मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ
 
मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ






क़ुरआन और इल्म{2}

8- ईल्मे वेलादत: “يَخْلُقُكُمْ فِي بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ خَلْقًا مِن بَعْدِ خَلْقٍ فِي ظُلُمَاتٍ ثَلَاثٍ”(ज़ोमर 7)
(अल्लाह तुमको शिकमे मादर में मुसलसल बनाता रहता है और यह काम तीन तारीकीयों में अंजाम पाता है।)
दौरे हाज़िर की तहक़ीक़ात ने वाज़ेह कर दिया है कि इंसानी तख़लीक़ का सिलसिला नुतफ़े से लेकर बशरीयत तक बराबर जारी रहता है और यह काम तीन पर्दों मिनबारी, ख़ूरबून, लफ़ाएफ़ी के अंदर होता है जिसकी वजह से नर और मादा का इम्तेयाज़ मुश्किल हो जाता है।
9- सेहते ग़ज़ाई: “وكُلُواْ وَاشْرَبُواْ وَلاَ تُسْرِفُواْ”(आराफ़ 32)
(खाओ, पीयो और इसराफ़ न करो।)
इन फ़िक़रात से साफ़ ज़ाहिर होता है कि इंसान के अमराज़ का ज़्यादा हिस्सा उसके इसराफ़ से तअल्लुक रखता है। इसराफ़ का मतलब माल को बेकार भेंक देना नही है बल्कि ज़रूरत से ज़्यादा खा लेना भी इसराफ़ की हद में दाख़िल है और इसी लिये इसका ज़िक्र सिर्फ़ माल के बजाए खाने पाने के साथ हुआ है यानी खाने में बेजा ज़्यादती न करो कि मुजिबे हलाकत है।
10- हिफ़ज़ाने सेहत: “حُرِّمَتْ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةُ وَالْدَّمُ وَلَحْمُ الْخِنْزِيرِ”(मायदा 4)
(तुम्हारे ऊपर मुरदार, ख़ून और सूवर के गोश्त को हराम कर दिया गया है। इसलिये कि इन चीज़ों के इस्तेमाल से तुम्हारी सेहत पर ग़लत असर पड़ता है।)
मुरदार का खाना बेहिसी पैदा करता है, ख़ून का पीना संगदिली का बाइस होता है और सूवर का गोश्त बेहयाई ईजाद करता है। अलावा इसके कि इन चीज़ों के जिस्म पर तिब्बी असरात भी होते हैं जिनका अंदाज़ा आज के दौर में दुश्वार नही है। हैरत की बात तो यह है कि मरीज़ को ख़ून देते वक़्त हज़ारों क़िस्म की तहक़ीक़ की जाती है और जानवरों का ख़ून पीते वक़्त इंसान इन तमाम बातों को नज़र अंदाज़ कर देता है।
11- विरासत: “يَا أُخْتَ هَارُونَ مَا كَانَ أَبُوكِ امْرَأَ سَوْءٍ وَمَا كَانَتْ أُمُّكِ بَغِيًّا”(मरियम 29)
(ऐ हारून की बहन मरियम न तुम्हारा बाप कोई बदकिरदार मर्द था और न तुम्हारी माँ बदकिरदार थी आख़िर यह तुम्हारे यहाँ बच्चा कैसे पैदा हो गया?।)
क़ुरआने मजीद ने मुख़ालेफ़ीन के इस फ़िक़रे की हिकायत करके इस नुक्ते की वज़ाहत कर दी कि इंसानी किरदार पर माँ बाप का असर पड़ता है और सीरत की तशकील में विरासत का बहरहाल एक हिस्सा होता है इसी लिये जनाबे मरियम ने भी क़ानून की तरदीद नही की बल्कि यह जाहिर कर दिया कि न मेरा बाप ख़राब था न मेरी माँ बुरी थी और न मैने कोई ग़लत एक़दाम किया है बल्कि यह सब क़ुदरत के करिश्मे हैं जिसका सुबूत ख़ुद यह बच्चा है तुम इससे सवाल कर लो सब ख़ुद ही मालूम हो जायेगा।
12- मा वराऊत तबीयत: “اللَّهُ يَتَوَفَّى الْأَنفُسَ حِينَ مَوْتِهَا وَالَّتِي لَمْ تَمُتْ فِي مَنَامِهَا”(जोमर 43)
(अल्लाह ही वक्ते मौत रूह को ले लेता है और जिसकी मौत का वक़्त नही होता है उसे ख़्वाब के बाद बेदार कर देता है।)
आयत आलमे तबीयत के अलावा एक आलमे नफ़्स व रूह की तरफ़ भी इशारा करती है, जिसका फ़ायदा यह है कि नफ़्स आलमे ख़्वाब में जिस्म को छोड़ कर अपने आलम की सैर करता है और अगर उसकी मौत का वक्त आ जाता है तो वह अपने आलम में रह जाता है और अगर हयात बाक़ी रहती है तो फिर जिस्म से पहले जैसा रिश्ता जोड़ लेता है।
13- कहराबाई ताक़त: “وَإِذَا الْبِحَارُ سُجِّرَتْ”(तकवीर 7)
(वह वक़्त भी आयेगा जब समन्दर भड़क उठेंगें।)
आग के साथ पानी और पानी के साथ आग का तसव्वुर आज की दुनिया में भी नामुमकिन ख़्याल किया जाता है चे जायके चौदह सदी क़ब्ल अरब की जाहिल दुनिया। लेकिन क़ुरआने मजीद ने समन्दर के साथ भड़कने का लफ़्ज़ इस्तेमाल करके ईल्मी दुनिया के ज़हनों को उन कहरबाई और बरक़ी ताक़तों की तरफ़ मोड़ दिया जो आज भी पानी के दिल के अंदर मौजूद हैं। फ़र्क़ यह है कि आज उन ताक़तों से इस्तेफ़ादा करने के लिये आलात व असबाब की ज़रूरत होती है और कल क़यामत का दिन वह होगा यह ताक़तें और अज़ ख़ुद सामने आ जायेगीं और सारे समन्दर भड़क उठेंगें, وَأَخْرَجَتِ الْأَرْضُ أَثْقَالَهَا (ज़लज़ला 3) ज़मीन सारे ख़ज़ाने उगल देगी तो पानी भी अपनी सारी ताक़तों को सरे आम लो आयेगा।
14- ख़ला: “يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ إِنِ اسْتَطَعْتُمْ أَن تَنفُذُوا مِنْ أَقْطَارِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ فَانفُذُوا لَا تَنفُذُونَ إِلَّا بِسُلْطَانٍ.”(रहमान 34)
(ऐ गिराहे जिन्न व इन्स, अगर तुममें अतराफ़े ज़मीन व आसमान से निकल जाने की ताक़त है तो निकल जाओ लेकिन यादँ रखो कि तम बग़ैर ग़ैर मामूली ताक़त के नही निकल सकते।)
आयत ने अक़तारे समावात व अर्ज़ की वुसअतों का ज़िक्र करने के बावजूद ख़ला तक पहुचने के इमकान पर रौशनी डाली है और ज़ाहिर है कि जब ग़ैर मामूली ताक़त के सहारे फ़जाए बसीत की वुसअतों को पार करके ख़ला ए बसीत तक रसाई मुमकिन है तो चाँद सूरज तक पहुचने में क्या दुश्वारी है? अगरते बाज़ सादा लौह अवाम ने इस आयत से चाँद तक जाने की मुहालीयत पर इस्तिललाल किया है लेकिन उन्हे यह सोचना चाहिये कि चाँद और सूरज वग़ैरह समावात व अर्ज़ की वुसअतों में शामिल हैं और क़ुरआने मजीद ने जिस शय को तक़रीबन नामुमकिन बताया है वह उन वुसअतों के बाहर निकल जाना है न कि उन वुसअतों में सैर करना। वर्ना अगर ऐसा होता तो कम अज़ कम जिन्नात को मुख़ातब न किया जाता जो उस फ़ज़ा में हमेशा ही परवाज़ किया करते है।
15- ईल्मुल अफ़लाक: “ثُمَّ اسْتَوَى إِلَى السَّمَاءِ وَهِيَ دُخَانٌ”(फ़ुस्सेलत 12)
ख़ालिक़ ने आसमान की तरफ़ तवज्जो की जो उस वक़्त धुँवा था।
आयत से साफ़ ज़ाहिर होता है कि आग़ाज़े ख़िलक़ते अफ़लाक धुँवे से हुआ है।
“وَجَعَلَ الْقَمَرَ فِيهِنَّ نُورًا وَجَعَلَ الشَّمْسَ سِرَاجًا”(नूह 17)
(क्या तुमने नही देखा कि अल्लाह ने किस तरह हफ़्त तबक़ आसमान पैदा कर दिये और उनमें चाँद को रौशनी और सूरज को चिराग़ बना दिया।) यह इशारा है इस बात की तरफ़ की सूरज का नूर ज़ाती है और चाँद का नूर उससे कस्ब किया हुआ है।
“اللّهُ الَّذِي رَفَعَ السَّمَاوَاتِ بِغَيْرِ عَمَدٍ تَرَوْنَهَا”(रअद 3)
(ख़ुदा वह है जिसने आसमानों को बुलंद कर दिया बग़ैर किसी ऐसे सुतून के जिसे तुम देख सको।)
मालूम होता है कि रफ़अते समावात मे कोई ग़ैर मरई सुतून काम कर रहा है जिसे आज की ज़बान में क़ुव्व्ते जज़्ब व दफ़्अ से ताबीर किया जा सकता है।
وَمَن يُرِدْ أَن يُضِلَّهُ يَجْعَلْ صَدْرَهُ ضَيِّقًا حَرَجًا كَأَنَّمَا يَصَّعَّدُ فِي السَّمَاء(अनआम 126)
(ख़ुदा जिसको उसकी गुमराही में छोड़ देता है उसके सीने को इतना तंग बना देता है जैसे वह आसमान में बुलंद हो रहा हो।)
आयत से साफ़ ज़ाहिर होता है कि आसमान की बुलंदी तंगी ए नफ़स का बाइस है इसलिये कि फ़ज़ाओं में हवा की मिक़दार ज़मीन से कहीं ज़्यादा कम है।
“وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَابَّةٍ وَهُوَ عَلَى جَمْعِهِمْ إِذَا يَشَاءُ قَدِيرٌ”
(अल्लाह की निशानीयों में से एक यह भी है कि उसने आसमान व ज़मीन और दोनो में मख़लूक़ात पैदा किये हैं और वह जब चाहे दोनो को जमा भी कर सकता है।)
मालूम यह होता है कि बाज़ आसमानों में बाज़ मख़लूक़ात का वुजूद है जो किसी वक़्त यहाँ की मख़लूक़ात के साथ जमा भी हो सकती है ख़्वाह क़यामत ही के दिन क्यों न हो।
“وَالشَّمْسُ تَجْرِي لِمُسْتَقَرٍّ لَّهَا”(यासीन 39)
(आफ़ताब अपने मुसतक़र के लिये दौड़ रहा है।)
यानी आफ़ताब का कोई आख़री मर्कज़ है जिसकी तलाश में मुसलसल सरगर्मे सफ़र है और उसकी सैर सिर्फ़ दौरी नही है बल्कि वह तेज़ी के साथ आगे की तरफ़ भी बढ़ रहा है अब ख़ुदा ही जाने कि इस फ़ज़ाए बेकराँ में उसका आख़री मुसतक़र और मर्कज़ क्या होगा?।
16- तबक़ातुल अर्ज़: “جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ ذَلُولًا فَامْشُوا فِي مَنَاكِبِهَا”(मुल्क 16)
(अल्लाह ने तुम्हारे लिये ज़मीन को सुबुक रौ नाक़ा बना दिया है अब उसके काँधों पर सफ़र करो।)
मालूम होता है कि ज़मीन में हल्की हल्की हरकत पायी जाती है और उसकी शक्ल गोल है वर्ना सफ़र काँधे के बजाए सीने या पुश्त पर होता।
“هُوَ الَّذِي خَلَقَ لَكُم مَّا فِي الأَرْضِ جَمِيعاً”(बक़रा 30)
(वह ख़ुदा वह है जिसने ज़मीन के अंदर की तमाम चीज़े तुम्हारे लिये पैदा की हैं।)
आयत से साफ़ ज़ाहिर है कि मख़लूक़ाते अर्ज़ी सिर्फ़ सतहे अर्ज़ से मुताल्लिक़ नही हैं बल्कि दूसरे तबक़ातुल अर्ज़ में भी मख़लूक़ात का वुजूद है और वह सब इंसानी फ़ायदे के लिये ख़ल्क़ हुई हैं चाहे उनकी शक्ल इंसानी हो या मादनीयाती।
“فَجَعَلَهُ غُثَاءً أَحْوَى.”(आला 5-6)
(उसी ख़ुदा ने चरागाहों को निकाला और फिर ख़ुश्क करके सियाह बना दिया।)
ख़ुश्की और सियाही की ख़ुसूसीयत का तज़किरा इस अम्र का शाहिद है कि यह अल्लाह का अलग से कोई दूसरा अहसान है जिसका तअल्लुक घाँस की पैदावार से नही है इसलिये अजब नही कि इससे दौरे हाज़िर की इस तहक़ीक़ ही की तरफ़ इशारा हो कि जिन ज़मीनों में पेटरोल वग़ैरह बरामद होता है वहाँ की घाँस ख़ुश्क और सियाह हो जाती है। अब ख़ुदा ही जाने कि उसने ग़ैर ज़ी ज़रअ वादीयों को किन ख़ज़ानों से सरफ़राज़ कर दिया है और इंसाना फ़ायदे के लिये क्या क्या चीज़ें ख़ल्क़ कर दी हैं।
“وَالأَرْضَ مَدَدْنَاهَا وَأَلْقَيْنَا فِيهَا رَوَاسِيَ وَأَنبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ شَيْءٍ مَّوْزُونٍ ”
(हमने ज़मीन को फ़ैलाया है और उसमें पहाड़ों को डाल कर उससे वह चीज़ें उगाई है जिनका वज़्न मुअय्यन है। आयत का इशारा इस अम्र की तरफ़ है कि नबातात के जुमला अनासिर और मवाद एक ख़ास वज़्न रखते हैं। ग़ैर मौज़ूँ कोई शय नही है।)
“وَمِن كُلِّ شَيْءٍ خَلَقْنَا زَوْجَيْنِ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ”
(हमने हर शय का जोड़ा उसी के अंदर से पैदा किया है।)
मालूम होता है कि आलमे वुजूद में वहदत और इकाई सिर्फ़ ख़ालिक़ व मालिक का हिस्सा है बाक़ी हर शय में दुई और ज़ौजीयत पायी जाती है चाहे वह दूई ज़ाहिरी ऐतबार से नर और मादा की हो या हक़ीक़ी ऐतबार से कहरबाई मौजों की?
याद रहे कि आयाते बाला के पेश करने से यह मतलब हरगिज़ नही है कि दौरे हाज़िर ने अपनी तहक़ीक़ी मंज़िल को जिस हद तक पहुचाया है आयत उसी हद की तरफ़ इशारा कर रही है बल्कि मक़सद सिर्फ़ यह है कि उन आयात में ईल्मे कायनात की तरफ़ खुले हुए इशारे पाये जाते हैं चाहे ईल्म वही हो जिसे आज की दुनिया में पेश किया जा रहा है या उससे बालातर कोई मंज़िल हो जहाँ तक आज का ईल्म नही पहुच सका है। इसी लिये मैने आयात की तशरीह मे सिर्फ़ इशारे का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया है और उसे तहक़ीक़ व तअयीन पर महमूल नही किया है।
ऊलूमे क़ुरआन के तज़किरे का एक मक़सद यह भी है कि यह ऊलूम अगर बक़ाए नौअ और इतक़ाए बशर के लिये ज़रूरी न हों तो कम अज़ कम निगाहे क़ुरआन में जाएज़ ज़रूर हैं वर्ना क़ुरआने मजीद उन हक़ाएक़ व मआरिफ़ की तरफ़ इशारा करके इंसानी ज़हन को तहक़ीक़ पर आमादा न करता लेकिन उसे क्या किया जाये कि सदरे अव्वल के बाज़ मुसलमानों ने इस नुक्ते से ग़फ़लत बरती और इसकन्दरया का अज़ीम कुतुबखाना जिससे ऊलूमें क़ुरआनी की तशरीह व तफ़सील का काम लिया जा सकता था नज़रे आतिश कर दिया गया और इस तरह उम्म्ते इस्लामीया दीगर अक़वाम से हमेशा हमेशा के लिये पीछे हो गयी, इसकन्दरया के कुतबखाने का नज़रे आतिश होना इतना बड़ा हौलनाक काम नही था जितना बड़ा हौलनाक अम्र उसकी पुश्त पर काम करने वाला नज़रिया था। कहा यह गया कि इन किताबों में अगर वही सब कुछ है जो क़ुरआने मजीद में है तो हमे क़ुरआन को होते हुए इन किताबों की ज़रूरत नही है और अगर इनमें क़ुरआने करीम के अलावा कोई शय है तो उम्मते क़ुरआन को ऐसी किताबें नज़रे आतिश ही कर देनी चाहियें जो क़ुरआन से हटकर मतालिब बयान करती हों। यह ऐसा ख़तरनाक और ज़हरीला नज़रिया था जिसने हर मोड़ पर बशरीयत को गुमराह करने का फ़रीज़ा अंजाम दिया है। ब्राहमनों ने रिसालत के इंकार में यही तर्ज़े इस्तिदलाल ऐख़्तियार किया कि अगर रसूल वही कुछ कहता है जो अक़्ल का फ़ैसला है तो अक़्ल के होते हुए रसूल की क्या ज़रूरत है और अगर रसूल अक़्ल के ख़िलाफ़ बोलता है तो ख़िलाफ़े अक़्ल बात को तसलीम करना इंसानीयत और बशरीयत के मनाफ़ी है। यहूदीयों और ईसाईयों का इस्तिदलाल भी यही था कि अगर शरीयते मूसा व ईसा बर हक़ है तो उसके मन्सूख़ होने के क्या मायनी हैं? और अगर ग़लत है तो ख़ुदा ने ऐसी शरीयत अपने अंबीया को क्यो दी? ग़रज़ बशरीयत के हर मोड़ पर तबाही का राज़ इसी ग़फ़लत में पोशीदा नज़र आता है और मेरा ख़्याल तो यह है कि मुसलमानों का यह अंदाज़े फ़िक्र भी अपने ज़हन की पैदावार नही था बल्कि उन्ही अक़वाम से लिये हुए सबक़ का नतीजा था जिन्होने हर दौर में बशरीयत को गुमराह किया है। और इस गुमराही का राज़ सिर्फ़ यह है कि हर क़ौम ने अस्ल मतलब को याद रखा और तफ़सीलात को फ़रामोश कर दिया वर्ना ब्राहमणों को यह सोचना चाहिये था कि नबी का काम अक़्ल की मुख़ालेफ़त नही होता है बल्कि अक़्ल के अहकाम की तफ़सील हुआ करता है। अक़्ल मालिक की इताअत का हुक्म देती है और नबी तरीक़ा ए इताअत की तालीम देता है, अक़्ल बुराईयों से अलग रहने का फ़ैसला करती है और नबी बुराईयों की तफ़सील बयान करता है। इसी तरह यहूदीयत व मसीहीयत के परस्तारों को यह सोचना चाहिये था कि किसी क़ानून का बरहक़ होना उसके अबदी होने की दलील नही है बल्कि कभी कभी क़ानून एक महदूद बक़्फ़े के लिये बनाया जाता है और उस बक़्फ़े में इन्तेहाई सालेह और सेहतमंद होता है लेकिन उस बक़्फ़े के गुज़र जाने के बाद वह बेकार और ग़ैर सेहतमंद हो जाया करता है ऐसे क़ानून के बारे में यह नही कहा जा सकता है कि चुँकि एक बक़्फ़े के लिये सेहतमंद था लेकिन हर दौर में कारगर और कारआमद होना चाहिये।
मुसलमानों के इस जाहिलाना तर्ज़े फ़िक्र की ख़राबी की तरफ़ एक मुहक़्क़िक़ ने बड़े अच्छे अंदाज़ से इशारा किया है। वह कहता है कि अगर सदरे अव्वल के उन मुसलमानों को ऊलूमे व मआरिफ़ से कोई भी राब्ता होता तो वह यह सोचते कि अगर इन किताबों में क़ुरआन के मुवाफ़िक़ बयानात हैं तो उन्हे दूसरी क़ौमों के सामने बतौर इस्तिदलाल पेश किया जा सकता था और अगर क़ुरआन के मुख़ालिफ़ नज़रियात हैं तो क़ुरआन की रौशनी में उनकी तरदीद करके दीगर अक़वाम पर क़ुरआन की बरतरी साबित की जा सकती है। लेकिन अफ़सोस कि उस दौर के मुसलमानों में न इस्बात की ताक़त थी और न तरदीद की। नतीजा यह हुआ कि हुक्मरानों ने अपनी जिहालत का पर्दा रखने के लिये एक अज़ीम ईल्मी सरमाये को नज़रे आतिश कर दिया और बशरीयत मंज़िले मेराज से सदीयों पीछे हट गयी।
याद रखने की बात है कि मुसलमानों के इस तर्ज़े अमल के पीछे कोई मज़हबी जज़्बा कार फ़रमा नही था बल्कि यह दर हक़ीक़त इक़्तेदार व आमेरीयत के मुज़ाहेरे का जज़्बा था जो इस शक़्ल में सामने आ रहा था। क़ुरआन की मुवाफ़ेक़त और मुख़ालेफ़त तो सिर्फ़ बाद की तावीली पैदावार है जिसका अहम सुबूत इमाम मुहम्मद इब्ने इस्माईल बुख़ारी और इमाम मुस्लिम की वह रिवायात हैं जिन्हे इन हज़रात ने किताबते हदीस के ज़ैल में दर्ज किया है और जिनसे अंदाज़ा होता है कि सदरे अव्वल के मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा रसूले अकरम की हदीसों के लिखने और जमा करने का मुख़ालिफ़ था। सोचने की बात है कि जो मुसलमान अपने रसूल के अक़वाल के जमा करने को बिदअत समझता हो वह इसकन्दरया के कुतिबख़ाने के साथ क्या बर्ताव करेगा। बात यहीं तक महदूद नही रहती बल्कि एक मंज़िल आगे बढ़ जाती है और साहिबें नज़र इंसान को यह सोचना पड़ता है कि इसकन्दरया की किताबों में तो ख़ैर मुख़ालेफ़ते क़ुरआन का इमकान था इसलिये उन्हे नज़रे आतिश कर दिया गया। रसूले अकरम(स) की हदीसों में कौन सी ख़ास बात थी जिसकी वजह से उसकी किताबत हराम थी क्या यहाँ भी मुख़ालेफ़ते क़ुरआन के इमकानात थे? या क़ुरआनी इजमाल को हदीस के तफसीलात की ज़रूरत न थी? यह कोई और जज़्बा काम कर रहा था जिसके इज़हार के सामने तारीख़ के मुँह में लगाम लगी हुई थी और मुवर्रिखञ की नातेक़ा गुँग है, बात सिर्फ़ यही है कि मुसलमान अपनी जिहालत की पर्दापोशी के लिये एक पुरी उम्मत को ऊलूमे दीन व दुनिया से महरूम कर रहे थे और इस रौशनी में कहना पड़ेगा कि आज का मुसलमान जिस अहसासे कमतरी का शिकार है और आज की उम्मत इस्लामीया ईल्मी मैदान में जिस क़दर पीछे हो गयी है उसकी ज़िम्मेदारी दौरे हाज़िर से ज़्यादा सदरे अव्वल के उन मुसलमानों पर है जिन्होने मुमानेअते ईल्म व फ़न और पाबंदी ए फ़िक्र व नज़र की बिदअत का संगे बुनियाद रखा था।



कुरआन तर्हीफ़-परिवर्तन नहीं हुआ

इस चीज़ में कोई शक नहीं है, कि पृथ्वी के समस्त प्रकार मुस्लमान प्रसिद्ध व पवित्र ग्रंथ कुरआनमजीद पर एक विशेष यक़ीन रख़ते है।

वेसात शुरु होने से पहले विभिन्न क़ौम और दल के अन्दर एक फ़साहत व वलाग़त का एक विशेश चर्चा था, या विशेश स्थान था और यह इस स्थान तक पहूच गई थी की अरब के समस्त प्रकार फ़साहत व वलाग़त वालों ने कुरआनमजीद की फ़साहत व वलाग़त की ताईद व तौसिक़ की। और यह कहने पर असहायाय़ हो गये की क़ुरआन मजीद की यह दिल्नशीन कथाएं क़ाविले क़्यास नहीं है। कुरआनमजीद की ज़ाहैंरी न कविता है और न उसकी क़ाफिया हमारे जैसा कविता के उदाहरण है। बल्कि वह लोग समझते थे कि कुरआनमजीद की कथाएं वेनज़ीर है, अज्ञान व अनपढ़ अरब मूशरिकीन, कुरआनमजीद को रसूल (स0) के तरफ़ जादु कहकर संमधं दिया करता था ताकि लोगों को उन से पथ भ्रष्ट किया जाए ताकि उन के चारों तरफ़ लोग भीढ़ न-लागाए, लेकिन इन समस्त प्रकार विहूदा तब्लीग़ करने के बावजूद पैग़म्बरे अकरम (स0) की अमंत्रण व क़ूरअने मजीद प्रसिद्ध व मारुफ़ होते गये, और दीन बा दीन उन के अनुशरणकारी में उन्नती होने लगे, हत्ता जो लोग पैग़म्बरे अकरम (स0) को अनुशरण करते नहीं थे वह लोग भी कुरआनमजीद को दिल्नशीन शब्दो की ध्वनी को सूनने के लिए पैग़म्बरे अकरम (स0) के गृहों के चारों तरफ़ छिप छिप कर पैठ के वपित्र कुरआनपाक की ध्वनी को सुता करता था।





इनहेराफ़ी बहसें

हमारा मानना है कि मुस्लमानों को क़ुरआने करीम की आयात में तदब्बुर करने से रोकने के लिए हमेशा ही साज़िशें होती रही हैम इन साज़िशों के तहत कभी बनी उमय्यह व बनी अब्बास के दौरे हुकूमत में अल्लाह के कलाम के क़दीम या हादिस होने की बहसों को हवा दे कर मुस्लमानों को दो गिरोहों में तक़्सीम कर दिया गया, जिस के सबब बहुत ज्यादा ख़ूँरेजिया वुजूद में आई। जबकि आज हम सब जानते हैं कि इन बहसों में नज़ाअ असलन मुनासिब नही है। क्योँ कि अगर अल्लाह के कलाम से हरूफ़ ,नक़ूश ,किताबत व काग़ज़ मुराद है तो बेशक यह सब चीज़ें हादिस हैं और अगर इल्मे परवरदिगार में इसके मअना मुराद हैं तो ज़ाहिर है कि उसकी ज़ात की तरह यह भी क़दीम है। लेकिन सितमगर हुक्काम और ज़ालिम ख़लीफ़ाओं ने मुसलमानों को बरसों तक इस मस्ले में उलझाए रक्खा। और आज भी ऐसी ही साज़िशें हो रही है और इस के लिए दूसरे तरीक़े अपनाए जा रहे हैं ताकि मुस्लमानों को क़ुरआनी आयात पर तदब्बुर व अमल से रोका जा सके।




क़ुरआने करीम की तफ़्सीर के ज़वाबित



हमारा मानना है कि क़ुरआने करीम के अलफ़ाज़ को उनके लुग़वी व उर्फ़ी मअना में ही इस्तेमाल किया जाये,जब तक आयत में अलफ़ाज़ के दूसरे मअना में इस्तेमाल होने का कोई अक़्ली या नक़्ली क़रीना मौजूद न हो। (लेकिन मशकूक क़रीनों का सहारा लेने से बचना चाहिए और क़ुरआने करीम की आयात की तफ़्सीर हद्स या गुमान की बिना पर नही करनी चाहिए।





जैसे क़ुरआने करीम फ़रमाता है कि “व मन काना फ़ी हाज़िहि आमा फ़हुवा फ़ी अलआख़िरति आमा”[77] यानी जो इस दुनिया में नाबीना रहा वह आख़ेरत में भी नाबीना ही रहे गा।





हमें यक़ीन है कि यहाँ पर “आमा” के लुग़वी मअना नाबीना मुराद नही हो सकते,इस लिए कि बहुत से नेक लोग ज़ाहेरन नाबीना थे,बल्कि यहाँ पर बातिनी कोर दिली व नाबीनाई ही मुराद है। यहाँ पर अक़्ली क़रीने का वुजूद इस तफ़्सीर का सबब है।





इसी तरह क़ुरआने करीम इस्लाम दुश्मन एक गिरोह के बारे में फ़रमा रहा है कि “सुम्मुन बुकमुन उमयुन फ़हुम ला यअक़ीलूना ”[78] यानी वह बहरे ,गूँगे और अन्धे है,इसी वजह से कोई बात नही समझ पाते।





यह बात रोज़े रौशन की तरह आशकार है कि वह ज़ाहिरी तौर पर अन्धे,बहरे और गूँगे नही थे बल्कि यह उन के बातिनी सिफ़ात थे। (यह तफ़्सीर हम क़रीना-ए- हालिया के मोजूद होने की वजह से करते हैं।)





इसी बिना पर क़ुरआने करीम की वह आयते जो अल्लाह तआला के बारे में कहती हैं कि “वल यदाहु मबसूसतानि ”[79] यानी अल्लाह के दोनों हाथ खुले हुए हैं। या “व इस्नइ अलफ़ुलका बिआयुनिना” [80] यानी (ऐ नूह)हमारी आँखों के सामने किश्ती बनाओ।





इन आयात का मफ़हूम यह हर गिज़ नही है कि अल्लाह के आँख, कान और हाथ पाये जाते है और वह एक जिस्म है। क्योँ कि हर जिस्म में अजज़ा पाये जाते हैं और उस को ज़मान, मकान व जहत की ज़रूरत होती है और आख़िर कार वह फ़ना हो जाता है। अल्लाह इस से बरतर व बाला है कि उस में यह सिफ़तें पाई जायें। लिहाज़ा “यदाहु” यानी हाथों से मुराद अल्लाह की वह क़ुदरते कामिला है जो पूरे जहान को ज़ेरे नुफ़ूज़ किये है,और “आयुन” यानी आँख़ों से मुराद उसका इल्म है हर चीज़ की निस्बत।





इस बिना पर हम ऊपर बयान की गई ताबीरात को चाहे वह अल्लाह की सिफ़ात के बारे में हों या ग़ैरे सिफ़ात के बारे में अक़्ली व नक़्ली क़रीनों के बग़ैर क़बूल नही करते । क्योँ कि तमाम दुनिया के सुख़नवरों की रविश इन्हीँ दो क़रीनों पर मुनहसिर रही है और क़ुरआने करीम ने इस रविश को क़बूल किया है। “व मा अरसलना मिन रुसुलिन इल्ला बिलिसानि क़ौमिहि”[81] यानी हमने जिन क़ौमों में रसूलों को भेजा उन्हीँ क़ौमों की ज़बान अता कर के भेजा। लेकिन यह बात याद रहे कि यह क़रीने रौशन व यक़ीनी होने चाहिए, जैसे ऊपर भी बयान किया जा चुका है।