मुसलमानो के दरमियान क़ुरआन की क्या अहमियत है?
 


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और फिर फ़रमाता है:
ऐ रसूल कह दो कि अगर (सारे जहान के) आदमी और जिन इस बात पर इकठ्ठे और मुत्तफ़िक़ हों कि क़ुरआन की मिस्ल ले आयें तो (नामुम्किन) उसके बराबर नही ला सकते अगरचे (उस कोशिश में) वह एक दूसरे की मदद भी करें।
(सूरह बनी इसराईल आयत 88)
और फिर फ़रमाता है:
क्या यह लोग कहते हैं कि उस शख़्स (तुम) ने उस (क़ुरआन) को अपनी तरफ़ से घड़ लिया है तो तुम उन से साफ़ साफ़ कह दो कि अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो (ज़्यादा नही) ऐसी ही दस सूरतें अपनी तरफ़ से घड़ के ले आओ।
(सूरह हूद आयत 13)
और फिर फ़रमाता है:
आया यह लोग कहते हैं कि इस क़ुरआन को रसूल ने झूट मूठ बना कर ख़ुदा से मंसूब कर दिया है, पस ऐ रसूल उन से कह दो कि उसकी मानिन्द सिर्फ़ एक ही सूरह लिख कर ले आएँ।
(सूरह युनुस आयत 38)
और फिर (उन लोगों का) पैग़म्बरे अकरम (स) से मुक़ाबला करते हुए फ़रमाता है:
और जो चीज़ (क़ुरआन) हम ने अपने बंदे पर नाज़िल की है अगर तुम्हे उसमें शक व शुब्हा है तो ऐसे इंसान की तरह जो लिखा पढ़ा नही और जाहिलियत के माहौल में उस की नश व नुमा हुई है, इस तरह का एक क़ुरआनी सूरह लिख कर ले आओ।
(सूरह बक़रा आयत 23)
और फिर इख़्तिलाफ़ और तज़ाद न रखने के मुतअल्लिक़ बराबरी और मुक़ाबला करते हुए फ़रमाया है:
आया यह लोग कुरआन पर ग़ौर नही करते और अगर यह क़ुरआन ख़ुदा के अलावा किसी और की तरफ़ से नाज़िल हुआ होता तो उसमे बहुत ज़्यादा इख़्तिलाफ़ पाये जाते क्योकि इस दुनिया में हर चीज़ में तग़य्युर और तरक़्क़ी पज़ीरी के क़ानून में शामिल है और वह इख़्तिलाफ़ अजज़ा और अहवाल से मुबर्रा नही होती और अगर क़ुरआन इंसान का बनाया हुआ होता तो जैसा कि तेईस साल के अरसे में थोड़ा थोड़ा नाज़िल होता रहा तो यह क़ुरआन) इख़्तिलाफ़ात और तज़ादात से मुबर्रा नही हो सकता था और इस तरह हरगिज़ यकसाँ न होता।
(सूरह निसा आयत 82)