फ़िक़्ही मसाइल
 


फ़िक़्ही मसाइल




निजासात





निजासात

*(म.न.84) दस चीज़ें नजिस हैं।

1)पेशाब

2)पख़ाना

3)मनी (वीर्य)

4)मुरदार

5)ख़ून

6)कुत्ता

7)सुवर

8)शराब

9)काफ़िर

10)निजासत ख़ाने वाले जानवर का पसीना


निजासत साबित होने के तरीक़े





*(म.न. 122) हर चीज़ की निजासत तीन तरीक़ो से साबित होती है।

1) इंसान को ख़ुद यक़ीन व इतमिनान हो कि वह चीज़ नजिस है। अगर किसी चीज़ के नजिस होने के बारे में सिर्फ़ गुमान हो तो उस चीज़ से परहेज़ करना लाज़िम नही है। लिहाज़ा चाय की दुकानों और होटलों में जहाँ पर लापरवाह किस्म के ऐसे लोग खाते पीते हैं जो निजासत व पाकीज़गी का लिहाज़ नही रखते उस वक़्त तक खाना खाने और चाय पीने में कोई हरज नही है जब तक इंसान को यह यक़ीन न हो जाये कि जो खाना उसके लिए लाया गया है नजिस है।

2) किसी के पास कोई चीज़ हो और वह उस चीज़ के बारे में कहे कि यह नजिस है और वह शख़्स झूट भी न बोलता हो तो वह चीज़ नजिस है। मसलन अगर किसी शख़्स की बीवी या नौकर कहे कि यह चीज़ जो मेरे पास है नजिस है तो वह चीज़ नजिस मानी जायेगी।

3) अगर दो आदिल आदमी किसी चीज़ के बारे में कहें कि यह नजिस है तो वह नजिस मानी जायेगी इस शर्त के साथ कि वह इस के नजिस होने की वजह बयान करें।

(म.न. 123) अगर कोई शख़्स मसला न जान ने की बिना पर यह न जान सके कि यह चीज़ नजिस है या पाक तो उसे चाहिए कि मसला मालूम करे जौसे उसे यह मालूम न हो कि चूहें की मेगनी पाक है यै नजिस तो उसके लिए ज़रूरी है कि वह इस बारे में मसला मालूम करे । लेकिन उगर मसला जानता हो और किसी चीज़ के बारे में शक करे कि पाक है या नजिस मसलन उसे शक हो यह चीज़ ख़ून है या नही या यह न जानता हो कि मच्छर का ख़ून है या इंसान का तो वह पाक माना जायेगा और उसके बारे में छान बीन करना भी लाज़िम नही है।

(म.न. 124) अगर किसी नजिस चीज़ के बारे में शक हो कि (बाद में) पाक हुई या नही तो वह चीज़ नजिस है।इसी तरह अगर किसी पाक चीज़ के बारे में शक हो कि (बादमें) नजिस हो गई है या नही तो वह पाक है। अगर कोई शख़्स इन चीज़ों के नजिस या पाक होने के बारे में पता भी लगा सकता हो तो तब भी छान बीन ज़रूरी नही है।

(म.न. 125) अगर कोई शख़्स जानता हो कि यह दो बरतन या दो कपड़े जो उसके इस्तेमाल में है इन में से एक नजिस हो गया है लेकिन उसको यह पता न हो कि इनमें से कौनसा नजिस हुआ है तो दोनो से ही परहेज़ ज़रूरी है।और अगर उसके पास दो कपड़े हो एक उसका अपना और एक दूसरे का और उसको यह पता न चले कि उसका अपना कपड़ा नजिस हुआ है या वह कपड़ा जिसको वह इस्तेमाल नही करता और वह किसी दूसरे इंसान का माल है तो यह ज़रूरी नही है कि अपने कपड़े से परहेज़ करे।

पेशाब पख़ाना करने के मुसतहब्बात व मकरूहात





(म.न.79) हर शख़्स के लिए मुस्तहब है कि जब भी पेशाब पख़ाना करने के लिए जाये तो ऐसी जगह पर बैठे जहाँ उसे कोई देख न सके। और पख़ाने मे दाख़िल होते वक़्त पहले अपना बायाँ पैर अन्दर रखे और वहाँ से निकलते वक़्त पहले दाहिना पैर बाहर रखे और यह भी मुस्तहब है पेशाब पख़ाना करते वक़्त अपने सर को (टोपी , दुपट्टे वग़ैरह) से ढक कर रखे और बदन का बोझ अपने बायेँ पैर पर रखे।

(म.न.80) सूरज चाँद की तरफ़ चेहरा कर के पेशाब पख़ाना करना मकरूह है। लेकिन अगर अपनी शर्म गाह को किसी चीज़ के ज़रिये ढक ले तो फिर मकरूह नही है। इसके अलावा हवा के रुख़ के मुक़ाबिल, गली कूचों में, घरों के दरवाज़ों के सामने और फलदार दरख़्तों के नीचे पेशाब पख़ाना करना मकरूह है। इसी तरह पेशाब पख़ाना करते वक़्त कोई चीज़ खाना, ज़्यादा देर तक बैठे रहना, दाहिने हाथ से पेशाब पख़ाने के मक़ाम को धोना और इस हालत में बाते करना भी मकरूह है लेकिन अगर कोई मजबूरी हो या ज़िक्रे ख़ुदा किया जाये तो कोई हरज नही है।

(म.न.81) खड़े हो कर पेशाब करना मकरूह है। और इसी तरह सख़्त ज़मीन पर,जानवरों के सुराख़ों पर और पानी में ख़ास तौर पर रुके हुए पानी में पेशाब करना भी मकरूह है।

(म.न.82) पेशाब और पख़ाने को रोकना मकरूह है और अगर बदन के लिए मुकम्मल तौर पर नुक़सान देह हो तो हराम है।

(म.न.83) नमाज़ से पहले , सोने से पहले, जिमाअ(संभोग) से पहले और मनी(वीर्य) के निकल जाने के बाद पेशाब करना मुस्तहब है।


मोहतज़र के अहकाम


मोहतज़र (जो ज़िन्दगी के आख़री लमहात में हो)

मोहतज़र के अहकाम
539. जो मुसलमान मोहतज़र हो, यानी अपनी ज़िन्दगी की अख़िरी साँसे ले रहा हो, चाहे वह मर्द हो या औरत, छोटा हो या बड़ा, एहतियात की बिना पर उसे इस तरह चित लिटाना चाहिए कि उसके पैरों के तलवें क़िबले की तरफ़ हों जायें।
540. जब तक मय्यित को मुकम्मल तौर पर ग़ुस्ल न दिया जाये बेहतर है कि उसे किबला रुख़ लिटाए रख़े। लेकिन जब ग़ुस्ल मुकम्मल हो जाये तो फिर उसे उस तरह लिटाया जाये जिस तरह मुर्दे को नमाज़े जनाज़ा के वक़्त लिटाया जाता है।
541. जो इंसान एहतेज़ार की हालत में हो, एहतियात की बिना पर उसे क़िबला रुख़ लिटाना हर मुसलमान पर वाजिब है। अगर मरने वाला इंसान राज़ी हो और क़ासिर भी न हो, तो इस काम के लिए उसके वली से इजाज़त लेना ज़रूरी नही है। इसके अलावा दूसरी सूरतों में, मरने वाले के वली से इजाज़त लेना ज़रूरी है।
542. यह भी मुस्तहब है कि मरने वाले के सरहाने शहादतैन, बारह इमामों के नाम और दूसरे दीनी अक़इद इस तरह बयान किये जायें कि वह समझ ले और उसके दम निकलने के वक़्त तक इन को दोहराते रहना चाहिए।
543. यह भी मुस्तहब है कि मरने वाले के सामने यह दुआ पढ़ी जाये “अल्लाहुम्मा इग़फ़िर ली अलकसीरा मिन मआसीका व इक़बल मिन्नी अलयसीरा मिन ताअतिक या मन यक़बलुल यसीर व यअफ़ु अनिल कसीर इक़बल मिन्नी अलयसीरा व आफ़ु अन्नी अलकसीर इन्नका अन्तल अफ़ुवुल ग़फ़ूर।”
544. अगर किसी इंसान की जान सख़्ती से निकल रही हो, तो मुस्तहब है कि उसे उस जगह पर ले जायें जहाँ वह नमाज़ पढ़ता हो, लेकिन इस शर्त के साथ कि उसे वहाँ ले जानें में कोई तकलीफ़ न हो।
545. जो इंसान एहतेज़ार की हालत में हो उसकी आसानी के लिए उसके सरहाने सूरह-ए-यासीन, सूरह-ए-साफ़्फ़ात, सूरह-ए-एहज़ाब, आयतुल कुर्सी और सूरह-ए-आराफ़ की चव्वन वीं आयत और इसके अलावा जो सूरह भी पढ़ा जा सके, पढ़ा जाये।
546. जो इंसान एहतेज़ार की हालत में हो उसे तन्हा छोड़ना, उसके पेट पर कोई वज़नी चीज़ रखना, मुजनिब व हाइज़ का उसके पास रहना, उसके पास ज़्यादा बातें करना, रोना और सिर्फ़ औरतों को छोड़ना मकरूह है।


मरने के बाद के अहकाम


मुस्तहब है कि मरने के बाद मैयित की आँखें और होंट बन्द कर दिये जायें और उसकी ठोडी को बाँध दिया जाए और उसके हाथ,पाँव सीधे कर दिये जायें। अगर मौत रात को हुई हो तो जहाँ मौत हुई हो वहाँ चिराग़ जलाए (रोशनी कर दे) और जनाज़े में

शिरकत के लिए मोमिनीन को ख़बर दे और मैयित दफ़्न करने में जल्दी करे। लेकिन अगर उस इंसान के मरने का यक़ीन न हो तो इन्तेज़ार करे ताकि सूरते हाल वाज़ेह हो जाए। इसके अलावा अगर मैयित हामिलः हो और बच्चा उसके पेट में ज़िन्दा हो तो ज़रूरी है कि दफ़्न करने में इतनी देर करें कि उसका पहलू चाक करके बच्चा बाहर निकाल लें और फिर उस पहलू को सी दें।



ख़ाक पर सजदाह करना




हमारा अक़ीदह है कि नमाज़ में या तो ख़ाक पर सजदाह किया जाये या फिर ज़मीन के अजज़ा में से किसी पर भी, या उन चीज़ों पर जो ज़मीन से पैदा होती हैं जैसे दरख़्तों के पत्ते लकड़ी व घास फ़ूँस बग़ैरह (उन चीज़ों को छोड़ कर जो खाने या पहन ने में काम आती हैं)

इसी वजह से हम सूती फ़र्श पर सजदाह करने को जायज़ नही मानते और ख़ाक पर सजदाह करने को दूसरी तमाम चीज़ों पर तरजीह देते हैं। आसानी के लिए अक्सर शिया पाक मिट्टी को गोल या चकोर शक्ल में ढाल लेते है और इसे अपने पास रखते है और नमाज़ पढ़ते वक़्त इसी पर सजदाह करते हैं। यह गोल या चकोर शक्ल में ढाली गई मिट्टी सजदाहगाह कहलाती हैं।

इस अमल की दलील के लिए हमारे पास पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की हदीस मौजूद है जिस में आपने फ़रमाया कि “जुइलत ली अलअर्ज़ु मस्जिदन व तहूरन”[18] यानी मेरे लिए ज़मीन को मस्जिद व तहूर क़रार दिया गया।

हम इस हदीस में मस्जिद से सजदेह की जगह मुराद लेते हैं। यह हदीस अक्सर कुतुबे सहा में मौजूद है।

मुमकिन है कि यह कहा जाये कि इस हदीस में मस्जिद से मुराद सजदेह की जगह नही है बल्कि नमाज़ की जगह है। उस के मुक़ाबिल में जो नमाज़ को किसी मुऐय्यन जगह पर पढ़ता हो ,लेकिन इस बात पर तवज्जोह देने से कि यहाँ पर तहूर भी इस्तेमाल हुआ है तहूर यानी ख़ाके तय्म्मुम, यह बात वाज़ेह हो जाती है कि यहाँ पर मस्जिद से मुराद सजदेह की जगह ही है न कि नमाज़ की जगह। यानी ज़मीन की ख़ाक तहूर भी है और सजदेह की जगह भी। इसके अलावा आइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिम अस्सलाम की बहुत सी ऐसी हदीसें हैं जो सजदेह के लिए ख़ाक, संग और इन्हीं के मानिन्द दूसरी चीज़ो के बारे में राहनुमाई करती हैं।

मोहर(1)पर सजदह करना




सामीः अली, तुम सब शीया क़ौम गीली मिट्टी को सुख़ा कर उस पर सजदह करते हो और यह काम शिर्क है. इस तरह से ईश्वर के व्यतीत अपर चिज़ की भी ईबादत करते हो।
अलीः अगर निर्देश देते हो तो मै तुम से एक प्रश्न करुँ।
सामीः पूछो
अलीः किया अल्लाह (के शरीर) पर सजदह करना सठिक है।
सामीः तुम्हारा यह कहना कुफ़्र है, क्योंकि अल्लाह का कोई शरीर नहीं, और न आखों से उस को देखा जा सकता है और न उस को हाथ द्बारा स्पष्ट किया जा सकता है। जो व्यक्ति विश्वास करता हो कि अल्लाह का शरीर है बिना संदेह के वह काफ़िर है और सजदह तो फक़त अल्लाह के लिये हो सकता है, अल्लाह पर नही क्योंकि सजदह का मक़्सद अल्लाह के सामने ख़ुज़ू व ख़ुशू के साथ उपस्थित होना है।
अलीः तुम्हारी कथाएं से यह पता चल रहा है कि सजदहगाह पर हमारा सजदह करना शिर्क नहीं है, क्योंकि सजदहगाह को ख़ुदा जान कर उस पर सजदह नहीं किया जा रहा है बल्कि उस मिट्टी के बने हुए सजदहगाह के माध्यम से ख़ुदा को सजदह किया जा रहा है।
फर्ज़ करें अगर ऐसा समझ रहे हैं तो-नउज़ो बिल्लाह सजदहगाह खुदा है, और अल्लाह से हट के उस को सजदह किया जा रहा है। क्योंकि सजदह करने वाला, अल्लाह के लिये सजदह नही कर रहा है बल्कि उस सजदहगाह को सजदह कर रहा है।
सामीः यह प्रथम बार है जो मै ऐसी बाते सुन रहा हूँ, अगर तुम सब सजदहगाह को अल्लाह समझते होते तो निश्चित तौर पर उस सजदहगाह पर सजदह न करते और उस पर अपनी पेशानी न रख़ते, लिहज़ा यहाँ प्रमाण हो रहा है कि तुम सब सजदहगाह को खुदा नहीं जानते।
उस समय सामी ने अली से कहाः अगर निर्देश हो तो मै तुम से एक प्रश्न और करूँ।
अलीः ज़रूर पुछो,
सामीः क्यों तुम लोग सजदहगाह ही पर सजदह करते हो दूसरी चीज़ों पर नही १
अलीः सच तो यह है कि इस विषय पर मुसलमानों का एक नज़रिया है, कि रसूले खुदा (स.अ.) ने इस के समन्धं ईरशाद फरमायाः
جعلت لي الأرض مسجداً و طهوراً؛

हमारे लिये ज़मीन (सजदहगाह) को पाक और पवित्र क़रार दिया गया है।
इस बिनापर पर, ख़ालिस मिट्टी पर सजदह करना यक़ीनन जाएज़ और सारे इसलामी सम्प्रदाय़ इस विषय पर एक नज़रिया रख़ते हैं। इस नज़रिये के अनुसार ख़ालिस मिट्टी पर सजदह करना जाएज़ और क़ाबिले क़ुबूल है, यही कारण है कि हम सब ख़ालिस मिट्टी पर सजदह करते है।
सामीः समस्क प्रकार मुसलमानों का नज़रिया मिट्टी पर सजदह करना किस तरह हासिल हुआ है१
अलीः जिस समय हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.) ने पवित्र मदीना शहर में प्रवेश करके वहां मस्जिद बनाई, किया उस समय मस्जिद में फ़र्श या चटाई जैसी कोई चीज़ थी१
सामीः नही, उस समय तो मस्जिद में कोई चीज़ नहीं थी।
अलीः रसूले अकरम (स.अ.) के बाद मुसलमान किस पर सजदह करते थें १
सामीः ज़मीन पर,
अलीः इस से पता चला कि पैग़म्बरे अकरम (स.अ.) ज़मीन पर नमाज़ पढ़ा करते थें, और मिट्टी पर सजदह किया करते थें. और उस समय के मुसलमान भी पैग़म्बरे अकरम (स.अ.) की तरह मिट्टी पर सजदह किया करते थें। इस तरह से मानना पड़ेगा कि मिट्टी पर सजदह करना बिल्कुल सही है इसी लिए हम सब पैग़म्बरे अकरम (स.अ.) की पैरुवी व अनुसरण करते हुए मिट्टी पर सजदह करते है, मानो यह बात हम यक़ीन से कह सकते हैं कि हमारी नमाज़ें बिल्कुल सही हैं।
सामीः क्यों तुम (शीया) सजदहगाह को अपने साथ रख़ते हो और इसके अलावा किसी और चीज़ पर सजदह नहीं करते १
अलीः तुमहारे इस प्रश्न का हमारे पास दो उत्तर हैः
1- हदीस के मुताबिक़ शीया ज़मीन से उगने और निकलने वाली (खाने और पहनने वाली चीज़ों के अलावा) चीज़ों पर चाहे वह मिट्टी हो या पत्थर या पत्ते, इन चीज़ों पर सजदह करना जाएज़ और सही समझते हैं।
2- सजदह करने की जगह का पाक और पवित्र होना ज़रूरी है वरना अपवित्र ज़मीन या मिट्टी पर सजदह करने से नमाज़ सही नहीं होगी. इसलिए शीया गीली मिट्टी को सुखा कर अपने साथ रखते हैं ताकि यक़ीन के साथ अपनी नमाज़ को सही तरीक़े से अदा कर सकें।
सामीः जब पाक मिट्टी और ख़ालिस ज़मीन पर सजदह करने का हुक्म है तो अपने साथ गीली मिट्टी क्यों नहीं रखते१
अलीः जहां तक अपने साथ गीली मिट्टी रख़ने का प्रश्न है वह इस लिए कि अपना कपड़ा ख़राब न हो।
दूसरी बात यह कि गीली मिट्टी को सुख़ा कर उस पर सजदह करना, अल्लाह के दर्बार में खुज़ु और खुसु की पहचान है। क्योंकि सजदह, ख़ुजु का स्थान है और मात्र अल्लाह के लिए सजदह करना जाएज़ है, इस बुनियाद पर अगर अल्लाह के सामने सजदह करने का उद्देश्व खुज़ु है और जिस चीज़ पर सजदह किया जारहा है वह भी खुजु है और सजदह जितना ख़ुजु और खुशु के साथ हो उतना उत्तम है।
इसी वजह से मुस्तहब है कि सजदह करने की जगह को नीचे होना चाहिए(9) अगर इस तरतीब के साथ सजदह किया जाए तो अल्लाह के सामने ख़ुज़ु और ख़ुशू बढ़ता है और इस के साथ साथ और मुस्तहब भी है कि सजदह की अबस्था में अपनी नाक को मिट्टी पर मला जाए जिस से अपने को अल्लाह के सामने बेशी से बेशी हक़ीर व नातवां जाहिर किया जा सके, लिहज़ा गीली मिट्टी को सुख़ा कर उस पर सजदह करना जाएज़ और सही है क्योंकि इस अबस्था में अपनी पेशानी को मिट्टी पर मला जाता है जिस से अल्लाह और उसकी अज़्मत के सामने अपने को एक हक़ीर व ज़लील समझा जाता है।
इस अबस्था में अगर कोई व्यक्ति सजदह करे, और अपनी पेशानी को फर्श, जा-नमाज़ या उससे भी क़ीमती चीजों पर रखे जैसे चांदी, सोना, अक़ीक़, या उससे भी बेशी क़ीमती चीज़ पर तो अल्लाह की अज़मत के सामने अपनी ज़लालत और हक़ारत का अनुभब नही होता१ इस बुनियाद पर जो बातें कही गई हैं किया उस चीज़ पर अल्लाह के लिए सजदह करना जिस से ख़ुज़ु व ख़ुशु में इज़ाफा होता है किया शिर्क व कुफ्र है १ और उस चीज़ पर सजदह करना जिस से ख़ुजु व ख़ुशु में कमी होती है किया उस के द्बारा अल्लाह को ख़ुश किया जा सकता है१
सामीः सजदहगाह पर कोई नक़्श या लिख़ी हुई चीज़ का किया हुक्म है१
अलीः हर सजदहगाह पर लिख़ा नहीं होता बल्कि कुछ सजदहगाह ऐसे होते हैं जिस पर कुछ लिख़ा होता है जिस से पता चलता है कि यह सजदहगाह पवित्र कर्रबला कि मिट्टी से बना हुआ हैआपकी नज़र में किया यह काम शिर्क है१
सामीः जो सजदहगाह कर्बला की मिट्टी से बनी है उस में कौन सी ख़ूबी और किया फज़ीलत है जिस पर तमाम शीया विश्वाश और यक़ीन के साथ उस पर सजदह करते है१
अलीः इस के लिए एक हदीस है जिस हदास में ईर्शाद होता है किः
السجود علی تربة الحسين (ع) يخرق الحجب السبع؛

तुरबते इमाम हूसैन (अः) पर सजदह करना सातों आसमान के परदों को हटा देता है।br> इस हदीस का मतलब यह है कि कर्बला की मिट्टी पर सजदह करने से नमाज़ क़ूबूल होती है और उस नमाज़ की फज़ीलत आसमान पर चली जाती है, इस लिए इस मिट्टी की एक विशेष ख़ूबी है जो दूसरी मिट्टी में नही है।
सामीः किया इमाम हूसैन (अ.स.) के तुरबते पाक पर सजदह करने से बातिल नमाज़ भी अल्लाह के निकट क़ुबूल हो जाती है१
अलीः शीया के धर्म शास्त्र (फिक़्ह) में है कि जो नमाज़ सही शर्तों के साथ न हो वह नमाज़ बातिल और वह अल्लाह के यहां क़ाबिले क़ुबूल नहीं है, लेकिन जो नमाज़ समस्त प्रकार शर्तों के साथ हो वह नमाज़ अल्लाह के निकट मक़बूल है। और उस का सवाब भी मिलेगा लेकिन जो नमाज़ मक़बूल न हो उस नमाज़ का सवाब नहीं मिलेगा लेकिन जो नमाज़ सही शर्तों के साथ और इमाम हूसैन (अः) के तुर्बत पर पढ़ी जाए वह क़ाबिले क़बूल और उस का सवाब भी बेशी है इसी लिए नमाज़ का क़बूल होना अन्य विषय है, और सही होने का अन्य विषय और है।
सामीः किया सर ज़मीने कर्बला मक्का और मदीना से विशेष स्थान रखता है जिसके कारण उस पर सजदह करना बहुत बेशी फज़ीलत और सवाब रख़ता है१
अलीः तुमहारे कहने का किया मतलब है१
सामीः किया सर ज़मीने मक्का आदम (अ.स.) के नाज़िल होने से पवित्र स्थल बना और मदीना जो रसूल खुदा (स.अ.) का पवित्र क़दमों से मुबारक बना, किया तुमहारी नज़र में मक्का और मदीना का विशेष मक़ाम कर्बला से कम है१ किया हूसैन इब्ने अली रसुले ख़ुदा (स.अ.) से बड़े और सम्मान में बिशेष स्थान रखते हैं१ यह अश्चर्य का विषय है !
अलीः ना, इस तरह नहीं है. इमाम हूसैन (अ.स.) का मक़ाम, महानता (अज़मत) और (शराफत) हज़रत रसूले खुदा (स.अ.) से है, और यही कारण है कि इमाम हूसैन (अ.स.) अपने नाना रसूले ख़ुदा (स.अ.) के दीन (इसलाम) की संरक्षण करने के लिए शहीद किए गए, वरना इमाम हूसैन (अ.स.) का मान-सम्मान हज़रत रसूले खुदा (स.अ.) के सम्मान और इज़्ज़त का एक हिस्सा है। इस के अलावा इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने नाना के दीन की संरक्षन के लिए अपनी क़ुरबानी के साथ साथ अपने साथियों, भाई, भतीजों और दूसरे रिश्तेदारों की क़ुरबानी दी यहां तक कि औरतों का असीर होना भी गवारा किया जिस के माध्यम से दीने इसलाम को मज़बूती मिली, इस्लाम को तो यज़ीद ने मिटाने की ठान ली थी और अगर कहीं इमाम हुसैन (अ.स.) ने क़ुरबानी न दी होती तो आज इस्लाम का नाम व निशान भी न होता यानी आप ने क़ुरबानी दी तो दीने इसलाम बचा, जिस की वजह से आप अल्लाह की तरफ़ से तीन चिज़ों को विशेष सम्मान का अधिकार प्राप्त है और वह यह है किः ( जिस को तरतीब के साथ बयान किया जा रहा है)।
1-अगर कोई व्यक्ति इमाम हूसैन (अ.स.) के मज़ारे शरीफ़ पर प्रार्थना करे तो उसकी प्रार्थना ज़रूर क़ुबूल होगी।
2-समस्त प्रकार सम्मान इमाम (अ.स.) आप के पबित्र नस्ल से है।
3- समस्त प्रकार दर्दों और व्यधीयों की दवाएं आप के तुर्बते पाक में अल्लाह ने शेफ़ा क़रार दिया है. इस बुनियाद पर ख़ुदा बन्दे आलम ने आप को एक अज़मत और इज़्ज़त का बिशेष स्थान प्रदान किया है, क्योंकि आप पबित्र दीने इसलाम को संरक्षण करने के लिये अल्लाह के राह में शहीद हो गए. बालक-बालिका और पूत्र पूत्री असीर हो गएं और आपके यावर व नासिर यूद्ध के मैदान में शहीद हो गए, एक जुमले में कहना काफी है, कि आप इसलाम को संरक्षण करने के लिये हर मुशकिल और मसाएब को बर्दाश्त कि, इस तरह तमाम प्रकार मूसिबतों-असहायों को सह करने के बाद आपकि तुर्बते पाक और आपके मक़ाम व फज़िलत में बाधा सृष्ट देख रहे हो१ या तुर्बते कर्रबला को एक स्थान प्रदान करना और दूसरी सर ज़मीन से इज्ज़तदार समझना, उधारण के तौर पर मदीना, इस का माना ये है कि इमाम हूसैन (अ.स.) को हज़रत रसूल (स.अ.) से बड़ा समझना है १ ये विषय सम्पूर्ण तरीके से उल्टा है. इमाम हूसैन (अ.स.) के तुर्बते पाक को सम्मान प्रदर्शन करना तथाः इमाम हूसैन (अ.स.) का सम्मान प्रदर्शन करना बराबर है. और आप को सम्मान प्रदर्शन करना तथा अल्लाह और उस के रसुल (स.अ.) को सम्मान प्रदर्शन करना बराबर है।
सामिः तुमहारा कहना सही है, लेकिन इस से पहले मै सोचता था कि तुम सब इमाम हूसैन (अ.स.) को रसुले अकरम (स.अ.) से अधिक स्थान पर जानते होगे, लेकिन मुझे अभी हक़ीक़त मालूम हुई. आपका धन्यवाद कि आप ने मुझे सही बात बताई, अब इस के बाद से मै सब समय के लिये तुर्बते कर्बला को अपने साथ रखूँगां और दूसरी चीज़ों पर सजदह करने से बिरत रहूगां ।
अलीः मै इस चिन्ता में था कि दुशमनों ने हमारे विपरीत जो झूटी बातें उड़ाई हैं उस से तुम को कैसे आगाह करुँ। जो लोग अपने को असली मुसलमान कह कर दूसरे मुसलमानों के विपरीत झूटी बातें मशहूर करते हैं सछ तो यह में कि वह मुसलमान नही बल्कि मुसलमानों के दुशमन हैं, आप से निवेदन है कि इस के बाद से जो बातें शियों के सम्बन्धं सुनिए उसकी हक़ीक़त मालूम किए बग़ैर क़बूल न कीज़िए. और सब समय हक़ीक़त और सच्ची कथाएं मालूम करने की चेष्टा करते रहिए। **************************************************** (1)जिसे उर्दू में सजदगाह कहते हैं।