फ़िक़्ही मसाइल
 


फ़िक़्ही मसाइल




वाजिब नामाजें


छः नामाजें वाजिब हैं (1) रोज़ाना की नमाज़

(2) नमाज़े आयात

(3) नमाज़े मय्यित।

(4) ख़ान-ए-काबा के तवाफ़ की नमाज़।

(5) बाप की क़ज़ा नमाज़ जो बड़े बेटे पर वाजिब होती है।

(6) जो नमाज़ें इजारे, क़सम और अहद की वजह से वाजिब होती हैं। नमाज़े जुमा रोज़ाना की नमाज़ों में से है।
रोज़ाना की वाजिब नमाज़ें

रोज़ाना की वाजिब नमाज़ें पाँच है।

ज़ोहर और असर (हर एक चार चार रकत)

मग़रिब (तीन रकत)

इशा (चार रकत)

सुबह (दो रकत)

(736) अगर इंसान सफ़र में हो तो ज़रुरी है कि चार रकती नमाज़ो को उन शर्तों के साथ जो बाद में बयान होगी, दो रकत पढ़े।


मुस्तहब नमाज़ें


(772) मुस्तहब नमाज़ें बहुत सी हैं जिन्हें नाफ़िलह भी कहते हैं, और मुस्तहब नमाज़ों में से रोज़ाना के नाफ़िलह की बहुत ज़्यादा ताकीद की गई है। यह नमाज़ें रोज़े जुमा के अलावा चौतीस रकत हैं। जिनमें से आठ रकत ज़ोहर की, आठ रकत अस्र की, चार रकत मग़रिब की, एक रकत इशा की, ग़यारह रकत नमाज़े शब (यानी तहज्जुद) की और दो रकत सुबह की होती हैं। चूँकि एहतियाते वाजिब की बिना पर इशा की दो रकत नफ़ल बैठकर पढ़नी ज़रूरी है इसलिए वह एक रकत शुमार होती है। लेकिन जुमे के दिन ज़ोहर और अस्र की सोलह रकत नफ़ल पर चार रकत का इज़ाफ़ा हो जाता है। और बेहतर है कि यह पूरी बीस रकतें ज़वाल से पहले पढ़ी जायें।

(773) नमाज़े शब की गयारह रकतों में से आठ रकतें नाफ़िलह-ए-शब की नियत से और दो रकत नमाज़े शफ़ा की नियत से और एक रकत नमाज़े वत्र की नियत से पढ़नी ज़रूरी हैं। नाफ़िल-ए-शब का मुकम्मल तरीक़ा दुआ़ की किताबों में बयान किया गया है।

(774) नाफ़िलह नमाज़ें बैठ कर भी पढ़ी जा सकती हैं लेकिन बाज़ फ़ुक़ाहा कहते है कि इस सूरत में बेहतर यह है कि बैठ कर पढ़ी जाने वाली नाफ़िलह नमाज़ों की दो रकतों को एक रकत शुमार किया जाये मसलन जो इंसान ज़ोहर की नाफ़िलह जो कि आठ रकत हैं, बैठकर पढ़ना चाहे तो उसके लिए बेहतर यह है कि सोलह रकतें पढ़े और अगर चाहे कि नमाज़े वत्र बैठ कर पढ़े तो एक एक रकत की दो नमाज़ें पढ़े। ता हम इस काम का बेहतर होना मालूम नहीं है लेकिन रजा की नियत से अंजाम दे तो कोई इशकाल नहीं है।

(775) ज़ोहर और अस्र की नाफ़िलह नमाज़ें सफ़र में नहीं पढ़नी चाहिए और अगर इशा की नाफ़िलह रजा की नियत से पढ़ी जाये तो कोई हरज नहीं है।


नमाज़े ग़ुफ़ैला


मुस्तहब्बी नमाज़ों में से एक नमाज़े ग़ुफ़ैला है, जो मग़रिब व इशा की नमाज़ के बीच पढ़ी जाती है। इसका वक़्त नमाज़े मग़रिब के बाद पश्चिम की तरफ़ की सुर्ख़ी ख़त्म होने तक है।
यह नमाज़ दो रकअत है और पहली रकअत में हम्द के बाद सूरः की जगह यह आयत पढ़ी जाती है “व ज़न्नूनि इज़ ज़हाबा मुग़ाज़िबन फ़ज़न्ना अन लन नक़दिरा अलैहि फ़नादा फ़िज़्ज़ुलिमाति
अन ला इलाहा इल्ला अन्ता सुबहानका इन्नी कुन्तु मिन अज़्ज़ालीमीन फ़स्तजबना लहु व नज्जैनाहु मिन अलग़म्मि व कज़ालिका नुनजिल मोमिनीना ” और दूसरी रकअत में हम्द के बाद यह
आयत पढ़ी जाती है “व इन्दा मफ़ातिहुल ग़ैबि ला यअलमुहा इल्ला हुवा व यअलमु मा फ़िल बर्रे वल बहरे व मा तसक़ुतु मिन वरक़तिन इल्ला यअलमुहा
व ला हब्बतिन फ़ी ज़ुलुमातिल अर्ज़ि व ला रतबिंव व ला याबिसिंव इल्ला फ़ी किताबिम मुबीन।” और क़ुनूत में यह दुआ पढ़ी जाती है “
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बिमफ़ातिहिल ग़ैबि अल्लती ला यअलमुहा इल्ला अन्ता अन तुसल्लिया अला मुहम्मदिवं व आलि मुहम्मद व अन तफ़अला बी इसके बाद अपनी दुआ माँगे
और फिर यह दुआ पढ़े अल्लाहुम्मा अन्ता वलियु नेअमति वल क़ादिरु अला तलिबति तअलमु हा-जति फ़असअलुका बिहक़्क़ि मुहम्मदिंवं व आलि मुहम्मदिन अलैहि व अलैहिमुस्सलाम लम्मा क़जैतहा ली।


जुमे की नमाज़ के वाजिब होने की चंद शर्ते हैं



(1) नमाज़ के वक़्त का दाख़िल हो जाना, जो कि ज़वाले आफ़ताब है, और इसका वक़्त अव्वले ज़वाले उर्फ़ी है बस जब भी इससे ताख़ीर हो जाये तो उसका वक़्त ख़त्म हो जाता है और फ़िर ज़ोहर की नमाज़ अदा करना चाहिए।

(2) नमाज़ियों की तादाद का पूरा होना, नमाज़े जुमा के लिए इमाम समीत पाँच अफ़राद का होना ज़रूरी है लिहाज़ा जब तक पाँच मुसलमान इकठ्ठे न हों जुमे की नमाज़ वाजिब नही होती।

(3) इमामे जमाअत का जामे-उश-शराइत होना, यानी इमामे जमाअत के लिए जो शर्तें ज़रूरी है इमाम में उनका पाया जाना। इन शर्तों का ज़िक्र नमाज़े जमाअत की बहस में किया जायेगा। अगर यह शर्त पूरी न हो तो जुमे की नमाज़ वाजिब नहीं होती।

नामाज का तर्जुमा


सूरए हम्द का तर्जुमा

بِسْمِ اللّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ«1»
शुरु करता हूँ, उस अल्लाह के नाम से जो दुनिया में मोमिनों व काफ़िरों सब पर रहम करता है और आख़ेरत में मोमिनों पर रहम करेगा।

الْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ «2»
सारी तारीफ़े उस अल्लाह के लिये मख़सूस हैं जो जहानों की परवरिश करने वाला है।

اَلرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ «3»
जो दुनिया में सब पर रहम करने वाला और आख़िरत में सिर्फ़ मोमिनीन पर रहम करने वाला है।

مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ «4»
जो क़ियामत के दिन का मालिक है।

إِيَّاكَ نَعْبُدُ وإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ «5»
हम सिर्फ़ तेरी इबादत करते हैं और सिर्फ़ तुझ से मदद माँगते हैं।

اِهْدِنَا الصِّرَاطَ المُسْتَقِيمَ «6»
हम को सिराते मुसतक़ीम पर साबित क़दम रख।

صِرَاطَ الَّذِينَ أَنعَمْتَ عَلَيهِمْ
ऐसे लोगों का रास्ता जिन पर तूने अपनी नेअमतें नाज़िल की है।( वह पैग़म्बर और ुनके जानशीन हैं)

غَيرِ المَغضُوبِ عَلَيهِمْ وَلاَ الضَّالِّينَ
उन लोगों का रास्ता नही जिन पर तूने क़हर नाज़िल किया और न उन लोगों का रास्ता जो गुमराह हैं।
सूरः ए क़ुल हुवल्लाहु अहद का तर्जुमा

بِسْمِ اللّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ«1
शुरु करता हूँ, उस अल्लाह के नाम से जो दुनिया में मोमिनों व काफ़िरों सब पर रहम करता है और आख़ेरत में मोमिनों पर रहम करेगा।

قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ «2»
ऐ मेरे नबी आप कह दीजिए वह अल्लाह एक है।

اللَّهُ الصَّمَدُ «3» वह सबसे बेनियाज़ है। ( उसे किसी की अवश्यक्ता नही है)

لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ «4»
न उसके कोई औलाद है और न वह किसी की औलाद है।

وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ «5»
यानी तमाम मख़लूक़ात में कोई उसके जैसा नही है।

रूकूअ और सजदे के ज़िक्र की तर्जुमा


سبحان ربي العظيم و بحمده मेरा अज़ीम अल्लाह हर बुराई और कमी से पाक व पाकीज़ा है और मैं उसकी हम्द कर रहा हूँ।

سبحان ربي الاعلي و بحمده. मेरा अल्लाह जो सबसे बड़ा है, वह हर बुराई और कमी से पाक व पाक़ीज़ा है और मैं उसकी हम्द कर रहा हूँ।

रुकूअ और सजदे के बाद के ज़िक्र का तर्जुमा


سمع الله لمن حمده यानी अल्लाह, तारीफ़ करने वालों की तारीफ़ को सुनता और क़बूल करता है।

استغفر الله ربي و اتوب اليه
मैं, उस अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी चाहता हूँ जो मेरा पालने वाला है और मैं उसकी तरफ़ पलटता हूँ।

بحول الله وقوته اقوم و اقعود
यानी मैं अल्लाह की मदद और ताक़त से उठता बैठता हूँ।

क़ुनूत का तर्जुमा

لا اله الا الله الحليم الكريم لا اله الا الله العلي العظيم سبحان الله رب السموات السبع و الارضين السبع و ما بينهن ورب العرش العظيم و الحمد لله رب العلمين
कोई इबादत के लायक़ नही है, सिवाए उस अल्लाह के जो हिल्म और करम वाला है और कोई बंदगी के लायक नही है सिवाए उस अल्लाह के जो बुलंद मर्तबा और बुज़ुर्गी व अज़मत वाला है। पाक व पाक़ीज़ा है वह अल्लाह जो सात आसमानों व ज़मीनों और उन दोनो उनके दरमियान की हर चीज़ और अर्शे अज़ीम का परवरदिगार है। हम्द व तारीफ़, उस अल्लाह से मख़सूस है जो तमाम मौजूदात का मालिक है।

तसबीहात का तर्जुम


سبحان الله و الحمد لله ولا اله الا الله و الله اكبر
अल्लाह तअला पाक व पाक़ीज़ा है, हम्द व तारीफ़ उसी के लिये मख़सूस है, उसके अलावा कोई माबूद नही है, अल्लाह उससे कहीँ बड़ा है कि उसकी तारीफ़ की जाये।

तशह्हुद का तर्जुमा


اشهد ان لا اله الا الله وحده لا شريك له
मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अलावा कोई इबादत के क़ाबिल नही है वह अकेला है उसका कोई शरीक नही है।

و اشهد ان محمدا عبده و رسوله
और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद(स) अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।

اللهم صل علي محمد وال محمد
ऐ अल्लाह, मुहम्मद और उनकी औलाद पर रहमतें नाज़िल कर।

सलाम का तर्जुमा

السلام عليك ايها النبي و رحمة الله و بركاته
ऐ नबी, आप पर सलाम हो और आप पर अल्लाह की रहमत व बरकत नाज़िल हो।

السلام علينا وعلي عباد الله الصالحين
हम पर और अल्लाह के तमाम नेक बंदों पर सलाम हो।

السلام عليكم و رحمة الله و بركاته
ऐ मोमिनों, तुम पर सलाम और तुम पर अल्लाह की रहमतें और बरकतें नाज़िल हों

मुस्तहब रोज़े


हराम और मकरूह रोज़ों के अलावा जिन का ज़िक्र किया जा चुका है साल के तमाम दिनों के रोज़े मुस्तहब है और बाज़ दिनों के रोज़े रखने की बहुत ताकीद की गई है जिन में से चंद यह हैः
(1) हर महीने की पहली और आख़री जुमेरात और पहला बुध जो महीने की दसवीं तारीख़ के बाद आये। और अगर कोई शख्स यह रोज़े न रखे तो मुस्तहब है कि उन की कज़ा करे और रोज़ा बिल्कुल न रख सकता हो तो मुस्तहब है कि हर दिन के बदले एक मुद तआम या 12/6 नुख़ुद सिक्केदार चाँदी फ़क़ीर को दे।

(2) हर महीने की तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़।

(3) रजब और शाबान के पूरे महीने के रोज़े। या उन दो महीनों में जितने रोज़े रख सकें चाहे वह एक दिन ही क्यों न हो।

(4) ईदे नौ रोज़ के दिन।

(5) शव्वाल की चौथी से नवीं तारीख तक।

(6) ज़ीक़ादा की पच्चीसवीं और इक्कीसवीं तारीख़।

(7) ज़ीक़ादा की पहली तारीख से नवीं तारीख़ (यौमे अरफ़ा) तक लेकिन अगर इंसान रोज़े की वजह से बेदार होने वाली कमज़ोरी की बिना पर यौमे अरफ़ा की दुआयें न पढ़ सके तो उस दिन का रोज़ा मकरूह है।

(8) ईदे सईदे ग़दीर के दिन (18 ज़िलहिज्जा)

(9) रोज़े मुबाहिला (24 ज़िलहिज्जा)

(10) मुहर्रामुल हराम की पहली, तीसरी और सातवीं तारीख़।

(11) रसूसले अकरम (स0) की विलादत का दिन (17 रबी-उल-अव्वल)

(12) जमादीयुल अव्वल की पंद्रहवी तारीख़।

और ईदे बेसत यानी रसूले अकरम (स0) के ऐलाने रिसालत के दिन (27 रजब) को भी रोज़ा रखना मुस्तहब है। और जो शख्स मुस्तहब रोज़ा रखे उस के लिए वाजिब नहीं है कि उसे इख़्तिताम तक ही पहुँचाये बल्कि अगर उस का काई मोमिन भाई उसे खाने की दावत दे तो मुस्तहब है कि उस की दावत क़बूल कर ले और दिन में ही रोज़ा खोल ले चाहे ज़ोहर के बाद ही क्यों न हो।


वह चीज़े जो रोज़े को बातिल करती हैं


(1581) नीचे लिखीं चन्द चीज़ें रोज़े को बातिल कर देती हैं
(1) खाना और पीना।

(2) जिमाअ (सम्भोग)

(3) इस्तिमना- यानी इंसान अपने आप या किसी दूसरे के साथ जिमाअ के अलावा कोई ऐसा काम करे जिस के नतीजे में मनी(वीर्य) निकल जाये ।

(4) अल्लाह ताआला,पैग़म्बर (स0) और आइम्मा-ए-ताहेरीन(अ0) से कोई झूटी बात मंसूब करना।

(5) गर्द व ग़ुबार हलक़ तक पहुँचाना।

(6) मशहूर क़ोल की बिना पर पूरा सर पानी में डुबोना।

(7) अज़ान तक जनाबत, हैज़ और निफ़ास की हालत में रहना।

(8) किसी सय्याल(द्रव) चीज़ से हुक़ना (इनेमा) करना।

(9) उल्टी करना।

हराम और मकरूह रोज़े


(1748) ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुरबान के दिन रोज़ा रखना हराम है और यह भी कि जिस दिन के बारे में इंसान को यह इल्म न हो कि शाबान की आख़री तारीख़ है या रमज़ानुल मुबारक की पहली तो अगर उस दिन पहली रमज़ानुल मुबारक की नियत से रोज़ा रखे तो हराम है।

(1749) अगर औरत के मुस्तहब (नफ़ली) रोज़ा रखने से शौहर की हक़ तलफ़ी होती हो तो औरत का रोज़ा रखना हराम है और एहतियाते वाजिब यह है कि चाहे शौहर की हक़ तलफ़ी न भी होती हो उस की इजाज़त के बग़ैर मुस्तहब (नफ़ली) रोज़ा न रखे।

(1750) अगर औलाद का मुस्तहब रोज़ा (माँ बाप की औलाद से शफ़क़त का वजह से) माँ बाप का लिए अज़िय्यत का सबब हो तो औलाद के लिए मुस्तहब रोज़ा रखना हराम है।

(1751) अगर बेटा बाप की इजाज़त के बग़ैर मुस्तहब रोज़ा रख ले और दिन के दौरान बाप उसे (रोज़ा रखने से) माना करे तो अगर बेटे का बाप की बात न मान ना फ़ितरी शफ़क़त की वजह से अज़ियत का सबब हो तो बेटे को चाहिये कि रोज़ा तोड़ दे।

(1752) अगर कोई शख्स जानता हो कि रोज़ा रखना उस के लिए ऐसा मुज़िर(हानी कारक) नहीं है कि जिस की परवाह की जाये तो अगरचे तबीब कहे कि मुज़िर है उस के लिए ज़रूरी है कि रोज़ा रखे और अगर कोई शख्स यक़ीन या गुमान रखता हो कि रोज़ा उस के लिए मुज़िर है तो अगरचे तबीब कहे कि मुज़िर नहीं है तो ज़रूरी है कि वह रोज़ा न रखे और अगर रोज़ा रखे जब कि रोज़ा रखना वाक़ई मुज़िर हो या क़स्दे क़ुर्बत से न हो तो उस का रोज़ा सही है।

(1753) अगर किसी शख्स को एहतेमाल हो कि रोजा रखना उस के लिए ऐसा मुज़िर्र है कि जिस की परवा की जाये और उस एहतेमाल की बीना पर (उस के दिल में) ख़ौफ़ पैदा हो जाये तो अगर उस का एहतेमाल लोगों की नज़र में सही हो तो उसे रोज़ा नही रखना चाहिये। और अगर वह रोज़ा रख ले तो गुज़िश्ता मसअले की तरह इस सूरत में भी उस का रोज़ा सही नही है।

(1754) जिस शख्स को एतेमाद हो कि रोज़ा रखना उस के लिए मुज़िर नही है अगर वह रोज़ा रख ले और मग़रिब के बाद पता चले कि रोज़ा रखना उस के लिए ऐसा मुज़िर था जिस की परवाह की जाती तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उस रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी है।

(1755) ऊपर बयान किये गये रोज़ों के अलावा और भी हराम रोज़े है जो मुफ़स्सल किताबों में मज़कूर है।

(1756) आशूर के दिन रोज़ा रखना मकरूह है और उस दिन का रोज़ा भी मकरूह है जिस के बारे में शक हो कि अरफ़े का दिन है या ईदे क़ुरबान का दिन।


वह लोग जिन पर रोज़ा रखना वाजिब नही


(1734) जो शख्स बुढ़ापे की वजह से रोज़ा न रख सकता हो या रोज़ा रखना उस के लिए शदीद तकलीफ़ का बाइस हो तो उस पर रोज़ा वाजिब नहीं है। लेकिन रोज़ा न रखने की सूरत में ज़रूरी है कि हर रोज़े के बदले एक मुद तआम यानी गेहूँ या जौ या रोटी या इन से मिलती जुलती कोई चीज़ फ़क़ीर को दे।

(1735) जो शख्स बुढ़ापे की वजह से माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़े न रखे अगर वह रमज़ानुल मुबारक के बाद रोज़े रखने के क़ाबिल हो जाये तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि जो रोज़े न रखे हों उन की क़ज़ा बजा लाये।

(1736) अगर किसी शख्स को कोई बीमारी हो जिस की वजह से उसे बहुत ज़्यादा प्यास लगती हो और वह प्यास बर्दाश्त न कर सकता हो या प्यास की वजह से उसे तकलीफ़ होती हो तो उस पर रोज़ा वाजिब नहीं है। लेकिन रोज़ा न रखने की सूरत में ज़रूरी है कि हर रोज़े के बदले एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि जितनी मिक़दार की बहुत ज़्यादा ज़रूरत हो उस से ज़्यादा पानी न पिये। और बाद में जब रोज़ा रखने के क़बिल हो जाये तो जो रोज़े न रखे हों एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उस की कज़ा बजा लाये।

(1737) जिस औरत के वज़े हम्ल(संतानुत्पत्ति) का वक़्त क़रीब हो, अगर उस का रोज़ा रखना खुद उस के लिए या उस के होने वाले बच्चे के मुज़िर्र(हानी कारक) हो तो उस पर रोज़ा रखना वाजिब नही है। लेकिन ज़रूरी है कि वह हर दिन के बदले एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और ज़रूरी है कि दोनों सूरतों में जो रोज़े न रखे हों उन की क़ज़ा बजा लाये।

(1738) जो औरत बच्चे को दूद्ध पिलाती हो और उसका दूद्ध कम हो चाहे बच्चे की माँ हो या दाया और चाहे बच्चे को मुफ़्त दूद्ध पिला रही हो अगर उस का रोज़ा रखना खुद उस के या दूद्ध पीने वाले बच्चे के लिए मुज़िर्र(हानी कारक) हो तो उस औरत पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है। लेकिन ज़रूरी है कि हर दिन के बदले एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और दोनों सूरतों में जो रोज़े न रखे हों उन की क़ज़ा करना ज़रूरी है। लेकिन एहतियाते वाजिब की बिना पर यह हुक्म सिर्फ़ इस सूरत में है जब कि बच्चे को दूद्ध पिलाने का इंहेसार उसी पर हो लेकिन अगर बच्चे को दूद्ध पिलाने का कोई और तरीक़ा हो मसलन कुछ औरतें मिल कर बच्चे को दूद्ध पिलायें तो ऐसी सूरत में उस हुक्म के साबित होने में इशकाल है।


वह चीज़ें जो रोज़ेदार के लिए मकरूह हैं


(1666) रोज़े दार के लिए कुछ चीज़ें मकरूह हैं जिन में से बाज़ यह हैं-
(1) आँख में दवा डालना और सुरमा लागाना जब कि उस का मज़ा या बू हलक़ में पहुँचे।

(2) हर ऐसा काम करना जो कि कमज़ोरी का बाइस हो मसलन फ़स्द खुलवाना और हम्माम जाना।

(3) (नाक से) निसवार खींचना इस शर्त के साथ कि यह इल्म न हो कि हलक़ तक पहुँचेगी और अगर यह इल्म हो कि हलक तक पहुँचेगी तो उस का इस्तेमाल जायज़ नहीं है।

(4) ख़ुशबूदार जड़ी बूटियां सूंघना।

(5) औरत का पानी में बैठना।

(6) शियाफ़ इस्तेमाल करना यानी किसी ख़ुश्क चीज़ से इनेमा लेना।

(7) जो लिबास पहन रखा हो उसे तर करना।

(8) दाँत निकलवाना और हर वह काम करना जिस की वजह से मुँह से खून निकले।

(9) तर लकड़ी से मिसवाक करना।

(10) बिलावजह पानी या कोई और सय्याल(द्रव) चीज़ मुँह में डालना।

और यह भी मकरूह है कि मनी के क़स्द के बग़ैर इंसान अपनी बीवी का बोसा ले या कोई शहवत अंगेज़ काम करे और अगर ऐसा काम करना मनी निकालेने के क़स्द से हो और मनी न निकले तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर रोज़ा बातिल हो जाता है।