मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ
 
मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ




इमाम महदी (अ) क़ुरआन और दीगर आसमानी किताबों में




हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का नामे नामी तमाम आसमानी किताबों तौरैत, ज़बूर, इन्जील में मौजूद है।
क़ुरआने करीम की कई आयात में आपके बारे में तफ़्सीर व तावील की गई है।
पैगम्बरे इस्लाम (स.) की ज़बाने मुबारक से मक्के, मदीने में, मेराज के मौक़े पर और दूसरी मुनासेबतों पर तमाम ही आइम्मा-ए मासूमीन के बारे मुख़तलिफ़ हदीसे जारी हुई हैं।

अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का नामे नामी तमाम आसमानी किताबों तौरैत, ज़बूर, इन्जील में मौजूद है।
क़ुरआने करीम की कई आयात में आपके बारे में तफ़्सीर व तावील की गई है।
पैगम्बरे इस्लाम (स.) की ज़बाने मुबारक से मक्के, मदीने में, मेराज के मौक़े पर और दूसरी मुनासेबतों पर तमाम ही आइम्मा-ए मासूमीन के बारे मुख़तलिफ़ हदीसे जारी हुई हैं।
अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने भी अपने बेटे महदी का ज़िक्र किया और हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने भी इमाम महदी का तज़केरा फ़रमाया है। इसी तरह हज़रत इमाम हसन और हज़रत इमाम हुसैन हज़रत इमाम सज्जाद हज़रतिमाम बाक़िर हज़रत इमाम सादिक़ हज़रत इमाम रिज़ा हज़रत इमाम मुहम्द तक़ी हज़रत इमाम अली नक़ी व हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिमु अस्सलाम ने भी अपने बेटे इमाम महदी का ज़िक्र किया है।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के असहाब में से अबू बकर, उमर, उस्मान, अब्दुल्लाह इब्ने उमर, अबू हुरैरा, समरा बिन जुन्दब, सलमान, अबुज़र, अम्मार और इनके अलावा भी बहुत से असहाब ने हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का ज़िक्र किया है।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की बीवियों में से आइशा, हफ़सा, उम्मे सलमा और कई दूसरी बीवियों ने हज़रत इमाम महदी का ज़िक्र किया है।
ताबेईन में औन बिन हुजैफ़ा, इबादियः बिन रबी और क़ुतादा जैसे अफ़राद ने इमाम महदी अलैहिस्सलाम का ज़िक्र किया है।
तफ़्सीर की किताबों में से, तफ़्सीरे तबरी, तफ़्सीरे राज़ी, तफ़्सीरुल ख़ाज़िन, तफ़्सीरे आलूसी, तफ़्सीरे इब्ने असीर, तफ़्सीरे दुर्रुल मनसूर वग़ैरह में आप हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का ज़िक्र पायेंगे।
इसी तरह आपको सहाए सित्ता, बुख़ारी, मुस्लिम, इब्ने माजा, अबू दाऊद, निसाई और अहमद में भी हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का ज़िक्र मिलेगा।
हदीस की दूसरी किताबें जैसे मुस्तदरके सहीहैन, मजमा उज़ ज़वाइद, मुसनदे शाफ़ई, सुनने दार क़ुतनी, सुनने बहीक़ी, मुसनदे अबी हनीफ़ा, क़न्ज़ुल उम्माल बग़ैरा में हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का ज़िक्र मौजूद है।
तारीख़ की किताबों में से तारीख़े तबरी, तारीख़े इब्ने असीर, तारीख़े मसूदी, तारीख़े सयूती, तीरीख़े इब्ने ख़लदून वग़ैरा में भी हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के बारे में लिखा गया है।
मुसलमानों के मुख़तलिफ़ फ़िर्क़ों के उलमा हज़रत इमाममहदी पर एतेक़ाद रखते हैं। उन्होंने इसका ज़िक्र अपनी किताबों, ख़ुत्बों वग़ैरा में कसरत से किया है। इन उलमा में हनफ़ी, शाफ़ी, हम्बली और मालकी सभी शामिल हैं। इनके अलावा भी दूसरे मज़हबों के उलमा और उनके मानने वालों ने हज़रत का ज़िक्र किया है।
क़ुरआनीमुक़ारेनत
क़ुरआने करीम पर तहक़ीक़ी नज़र डालने से हम इन नतीजों पर पहुँचते हैं।





इंसान के जीवन पर क़ुरआने करीम के प्रभाव

लेखक- डा. रज़ाई
उर्दू अनुवादक- सैय्यद अली अब्बास नक़वी
हिन्दी अनुवादक- सैय्यद क़मर ग़ाज़ी



क़ुरआने करीम विभिन्न प्रकार से इंसान के जीवन को प्रभावित करता है।

जैसे क़राअत, हिफ़्ज़, फ़ह्म और अमल के द्वारा यह प्रभाव इंसान के व्यक्तिगत और समाजिक दोनो जीवनों पर पड़ता है।यहाँ पर हम इन प्रभावों का संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं।

इंसान के व्यक्तिगत जीवन पर कराअत के प्रभाव
1- अल्लाह की याद

क़रआन पढ़ने वाला अल्लाह की याद से तिलावत शुरू करता है अर्थात कहता है कि बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम और यही ज़िक्र उसको अल्लाह की तरफ़ आकर्षित करता है।यूँ तो क़ुरआन पढ़ने वाला कभी भी अल्लाह की ओर से अचेत नही रहता । और यह बात उसकी आत्मा के विकास में सहायक बनती है।
2- हक़ के दरवाज़ों का खुलना

इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने कहा हैं कि बिस्मिल्लाह पढ़ कर हक़ के दरवाज़ो को खोलो । बस क़ुरआन पढ़ने के लाभों और प्रभावों में से एक यह भी है कि जब क़ुरआन पढ़ने वाला क़ुरआन पढ़ने के लिए बिस्मिल्लाह कहता है तो उसके लिए हक़ के दरवाज़े खुल जाते हैं।
3- गुनाह के दरवाज़ों का बन्द होना

इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने कहा कि आउज़ु बिल्लाहि मिनश शैतानिर्रजीम पढ़कर गुनाहों के दरवाज़ों को बंद करो। इस तरह जब इंसान क़ुरआन पढ़ने से पहले आउज़ुबिल्लाह पढ़ता है तो इससे गुनाहों के दरवाज़े बन्द हो जाते हैं।
4- क़ुरआन पढ़ने से पहले और बाद में दुआ माँगने का अवसर

क़ुरआन पढ़ने के नियमों में से एक यह है कि क़ुरआन पढ़ने से पहले और बाद में दुआ करनी चाहिए। दुआ के द्वारा इंसान अल्लाह से वार्तालाप करता है। और उससे अपनी आवश्यक्ता की पूर्ती हेतू दुआ माँगता है। और इसका परिणाम यह होता है कि अल्लाह उसकी बात को सुनता है और उसकी आवश्यक्ताओं की पूर्ती करता है। और यह बात इंसान के भौतिक व आध्यात्मिक विकास मे सहायक बनती है।
5- क़ुरआन पढ़ने वाले का ईनाम

इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के इस कथन का वर्णन करते हैं कि जो इंसान क़ुरआन को खोल कर इसकी तिलावत करे और इसको खत्म करे तो अल्लाह की बारगाह में इसकी एक दुआ क़बूल होती है। जी हाँ दुआ का क़बूल होना ही क़ुरआन पढ़ने वाले का इनआम है।
6- क़ुरआन ईमान की दृढता का कारण बनता है

क़ुरआने करीम के सूरए तौबा की आयत न. 124 में वर्णन हुआ है कि जब कोई सूरह नाज़िल होता है तो इन में से कुछ लोग यह व्यंग करते हैं कि तुम में से किस के ईमान में वृद्धि हुई है। तो याद रखो कि जो ईमान लाने वाले हैं उनही के ईमान में वृद्धि होती है और वही खुश भी होते हैं।

सूरए इनफ़ाल की दूसरी आयत में वर्णन होता है कि अगर उनके सामने क़ुरआन की आयतों की तिलावत की जाये तो उनके ईमान में वृद्धि हो जाये।
7- क़ुरआने करीम शिफ़ा( स्वास्थ्य) प्रदान करता है

क़रआने करीम परोक्ष रोगो के लिए दवा है। इंसान के आत्मीय रोगों का उपचार क़ुरआन के द्वारा ही होता है।जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए फ़ुस्सेलत की आयत न. 44 के अन्तर्गत वर्णन हुआ है कि ऐ रसूल कह दीजिये कि यह किताब ईमान वालों के लिए शिफ़ा और हिदायत है। इससे यह अर्थ निकलता है कि क़ुरआन पढ़ने वाले को सबसे पहले क़ुरआन की शिफ़ा प्राप्त होती है।
8- अल्लाह की रहमत का उतरना

क़ुरआन पढ़ने वाले पर अल्लाह की रहमत की बारिश होती है।
9- अल्लाह की तरफ़ से हिदायत(मार्ग दर्शन)

क़ुरआने करीम हिदायत की किताब है। अल्लाह की तरफ़ से उन्ही लोगों को हिदायत प्राप्त होती है जो मुत्तक़ी हैं और क़ुरआन की ज़्यादा तिलावत करते हैं।
10- बाह्य और आन्तरिक पवित्रता

इंसान क़ुरआन पढ़ते समय उसके नियमों का पालन करता है। यह कार्य उसकी आत्मा के उत्थान और पवित्रता मे सहायक बनता है। जब क़ुरआन पढ़ने वाला क़ुरान पढ़ने से पहले वज़ू या ग़ुस्ल करता है तो इस कार्य से उसके अन्दर एक विशेष प्रकार का तेज पैदा होता है। जो इसकी आन्तरिक पवित्रता मे सहायक बनता है।
11- सेहत

इंसान क़ुरआन पढ़ने से पहले बहुत सी तैय्यारियाँ करता है जैसे मिस्वाक करना,वज़ू या ग़ुस्ल करना पाक साफ़ कपड़े पहनना आदि। और यह सब कार्य वह हैं जिनसे इंसान की सेहत की रक्षा होती है।
12- अहले क़ुरआन होना

क़ुरआने करीम को पढ़ने और इससे लगाव होने की वजह से इंसान पर इसके बहुत से प्रभाव पड़ते है। जिसके फल स्वरूप वह क़ुरआन का अनुसरण करने वाला व्यक्ति बन जाता है। अर्थात उसके अन्दर क़ुरआनी अखलाक़, आस्था और पवित्रता पैदा हो जाती है।दूसरे शब्दों मे कहा जा सकता है कि वह क़ुरआन के रंग रूप में ढल जाता है।
13- विचार शक्ति का विकास

जब इंसान क़ुरआन पढ़ता है और उसके भाव में चिंतन करता है तो इस चिंतन फल स्वरूप उसकी विचार शक्ति की क्षमता बढती है। जिसका प्रभाव उसके पूरे जीवन पर पड़ता है। विशेष रूप से उसके ज्ञान के क्षेत्र को प्रभावित करता है।
14- आखोँ की इबादत

हज़रत रसूले अकरम स. ने फ़रमाया कि क़ुरआन के शब्दों की तरफ़ देखना भी इबादत है।यह इबादत केवल उन लोगो के भाग्य मे आती है जो क़ुरआन को पढ़ते हैं।
15-संतान का प्रशिक्षण

जब माता पिता हर रोज़ पाबन्दी के साथ घर पर क़ुरआन पढ़ेंते हैं तो उनकी संतान पर इसके बहुत अच्छे प्रभाव पड़ते हैं। इस प्रकार इस कार्य से अप्रत्यक्ष रूप से उनका प्रशिक्षण होता है। जिसके फल स्वरूप वह धीरे धीरे क़ुरआन के भाव से परिचित हो जाते हैं।
16- गुनाहों का कफ़्फ़ारा

हज़रत रसूले अकरम स. ने कहा कि क़ुरआन पढ़ा करो क्यों कि यह गुनाहों का कफ़्फ़ारा है।
17- दोज़ख की ढाल

हज़रत रसूले अकरम स. ने कहा कि क़ुरआन का पढ़ना दोज़ख (नरक) के लिए ढाल है और इसके द्वारा इंसान अल्लाह के अज़ाब से सुरक्षित रहता है। जी हाँ अगर कोई इंसान क़ुरआन को पढ़े और उसकी शिक्षाओं पर क्रियान्वित हो तो उसका रास्ता नरकीय लोगों से अलग हो जाता है।
18- अल्लाह से वार्तालाप

हज़रत रसूले अकरम स. ने कहा कि अगर तुम में से कोई व्यक्ति यह इच्छा रखता हो कि अल्लाह से बाते करे तो उसे चाहिए कि वह क़ुरआन को पढ़े।
19- क़ुरआन पढ़ने से दिल ज़िन्दा होते हैं

हज़रत रसूले अकरम स. ने कहा कि क़ुरआन दिलो को ज़िन्दा करता है और बुरे कार्यों से रोकता है।
20- क़ुरआन पढ़ने से दिलों का ज़ंग भी साफ़ हो जाता है।

हज़रत रसूले अकरम स. ने कहा कि इन दिलों पर इस तरह ज़ंग लग गया है जिस तरह लोहे पर लग जाता है। प्रश्न किया गया कि फिर यह कैसे चमकेगें ? रसूल अकरम स. ने उत्तर दिया कि क़ुरआन पढ़ने से।
21- क़ुरआन पढ़ने से इंसान बुरईयों से दूर रहता है।

अगर इंसान क़ुरआन पढ़कर क़ुरआन के आदेशों का पलन करे तो वह वास्तव में बुराईयों से दूर हो जायेगा।

नोट--- यह लेख डा. मुहम्मह अली रिज़ाई की किताब उन्स बा क़ुरआन से लिया गया है। परन्तु अनुवाद की सुविधा के लिए कुछ स्थानों पर कमी ज़्यादती की गई है।( उर्दू हिन्दी अनुवादक)




क़ुरआन और सदाचार

लेखक- सैय्यद वजीह अकबर ज़ैदी
अवनुवादक- कमरगाज़ी
इस में कोई शक नही है कि सदाचार हर समय में महत्वपूर्ण रहा हैं। परन्तु वर्तमान समय में इसका महत्व कुछ अधिक ही बढ़ गया है। क्योँकि वर्तमान समय में इंसान को भटकाने और बिगाड़ने वाले साधन पूर्व के तमाम ज़मानों से अधिक हैं। पिछले ज़मानों मे बुराईयाँ फैलाने और असदाचारिक विकार पैदा करने के साधन जुटाने के लिए मुश्किलों का सामना करते हुए अधिक मात्रा मे धन खर्च करना पड़ता था। परन्तु आज के इस विकसित युग में यह साधन पूरी दुनिया मे व्याप्त हैं।जो काम पिछले ज़मानों में सीमित मात्रा में किये जाते थे वह आज के युग में असीमित मात्रा में बड़ी आसानी के साथ क्रियान्वित होते हैं। आज एक ओर विकसित हथियारों के द्वारा इंसानों का कत्ले आम किया जा रहा है। तो दूसरी ओर दुष्चारिता को बढ़ावा देने वाली फ़िल्मों को पूरी दुनिया मे प्रसारित किया जा रहा है।विशेषतः इन्टर नेट के द्वारा मानवता के लिए घातक विचारों व भावो को दुनिया के तमाम लोगों तक पहुँचाया जा रहा है। इस स्थिति में आवश्यक है कि सदाचार की तरफ़ गुज़रे हुए तमाम ज़मानों से अधिक तवज्जोह दी जाये। इस कार्य में किसी भी प्रकार की ढील हमको बहुत से संकटों में फसा सकती है। खुश क़िस्मती से हमारे पास क़ुरआने करीम जैसी किताब मौजूद है। जिसमे एक बड़ी मात्रा में अति सुक्ष्म सदाचारिक उपदेश पाये जाते हैं। दुनिया के दूसरे धर्मों के अनुयाईयों के पास ऐसी नेअमतें नही हैं। बस हमें इस बात की ज़रूरत है कि हम क़ुरआन के साथ अपने सम्बन्ध को बढ़ायें और उसके बताये हुए रास्ते पर अमल करें ताकि इस ज़माने में भटकनें से बच सकें। सदाचार विषय का महत्व सदाचार वह विषय है जिसको क़ुरआने करीम में विशेष महत्व दिया गया है। और तमाम नबीयों का उद्देश भी सदाचार की शिक्षा देना ही था। क्योँकि सदाचार के बिना इंसान के दीन और दुनिया दोनों अधूरे हैं। वास्तव में इंसान को इंसान कहना उसी समय शोभनीय है जब वह इंसानी सदाचार से सुसज्जित हो। सदाचारी न हो ने पर यह इंसान एक खतरनाक नर भक्षी का रूप भी धारण कर लेता है। और चूँकि इंसान के पास अक़्ल जैसी नेअमत भी है अतः इसका भटकना अन्य प्राणीयों से अधिक घातक सिद्ध होता है।और ऐसी स्थिति में वह सब चीज़ों को ध्वस्त करने की फ़िक्र में लग जाता है। और अपने भौतिक सुख और लाभ के लिए युद्ध करके बे गुनाह लोगों का खून बहानें लगता है। क़ुरआने करीम को पढ़ने से मालूम होता है कि बहुतसी आयात इस विषय की महत्ता को प्रकट करती हैं। जैसे सूरए जुमुआ की दूसरी आयत मे ब्यान किया गया कि “वह अल्लाह वह है जिसने मक्के वालों के मध्य एक रसूल भेजा जो उन्हीं मे से था। (अर्थात मक्के ही का रहने वाला था) ताकि वह उनके सामने आयात को पढ़े और उनकी आत्माओं को पवित्र करे और उनको किताब व हिकमत(बुद्धी मत्ता) की शिक्षा दे इस से पहले यह लोग(मक्का वासी) प्रत्यक्ष रूप से भटके हुए थे।” और सूरए आले इमरान की आयत न. 64 मे ब्यान होता है कि “यक़ीनन अल्लाह ने मोमेनीन पर एहसान (उपकार) किया कि उनके दरमियान उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो इनके सामने अल्लाह की आयात पढ़ता है इनकी आत्माओं को पवित्र करता है और उनको किताब व हिकमत (बुद्धिमत्ता ) की शिक्षा देता है जबकि इससे पहले यह लोग प्रत्यक्ष रूप से भटके हुए थे।” उपरोक्त की दोनों आयते रसूले अकरम (स.) की रिसालत के वास्तविक उद्देश्य,आत्माओं की पवित्रता और सदाचारिक प्रशिक्षण को ब्यान कर रही हैं। यहाँ पर यह कहा जा सकता है कि आयात की तिलावत, (आवाज़ के साथ पढ़ना) किताब और हिकमत की शिक्षा को आत्माओं को पवित्र बनाने और प्रशिक्षत करने के लिए आधार बनाया गया है। और आत्माओं की पवित्रता ही सदाचारिक ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य है। शायद यही वजह है कि अल्लाह ने क़ुरआने करीम की बहुत सी आयात में आत्मा की पवित्रता को शिक्षा से पहले ब्यान किया है। क्योँकि वास्तविक ऊद्देश्य आत्माओं की पवित्रता ही है। जबकि क्रियात्मक रूप मे शिक्षा को आत्मा की पवित्रता पर प्राथमिकता प्राप्त है। उपरोक्त लिखित दोनों आयतों में से पहली आयत में अल्लाह ने रसूले अकरम (स.) को सदाचार की शिक्षा देने वाले के रूप मे रसूल बनाने को अपनी एक निशानी बताया है। और प्रत्यक्ष रूप से भटके होनें को, शिक्षा और प्रशिक्षण के विपरीत शब्द के रूप मे पहचनवाया है। इससे मालूम होता है कि क़ुरआने करीम में सदाचार विषय को बहुत अधिक महत्ता दी गई है। और दूसरी आयत में रसूले अकरम (स.) को सदाचार के शिक्षक के रूप मे भेज कर मोमेनीन पर एहसान(उपकार) करने का वर्णन किया गया है। जो सदाचार की महत्ता के लिए एक खुली हुई दलील है। नतीजा उल्लेखित आयतों व अन्य आयतों के अध्ययन से पता चलता है कि क़ुरआन की दृष्टि में सदाचार विषय बहुत महत्व पूर्ण है। और इसको एक आधारिक विषय के रूप में माना गया है। जबकि इस्लाम के दूसरे तमाम क़ानूनों को इस के अन्तर्गत ब्यान किया गया है।सदाचार का रूर्ण विकास ही वह महत्वपूर्ण उद्देश्य है जिस पर तमाम आसमानी धर्मों ने विशेष रूप से बल दिया है। और सदाचार ही को तमाम सुधारों का मूल माना है। ज्ञान और सदाचार का सम्बन्ध अल्लाह ने क़ुरआने करीम की बहुत सी आयात में किताब और हिकमत(बुद्धिमत्ता) की शिक्षा को आत्मा की पवित्रता के साथ उल्लेख किया है। कहीं पर आत्मा की पवित्रता का ज्ञान से पहले उल्लेख किया और कहीं पर आत्मा की पवित्रता को ज्ञान के बाद ब्यान किया। इस से यह ज्ञात होता है कि ज्ञान और सदाचार के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है।अर्थात अगर किसी इंसान को किसी बात की अच्छाई या बुराई का ज्ञान हो जाये तो इसका असर उसकी व्यक्तित्व पर पड़ेगा वह अच्छाई को अपनाने और बुराई से बचने की कोशिश करेगा।इंसान की बहुत सी व्यवहारिक बुराईयाँ अज्ञानता के आधार पर होती हैं। अतः अगर समाज से अज्ञानता को दूर कर दिया जाये तो समाज से बहुत सी बुराईयाँ समाप्त हो जायेंगीं। और धीरे धीरे अच्छाईयाँ बुराईयों का स्थान ले लेगीं। यह बात अलग है कि यह क़ानून पूरी तरह से लागू नही होता है।और यह भी आवश्यक नही है कि सदैव ऐसा ही हो। क्योकिं इस सम्बन्ध में दो दृष्टि कोण पाये जाते हैं पहला दृष्टिकोण यह है कि ज्ञान अच्छे सदाचार के लिए कारक है। तथा समस्त सदाचारिक बुराईयाँ अज्ञानता के कारण होती हैं। इस दृष्टि कोण के अनुसार सदाचारिक बुरीय़ों को समाप्त करने का केवल एक ही तरीक़ा है और वह यह कि समाज में व्यापक स्तर पर शिक्षा का प्रसार करके समाज के विचारों को उच्चता प्रदान की जाये। दूसरा दृष्टि कोण यह है कि ज्ञान और सदाचार मे आपस में कोई सम्बन्ध नही है। और ज्ञान बदकार और दुराचारी लोगों कोउनकी बदकारी और दुराचारी में मदद करता है। और वह पहले से बेहतर तरीक़े से अपने बुरे कामों पर बाक़ी रहते हैं। लेकिन वास्तविक्ता यह है कि न तो ज्ञान और सदाचार के सम्बन्ध से पूर्ण रूप से मना किया जा सकता है और न ही पूर्ण रूप से ज्ञान को सदाचार का आधार माना जा सकता है। अर्थात यह भी नही कहा जा सकता कि जहाँ पर ज्ञान होगा वहाँ पर अच्छा सदाचार भी अवश्य होगा। क्या इन्सान के अख़लाक़ मे परिवर्तन हो सकता है ? यह एक ऐसा सवाल है जो सदाचार की समस्त बहसों से सम्बन्धित है। क्योंकि अगर इन्सान के सदाचार में परिवर्तन को सम्भव न माना जाये तो केवल सदाचार विषय ही नही अपितु तमाम नबियों की मेहनतें और तमाम आसमानी किताबो (क़ुरआन, इंजील, तौरात, ज़बूर) में वर्णित सदाचारिक उपदेश निष्फल हो जायेगें। और दण्ड विधान की समस्त सहिंताऐं भी निषकृत सिद्ध होगीं। समस्त नबियों की शिक्षा और आसमानी किताबों में सदाचार से सम्बन्धित ज्ञान का पाया जाना इस बात के लिए तर्क है कि इंसान के सदाचार मे परिवर्तन सम्भव है। हमने बहुत से ऐसे लोगों को देखा हैं जिनका सदाचार और व्यवहार सही प्रशिक्षण के द्वारा बहुत अधिक परिवर्तित हुआ है। यहाँ तक कि जो लोग कभी शातिर बदमाश थे आज वही लोग सही मार्ग दर्शन के कारण आबिद और ज़ाहिद व्यक्ति के रूप में परिवर्तित हो चुके हैं। अपनी इस बात को सिद्ध करने के लिए क़ुरआने करीम से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। 1- इस दुनिया में अम्बिया और आसमानी किताबों का आना इस बात के लिए सबसे अच्छा तर्क है कि हर व्यक्ति को प्रशिक्षित करना और उसके व्यवहार को बदलना सम्भव है। जैसे कि सूरए जुमुआ की दूसरी आयत में ब्यान हुआ है जिसका वर्णन पीछे भी किया जा चुका है। और इसी के समान दूसरी आयतों से यह ज्ञात होता है कि रसूले अकरम (स.) के इस दुनिया में आने का मुख्य उद्देश्य लोगों का मार्ग दर्शन करना उनको शिक्षा प्रदान करना तथा उनकी आत्माओं को पवित्र करना है जो प्रत्यक्ष रूप से भटके हुए थे।और यह सब तभी सम्भव है जब इंसान के व्यवहार में परिवर्तन सम्भव हो। 2- क़ुरआन की वह समस्त आयतें जिन में अल्लाह ने पूरी मानवता को सम्बोधित किया है और सदाचारिक विशेषताओं को अपनाने का आदेश दिया है यह समस्त आयतें इन्सान के सदाचार मे परिवर्तन सम्भव होने पर सबसे अचछा तर्क हैं। क्योंकि अगर यह सम्भव न होता हो अल्लाह का पूरी मानवता को सम्बोधित करते हुए इसको अपनाने का आदेश देना निष्फल होगा। इन आयात पर एक आपत्ति व्यक्त की जा सकती है कि इन आयात में से अधिकतर आयात अहकाम को ब्यान कर रही हैं। और अहकाम का सम्बन्ध इंसान के क्रिया कलापो से है। जबकि सदाचार का सम्बन्ध इंसान की आन्तरिक विशेषताओं से है। अतः यह कहना सही न होगा कि इन आयात में सदाचार की शिक्षा दी गई है। इस आपत्ति का जवाब यह है कि इंसान के सदाचार और क्रिया कलापो में बहुत गहरा सम्बन्ध पाया जाता है। यह पूर्ण रूप से एक दूसरे पर आधारित हैं। और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। इंसान के अच्छे क्रिया कलाप उसके अच्छे सदाचार का नतीजा होते हैं।जिस तरह उसके बुरे क्रिया कलाप उसके दुराचार का नतीजा होते हैं। 3- क़ुरआने करीम की वह आयात जो स्पष्ट रूप से सदाचार को धारण करने और बुराईयों से बचने का निर्देश देती हैं वह इंसान के सदाचार मे परिवर्तन के सम्भव होने के विचार को दृढता प्रदान करती हैं। जैसे सूरए शम्स की आयत न.9 और 10 में कहा गया है कि “क़द अफ़लह मन ज़क्काहा व क़द ख़ाबा मन दस्साहा” जिस ने अपनी आत्मा को पवित्र कर लिया वह सफ़ल हो गया और जिसने अपनी आत्मा को बुराईयों मे लीन रखा वह अभागा रहा। इस आयत में एक विशेष शब्द “ दस्साहा” का प्रयोग हुआ है और इस शब्द का अर्थ है किसी बुरी चीज़ को दूसरी बुरी चीज़ से मिला देना। इस से यह सिद्ध होता है कि पवित्रता इंसान की प्रकृति मे है और बुराईयाँ इस को बाहर से प्रभावित करती हैं अतः दोनों मे परिवर्तन सम्भव है। अल्लाह ने सूरए फ़ुस्सेलत की आयत न.34 मे कहा है कि “तुम बुराई का जवाब अच्छे तरीक़े से दो” इस तरह इस आयत से यह ज्ञात होता है कि मुहब्बत और अच्छे व्यवहार के द्वारा भयंकर शत्रुता को भी मित्रता में बदला जा सकता है। और यह उसी स्थिति में सम्भव है जब अख़लाक़ मे परिवर्तन सम्भव हो।