मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ
 
मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ




क़ुरआन और अदब

1. क़ुरआन रब की ख़ास इनायत का नाम है।

क़ुरआन नज़मो ज़बते शरीयत का नाम है।

क़ुरआन एक ज़िंदा हक़ीक़त का नाम है।

क़ुरआन ज़िंदगी की ज़रूरत का नाम है।

क़ुरआन एक किताबे इलाही जहाँ में है।

क़ुरआन के बग़ैर तबाही जहाँ में है।

1. क़ुरआन किरदगार की रहमत का नाम है।

क़ुरआन ज़ुल जलाल की अज़मत का नाम है।

क़ुरआन अहलेबैते रिसालत का नाम है।

क़ुरआन ही तो मक़सदे बेसत का नाम है।

नाज़िल किया है इसको ख़ुदा-ए- जलील ने ।

पहुँचाया है रसूल तलक जिबरईल ने।

1. क़ुरआन अंबिया की कहानी का नाम है।

क़ुरआन ला मकां की निशानी का नाम है।

क़ुरआन दीने हक़ की रवानी का नाम है।

क़ुरआन मुस्तफ़ा की जवानी का नाम है।

क़ुरआं के इल्म की नही हद, बेपनाह है।

क़ुरआन एक किताब नही, दर्सगाह है।

1. क़ुरआन है नबी की नबूव्वत को मोजज़ा।

क़ुरआन है रमूज़ की कसरत को मोजज़ा।

क़ुरआन है ख़ुदा की सदाक़त को मोजज़ा।

क़ुरआन आज भी है बलाग़त का मोजज़ा।

ऐसी कोई किताब नही कायनात में।

क़ुरआन का जवाब नही कायनात में।

1. ताज़ीम इस किताब की हक़ के वली ने की।

काबे में सबसे पहले नबी के वसी ने की।

क़ब्ल अज़ नुज़ूल इसकी तिलावत अली ने की।

तसदीक़ इस कलाम की मेरे नबी ने की।

क़ुरआनो अहलेबैत का ये इत्तेसाल है।

क़ुरआन हो अली के बिना ये मुहाल है।

1. है ज़िक्र नूह का, कहीं आदम का तज़किरा।

ईसा का ज़िक्र है, कहीं मरियम का तज़किरा।

है जा बजा रसूले मुकर्रम का तज़किरा।

और है कहीं पे ख़िलक़ते आलम का तज़किरा।

हिजरत का तज़किरा, कहीं ज़िक्रे ग़दीर है।

है ज़िक्रे फ़ातिमा, कहीं ज़िक्रे अमीर है।

1. क़ुरआन को गिरोह में बट कर न देखिये।

लफ़ज़ो मआनी इसके उलट कर न देखिये।

औराक़ इसके सिर्फ़ पलट कर न देखिये।

कुरआं को अहले बैत से हट कर न देखिये।

क़ुरआन दीने हक़ की ज़रूरत का नाम है।

क़ुरआन अहलेबैत की सीरत का नाम है।




कुरआन की फ़साहत व बलाग़त



अल्लाह के पवित्र कुरआन मजीद, और प्रसिद्ध ग्रंथ एक ज्ञान व हुनर, फ़िक्री व अक़ली, मददी व मानबी के व्यतीत एक आसमानी मोज़ेज़ा भी है, क्योंकी कुरआन मजीद बूलन्द ध्वनी के साथ जनसाधारण को अमंत्रन किया है. कि हमारे उदाहरण एक पवित्र कुरआन को ले आएं, इस का कारण यह है की अरब के लोग एक विशेष लतीफ़ बयान में जौक़ व शौक़ रख़ते थे, और उन लोगों के ज़बान की फ़साहत व बलाग़त एक विशेष स्थान व उन्नती पर थी. लेकिन इस के बावजूद कुरआन के सम्मुख़ और उस का उत्तर लाने में कोई शक्ति नहीं रख़ता था, अगर वह लोग कुरआन की विरुद्ध में कोई शक्ति रख़ता यक़ीनन युद्ध के मैदाने में प्रवेश करता। और विसात व कुरआन के प्रकाश के यूग तक, इस का विरुद्ध करता, क्योंकि ख़ूद कुरआन मजीद आपनी विरुद्ध दल को उसी तरह एक प्रसिद्ध और ग्रंथ लाने के लिए दवत की है ताकि हमारे जैसा एक प्रसिद्ध ग्रंथ लेके अएं। लेकिन अरब के दर्मियान समस्त प्रकार कविता कहने वालें और उस समय के अपनी ज़बान में फ़साहत व बलाग़त रख़ने वालें जो उस यूग से लेकर आज के यूग तक अरब ज़बान पर एक हल-चल मचा के रख़े है. उन लोगों ने भी क़बूल किया हैं कि कुरआन की ज़बानी और रसुल की बयानी में कोई पार्थक नहीं है। कुरआन उन सब अदबीयात और भाषा की मिठी को दफ़न कर दिया है।


अतीत इतिहास लिख़ने वालों और अरब के इतिहास लिख़ने वालों ने क़बूल करके बयान दिया हैः कि कुरआन प्रत्येक यूग के लिए मोज़ेज़ा व वेनज़ीर है। कोई उस के विरुद्ध नहीं कर सकता और सब समय और सब यूग के लिए मोज़ेज़ा है।


हाँ, कुरआन एक ऐसा प्रसिद्ध ग्रंथ है जो सब समय के लिए जीवित और इंसान को इंनसानीयत की तरफ़ उन्नती कराता है। ख़ूश वख्ति, साआदत, परित्राण को एक भीत्ति क़रार दिया है (( यक़ीनन पवित्र कुरआन इंसानों को एक ऐसा सही पथ का निर्देशना करता है जो मूस्तक़ीम और सीधा रास्ता है। और इमान्दार व्यक्तियों को खूश ख़बरी देते है. कि उन लोगों को अच्छे पूरष्कार मिलेगा)) (12) इस विनापर पवित्र कुरआन मजीद पैग़म्बरे अकरम (स0) के लिए सब समय मोज़ेज़ा और सूरज की किरण कि तरह चमकने वाला है। और अल्लाह के वही है, और अल्लाह के वही कभी ख़ामोश होने वाला नहीं है। अल्लाह का फ़रमान है ((मैं ने इस पवित्र कुरआन को नाज़िल किया हूँ और मैं उस को संरक्षण करुऊँगा))। (13)






क़ुरआन और अहकाम


तहारत

يا ايها الذين امنوا كلوا من طيبات ما رزقناكم

1. ऐ मोमिनों हमारे दिये हुए पाक रिज़्क़ को खाओ।(बक़रह 172)

وَلاَ تَقْرَبُوهُنَّ حَتَّىَ يَطْهُرْنَ

1. औरतों से उस वक़्त नज़दीकी न करो जब तक वह हैज़ से पाक न हो जायें। (बक़रह 222)

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ إِذَا قُمْتُمْ إِلَى الصَّلوةِ فاغْسِلُواْ وُجُوهَكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ إِلَى الْمَرَافِقِ وَامْسَحُواْ بِرُؤُوسِكُمْ وَأَرْجُلَكُمْ إِلَى الْكَعْبَينِ وَإِن كُنتُمْ جُنُبًا فَاطَّهَّرُواْ وَإِن كُنتُم مَّرْضَى أَوْ عَلَى سَفَرٍ أَوْ جَاء أَحَدٌ مَّنكُم مِّنَ الْغَائِطِ أَوْ لاَمَسْتُمُ النِّسَاء فَلَمْ تَجِدُواْ مَاء فَتَيَمَّمُواْ صَعِيدًا طَيِّبًا فَامْسَحُواْ بِوُجُوهِكُمْ وَأَيْدِيكُم مِّنْهُ مَا يُرِيدُ اللّهُ لِيَجْعَلَ عَلَيْكُم مِّنْ حَرَجٍ وَلَكِن يُرِيدُ لِيُطَهَّرَكُمْ وَلِيُتِمَّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

1. ऐ ईमान वालो जब भी नमाज़ के लिए खड़े हो तो पहले अपने चेहरों को और कोहिनियों तक हाथों को धोओ और अपने सिर और गट्टे तक पैरों का मसह करो और अगर जनाबत की हालत में हों तो ग़ुस्ल करो और अगर मरीज़ हो या सफ़र में हों या पख़ाना वग़ैरह किया हो या औरतों के साथ हमबिस्तर हुए हो और पानी न मिले तो पाक मिट्टी से तयम्मुम कर लो, इस तरह कि अपने चेहरे व हाथों का मसह कर लो कि ख़ुदा तुम्हारे लिए किसी तरह की ज़हमत नही चाहता, बल्कि यह चाहता है कि तुम्हें पाक व पाकीज़ा बना दे और तुम पर अपनी नेअमतों को तमाम कर दे। शायद तुम इस तरह उसके शुक्र गुज़ार बंदे बनजाओ। ।(मायदह 6)

وَيُنَزِّلُ عَلَيْكُم مِّن السَّمَاء مَاء لِّيُطَهِّرَكُم بِهِ

1. अल्लाह ने आसमान से पानी नाज़िल किया ताकि तुम उससे तहारत हासिल करो। (अनफ़ाल11)

وَأَنزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً طَهُورًا

1. हम ने आसमान से पाक करने वाला पानी नाज़िल किया। (फ़ुरक़ान 48)

وَثِيَابَكَ فَطَهِّرْ وَالرُّجْزَ فَاهْجُرْ

1. ऐ पैग़म्बर अपने लिबास को पाक रखें व कसाफ़त सके दजूर रहें। (मद्दस्सिर 4-5)

नमाज़

إِنَّ الصّلوةَ كَانَتْ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ كِتَابًا مَّوْقُوتًا

1. नमाज़ मोमिनों पर वक़्त की पाबंदी के साथ वाजिब कर दी गई है।(निसा103)

حَافِظُواْ عَلَى الصَّلَوَاتِ والصَّلوةِ الْوُسْطَى

2. तमाम नमाज़ों की और ख़ुसूसन दरमियानी नमाज़ की पाबंदी करो। (बक़रह 238)

وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلوةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا

3. अपने अहल को नमाज़ का हुक्म दो और फिर सब्र करो। (ताहा 132)

أَقِمِ الصَّلاَةَ لِدُلُوكِ الشَّمْسِ إِلَى غَسَقِ اللَّيْلِ وَقُرْآنَ الْفَجْرِ إِنَّ قُرْآنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا

4. ज़वाले आफ़ताब, तारीकिये शब और फ़ज्र के वक़्त नमाज़ क़ाइम करो। (इसरा 78)

فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ

5. नमाज़ के वक़्त अपना रुख़ मस्जिदुल हराम की तरफ़ कर लिया करो। (बक़रह 144)

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا ارْكَعُوا وَاسْجُدُوا وَاعْبُدُوا رَبَّكُمْ

6. ईमान वालो! रुकूअ, सजदह और इबादते परवर दिगार करो।(हज77)

وَلاَ تَجْهَرْ بِصَلاَتِكَ وَلاَ تُخَافِتْ بِهَا

7. तमाम नमाज़ें न बलन्द आवाज़ से पढ़ो न आहिस्ता। (इसरा 110)

وَأَقِمِ الصَّلوةَ لِذِكْرِي

8. मेरे ज़िक्र के लिए नमाज़ क़ाइम करो। (ताहा14)

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نُودِي لِلصَّلوةِ مِن يَوْمِ الْجُمُعَةِ فَاسْعَوْا إِلَى ذِكْرِ اللَّهِ

9. ऐ ईमान लाने वालों ! जब जुमे के दिन नमाज़ के लिए बुलाया जाये तो तो अल्लाह के ज़िक्र के लिए दौड़ पड़ो। (जुमुआ 9)

وَإِذَا ضَرَبْتُمْ فِي الأَرْضِ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَقْصُرُواْ مِنَ الصَّلوةِ

10. जब तुम सफ़र करो तो नमाज़ें कस्र कर दो। (निसा101)

فَإنْ خِفْتُمْ فَرِجَالاً أَوْ رُكْبَانًا

11. खौफ़ की मंज़िल में हो तो पयादा या सवारी पर ही नमाज़ पढ़लो। (बक़रह239)

وَأَقِيمُواْ الصَّلوةَ وَآتُواْ الزَّكَوةَ وَارْكَعُواْ مَعَ الرَّاكِعِينَ

12. नमाज़ क़ाईम करो, ज़कात दो और जमाअत के साथ रुकूअ करो। (बक़रह 43)
रोज़ा

أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ

1. ईमान वालों तुम पर रोज़े वाजिब कर दिये गये हैं। (बक़रह 183)

شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِيَ أُنزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِّنَ الْهُدَى وَالْفُرْقَانِ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ

1. जो रमज़ान के महीने में हाज़िर रहे उसका फ़र्ज़ है कि रोज़े रखे। (बक़रह185)

أُحِلَّ لَكُمْ لَيْلَةَ الصِّيَامِ الرَّفَثُ إِلَى نِسَآئِكُمْ

1. तुम्हारे लिए रोज़े की रात में औरते से नज़दीकी जाइज़ है। (बक़रह187)

हज

وَلِلّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلاً

1. बैतुल्लाह के सफ़र की इसतेताअत रखने वालों पर हज्जे बैतुल्लाह वाजिब है। (आलि इमरान97)

وَأَتِمُّواْ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلّهِ فَإِن أُحْصِرْتُمْ فَمَا اسْتَيْسَرَ مِنَ الْهَدْيِ

2. हज व उमरह को अल्लाह के लिए तमाम करो और मजबूर हो जाओ तो क़ुरबानी दे कर आज़ाद हो जाओ। (बक़रह 196)

الْحَجُّ أَشْهُرٌ مَّعْلُومَاتٌ فَمَن فَرَضَ فِيهِنّ الْحَجَّ فَلاَ رَفَثَ وَلاَ فُسُوقَ وَلاَ جِدَالَ فِي الْحَجِّ

3. हज मुऐय्यन महीनों का अमल है और इसके दौरान जिमाअ, झ़ूट और जिदाल जाइज़ नही है।(बक़रह 197)

فَإِذَا أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُواْ اللّهَ عِندَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ

4. अराफ़ात से आगे बढ़ो तो मशअरल हराम में अल्लाह का ज़िक्र करो।(बक़रह 198)

وَاتَّخِذُواْ مِن مَّقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى

5. मक़ामे इब्रहीम को मुसल्ला बना कर नमाज़ अदा करो।(बक़रह125)

أَفِيضُواْ مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ ثُمّ

6. फिर तमाम लोगों के साथ मिना की तरफ़ बढ़ जाओ। (बक़रह199)

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ لاَ تَقْتُلُواْ الصَّيْدَ وَأَنتُمْ حُرُمٌ

7. ईमान वालो! एहराम की हालत में शिकार मत करना( मायदह95)
ज़कात

خُذْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِم بِهَا

1. पैग़मबर आप उनके माल से ज़कात ले लिजिये ताकि ये पाको पाकीज़ा हो जायें।(तौबा 103)

أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ أَنفِقُواْ مِن طَيِّبَاتِ مَا كَسَبْتُمْ وَمِمَّا يَا أَخْرَجْنَا لَكُم مِّنَ الأَرْضِ

2. अपनी पाकीज़ा कमाई में से राहे ख़ुदा में ख़र्च करो। (बक़रह267)

فَآتِ ذَا الْقُرْبَى حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ

3. क़राबतदार, मिसकीन और मुसाफ़िर को उसका हक़ दो। (रूम38)

إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاء وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللّهِ وَابْنِ السَّبِيلِ

4. सदक़ात, फ़क़ीरों, मिसकीनों,मक़रूज़,मोल्लिफ़तुल क़ुलूब, मुसाफ़िर ग़ुरबत ज़दा और राहे ख़ुदा के लिए है। (तौबह60)
ख़ुमुस

وَاعْلَمُواْ أَنَّمَا غَنِمْتُم مِّن شَيْءٍ فَأَنَّ لِلّهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ

1. याद रखो, तुम्हारे हर फ़ायदे में अल्लाह, रसूल और रसूल के क़राबतदारों का,यतीमों का, मिसकीनों का और मुसाफिरों का ख़ुमुस वाजिब है। (अनफ़ाल41)

जिहाद

كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌ لَّكُمْ

1. तुम पर जिहाद वाजिब कर दिया गया अगरचे तुम्हें नागवार है।(बकरह216)

وَجَاهِدُوا فِي اللَّهِ حَقَّ جِهَادِهِ

2. अल्लाह की राह में जिहाद का हक़ अदा करो। (हज78)

وَقَاتِلُواْ فِي سَبِيلِ اللّهِ الَّذِين يُقَاتِلُونَكُمْ وَلاَ تَعْتَدُواْ

3. तुम उन लोगों से अल्लाह की राह में जंग करो जो तुम से जंग करे लेकिन ज़्यादती न करना।(बक़रह190)
अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर

وَلْتَكُن مِّنكُمْ أُمَّةٌ يَدْعُونَ إِلَى الْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ

1. तुम में से एक जमाअत नेकी की दावत, अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर के लिए होनी चाहिए।( आलि इमरान 104)

كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ

2. तुम बेहतरीन उम्मत हो जिसे लोगों के लिए निकाला गया है। तुम अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर करते हो। (आलि इमरान 110)








क़ुरआन और अहले बैत





इस्लामी रिवायतों की बिना पर क़ुरआने मजीद की बे शुमार आयतें अहले बैत अलैहिम अस्सलाम के फ़ज़ाइल व मनाक़िब के गिर्द घूम रही हैं और इन्हीं मासूम हस्तियों के किरदार के मुख़्तलिफ़ पहलुओं की तरफ़ इशारा कर रही हैं। बल्कि कुछ रिवायतों की बिना पर पूरे कुरआन का ताल्लुक़ इनके मनाक़िब, इनके मुख़ालिफ़ों के नक़ाइस, इनके आमाल व किरदार और इनकी सीरत व हयात के आईन व दस्तूर से है। लेकिन यहाँ पर सिर्फ़ उन्हीं आयतों की तरफ़ इशारा किया जा रहा है जिनके शाने नुज़ूल के बारे में आलमे इस्लाम के आम मुफ़स्सिरों ने भी इक़रार किया है कि इनका नुज़ूल अहले बैते अतहार के मनाक़िब या उनके मुख़ालिफ़ों के नक़ाइस के सिलसिले में हुआ है।



इस्लामी रिवायतों की बिना पर क़ुरआने मजीद की बे शुमार आयतें अहले बैत अलैहिम अस्सलाम के फ़ज़ाइल व मनाक़िब के गिर्द घूम रही हैं और इन्हीं मासूम हस्तियों के किरदार के मुख़्तलिफ़ पहलुओं की तरफ़ इशारा कर रही हैं। बल्कि कुछ रिवायतों की बिना पर पूरे कुरआन का ताल्लुक़ इनके मनाक़िब, इनके मुख़ालिफ़ों के नक़ाइस, इनके आमाल व किरदार और इनकी सीरत व हयात के आईन व दस्तूर से है। लेकिन यहाँ पर सिर्फ़ उन्हीं आयतों की तरफ़ इशारा किया जा रहा है जिनके शाने नुज़ूल के बारे में आलमे इस्लाम के आम मुफ़स्सिरों ने भी इक़रार किया है कि इनका नुज़ूल अहले बैते अतहार के मनाक़िब या उनके मुख़ालिफ़ों के नक़ाइस के सिलसिले में हुआ है।

उलमा-ए-हक़ ने इस सिलसिले में बड़ी बड़ी किताबें लिखी हैं और मुकम्मल तफ़सील के साथ आयात व उनकी तफ़्सीर का तज़करा किया है। हम यहाँ पर उसका सिर्फ़ एक हिस्सा ही पेश कर रहे हैं ।

बिस्मिल्लाह हिर्रहमानिर्रहीम

1- “وَكَذَلِكَ جَعَلْنَاكُمْ أُمَّةً وَسَطًا لِّتَكُونُواْ شُهَدَاء عَلَى النَّاسِ”(बक़रा 144)

उम्मते वसत हम अहले बैत हैं।(अमीरूलमोमीनीन(अ))(शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 92)

2- “فَمَنْ حَآجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْاْ نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ”(आले इमरान 62)

यह आयत मुबाहेले के मौक़े पर अहलेबैत की शान में नाज़िल हुई है।(तफ़सीरे जलालैन, सहीय मुस्लिम किताब फ़ज़ाएलुस सहाबा, ग़ायुम मराम पेज 300 वग़ैरह।)

3- “وَمَن يَعْتَصِم بِاللّهِ فَقَدْ هُدِيَ إِلَى صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ”(आले इमरान 101)

अली(अ) उनकी ज़ौजा और उनकी औलाद हुज्ज्ते ख़ुदा है। इनसे हिदायत हासिल करने वाला सिराते मुस्तक़ीम की तरफ़ हिदायत पाने वाला है।(रसूले अकरम(स))(शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 58)

4- “وَاعْتَصِمُواْ بِحَبْلِ اللّهِ جَمِيعًا وَلاَ تَفَرَّقُواْ”(आले इमरान 104)

(بِحَبْلِ اللّهِ) से मुराद हम अहले बैत(अ) हैं।(इमाम सादिक़(अ))( शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 131)

5- “يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ أَطِيعُواْ اللّهَ وَأَطِيعُواْ الرَّسُولَ وَأُوْلِي الأَمْرِ مِنكُمْ”(निसा 60)

(وَأُوْلِي الأَمْرِ) से मुराद आईम्मा ए अहले बैत हैं।(इमाम जाफ़र सादिक़(अ))( यनाबीऊल मवद्दत पेज 194)

6- “وَلَوْ رَدُّوهُ إِلَى الرَّسُولِ وَإِلَى أُوْلِي الأَمْرِ مِنْهُمْ لَعَلِمَهُ الَّذِينَ يَسْتَنبِطُونَهُ مِنْهُمْ”(निसा 84)

(وَأُوْلِي الأَمْرِ) से मुराद आईम्मा ए अहले बैत हैं।(इमाम मुहम्मद बाक़िर, इमाम जाफ़र सादिक़(अ))( यनाबीऊल मवद्दत पेज 321)

7- “يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ اتَّقُواْ اللّهَ وَكُونُواْ مَعَ الصَّادِقِينَ”(तौहा 119)

(सादिक़ीन मुहम्मद व आले मुहम्मद(अ) हैं।(इब्ने उमर) (ग़ायतुल मराम पेज 148)

8- “بَقِيَّةُ اللّهِ خَيْرٌ لَّكُمْ”(हूद 86)

(بَقِيَّةُ اللّهِ) क़ाएमे आले मुहम्मद की हस्ती है।(इमाम मुहम्मद बाक़िर(अ)(नुरूल अबसार पेज 172)

9- “أَلَمْ تَرَ كَيْفَ ضَرَبَ اللّهُ مَثَلاً كَلِمَةً طَيِّبَةً كَشَجَرةٍ طَيِّبَةٍ”(इब्राहीम 25)

(شَجَرةٍ) ज़ाते पैग़म्बर है। फ़रअ अली हैं। शाख़ फ़ातेमा ज़हरा हैं। और समरात हज़राते हसनैन हैं।(इमाम मुहम्मद बाक़िर(अ)( शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 311)

10- “فَاسْأَلُواْ أَهْلَ الذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لاَ تَعْلَمُونَ”(नहल 44)

(أَهْلَ الذِّكْرِ) हम अहले बैत हैं।(इमाम मुहम्मद बाक़िर(अ)(जामेऊल बयान फ़ी तफ़सीरिल क़ुरआन जिल्द 14 पेज 108)

11- “وَآتِ ذَا الْقُرْبَى حَقَّهُ”(इसरा 27)

(ذَا الْقُرْبَى) से मुराद हम अहलेबैत है।(इमाम ज़ैनुल आबेदीन)(ग़ायतुम मराम पेज 323)

12- “يَوْمَ نَدْعُو كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ”(इसरा 71)

आईम्मा ए हक़ अली औलादे अली(अ) हैं।(इब्ने अब्बास)(ग़ायतुल मराम पेज 272)

13- “وَلَقَدْ كَتَبْنَا فِي الزَّبُورِ مِن بَعْدِ الذِّكْرِ أَنَّ الْأَرْضَ يَرِثُهَا عِبَادِيَ الصَّالِحُونَ”(अंबीया 105)

यह क़ाएमे आले मुहम्मद और उनके असहाब हैं।(सादिक़ैन(अ)( यनाबीऊल मवद्दत पेज 510)

14- “ذَلِكَ وَمَن يُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِن تَقْوَى الْقُلُوبِ”(हज 33)

(شَعَائِرَ اللَّهِ) हम अहले बैत हैं।(अमीरूल मोमीनीन(अ)(यनाबीऊल मवद्दत)

15- “لِيَكُونَ الرَّسُولُ شَهِيدًا عَلَيْكُمْ وَتَكُونُوا شُهَدَاءَ عَلَى النَّاسِ”(हज 78)

यह आयत रसूले अकरम और आईम्मा औलादे रसूल के बारे में है।(अमीरूल मोमीनीन(अ)( ग़ायतुल मराम पेज 265)

16- “فَإِذَا نُفِخَ فِي الصُّورِ فَلَا أَنسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍ وَلَا يَتَسَاءَلُونَ”(मोमीनून 102)

रोज़े क़यामत मेरे हसब व नसब के अलावा सारे हसब व नसब मुनक़ता हो जायेगें।(रसूले अकरम)( शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 407)

17- “…….مَثَلُ نُورِهِ كَمِشْكَاةٍ فِيهَا مِصْبَاحٌ”(नूर 35)

(مِشْكَاةٍ) जनाबे फ़ातेमा, مِصْبَاحٌ हसनैन, شَجَرَةٍ مُّبَارَكَةٍ हज़रते इब्राहीम, نُّورٌ عَلَى نُور) इमाम बादा इमाम हैं, (इमाम अबुल हसन)( ग़ायतुल मराम पेज 315)

18- “وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُم فِي الْأَرْضِ”(नूर 56)

इन हज़रात से मुराद अहले बैते ताहेरीन हैं।(अब्दुल्लाह इब्ने मुहम्मद अल हनफ़ीया)( शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 413)

19- “وَالَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَاجِنَا وَذُرِّيَّاتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍ وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا”(फ़ुरक़ान 74)

अज़वाज ख़दीजा, ज़ुर्रियत फ़ातेमा, क़र्रातुलऐन हसनैन और इमाम हज़रत अली है।(शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 416)

20- “وَنُرِيدُ أَن نَّمُنَّ عَلَى الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا فِي الْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةً وَنَجْعَلَهُمُ الْوَارِثِينَ”(क़सस 6) यह सिलसिला ए इमामत है जो ता क़यामत बाक़ी रहने वाला है।(इमाम जाफ़रे सादिक़)( शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 430)

21- “وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا لَمَّا صَبَرُوا وَكَانُوا بِآيَاتِنَا يُوقِنُونَ”(सजदा 25)

अल्लाह ने औलादे हारून में 12 क़ाएद क़रार दिये थे और औलादे अली(अ) में 11 इमाम बनाये हैं। जिससे कुल 12 हो गये।(इब्ने अब्बास)( शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 455)

22- “إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا”(अहज़ाब 34)

यह आयत अली व फ़ातेमा व हसनैन और रसूले अकरम की शान में नाज़िल हुई है।(उम्मे सलमा)(फ़ज़ाएलुल ख़मसा जिल्द 2 पेज 219)

23- “إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا”(अहज़ाब 57)

मेरे साथ अहलेबैत पर सलावात ज़रूरी है।(रसूले अकरम)(तफ़सीरे मराग़ी जिल्द 22 पेज 34)

24- “قُلْ مَا سَأَلْتُكُم مِّنْ أَجْرٍ فَهُوَ لَكُمْ”(सबा 48)

अजरे रिसालत से मुराद मुहब्बते अहले बैत है जिससे तमाम अवलिया ए ख़ुदा की मुहब्बत पैदा होती है।(इमाम मुहम्मद बाक़िर(अ)(यनाबीऊल मवद्दत 512)

25- “وَقِفُوهُمْ إِنَّهُم مَّسْئُولُونَ”(साफ़ात 25)

रोज़े क़यामत सबसे पहले मरहले पर मुहब्बते अहलेबैत के बारे में सवाल किया जायेगा।(रसूले अकरम)(ग़ायतुल मराम पेज 259)

26- “سَلَامٌ عَلَى إِلْ يَاسِينَ”(साफ़ात 131)

(إِلْ يَاسِينَ) आले मुहम्मद हैं।(इब्ने अब्बास)( ग़ायतुल मराम पेज 382)

27- “إِلَى يَوْمِ الْوَقْتِ الْمَعْلُومِ”(साद 82)

(يَوْمِ الْوَقْتِ الْمَعْلُوم) रोज़े ज़हूरे क़ाएमे आले मुहम्मद है।(इमाम जाफ़र सादिक़(अ)( यनाबीऊल मवद्दत पेज 509)

28- “قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَى”(शूरा 24)

(الْقُرْبَى) मुरसले आज़म के क़राबत दार हैं।(सईद इब्ने जबीर)(फ़ी ज़िलालिल क़ुरआन जिल्द 7 और दूसरी बहुत सा किताबें)

29- “وَبِالْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ”(ज़ारियात 19)

यह आयत अली, फ़ातेमा और हसनैन के बारे में नाज़िल हुई है।(इब्ने अब्बास)(शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 195)

30- “مَرَجَ الْبَحْرَيْنِ يَلْتَقِيَانِ”(रहमान 20)

(الْبَحْرَيْنِ) अली व फ़ातेमा(اللُّؤْلُؤُ وَالْمَرْجَانُ) हसन व हुसैन हैं।(इब्ने अब्बास) (दुर्रे मनसूर जिल्द 6 पेज 142)

31- “وَالسَّابِقُونَ السَّابِقُونَ”(वाक़ेया 11)

यह अली(अ) और उनके शिया हैं।(रसूले अकरम(स)(शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 216)

32- “وَأَصْحَابُ الْيَمِينِ مَا أَصْحَابُ الْيَمِينِ”(वाक़ेया 28)

हम और हमारे शिया असहाबे यमीन हैं।(इमाम बाक़िर(अ)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 293)

33- “هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَى وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ”(सफ़ 10)

इसका मिसदाक़ ज़हूरे क़ाएम के वक़्त सामने आयेगा।(इमाम जाफर सादिक़(अ)( यनाबीऊल मवद्दत पेज 508)

34- “إِنَّ هَذِهِ تَذْكِرَةٌ فَمَن شَاءَ اتَّخَذَ إِلَى رَبِّهِ سَبِيلًا”(मुज़म्म्ल 20)

जिसने मुझसे और मेरे अहलेबैत से तमस्सुक किया उसने ख़ुदा का रास्ता इख़्तेयार कर लिया।(रसूले अकरम(स))(सवाएक़े मोहरेक़ा पेज 90)

35- “.............هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنسَانِ حِينٌ مِّنَ الدَّهْرِ لَمْ يَكُن شَيْئًا مَّذْكُورًا”(दहर 1- 32)

यह सूरह अहलेबैत की शान में नाज़िल हुआ है।(और साएल जिबरईल थे जिनके ज़रीये क़ुदरत ने अहलेबैत का इम्तेहान लिया था।)(इब्ने अब्बास)( तफ़सीरे क़ुरतुबी, ग़ायतुल मराम पेज 368)

36- “وَوَالِدٍ وَمَا وَلَدَ”(बलद 3)

अली(अ) और औलादे अली मुराद हैं।(इमाम मुहम्मद बाक़िर(अ)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 331)

37- “..........وَالشَّمْسِ وَضُحَاهَا”(शम्स 1-4)

(َالشَّمْسِ) रसूले अकरम,( الْقَمَرِ) अली,( النَّهَارِ) हसनैन (اللَّيْلِ) बनी ऊमय्या हैं।(इब्ने अब्बास)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 333)

38- “وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ”(तीन 1-8)

(وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ) हसन व हुसैन, (وَطُورِ سِينِينَ) अमीरूल मोमीनीन(अ) (الْبَلَدِ الْأَمِينِ) रसूले अकरम(स) हैं।(इमाम मूसा काज़िम(अ)( शवाहीदुत तनज़ील)

39- “إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أُوْلَئِكَ هُمْ خَيْرُ الْبَرِيَّةِ”(बय्येना 8-9)

आले मुहम्मद(خَيْرُ الْبَرِيَّةِ) हैं।(रसूले अकरम(स)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 364)

40- “إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ”(कौसर 1)

कौसर हम अहलेबैत की मंज़िले जन्नत का नाम है।(रसूले अकरम(स)( शवाहीदुत तनज़ील जिल्द 2 पेज 376)