किताब- नमाज़ के 114 नुक्ते
 




तीसरा हिस्सा - नमाज़ के मानवी पहलु और मतालिब





37- नमाज़ और सच्चाई



अगर कोई इंसान किसी को पसंद करता है, तो उससे बात करना भी पसंद करता है। बस वह लोग जो अल्लाह से दोस्ती का दावा तो करते हैं, मगर नमाज़ मे दिल चस्पी नही रखते वह अपने दावे मे सच्चे नहीँ हैं। नमाज़ उन बातों के आज़माने का ज़रिया है जो इंसान अपनी ज़बान से कहता है। यही वजह है कि मुनाफ़िक़ की नमाज़ उसके दूसरे तमाम आमाल की तरह सच्चाई से खाली होती है।



38-नमाज़ और ज़ीनत




जहाँ इस्लाम ने नमाज़ को हज़ूरे क़ल्ब यानी जवज्जुह के साथ पढ़ने का हुक्म दिया है। और इसको मोमिन की निशानियों मे से एक निशानी बताया है। और कहा है कि अगर नमाज़ तवज्जुह के साथ न पढ़ी गयी तो क़बूल नही की जायेगी। या यह कि नमाज़ का सिर्फ़ वही हिस्सा क़बूल किया जायेगा जो तवज्जुह के साथ पढ़ा गया होगा। इस बात का भी हुक्म दिया गया है कि नमाज़ पढ़ने के लिए अपना पाको पाकीज़ा बेहतरीन लिबास पहनो और खुशबु का इस्तेमाल करो और इतमिनान के साथ नमाज़ को अदा करो।



हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम जब नमाज़ के लिए मस्जिद की तरफ़ जाते थे, तो इस तरह से अपने को ज़ीनत देते थे, कि देखने वाले आपसे कहते थे, कि ऐसा लगता है कि आप दुल्हन के कमरे मे जा रहे हैं।



यह सुन कर इमाम फ़रमाते कि “नही मैं तमाम अच्छाइयों और ज़ेबाईयों के खालिक़ से मुलाक़ात के लिए जा रहा हूँ।”

औरतों के लिए अच्छा है कि जब वह नमाज़ पढ़ा करें तो अपने ज़ेवरों को पहन लिया करें।



39- नमाज़ एक ऐसा मुआमला है जिसमे फ़ायदा ही फायदा है




अल्लाह फ़रमाता है कि तुम मुझे याद करो मैं तुमको याद रखूँगा। हमारे याद करने से अल्लाह को कोई फ़ायदा नही है। मगर अल्लाह जब हमें याद करता है तो इसकी मेहरबानीयाँ हमको नसीब हो जाती हैं। वह हमारे गुनाहों को माफ़ कर देता है। हमारी मुश्किलों को आसान कर देता है और हमारी दुआओं को क़बूल करता है। उसकी मेहरबानियाँ हमारे लिए बहुत अहमियत रखती हैं। बस नमाज़ मे अल्लाह को याद करने का मतलब यह है कि हम ने एक बेक़ीमत चीज़ के बदले एक क़ीमती चीज़ हासिल करली है। हमने उस को याद किया है जिसको हमारी याद से कोई फ़ायदा नही पहुँचता। इसलिए कि अल्लाह क़ुरआने करीम मे इरशाद फ़रमा रहा है कि अल्लाह तमाम दुनिया वालों से बेनियाज़ है।(यानि अल्लाह को दुनिया वालों से किसी चीज़ की ज़रूरत नही है।) लेकिन हमने अल्लाह को याद करके अल्लाह को अपनी तरफ़ मुतवज्जेह कर लिया है। और हक़ीक़त भी यही है कि हमने तमाम कमालात को पालिया है। लिहाज़ा नमाज़ एक फ़ायदेमन्द मुआमला है और अल्लाह ने खुद हमको इसकी दावत दी है।



40-नमाज़ और सुकून




रूही सुकून व आराम एक ऐसा मस्ला है जिसको इल्म और सनअत(उत्पादन) पर मबनी(आधारित) यह दुनिया अभी तक हल नही कर सकी है। हर रोज़ नफ़्सियाती बीमारीयों की तादाद मे इज़ाफ़ा हो रहा है और दवा का इस्तेमाल हर दिन बढ़ता जा रहा है। कोई भी चीज़ इंसान को सुकून नही देती सिर्फ़ अल्लाह की याद, उसकी मुहब्बत और उसकी ज़ात पर ईमान व तवक्कुल से इंसान के दिल को आराम व सुकून मिलता है।



नमाज़ अल्लाह की याद है और फ़क़त अल्लाह की याद से दिल को सुकून मिलता है। हम सब ऐसे इंसानों को जानतें हैं, जिनके पास इल्म, दौलत और ताक़तो क़ुदरत सभी कुछ मौजूद है। मगर उनको वह आराम व सुकून हासिल नही है, जिसकी एक इंसान को ज़रूरत होती है। और इनके मुक़ाबिल वह लोग भी हैं जिनके पास माल दौलत नही है मगर फ़िर भी वह मुत्मइन हैं और सुकून से रहते हैं। इसकी वजह यह है कि वह अल्लाह पर ईमान रखते हैं। वह एक खास अक़ीदा नज़रिया और फ़िक्र रखते हैं । और हर अच्छे बुरे हादसे को सहन करते हैं।



अल्लाह की याद से दिलों को सुकून मिलता है। और अल्लाह की याद का सबसे अच्छा तरीक़ा नमाज़ है। आज की इस दुनिया मे इंसान के पास इल्म और महारत की कमी नही है बल्कि उसके पास जिस चीज़ की कमी है उसका नाम सुकून है। आज के इस दौर मे न तो बड़ी ताक़तों को आराम हासिल है और ना ही दौलतमंद अफ़राद को राहत है। जहाँ मुनाफ़िक़ लोग बेचैन हैं वहीँ दौलत के पुजारी दरबारी उलमा भी सुकून से नही हैं। हाँ अगर हमने इस दौर मे किसी को सुकून से देखा है तो वह इमाम खुमैनी रिज़वानुल्लाह अलैह की ज़ात थी। जब वह फ़रवरी 1979 मे फ़्राँस से ईरान आरहे थे तो हवाई जहाज़ मे एक प्रेस रिपोरटर ने सवाल किया कि आप इस वक़्त कैसा महसूस कर रहे हैं? आप ने फ़रमाया कि “कुछ भी नही।” जबकि हालात यह थे कि अभी शाह की सरकार बाक़ी थी और हवाई जहाज़ को मार गिराने का खतरा था। इमाम खुमैनी ने अपने वसीयत नामे मे भी लिखा है कि ” मैंपुर सुकून क़ल्ब के साथ अल्लाह की बारगाह मे जारहा हूँ।” यह दिल का सुकून माल दौलत या ताक़त और शौहरत से नही मिलता बल्कि यह सुकून अल्लाह से राबते के नतीजे मे हासिल होता है। और अल्लाह से राबते का सबसे अच्छा तरीक़ा नमाज़ है।



41- नमाज़ यानी ईमान




शुरू मे 15 साल तक मुसलमानो ने बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ नमाज़ पढ़ी। और जब क़िबला काबे की तरफ़ बदला गया(क़िबले के बदलने के कुछ सबब सूरए बक़रा मे ब्यान किये गये हैं।) तो मुसलमानो को यह फ़िक्र हुई कि हमने जो नमाज़े बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ रुख करके पढ़ी हैं उनका क्या होगा? जब उन्होने इस बारे मे पैगम्बर से सवाल किया तो क़ुरआन की यह आयत नाज़िल हुई कि अल्लाह तुम्हारे ईमान को ज़ाय(बर्बाद) नही करेगा। क्योँकि उन्होने अपनी नमाज़ों के बारे मे सवाल किया था लिहाज़ा होना तो यह चाहिए था कि उनको जवाब दिया जाता कि तुम्हारी पहली नमाज़ें सही हैं। अल्लाह तुम्हारी नमाज़ों को ज़ाय(बर्बाद) नही करेगा। मगर अल्लाह ने यह आयत नाज़िल की कि अल्लाह तुम्हारे ईमान को ज़ाय (बर्बाद) नही करेगा। इसका मतलब यह है कि नमाज़ ईमान है और नमाज़ को तर्क(छोड़ना) करना ईमान को तर्क करना है।



42-नमाज़ और अल्लाह की बुज़ुर्गी




नमाज़ मे सबसे पहला वाजिब जुमला अल्लाहु अकबर है।( यानी अल्लाह सबसे बड़ा है।) और जो अल्लाह को बड़ा मान लेगा उसके सामने दुनिया की हर चीज़ छोटी हो जायेगी।



जैसे जब कोई हवाई जहाज़ मे बैठ कर आसमान की तरफ़ ऊँचाई पर पहुँचता है तो ज़मीन पर बने बड़े बड़े घर महल्ले और शहर छोटे छोटे नज़र आने लगते हैं। और जैसे जैसे उसकी ऊँचाई बढ़ती जाती है ज़मीन उसको छोटी नज़र आने लगती है। इसी तरह जिसकी नज़र मे अल्लाह की बुज़ुर्गी होगी उसकी नज़र मे ग़ैरों की कोई अहमियत नही रह जायेगी। ताक़त, माल, मक़ाम,शोहरत कुछ भी उसकी नज़र मे नही समायेगा।



हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा मे मुत्तेक़ीन के सिफ़ात ब्यान करते हुए फ़रमाते हैं कि “जिस वक़्त भी मोमिनीन की आँखों मे अल्लाह की बुज़ुर्गी समा जायेगी, उसी वक़्त अल्लाह के अलावा हर चीज़ को छोटा समझने लगेगें।”



अगर हमारी नज़रों मे दुनिया की कोई अहमियत न रहे तो उससे हमारा लगाव भी खुद ही कम हो जायेगा। और इस तरह हम मालो मक़ाम के लिए जराइम मे मुबतला न होंगें।



इमाम खुमैनी रिज़वानुल्लाह अलैह फरमाया करते थे कि“अमरीका कोई नुक़्सान नही पहुँचा सकता।” यह सिर्फ़ एक नारा नही था बल्कि उन्होने अपनी उम्र इस अक़ीदे के साथ गुज़ारी थी कि अल्लाह सबसे बड़ा है। लिहाज़ अमरीका उनकी नज़र मे कुछ भी नही था।उनके सामने हर हादसा मामूली था।



आशूर के दिन हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने फ़रमाया कि ऐ परवर दिगार हमारी इस छोटी सी कुर्बानी को क़बूल फ़रमा। कर्बला मे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत एक बहुत बड़ा हादसा है। लेकिन जिन की नज़रों मे अल्लाह की बुज़ुर्गी हो वह इस बड़े हादसे को भी मामूली और छोटा समझते हैं।



और जब बनी उमैय्या के हाकिम ने आप से सवाल किया कि कर्बला मे आपने क्या देखा? तो हज़रत ज़ैनब ने फ़रमाया कि हमने अच्छाई के अलावा कुछ नही देखा। आरिफ़ हज़रात की नज़रें देखती हैं कि अल्लाह के तमाम काम हिकमत तरबीयत और अच्छाई लिये हुए होते हैं।



43-नमाज़ और इख्लास




नमाज़ मे अव्वल से आखिर तक क़सदे क़ुर्बत नमाज़ के सही होने के लिए शर्त है। अगर हम नमाज़ पढ़ते वक़्त कोई हरकत या नमाज़ के वाजिब और मुस्तहब्बात मे से एक लफ़्ज़ भी ग़ैरे खुदा के लिए अंजाम दें तो नमाज़ बातिल हो जाती है। इसी तरह अगर नमाज़ की जगह या नमाज़ का वक़्त किसी ग़ैरे खुदा के लिए मुऐयन करें तो इस हालत मे भी नमाज़ बातिल है। यहाँ तक कि वह शक्ल और हालत जो हम नमाज़ के वक़्त बनाते हैं अगर वह भी अल्लाह के अलावा किसी दूसरे के लिए है तो नमाज़ बातिल है।



लिहाज़ा नमाज़ इस हालत मे इबादत शुमार होगी जब उसमे कोई भी क़स्द अल्लाह के अलावा किसी दूसरे के लिए न हो। और यह क़स्दे कुर्बत अव्वले नमाज़ से आखिरे नमाज़ तक बाक़ी रहे।



ज़ाहिर है कि
अगर इंसान हर रोज़ दुनिया के लगाव और इसकी चमक दमक को अपने दिल से दूर करके अपनी रूह की रस्सी को अल्लाह की ज़ात के साथ बाँध ले। और उसके साथ इस तरह राज़ो नियाज़ करे कि अल्लाह के अलावा कोई दूसरा उसके दिल मे दाखिल न हो सके तो समझो कि उसने एक बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है।


हम नमाज़ मे इय्याका नअबुदु व इय्याका नस्तःईन कह कर यह ऐलान करते हैं कि हम तेरी खालेसाना इबादत करते हैं। और इस इखलास को खुद अल्लाह की ज़ात से चाहते हैं।



44- नमाज़ आज़माइश का पैमाना है




क़ुरआने करीम के सूरए बक़रा की आयत न. 45 मे इरशाद होता है कि अल्लाह के खाशेअ( ) बंदों के अलावा दूसरे सब लोग नमाज़ को बार समझते हैं। लिहाज़ा अगर हम किसी वक़्त नमाज़ को बार महसूस करने लगें तो हमको यह समझ लेना चाहिए कि हम अल्लाह के लिए खुज़ुओ खुशुअ नही रखते। और खुज़ुओ खुशुअ का खत्म हो जाना तकब्बुर और लापरवाही की निशानी है।



रमज़ानुल मुबारक मे पढ़ी जाने वाली दुआ-ए-सहर जो हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने अबु हमज़ा सुमाली को तालीम फ़रमाई थी। इसमे नमाज़ की अहमियत पर इन जुमलों के साथ रोशनी डाली गई है।



ऐ मेरे अल्लाह मैं नमाज़ के वक़्त अपने अन्दर खुशी क्यो महसूस नही करता।



शायद तूने मुझे अपनी बारगाह से निकाल दिया है।



शायद बेहूदा बातें करने की वजह से मेरी तोफ़ीक़ मे कमी हो गई है।



शायद तू मुझे सच्चा नही मानता है।



शायद बुरे लोगों की दोस्ती ने मेरे ऊपर (ग़लत) असर डाला है।



हर हालत मे नमाज़ को बोझ महसूस करना खतरे की निशानी है।



45- नमाज़ करम का दरवाज़ा है




अल्लाह के अलावा दूसरे अफ़राद के यहाँ या तो करम पाया ही नही जाता या फिर उनका करम बहुत कम है। अकसरन लोग दूसरों पर ऐहसान व करम नही करते। और अगर किसी के खुशामदें करने की वजह से किसी पर करम करते हैं तो उनका अपना माल कम हो जाता है। मगर अल्लाह के लुत्फ़ो करम की कोई हद नही है। उसके लुत्फ़ का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है। उसने खुद इस दरवाज़े मे दाखिल होने की दावत दी है।वह अपने लुत्फ़ की हदूद मे दाखिल होने वाले अफ़राद से खुश होता है।वह बग़ैर किसी रिशवत या हदिया के सबकी सुनता है।



अल्लाह से राबिता करने के लिए न किसी वक़्त की क़ैद है न किसी खास जगह की। न किसी क़ानून की ज़रूरत है न किसी सिफ़ारिश की। उससे राबते के लिए कोई शर्त नही है। बस यही काफ़ी है कि सच्चे दिल के साथ उससे राबिता करें। अपने गुनाहों का इक़रार करें और उस से मदद माँगें।



46-नमाज़ तकरार नही मेराज है




कुछ लोगों का मानना है कि नमाज़ तकरार के अलावा कुछ भी नही है। यह खयाल ग़लत है। सच्चाई यह है कि नमाज़ तरक़्क़ी का ज़ीना(सीढ़ी)है। नमाज़ को जितने सच्चे दिल के साथ पढ़ा जायेगा उतनी ही ज़्यादा बलन्दीयाँ हासिल होती जायेंगी। देखने मे रुकू व सजूद तकरारी अमल लगते हैं मगर हक़ीक़त यह है कि नमाज़ उस खुदाल की तरह है जिससे कुँआ खोदा जाता है। जब खुदाल को बार बार ज़मीन पर मारा जाता है तो देखने मे यह लगता है कि यह काम तकरार हो रहा है। मगर हक़ीक़त यह है कि खुदाल का हर वार हमको पानी से क़रीब करता जाता है। जैसे जैसे इंसान सीढ़ी पर ऊपर चढ़ता जाता है वह आसमान से क़रीब होता जाता है।



आप क़ुरआन को जितना ज़्यादा पढ़ेगें उतने ही ज़्यादा मतालिब हासिल करेंगे। खुशबूदार फूल को आप जितना ज़्यादा सूँघेंगे उतनी ही ज़्यादा लज़्ज़त हासिल करेंगे। हज के सफ़र मे जितना ज़्यादा भाग दौड़ करेंगे उतने ही ज़्यादा राज़ो से आगाही हासिल करेंगे। बहर हाल नमाज़ देखने मे एक तकरारी काम मालूम होता है मगर हक़ीक़त मे इंसान को बलंदी अता करती है।