और इन्तिज़ाम


अगर कभी नमाज़ पढ़ते वक़्त इमामे जमाअत के सामने कोई ऐसी मजबूरी आ जाये कि वह नमाज़ को पूरा न सके तो उनके पीछे खड़े लोगों मे जो ज़्यादा नज़दीक होता है वह नमाज़ की इमामत की ज़िम्मेदारी अपने काँधोँ पर ले लेता है। और यह इस बात की तरफ़ इशारा है कि इस्लामी प्रोग्राम किसी एक इंसान के चले जाने से दरहम बरहम नही होने चाहिए। बल्कि ऐसा इन्तिज़ाम होना चाहिए कि अगर एक इंसान बीच से चला जाये तो निज़ाम(व्यवस्था) पर कोई असर न पड़े। यानी अहम (महत्वपूर्ण) बात मक़सद को मज़बूती अता करना है चाहे पेशवा अपनी ज़ाती मजबूरीयों की वजह से बदलते रहें।



83- नमाज़ और अवामी निगरानी


अगर इमाम जमाअत या मोमेनीन मे से कोई नमाज़ की रकतों के बारे मे शक करे तो एक दूसरे की मदद से अपने शक को दूर कर सकते हैं।

मसलन अगर इमामे जमाअत को शक हो कि तीन रकत पढ़ी हैं या चार, तो अगर वह देखे कि लोग सजदे के बाद खड़े हो गये हैं तो इमामे जमाअत को चाहिए कि वह भी खड़ा हो जाये। और शक वाली रकत को तीसरी ही रकत तस्लीम करे।

नमाज़े जमाअत की बरकतों मे से एक यह भी है कि आपसी शको शुबहात दूर हो जाते हैं, एक दूसरे पर इत्मिनान बढ़ता है। इससे यह सबक़ भी हासिल होता है कि शक व शुबहे की हालत मे साहिबे ईमान अवाम की तरफ़ भी रुजुअ करना चाहिए और इमाम और मामूम (पीछे रहने वाले) दोनो को एक दूसरे का ध्यान रखना चाहिए।



84- नमाज़ और मुहब्बत


जो मुहब्बत मस्जिद के नमाज़ीयो के दरमियान पायी जाती है ऐसी मुहब्बत किसी दूसरी जगह पर देखने को नही मिलती। मस्जिद के नमाज़ियों का मिज़ाज यह बन जाता है कि अगर एक नमाज़ी दो तीन दिन न आये तो आपस मे एक दूसरे से उसके बारे मे पूछने लगते हैं। और अगर वह मरीज़ होता है तो उसकी अयादत के लिए जाते हैं। अगर वह किसी मुश्किल मे घिरा होता है तो उसकी मुश्किल को हल करते हैं। लिहाज़ा मस्जिद के नमाज़ियों को तन्हाई का ऐहसास नही होता। अगर किसी के कोई भाई या बेटा न हो और वह नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद मे जाता हो तो उसको ऐसा लगने लगता है कि सब उसके भाई बेटे हैं।

अकसर देखा गया है कि जब कोई नमाज़ी इस दुनिया से जाता है तो उसके जनाज़े मे एक बड़ी तादाद मे लोग शिरकत करते हैँ और इज़्ज़तो एहतिराम के साथ उसको दफ़्न करते है। उसके लिए जो मजलिसें की जाती हैं उनमे भी रोनक़ होती है। यह सब उस दिली मुहब्बत की निशानी है जो मस्जिद के नमाज़ियों मे आपस मे पैदा हो जाती है।

अगर कोई नमाज़ी हज करके आये या उसके यहाँ बेटे या बेटी की शादी हो तो वह इन मौक़ों पर अपने दिल मे मुहब्बत की एक खास गर्मी महसूस करता है। वह अपनी खुशी व ग़मी मे लोगों को अपना शरीक पाता है। नमाज़ियों के दरमियान पायी जाने वाली इस मुहब्बत का किसी दूसरी चीज़ से मुक़ाबला नही किया जा सकता।



85- नमाज़ व इज़्ज़त


कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने महल्ले मे कभी कोई ग़लत काम नही करते क्योंकि लोग उनको और उनके रिश्तेदारों को पहचानते हैं। लेकिन अगर यही लोग किसी ऐसी जगह पर पहुँच जाये जहाँ पर इनको कोई न पहचानता हो तो वही ग़लत काम अंजाम देना उनके लिए मुश्किल नही होता। नमाज़ मे शिरकत करने से इंसान मस्जिद, इस्लाम और लोगों से वाबस्ता हो जाता है। और इंसान ऐसा मुत्तक़ी बन जाता है कि हत्तल इमकान (यथावश) ग़लतीयों से बचता है। क्योंकि वह जानता है कि एक छोटी सी ग़लती की वजह से भी उसकी इज़्ज़त व आबरू खाक मे मिल सकती है।

लेकिन वह लोग जो मस्जिद इस्लाम और अवाम से दूर रहते हैं उनके लिए ग़लत काम अंजाम देना कोई मुश्किल काम नही है। क्योंकि वह लोगों के दरमियान मज़हबी हवाले से कोई पहचान या मक़ाम ही नही रखते जिसके लुट जाने का उन्हें खौफ़ हो।



86- नमाज़ समाज की इस्लाह (सुधार) करती है


अल्लाह ने नमाज़ के क़ाइम करने के हुक्म के साथ साथ फ़रमाया है कि हम इस्लाह चाहने वालों के बदले को ज़ाय (बर्बाद) नही करेगें। इससे माअलूम होता है कि अगर नमाज़ की ज़ाहिरी और बातिनी तमाम शर्तों का लिहाज़ रखा जाये और नमाज़ को सही तरीक़े से क़ाइम किया जाये तो समाज की इस्लाह होगी।

नमाज़ी हक़ीक़त मे एक मुस्लेह (सुधारक) इंसान है। इबादत कोने मे बैठ कर नही बल्कि समाज की इस्लाह के साथ करनी चाहिए। नमाज़ियों को चाहिए कि समाज से तमाम बुराईयों को दूर करें।



87- नमाज़ और सियासत


बहुतसी रिवायात मे मिलता है कि अगर इंसान तमाम उम्र मुक़द्दस शहर मक्के मे रहकर खाना-ए-काबे मे नमाज़ें पढ़े लेकिन अल्लाह की तरफ़ से भेजे हुए इमामों को ना माने तो उसकी नमाज़ क़बूल नही होगी।

आज के मुस्लमानो की मुश्किल यही है कि वह नमाज़ तो पढ़ते हैं मगर उनके इमाम डरपोक दूसरों से वाबस्ता और उनके ही बनाए हुए हैं। उन्होने इक़्तेदार पर क़ब्ज़ा कर लिया है जबकि उनमे इलाही नुमाइंदों की कोई निशानी नही पायी जाती। वह ज़बान से तो कहते हैं कि ऐ अल्लाह हमको सिराते मुस्तक़ीम की हिदात कर मगर अमली (प्रैक्टिकली) तौर पर वह दूसरी राहों पर चलते हैं।



88- नमाज़ और मशवरत


क़ुरआने करीम के सूरए शूरा मे मोमेनीन के सिफ़ात ब्यान करते हुए इरशाद होता है कि उनके काम मशवरों की बुनियाद पर होते हैं और वह नमाज़ को क़ाइम करते हैं।

इस आयत से मालूम होता है कि जो लोग मशवरा कमैटी मे हैं चाहे वह किसी भी शोबे (विभाग) से हों उनको नमाज़ क़ाइम करने की ज़िम्मे दारी की तरफ़ भी मुतवज्जेह होना चाहिए। अगर आपस मे मशवरा करना मुहिम (महत्वपूर्ण)है तो नमाज़ इस मशवरे से भी ज़्यादा मुहिम है। जहाँ मशवरा कमैटी के मेम्बरों के चुनाव के लिए वोट बक्सों को भरने के लिए बड़ी बड़ी रक़मे खर्च की जाती हैं वहाँ मस्जिदो को भरने के लिए भी थोड़ी बहुत कोशिश ज़रूर करनी चाहिए।



89- नमाज़े जमाअत मुसल्लह दुशमनों के सामने


हम क़ुरआने करीम के सूरए निसा की आयत न.102 में पढ़ते हैं कि ऐ रसूल जब तुम लोगों के दरमियान हो तो नमाज़ क़ाइम करो। लेकिन जब तुम्हारे सामने मुसल्लह दुश्मन हो तो पहली सूरत तो यह है कि सब लोग आपकी इक़्तदा न करें (यानी कुछ लोग आपके पीछे नमाज़ पढ़े और बाक़ी दुश्मन से हिफ़ाज़त करें) और दूसरी सूरत यह है कि जो लोग आपकी इक़्तेदा करें उनको चाहिए कि अपने हथियारों के साथ आपकी इक़्तेदा करें। और आपसी भेद भाव को रोकने के लिए यह होना चाहिए कि पहली रकत मे एक दस्ता आपकी इक़्तेदा करे और दूसरी रकत जल्दी से जुदागाना पढ़ कर नमाज़ को तमाम कर के हिफ़ाज़त कर रहे दस्ते की जगह पहुँच जाये। ताकि हिफ़ाज़त करने वाला दस्ता नमाज़ की दूसरी रकत मे आपकी इक़्तेदा करे। ताकि जमाअत भी न छुटे और दुमन की तरफ़ से ग़फ़लत भी न रहे। और इस्लामी सिपाहियों के बीच भेद भाव भी पैदा न होने पाये। मुसलमानों को चाहिए कि अपनी जगह बदलते वक़्त इतनी तेज़ी करें कि दूसरी रकत मे शरीक हो जायें।

इससे ज़ाहिर होता है कि सिपाहियों का पहले से बावज़ू होना और जंग की हालत मे नमाज़ के मसाइल से आगाह होना ज़रूरी है।

इस आयत का मफ़हूम फ़िल्मी कहानी मे बदलने के क़ाबिल है। क्योंकि यह दिलचस्प भी है और जंग की हालत मे इबादत के तरीक़े को भी ब्यान करता है। इसमे नमाज़े जमाअत की अहमियत, काम की फुर्ती, अदालत, भेद भाव का खात्मा, अल्लाह की तरफ़ तवज्जुह और दुशमन से ग़ाफ़िल न होना सभी कुछ तो ब्यान किया गया है।



90-मस्जिद मे माल और औलाद के साथ जाना चाहिए


क़ुरआने करीम के सूरए कहफ़ की 46वी आयत में इरशाद होता है कि माल और औलाद दुनिया की ज़ीनत है।

और सूरए आराफ़ की 31वी आयत मे इरशाद होता है कि जब भी मस्जिद मे जाओ तो ज़ीनत के साथ जाओ। यानी अपनी औलाद को भी मस्जिद से आशना करो और थोड़ा माल भी अपने साथ ले कर जाओ। ताकि अगर वहाँ पर कोई फ़क़ीर हो तो उसकी मदद कर सको।(अलबत्ता मस्जिद मे ज़ीनत से मुराद अच्छा और साफ़ लिबास, खुशबु, आराम सुकून, अच्छे इमामे जमाअत का चुनाव वग़ैरह भी हो सकते हैं)



91-नमाज़ इस्लामी भाई चारे के लिए शर्त है


क़ुरआने करीम के सूरए तौबा मे अल्लाह कुफ़्फ़ार और मुशरेकीन का तअर्रुफ़ करा कर और उनकी साज़िशों व बुरे इरादों से आगाह करने के बाद फ़रमाता है कि लेकिन अगर वह तौबा करें नमाज़ पढ़ने लगें और अपने माल की ज़कात दें तो वह आपके दीनी भाई हैं। इस आयत मे दीनी भाई बनने के लिए एक शर्त इक़ाम-ए-नमाज़ को भी रखा गया है।



92- कुफ़्फ़ार आपकी नमाज़ से खुश नही हैं


तफ़सीरे नमूना में सूरए मायदा की 58 वी आयत के तहत लिखा गया है कि तमाम यहूदी और कुछ ईसाइ जब अज़ान की आवाज़ सुनते थे या मुसलमानों को नमाज़ मे खड़ा देखते थे तो उनका मज़ाक़ उड़ाते थे। इसी लिए क़ुरआन ने उनके साथ दोस्ती से मना किया है।



93- नमाज़ का मज़ाक़ बनाना पूरे दीन का मज़ाक़ बनाना है


रिफ़ाह और सवीद नाम के दो मुशरेकीन ने पहले इस्लाम क़बूल किया और बाद मे मुनाफ़ेक़ीन के साथ हो गये। कुछ मुसलमान उनके पास आने जाने लगे तो सूरए मायदा की 57 और 58वी आयतें नाज़िल हुई कि ऐ मोमेनीन जो तुम्हारे दीन का मज़ाक़ उड़ाये उनसे दोस्ती न करो। क्योंकि जब तुम अज़ान देते हो तो वह मज़ाक़ बनाते हैं। आपस मे मिली हुई इन दो आयतों मे पहले फ़रमाया गया कि वह तुम्हारे दीन का मज़ाक़ बनाते हैं। बाद मे कहा गया कि अज़ान का मज़ाक़ उड़ाते हैं। इससे मालूम होता है कि नमाज़ दीन का निचौड़

नमाज़ का मज़ाक़ बनाने वालों से दोस्ती करने का किसी भी मुसलमान को हक़ नही है लिहाज़ा न उनसे दोस्ती की जाये और न ही उन से किसी क़िस्म का रबिता रखा जाये।



94- बेनमाज़ीयों से मुहब्बत न करो


सूरए इब्राहीम की 37 वी आयत मे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ इस तरह ब्यान की गयी है कि उन्होंनें कहा कि ऐ पालने वाले मैंने अपनी ज़ुर्रियत (संतान) को इस सूखे पहाड़ी इलाक़े मे इस लिए बसाया कि वह नमाज़ क़ाइम करें। बस तू भी लोगों के दिलों मे इनकी मुहब्बत डाल दे।

जो लोग नमाज़ क़ाइम करने के लिए किसी भी जगह का सफ़र करें और इस सिलसिले मे हर तरह की सख्तियाँ बर्दाश्त करें तो शुक्र करने वाला अल्लाह उनका शुक्रिया अदा करता है। और लोगों के दिलों मे उनकी मुहब्बत डाल देता है।

लेकिन जो लोग नमाज़ क़ाइम करने के लिए कोई क़दम नही उठाते चाहे वह जनाबे इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलाद से ही क्यों न हो इस बात का हक़ नही रखते कि लोग उनसे मुहब्बत करे।


95- नमाज के अलावा किसी भी अमल के लिए इतनी तारीखी गवाहीयाँ नही है


खुद रसूले अकरम (स.), आइम्माए मासूमीन अलैहिमुस्सलाम, असहाब, मोमेनीन व मुस्लेमीन ने मिनारों की बलंदियों, मकानों की छतों, मदरसों, रेडियो और टेलीवीज़नों से गाँवों और शहरों मे चाहे वह किसी भी क़ार्रे(द्वीपों) के रहने वाले हों वह चाहे औरत हो मर्द, बच्चे हों या बूढ़े अज़ाने कहीँ हैं। और जिन्होने भी इंसानी तारीख मे अज़ान और इक़ामत कही है उन्होने इस बात की गवाही दी है कि नमाज़ सबसे अच्छा अमल है। सबने गवाही दी है कि नमाज़ कामयाबी है। दुनिया मे कभी भी किसी भी अच्छे काम के लिए इतने लोगों ने गवाहियाँ नही दी हैं।



96- घरों के नक़्शे और नमाज़


शहरो को बसाने और घरों को बनाने के लिए नक़्शे बनाते वक़्त नमाज़ और क़िबले के मसाइल को भी ध्यान में रखना चाहिए। क्योंकि सूरए युनुस की आयत न.87 मे इरशाद होता है कि अपने घरों को क़िबला क़रार दो और नमाज़ को क़ाइम करो। (क़िबला क़रार दो यानी क़िबला रुख बनाओ)

हमने मूसा व हारून से कहा कि बनी इस्राईल के रहने की मुश्किलात को दूर करो। अपनी क़ौम के रहने के लिए घर बनाओ और उनको बिखराओ व दरबदरी से बचाओ। घर का मालिक बनने के बाद उनके अन्दर वतन और हिफ़ाज़ते वतन का जज़बा पैदा होगा। लेकिन ध्यान रहे कि शहर बसाते वक़्त अपने घरों को क़िबला क़रार दो ताकि नमाज़ के क़ाइम करने मे कोई परेशानी न हो।

ईरान के वह शहर जिनकी नक़्क़ाशी शेख बहाई ने की हैं उनमे सड़कों और गलियों को इस तरह बनाया गया है कि वह सीधी क़िबले की सिम्त हैं। (क़िबले के दूसरे मअना भी हैं मगर नमाज़ के हुक्म को ध्यान मे रखते हुए यही माना सबसे अच्छे हैं।



97- अल्लाह के नुमाइंदे नमाज़ीयों का किसी से सौदा नही करते


48-नमाज़ और तालीम

क़ुरैश के कुछ बड़े लोगों ने रसूले अकरम (स.) से कहा कि अगर तुम अपने पास से अपने ग़रीब सहबियों को भगा दो तो हम आपके पास बैठने लगेगें। फ़ौरन आयत नाज़िल हुई कि ऐ पैगम्बर उन्हीं लोगों के साथ रहो जो सुबह शाम अल्लाह के नाम का जाप करते हैं। मालदार लोगों को खुश करने के लिए अल्लाह का ज़िक्र करने वाले ग़रीब लोगों को अपने पास से दूर मत करना। इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि सुबाह शाम अल्लाह का ज़िक्र करने वालों से मुराद नमाज़ी लोग हैं।