फ़िक़्ही मसाइल
 


फ़िक़्ही मसाइल



मुजनिब इंसान के लिए नौ कार्य मकरूह हैं।


362 मुजनिब इंसान के लिए नौ कार्य मकरूह हैं।

·खाना, पीना लेकिन अगर हाथ मुँह धो लिये जायें और कुल्ली कर ली जाये तो मकरूह नही है। और अगर सिर्फ़ हाथ धो लिये जायें तो तब भी कराहत कम हो जायेगी।

·कुरआने करीम की सात से ज़्यादा उन आयतों को पढ़ना जिनमें वाजिब सजदा न हो।

·कुरआने मजीद की ज़िल्द, हाशिये या अलफ़ाज़ के बीच की ख़ाली जगह को छूना।

·कुरआने करीम को अपने साथ रखना।

·सोना- लेकिन अगर वुज़ू कर ले या पानी न होने की वजह से ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम कर ले इसके बाद सोना मकरूह नही है।

·मेंहदी या इससे मिलती जुलती किसी चीज़ से ख़िज़ाब करना।

·बदन पर तेल की मालिश करना।

·एहतिलाम(स्वप्न दोष) हो जाने के बाद संभोग करना।


मुस्तहब ग़ुस्ल

(651) इस्लाम की मुक़द्दस शरीअत में बहुत से ग़ुस्ल मुस्तहब हैं जिन में से कुछ यह हैं:
जुमे के दिन का ग़ुस्ल
1-
इस का वक़्त सुब्ह का अज़ान के बाद से सूरज के ग़ुरूब होने तक है और बेहतर यह है कि ग़ुस्ल ज़ोहर के क़रीब किया जाये (और अगर कोई शख़स उसे ज़ोहर तक अंजाम न दे तो बेहतर यह है कि अदा और क़ज़ा की नियत किये बग़ैर ग़रूबे आफ़ताब तक बजालाये) और अगर जुमे के दिन ग़ुस्ल न करे तो मुस्तब है कि हफ़ते के दिन सुबह से ग़ुरूबे आफ़ताब तक उस का क़ज़ा बजा लाये। और जो शख़स जानता हो कि उसे जुमे के दिन पानी मयस्सर न होगा तो वह रजाअन जुमेरात के दिन ग़ुस्ल अंजाम दे सकता है और मुस्तहब है कि ग़ुस्ले जुमा करते वक़त यह दुआ पढें:
अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहु ला शरीकलहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुहू अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व आलि मुहम्मद व इजअलनी मिनत तव्वाबीना व इजअलनी मिनल मुत्ताहिरीन।

(2-7) माहे रमाज़ान की पहली और सतरहवीं रात और उन्नीस्वी, इक्कीससवीं, और तेईसवीं रातों के पहले हिस्से का ग़ुस्ल और चौबीसवीं रात का ग़ुस्ल।

(8-9) ईदुलफ़ित्र और ईदे क़ुरबान के दिन का ग़ुस्ल, उस का वक़्त सुब्ह की अज़ान से सूरज ग़ुरूब होने तक है और बेहतर यह है कि ईद की नमाज़ से पहले कर लिया जाये।

(10-11) माहे ज़िल हिज्जा के आठवें और नवें दिन का ग़ुस्ल और बेहतर यह है कि नवें दिन का ग़ुस्ल ज़ोहर के नज़दीक किया जाये।

(12) उस शख़्स का ग़ुस्ल जिसने अपने बदन का कोई हिस्सा ऐसी मय्यित के बदन से मस किया हो जिसे ग़ुस्ल दिया जा चुका हो हो।

(13) अहराम का ग़ुस्ल।

(41) हरमे मक्का में दाख़िल होने का ग़ुस्ल।

(15) मक्काए मुकर्रमा में दाखिल होने का ग़ुस्ल।

(16) ख़ान-ए-काबा की ज़ियारत का ग़ुस्ल।

(17) काबे में दिखिल होने का गुस्ल।

(18) ज़िब्ह और नहर के लिये ग़ुस्ल।

(19) बाल मूनडने के लिए गुस्ल।

(20) हरमे मदीना में दिख़िल होने का ग़ुस्ल।

(21) मदीन-ए- मुनव्वरा में दाख़िल होने का ग़ुस्ल।

(22) मस्जिदुन नबी में दाख़िल होने का ग़ुस्ल।

(23) नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहे व आलिही वसल्लम की क़ब्रे मुतह्हर से विदा होने का ग़ुस्ल।

(24) दुश्मन के साथ मुबाहिला करने का ग़ुस्ल।

(25) बच्चे के पैदा होने के बाद उसे ग़ुस्ल देना।

(26) इस्तिख़ारा करने का ग़ुस्ल।

(27) तलबे बारान का ग़ुस्ल।

652 फ़ोक़ाहा ने मुस्तब ग़ुस्लों के बाब में बहुत से ग़ुस्लों का ज़िक्र फ़रमाया जिन में से चंद यह हैं:

(1) माहे रमाज़ानुल मुबारक की तमाम ताक़[1] रातों का ग़ुस्ल और उस का आख़री दहाई की तमाम रातों का ग़ुस्ल और उस का तीसवीं रात के आख़री हिस्से में दूसरा ग़ुस्ल।

(2) माहे ज़िल हिज्जा के चौबीसवें दिन का ग़ुस्ल।

(3) ईदे नोरोज़ के दिन और पंद्रहवीं शाबान और नवीं और सतरहवीं रबी उल अव्वल और ज़ीक़ादा के पच्चीसवें दिन का ग़ुस्ल।

(4) उस औरत का ग़ुस्ल जिस ने अपने शौहर के अलावा किसी और के लिये ख़ुशबू इस्तेमाल की हो।

(5) उस शख़्स का ग़ुस्ल जो मसती की हालत में सो गया हो।

(6) उस शख़्स का ग़ुस्ल जो किसी सूली चढ़े हुए इंसान को देखने गया हो और उसे देखा भी हो लेकिन अगर इत्तेफ़ाक़न या मज़बूरी की हालत में नज़र गई हो या अगर शहादत (गवाही) देने गया हो तो ग़ुस्ल मुस्तहब नही है।

(7) दूर या नज़दीक से मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की ज़ियारत करने के लिए ग़ुस्ल, लेकिन अहवत यह है कि यह तमाम ग़ुस्ल रजा का नियत से बजा लाये जायें।
(654) अगर इंसान के ज़िम्मे कई मुस्तहब ग़ुस्ल हों और वह शख़्स सब की निय्यत कर के एक ग़ुस्ल कर ले तो काफ़ी है।


अज़ान व इक़ामत

925. हर मर्द और औरत के लिए मुस्तहब है कि रोज़ाना की वाजिब नमाज़ों से पहले अज़ान व इक़ामत कहे। इनके अलावा दूसरी वाजिब और मुस्तहब नमाज़ों से पहले अज़ान व इक़ामत कहना मशरूअ नही है। लेकिन अगर ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुरबान की नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ी जा रही हो तो मुस्तहब है कि नमाज़ से पहले तीन बार अस्सलात कहे।

926. मुस्तहब है कि बच्चे की पैदाइश के पहले दिन या नाफ़ उखड़ने से पहले उसके दाहिने कान में अज़ान और बायें कान में इक़ामत कही जाये।

927. अज़ान में अठ्ठारह जुमले हैं।

अल्लाहु अकबर, चार बार

अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह, दो बार

अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह, दो बार

हय्या अलस्सलात, दो बार

हय्या अलल फ़लाह, दो बार

हय्या अला ख़ैरिल अमल, दो बार

अल्लाहु अकबर, दो बार

ला लाहा इल्लल्लाह, दो बार ।

और इक़ामत में सतरह जुम्ले हैं, जो इस तरह हैं।

अल्लाहु अकबर, दो बार

अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह, दो बार

अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह, दो बार

हय्या अलस्सलात, दो बार

हय्या अलल फ़लाह, दो बार

हय्या अला ख़ैरिल अमल, दो बार

क़द क़ा-मतिस्सलात, दो बार

अल्लाहु अकबर, दो बार

ला इलाहा इल्लल्लाह, एक बार।

928. अशहदु अन्ना अमीरल मोमिनीना अज़ान व इक़ामत का हिस्सा नही है, लेकिन अगर अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह के बाद क़ुरबत की नियत से कहा जाये तो बेहतर है।


अज़ान व इक़ामत का तर्जमा

अल्लाहु अकबर यानी अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह इससे बहुत बड़ा है कि उसकी तारीफ़ की जा सके।

अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह, यानी मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अलावा और कोई माबूद (इबादत योग्य) नही है।

अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह, यानी मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (स.) अल्लाह के रसूल हैं।

अशहदु अन्ना अमीरल मोमेनीना अलीयन वली युल्लाह, यानी मैं गवाही देता हूँ कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम मोमिनों के अमीर और अल्लाह के वली हैं।

हय्या अलस्सलात, यानी नमाज़ के लिए जल्दी करो।

हय्या अलल फ़लाह, यानी कामयाबी के लिए जल्दी करो।

हय्या अला ख़ैरिल अमल, यानी बेहतरीन अमल के लिए जल्दी करो।

क़द क़ा-मतिस्सलात, यानी नमाज़ क़ायम हो गई।

ला इलाहा इल्लल्लाह, यानी अल्लाह के अलावा और कोई माबूद (इबादत योग्य) नही है।

929. ज़रूरी है कि अज़ान व इक़ामत का तर्जमा के जुमलों के बीच ज़्यादा फ़ासला न दिया जाये, अगर उनके जुमलों के बीच मामूल से ज़्यादा फ़ासला दे दिया जाये, तो ज़रूरी है कि अज़ान व इक़ामत का तर्जमा दोबारा पढ़ी जाये।

930. अगर अज़ान व इक़ामत का तर्जमा में आवाज़ को गले में इस तरह घुमाये कि ग़िना हो जाये, यानी अज़ान व क़ामत इस तरह कहे जैसे गाने बजाने और खेल कूद की महफ़िलों में आवाज़ निकालने का रिवाज है, तो यह हराम है और अगर ग़िना न हो तो मकरूह है।

931. जब दो नमाज़ों को मिलाकर पढा जा रहा हो तो अगर पहली नमाज़ के लिए अज़ान कही हो तो बाद वाली नमाज़ के लिए अज़ान साक़ित है। चाहे दो नमाज़ों को मिलाकर पढ़ना बेहतर हो या न हो, मसलन अर्फ़े के दिन (नवीं ज़िलहिज) ज़ोह्र व अस्र की नमाज़ों को मिला कर पढ़ना और ईदे क़ुरबान की रात में मग़रिब व इशा की नमाज़ को मिला कर पढ़ना उस इंसान के लिए जो मशअरिल हराम में मौजूद हो इन सूरतों में अज़ान के साक़ित होने के लिए शर्त है कि दोनों नमाज़ों के बीच कोई फ़ासला न हो या फ़ासला बहुत कम हो, लेकिन नमाज़े नाफ़िला और ताक़ीबात से कोई फ़र्क़ नही पड़ता। एहतियाते वाजिब यह है कि इन सूरतों में अज़ान मशरूइय्यत की नियत से न कही जाये, बल्कि आख़िरी दो सूरतों में अज़ान कहना मुनासिब नही है, चाहे वह मशरूइय्यत की नियत से भी न हो।

932. अगर नमाज़े जमाअत के लिए अज़ान व इक़ामत का तर्जमा कही जा चुकी हो तो जो इंसान जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ रहा हो, उसके लिए ज़रूरी नही है कि वह अपनी नमाज़ के लिए अज़ान व इक़ामत का तर्जमा कहे ।

933. अगर कोई इंसान नमाज़ के लिए मस्जिद में जाये और देखे कि नमाज़े जमाअत ख़त्म हो चुकी है तो जब तक सफ़े टूट न जाये और लोग इधर उधर न हो जाये वह अपनी नमाज़ के लिए अज़ान व इक़ामत का तर्जमा न कहे यानी इन दोनों का कहना इमुस्तहबे ताकीदी नही है। बल्कि अगर वह अज़ान कहना चाहे तो बेहतर यह है कि बहुत आहिस्ता कहे और अगर दूसरी नमाज़े जमाअत क़ायम करना चाहता हो तो हर गिज़ अज़ान व इक़ामत का तर्जमा न कहे।


अज़ान व इक़ामत के कुछ अहकाम

936. अगर कोई इंसान किसी दूसरे की अज़ान जो एलान या जमाअत की नमाज़ के लिए कही जाए सुने तो मुस्तहब है कि उसका जो हिस्सा सुने उसे ख़ुद भी आहिस्ता आहिस्ता दोहराए।

937. अगर किसी इंसान ने किसी दूसरे् की अज़ान व इक़ामत सुनी हो तो चाहे वह ुसने उन जुमलो को दोहराया हो या न दोहराया हो तो अगर अज़ान व इक़ामत और ुस नमाज़ के बीच जो वह पढ़ना चाहता है ज़्यादा फ़ासिला न हुआ हो तो वह अपनी नमाज़ के लिए अज़ान व इक़ामत कह सकता है।

938. अगर कोई मर्द औरत की ्ज़ान को लज़्ज़त के क़स्द से सुने तो उसकी अज़ान साक़ित नही होगी, बल्कि ्गर मर्द का िरादा लज़्ज़त हासिल करना न भी हो तब भी उसकी अज़ान साक़ित होना मुशकिल है।

939. ज़रूरी है कि नमाज़े जमाअत की अज़ान व िक़ामत मर्द कहे, लेकिन औरतों की नमाज़े जमाअत में अगर औरत अज़ान व इक़ामत कहे तो काफ़ी है।

940. ज़रूरी है कि इक़ामत अज़ान के बाद कही जाये, िसके अलावा इक़ामत में यह भी मोतबर है कि खड़े हो कर और हदस से पाक हो कर (यानी वुज़ू या ग़ुस्ल या तयम्मुम की हालत में) कही जाये।

941. अगर कोई िंसान अज़ान व इक़ामत के जुमले तरतीब के बग़ैर कहे मसलन हय्या अलल फ़लाह को हय्या अलस्सलः से पहले कहे तो ज़रूरी है कि जहँ से तरतीब बिगड़ी हो वहाँ से दुबारा कहे।

942. ज़रूरी है कि अज़ान व िक़ामत के बीच फ़ासिला न हो और अगर उन दोनों के बीच इतना फ़ासिला हो जाये कि जो अज़ान कही जा चुकी हो, उसे उस इक़ामत की अज़ान शुमार न किया जासके तो दोबारा अज़ान कहना मुस्तहब है। इसके अलावा अगर अज़ान व इक़ामत और नमाज़ के बीच इतना फ़ासिला हो जाये कि वह अज़ान व इक़ामत उस नमाज़ की अज़ान व िक़ामत न कही जा सके तो उस नमाज़ के लिए दोबारा अज़ान व इक़ामत कहना मुस्तहब है।

943. अज़ान व िक़ामत का सही अर्बी में कहना ज़रूरी है। लिहाज़ा अगर कोई िंसान ुन्हें ग़लत अरबी में कहे या एक हर्फ़ की जगह कोई दूसरा हर्फ़ कहे या इउनका तर्जमा उर्दू या हिन्दी में कहे सही नही है।

944. ज़रूरी है कि अज़ान व इक़ामत को नमाज़ का वक़्त दाख़िल हो जाने के बाद कहा जाये। अगर कोई िंसान जान बूझ कर या भूल चूक की बिना पर अज़ान व िक़ामत को वक़्त से पहले कहे तो बातिल है। लेकिन अगर ऐसी सूरत हो कि वक़्त नमाज़ के दरमियान दाख़िल हो तो वह नमाज़ सही होगी, इसको मसला न. 752 में बयान किया जा चुका है।

945. अगर कोई िंसान इक़ामत कहने से पहले शक करे कि अज़ान कही है या नही तो ज़रूरी है कि पहले अज़ान कहे और ्गर इक़ामत कहने में मशग़ूल हो जाए और शक करे कि अज़ान कही है या नही तो अज़ान कहना ज़रूरी नही है।

946. अगर अज़ान व इक़ामत कहते वक़्त कोई शक करे कि इससे पहला जुमला कहा है या नही तो जिस जुमले के बारे में उसे शक हो वह जुमला कहे , लेकिन अगर उसे अज़ान व इक़ामत का कोई जुमला कहते हुए शक हो कि उसने इससे पहले वाला जुमला कहा है या नही तो उस जुमले का कहना ज़रूरी नही है।

947. अज़ान कहते वक़्त मुस्तहब है कि इं्सान वुज़ू से हो, किबला रुख़ खड़ा हो, दोनों हाथों को कानों पर रखे और ूँची आवाज़ में अज़ान कहे, दो जुमलों के बीच थोड़ा फ़ासिला रखे और दो जुमलों के बीच बाते न करे।

948. इक़ामत कहते वक़्त मुस्तहब है कि इंसान का बदन साकिन हो और इक़ामत को अज़ान के मुक़ाबले में आहिस्ता कहा जाये और उसके दो जुमलों को स में न मिलाया जाये। लेकिन दो जुमलों के बीच फ़ासिला नही देना चाहिए जितना अज़ान के जुमलों के बीच दिया जाता है।

949. अज़ान कहने के बाद और इक़ामत कहने से पहले एक क़दम आगे बढ़ना या थोड़ी देर के लिए बैठना या सजदा करना या अल्लाह का ज़िक्र करना या दुआ पढ़ना या थोड़ी देर के लिए साकित हो जाना या कोई बात कहना या दो रकत नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है। लेकिन सुबह की अज़ान व इक़ामत के बीच कलाम करना और नमाज़े मग़रिब की अज़ान व िक़ामत के बीच दो रकत नमाज़ पढ़ना मुस्तहब नही है।

950. मुस्तहब है कि जिस इंसान को अज़ान देने पर मुक़र्रर (नियुक्त) किया जाये वह आदिल और वक़्त की पहचान रखने वाला हो यह भी मुस्तहब है कि वह उँची जगह खड़ा हो कर बलन्द आवाज़ में अज़ान कहे।

छः शर्तों के साथ अज़ान व इक़ामत साक़ित है

934. जिस जगह पर कोई नमाज़े जमाअत ताज़ा ख़त्म हुई हो, अगर वहाँ पर कोई इंसान सफ़ें टूटने और लोगों के इधर उधर होने से पहले, अपनी फुरादा नमाज़ पढ़ना चाहे या किसी दूसरी ऐसी नमाज़े जमाअत में शरीक होना चाहे जो अभी बरपा हो रही हो, तो उससे इन छः शर्तों के साथ अज़ान व इक़ामत साक़ित है।

1. नमाज़े जमाअत मस्जिद में हो। अगर मस्जिद में न हो तो अजद़ान व क़ामत का साक़ित होना मालूम नही।
2. उस नमाज़ के लिए अज़ान व इक़ामत कही जा चुकी हो।
3. नमाज़े जमाअत बातिल न हो।
4. उस इंसान की नमाज़ और नमाज़े जमात एक ही जगह पर हो। लिहाज़ा अगर नमाज़े जमाअत मस्जिद के अन्दर पढ़ी जाये और वह इंसान फ़ुरादा नमाज़ मस्जिद की छत पर पढ़ना चाहे तो मुस्तहब है कि वह अज़ान व इक़ामत कहे।
5. नमाज़े जमाअत अदा हो। लेकिन यह शर्त नही है कि ख़ुद उसकी नमाज़ भी अदा हो।
6. उस इंसान की नमाज़ और नमाज़े जमाअत का वक़्त मुशतरक हो मसलन दोनों नमाज़े ज़ोह्र या नमाज़े अस्र पढ़ें। या नमाज़े ज़ोह्र जमाअत से पढ़ी जा रही हो और वह नमाज़े अस्र पढ़े या वह नमाज़े ज़ोह्र पढ़े और जमाअत की नमाज़, नमाज़े अस्र हो, लेकिन अगर नमाज़े जमाअत अस्र की हो और वह आखिरी वक़्त में चाहे कि नमाज़े मगरिब अदा पढ़े तो उससे अज़ान व इक़ामत साक़ित नही होगी।

935. जो शर्तें इससे पहले मस्अले में बयान की गई हैं अगर कोई इंसान उनमें से तीसरी शर्त के बारे में शक करे यानी उसे शक हो कि नमाज़े जमाअत सही थी या नही तो उससे अज़ान व इक़ामत साक़ित है। लेकिन अगर इसके अलावा बाक़ी पाँच शर्तों के बारे में शक करे तो बेहतर है कि रजा–ए- मतलूबियत की नियत से अज़ान व इक़ामत कहे।

मस्जिद के अहकाम


909. मस्जिद की ज़मीन, अन्दरूनी व बाहरी छत और मस्जिद की दीवार को नजिस करना हराम है। और जिस इंसान को पता चले कि इनमें से कोई जगह नजिस हो गई है, तो ज़रूरी है कि उसकी निजासत को फ़ौरन पाक करे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि मस्जिद की दीवार के बाहरी हिस्से को भी नजिस न किया जाये और अगर वह नजिस हो जाये तो निजासत को पाक करना ज़रूरी नही है। लेकिन अगर दीवार के बाहरी हिस्से का नजिस करना मस्जिद की बेहुरमती का सबब हो, तो क़तन हराम है और निजासत को इतनी मिक़दार में साफ़ करना ज़रूरी है जिससे बेहुरमति न हो।

910.अगर कोई इंसान मस्जिद को पाक करने पर क़ादिर न हो, या उसे मस्जिद पाक करने के लिए किसी दूसरे की मदद की ज़रूरत हो और उसे कोई न मिल रहा हो, तो उस पर मस्जिद को पाक करना वाजिब नही है। लेकिन अगर वह यह समझता हो कि अगर किसी दूसरे को इस निजासत के बारे में बतायेगा तो वह इसे पाक कर देगा, तो ज़रूरी है कि वह किसी दूसरे को बताए।

911. अगर मस्जिद की कोई ऐसी जगह नजिस हो गई हो जिसे खोदे या तोड़े बग़ैर, पाक करना मुमकिन न हो तो उस जगह को खोदना या तोड़ना ज़रूरी है, लेकिन यह सिर्फ़ उस हालत में है, जबकि कुछ हिस्सा ही तोड़ना पडे, या मस्जिद को बेहुरमती से बचाने के लिए पूरे हिस्से को ही तोड़ने ज़रूरी हो, इस सूरत के अलावा मस्जिद को तोड़ने में इशकाल है। खोदी हुई जगह को भरना और तोड़ी हुई जगह को बनाना वाजिब नही है। लेकिन अगर मस्जिद की कोई चीज़, मसलन ईंट नजिस हो गई हो, तो अगर मुमकिन हो तो उसे पानी से पाक करके उसकी असली जगह पर लगाना ज़रूरी है।

912. अगर कोई इंसान मस्जिद को ग़स्ब करके उस पर अपना घर या कोई ऐसी ही चीज़ बनाले, या मस्जिद इतनी टूट फूट जाये कि उसे मस्जिद न कहा जा सके तो भी एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसे नजिस न किया जाये, लेकिन अगर वह नजिस हो जाये, तो उसे पाक करना वाजिब नही है।

913. आइम्मा –ए- अहले बैत अलैहिस्सलाम में से किसी भी इमाम के हरम को नजिस करना हराम है। अगर उनके हरमों में से कोई हरम नजिस हो जाये और उसका नजिस रहना उसकी बेहुरमती का सबब हो तो उसको पाक करना वाजिब है। बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर बेहुरमति न होती हो तब भी पाक किया जाये।

914. अगर मस्जिद की चटाई नजिस हो जाये तो उसे पाक करना ज़रूरी है। अगर चटाई का नजिस होना मस्जिद की बेहुरमति शुमार होता हो और वह धोने से खऱराब होती हो और नजिस हिस्से को काटना बेहतर हो, तो उसे काटना ज़रूरी है।

915. अगर किसी ऐने निजासत या नजिस चीज़ को मस्जिद में ले जाने से मस्जिद की बेहुरमति होती हो तो उसे मस्जिद में ले जाना हराम है। बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर बेहुरमति न होती हो तब भी उसे मस्जिद में न लेजायें।

916. अगर मस्जिद में मजलिसे अज़ा के लिए शामयाना टाँगा जाये, क़नात लगाई जाये, फ़र्श बिछाया जाये, सियाह पर्दे लटकाये जायें और चाय का सामान उसके अन्दर लेजाया जाये तो अगर इन चीज़ों से मस्जिद का तक़द्दुस पामाल न होता हो और नमाज़ पढ़ने में भी कोई रुकावट न हो तो ऐसा करने में कोई हरज नही है।

917. एहतियाते वाजिब यह है मस्जिद को सोने से न सजाया जाये और एहतियाते मुस्तहब यह है कि मस्जिद को इंसान व हैवान जैसे जानदारों की तस्वीरों से भी न सजाया जाये।

918. अगर मस्जिद टूट फूट भी जाये तब भी न उसे बेचा जा सकता है और न ही मिलकियत और सड़क में शामिल किया जा सकता है।

919. मस्जिद के दरवाज़ों ख़िड़कियों और दूसरी चीज़ों को बेचना हराम है। अगर मस्जिद टूट फूट जाये तब भी उन चीज़ों को उसी मस्जिद की मरमम्त के लिए इस्तेमाल किया जाये। अगर उस मस्जिद के काम की न रही हों तो ज़रूरी है कि किसी दूसरी मस्जिद के काम में लाया जाये और अगर दूसरी मस्जिदों के काम की भी न रही हो तो उन्हें बेचा जा सकता है और उससे मिलने वाली रक़म को, अगर मुमकिन हो तो उसी मस्जिद की मरम्मत पर ख़र्च करना चाहिए वरना किसी दूसरी मस्जिद पर भी ख़र्च किया जा सकता है।

920. मस्जिद बनाना और बोसीदा मस्जिद की मरम्मत करना मुस्तहब है। अगर मस्जिद इतनी ज़्यादा बोसीदा हो गई हो कि उसकी मरम्मत न कराई जा सकती हो तो उसे गिरा कर दोबारा बनाया जा सकता है। बल्कि अगर मस्जिद सही हो तब भी उसे बड़ा बनाने के लिए गिरा कर दोबारा बनाया जा सकता है।

921. मस्जिद को साफ़ सुथरा रखना और उसमें चराग़ जलाना मुस्तहब है। अगर कोई मस्जिद में जाना चाहे तो मुस्तहब है कि ख़ुशबू लगाये पाक और अच्छा लिबास पहने और अपने जूतों के तलवों को देखे कि कहीँ कोई निजासत तो नही लगी है। मस्जिद में दाख़िल होते वक़्त पहले दाहिना पैर रखे और बाहर आते वक़्त पहले बांया पैर बाहर निकाले। यह भी मुस्तहब है कि सबसे पहले मस्जिद में पहुँचे और सबके बाद मस्जिद से बाहर आये।

922. अगर कोई इंसान मस्जिद में दाख़िल हो तो मुस्तहब है कि दो रकत नमाज़े ताहिय्यत व मस्जिद के एहतेराम की नियत से पढ़े और अगर कोई दूसरी वाजिब या मुस्तहब नमाज़ पढ़ले तो वह भी काफ़ी है।

923. अगर इंसान मजबूर न हो तो मस्जिद में सोना, काम करना, दुनियावी कामों के बारे में बात चीत करना और ऐसे शेर पढ़ना जिनमें कोई काम की बात व नसीहत न हो, मकरूह है। इसी तरह मस्जिद में थूकना, नाक सिनकना और बलग़म फेंकना मकरूह है, बल्कि कुछ हालतों में तो हराम है। इसके अलावा गुम शुदा इंसान व चीज़ को तलाश करने के लिए ज़ोर से बोलना भी मकरूह है। लेकिन ऊँची आवाज़ में अज़ान कहने में कोई हरज नही है।

924. दीवाने को मस्जिद में दाखिल होने देना मकरूह है और इसी तरह उस बच्चे को भी दाखिल होने देना मकरूह है जो नमाज़ियों के लिए ज़हमत बनता हो या जिसके बारे में एहतेमाल हो कि वह मस्जिद को नजिस कर देगा। इन दो सूरतों के अलावा बच्चे को मस्जिद में आने देने में कोई हरज नही है। उस इंसान का भी मस्जिद में जाना मकरूह है जिसने लहसुन प्याज़ और इन्हीं जैसी दूसरी चीज़ें खाईं हों और उनकी बू लोगों को ना गवार गुज़रती हो।
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ताक़ राते उन रातों को कहा जाता है जिनकी गिनती में जोड़े नही होते जैसे पहली, तीसरी, पाँचवीं, सातवीं....।