फ़िक़्ही मसाइल
 


फ़िक़्ही मसाइल




तक़िय्येह का फ़लसफ़ा




हमारा अक़ीदह है कि अगर कभी इंसान ऐसे मुतस्सिब लोगों के दरमियान फँस जाये जिन के सामने अपने अक़ीदेह को बयान करना जान के लिए खतरे का सबब हो तो ऐसी हालत में मोमिन की ज़िम्मेदारी यह है कि वह अपने अक़ीदेह को छुपा ले और अपनी जान की हिफ़ाज़त करे। हम इस काम को “तक़िय्यह” का नाम देते हैं। इस अक़ीदेह के लिए हमारे पास क़ुरआने करीम की दो आयतें व अक़्ली दलीलें मौजूद हैं।

क़ुरआने करीम मोमिने आले फ़िरौन के बारे में फ़रमाता है कि “व क़ाला रजुलुन मोमिनुन मिन आलि फ़िरऔना यकतुम ईमानहु अतक़तुलूना अन यक़ूला रब्बिया अल्लाहु व क़द जाआ कुम बिलबय्यिनाति मिन रब्बि कुम”[13] यानी आले फ़िरौन के एक मोमिन मर्द ने जिसने अपने ईमान का छुपा रखा था कहा कि क्या तुम उस इंसान को क़त्ल करना चाहते हो जो यह कहता है कि अल्लाह मेरा रब है, जब कि वह तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से खुली हुई निशानियाँ लेकर आया है।

“यक्तुम ईमानहु ” तक़िय्यह के मसले के रौशन करता है। क्या यह सही था कि मोमिने आले फ़िरौन अपने ईमान को ज़ाहिर कर के अपनी जान से हाथ धो बैठता और काम को आगे न बढ़ाता ?

क़ुरआने करीम सद्रे इस्लाम के कुछ मुजाहिद मोमिनीन को जो कि मुशरिक दुश्मनो के पँजों में फँस गये थे उन्हे तक़िय्येह का हुक्म देते हुए फ़रमाता है कि “ला यत्तख़िज़ि अलमोमिनूना अलकाफ़िरीना औलिया मिन दूनि अलमोमिनीना व मन यफ़अल ज़लिक फ़लैसा मिन अल्लाहि फ़ी शैआन इल्ला अन तत्तक़ू मिन हुम तुक़ातन”[14]यानी मोमिनीन को चाहिए कि वह मोमिनीन को छोड़ कर किसी काफ़िर को अपना दोस्त या सरपरस्त न बनायें और अगर किसी ने ऐसा किया तो समझो उसका राब्ता अल्लाह से कट गया। मगर यह कि (तुम खतरे में हो ) और उन से तक़िय्यह करो।

इस बिना पर तक़य्या (यानी अपने अक़ीदेह को छुपाना) ऐसी हालत से मख़सूस है जब मुतास्सिब दुश्मन के सामने इंसान का जान व माल ख़तरे में पड़ जाये। ऐसी हालत में मोमिनीन को अपनी जानों को ख़तरे में नही डालना चाहिए बल्कि उनकी हिफ़ाज़त करनी चाहिए । इसी वजह से हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि “अत्तक़िय्यतु तुर्सुल मोमिनि ”[15] यानी तक़िय्यह मोमिन की ढाल है।

तक़िय्येह को तुर्स (ढाल) से ताबीर करना एक लतीफ़ ताबीर है जो इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि तक़िय्यह दुश्मन के मुक़ाबिल एक दिफ़ाई वसीला है।

जनाबे अम्मारे यासिर का दुश्मनो के सामने तक़िय्यह करना और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का उस को सही क़रार देना बहुत मशहूर वाक़िया है।[16]

मैदाने जंग में अपने सिपाहियों व हथियारों को छुपाना, दुश्मनों से जंगी राज़ों को छुपा कर रखना वग़ैरह इंसान की ज़िन्दगी में तक़िय्येह की ही एक क़िस्म है। तक़िय्यह यानी छुपाना, उस मक़ाम पर जहाँ किसी चीज़ का ज़ाहिर करना ख़तरे व नुक़्सान का सबब हो चाहे छुपाने से कोई फ़ायदा न भी हो। यह एक ऐसी अक़्ली व शरई बात है जिस पर ज़रूरत के वक़्त सिर्फ़ शिया ही नही बल्कि तमाम दुनिया के मुसलमान व अक़्लमन्द इंसान अमल करते हैं।

ताज्जुब की बात है कि कुछ लोग तक़िय्येह के अक़ीदेह को शियों व मकतबे अहलेबैत से मख़सूस करते हैं और उन पर एक ऐतेराज़ की शक्ल में इस को पेश करते हैं। जब कि यह एक रौशन मसला है जिसकी जड़ें क़ुरआने करीम , अहादीस व पैग़म्बरे इस्लाम की सीरत में मौजूद हैं। और पूरी दुनिया के अहले अक़्ल हज़रात भी इस के क़ुबूल करते हैं।


तक़िय्यह कहाँ पर हराम है




इस ग़लत फ़हमी की असली वजह शियों के अक़ीदेह के बारे में मुकम्मल मालूमात का न होना है, हमारा ख़याल है कि ऊपर बयान की गई वज़ाहत से यह मसला कामिल तौर पर रौशन हो गया होगा।

लेकिन इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि कुछ जगहोँ पर तक़िय्यह हराम है। और यह उस मक़ाम पर है जहाँ असासे दीनो व इस्लाम व क़ुरआन या निज़ामे इस्लामी ख़तरे में पड़ जाये। ऐसे मौक़ों पर इंसान को चाहिए कि अपने अक़ीदेह को ज़ाहिर करे चाहे इस अक़ीदेह को ज़ाहिर करने पर कितनी ही बड़ी क़ुरबानी क्योँ न देनी पड़े। हमारा मानना है कि आशूर को कर्बला में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का क़ियाम इसी हदफ़ के लिए था। क्योँ कि बनी उमय्यह के बादशाहों ने इस्लाम की असास को ख़तरे में डाल दिया था। हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क़ियाम ने उन के कामों पर से पर्दा हटा दिया और इस्लाम को ख़तरे से बचा लिया।

मर्द की ब निस्बत औरत की मीरास आधी क्यों?



हसन रज़ा

ख़्वातीन बिल ख़ुसूस इल्म हासिल करने वाली लड़कियों आम तौर से सवाल करती हैं कि मर्द की ब निस्बत औरत की मीरास आधी क्यों हैं? क्या यह अदालत के मुताबिक़ है और यह औरत के हुक़ूक़ पर ज़ुल्म नही है?

जवाब: अव्वल यह कि हमेशा ऐसा नही है कि मर्द, औरत की मीरास से दुगुना मीरास पाये बल्कि बाज़ मर्द और औरत दोनो बराबर मीरास पाते हैं मिन जुमला मय्यत के माँ बाप दोनो मीरास का छठा हिस्सा ब तौरे मुसावी पाते हैं, इसी तरह माँ के घराने वाले ख़्वाह औरतें हों या मर्द दोनों ब तौरे मुसावी मीरास पाते हैं और बाज़ वक़्त औरत पूरी मीरास पाती है।

दूसरे यह कि दुश्मन से जिहाद करने के इख़राजात मर्द पर वाजिब हैं जब कि औरत पर यह इख़राजात वाजिब नही है।

तीसरे यह कि औरत के इख़रजात मर्द पर वाजिब हैं अगर चे औरत की दर आमद बहुत अच्छी और ज़्यादा ही क्यों न हों।

चौथे यह कि औलाद के इख़राजात चाहे वह ख़ुराक हो या लिबास वग़ैरह हों मर्द के ज़िम्मे है।

पाँचवें यह कि अगर औरत मुतालेबा करे और चाहे तो बच्चो को जो दूध पिलाती है वह शीर बहा (दूध पिलाने के हदिया) ले सकती है।

छठे यह कि माँ बाप और दूसरे अफ़राद के इख़राजात कि जिस की वज़ाहत रिसाल ए अमलिया में की गई है, मर्द के ज़िम्मे हैं।

सातवें यह कि बाज़ वक़्त दियत (शरई जुर्माना) मर्द पर वाजिब है जब कि औरत पर वाजिब नही है और यह उस वक़्त होता है कि जब कोई शख़्स सहवन जिनायत का मुरतकिब हो तो उस मक़ाम पर मुजरिम के क़राबत दारों (भाई, चचा और उन के बेटों) को चाहिये कि दियत अदा करें।

आठवीं यह कि शादी के इख़राजात के अलावा शादी के वक़्त मर्द को चाहिये कि औरत को मेहर भी अदा करे।

इस बेना पर ज़्यादा तर मरहलों में मर्द ख़र्च करने वाला और औरत इख़राजात लेने वाली होती है, इसी वजह से इस्लाम ने मर्द मर्द के हिस्से को औरत की ब निस्बत दो गुना क़रार दिया है ता कि तआदुल बर क़रार रहे और अगर औरत की मीरास, मर्द की मीरास से आधी हो तो यह ऐने अदालत है और इस मक़ाम पर मुसावी होना मर्द के ह़ुक़ूक़ पर ज़ुल्म हैं।

इसी बेना पर हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम ने फ़रमाया:

माँ बाप और औलाद के इख़राजात मर्द पर वाजिब हैं।

हज़रत से पूछा गया कि औरत की ब निस्बत मर्द की मीरास दो गुना क्यों होती हैं?

हज़रत ने फ़रमाया: इस लिये कि आक़ेला की दिय, ज़िन्दगी के इख़राजात, जिहाद, महर और दूसरी चीज़ें औरत पर वाजिब नही हैं जब कि मर्द पर वाजिब हैं।

जब हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस सलाम से पूछा गया कि औरत की मीरास के आधी होने की इल्लत क्या है? तो आप ने फ़रमाया: इस लिये कि जब औरत शादी करती है तो उस का शुमार (माल) पाने वाली में होता है, उस के बाद इमाम (अ) ने सूर ए निसा की 34 वीं आयत को दलील के तौर पर पेश किया।