मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ
 
मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ






आयत के संदेश:2

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ عَلَيْكُمْ أَنفُسَكُمْ لاَ يَضُرُّكُم مَّن ضَلَّ إِذَا اهْتَدَيْتُمْ إِلَى اللّهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
अनुवाद:
ऐ ईमान वालो, अपने आप को बचाओ। इसलिये कि अगर तुम मार्गदर्शन पाने वाले हो गये तो किसी धर्म भ्रष्ट इंसान की धर्म भ्रष्टता तुम्हे कोई नुक़सान नही पहुचा सकती। तुम सब को अल्लाह की तरफ़ पलट कर जाना है। फिर वह तुम्हे तुम जो कुछ करते थे, उससे सूचित करेगा।


आयत की सूक्ष्मताएं:
कहा जा सकता है कि समाज को अच्छाई की दावत देकर और बुराईयों से रोक कर और दूसरे समाजी आदेशों के ज़रीये बचाना भी (अपने आप को बचाने) का एक ज़रीया है।
आयत के संदेश:
हक़ की राह में तन्हाई से नही डरना चाहिये। (عَلَيْكُمْ أَنفُسَكُمْ لاَ يَضُرُّكُم)
अगर दूसरों से मुक़ाबला नही कर सकते तो अपने आप से मुक़ाबला करो। (لاَ يَضُرُّكُم)
समाजी धर्म भ्रष्टता और पाप दूसरों के लिये पापों के जाएज़ होने का कारण नही हो सकता।
दूसरों के धर्म भ्रष्ट हो जाने से तुम अपनी हिम्मत न हारो। (لاَ يَضُرُّكُم)
देखो दूसरों को बचाने के चक्कर में ख़ुद को न डूबो लेना। (عَلَيْكُمْ أَنفُسَكُمْ لاَ يَضُرُّكُم)
बाहरी ताक़त तुम्हे कोई नुक़सान नही पहुचा सकती, अगर तुम हारोगे तो अपनी वजह से, (....لاَ يَضُرُّكُم)
क़यामत में सब अपने अपने कामों के उत्तरदायी होंगें। (عَلَيْكُمْ أَنفُسَكُمْ)
इस्लाम का रास्ता इतना सीधा और मज़बूत है कि किसी का शक या उसकी धर्म भ्रष्टता उसमें रुकावट नही हो सकती।
इस तरह से अपने को सुधार लो कि समाज की बुराईयाँ तुम पर कोई असर न कर सकें। (لاَ يَضُرُّكُم)
पहले ख़ुद को सँवारों फिर समाज को सुधारना। (عَلَيْكُمْ أَنفُسَكُم)
तुम अंधेरी दुनिया में अकेले दिया जलाते रहो।
दूसरों की बुराईयों को ज़ाहिर करने के चक्कर में न रहो। (عَلَيْكُمْ أَنفُسَكُم) (तफ़सीरे नुरुस सक़लैन)
तुम्हारे बच जाने का कारण तुम्हारा मार्गदर्शन पा जाना है। (إِذَا اهْتَدَيْتُمْ)
अपने बाप दादा (पुर्खों) या दूसरों के रास्ते पर चलने से क़यामत में निजात नही मिल सकती है। हर इंसान को अपने धर्म और कामों का ख़ुद जवाब देना होगा। (فَيُنَبِّئُكُم)
क़यामत पर ईमान होना ख़ुद को सँवारने की वजह है। (إِلَى اللّهِ مَرْجِعُكُمْ)

يِا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ شَهَادَةُ بَيْنِكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ حِينَ الْوَصِيَّةِ اثْنَانِ ذَوَا عَدْلٍ مِّنكُمْ أَوْ آخَرَانِ مِنْ غَيْرِكُمْ إِنْ أَنتُمْ ضَرَبْتُمْ فِي الأَرْضِ فَأَصَابَتْكُم مُّصِيبَةُ الْمَوْتِ تَحْبِسُونَهُمَا مِن بَعْدِ الصَّلاَةِ فَيُقْسِمَانِ بِاللّهِ إِنِ ارْتَبْتُمْ لاَ نَشْتَرِي بِهِ ثَمَنًا وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَى وَلاَ نَكْتُمُ شَهَادَةَ اللّهِ إِنَّا إِذًا لَّمِنَ الآثِمِينَ अनुवाद:
ऐ ईमान वालो, जब तुम्हारे मरने का दिन क़रीब आ जाये तो अपनों में से दो न्यायवान (ईमानदार) लोगों को अपने मुत्युपत्र (वसीयत) पर गवाही के लिये बुलाओ और अगर सफ़र की हालत में मौत तुम्हारे क़रीब हो (और मुसलमान आदमी गवाही के लिये न मिले) तो दो ग़ैर मुसलमान को गवाही के लिये बुलाओ और अगर (तुम्हे उनकी सच्चाई में)शक हो तो तो नमाज़ के बाद उन्हे रोके रहो ताकि वह अल्लाह की सौगंध खायें कि हम किसी भी क़ीमत पर बेईमानी नही करेंगें, अगरचे हमारे रिश्तेदार ही क्यो न हों, और हम अल्लाह के लिये अपनी गवाही से मुँह नही मोड़ेंगें, इसलिये कि अगर हमने अपनी गवाही से मुह मोड़ा तो हम गुनाहगार (पापी) होंगें।

आयत की सूक्ष्मताएं:
इब्ने अबी मारिया नाम का एक मुसलमान दो ईसाई भाईयों के साथ जिनके नाम तमीम और अदी थे, व्यापार के लिये सफ़र पर गया, रास्ते में जब वह बीमार हो गया तो उसने एक मुत्यु पत्र (वसीयतनामा) लिखा और उसे अपने सामान में छिपा दिया और सामान उन्हे दे दिया कि उसके रिश्तेदारों तक पहुचा दें, उसके मरने के बाद उन्होने उसके सामान में से क़ीमती चीज़ें चुरा लीं और मदीने लौट कर बाक़ी सामान उसके रिश्तेदारों के हवाले कर दिया, उन्होने जब सामान में से ख़त निकाला तो उसमें सामानों की लिस्ट को पढ़ा और उनसे बाक़ी सामान को मागाँ और उन्होंने इंकार कर दिया तो उसके रिश्तेदारों ने पैग़म्बर (स) से शिकायत की, उस समय यह आयत नाज़िल हुई।
उसूले काफ़ी की हदीस के अनुसार, पैग़म्बर (स) ने उनसे क़समें (सौगंध) खिलायीं और उन्हे छोड़ दिया मगर जब ख़त से उनके झूट पकड़े गये तो पैग़म्बर (स) ने दोबारा उन्हे बुलाया और जब मरने वाले रिश्तेदारों ने क़समें खायी कि इसके अलावा भी सामान था तो उन्हे लौटाना पड़ा।
आयत के संदेश:
मुत्युपत्र (वसीयत) लिखते समय मोमिन को होशियारी से काम लेना चाहिये। (يِا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ)
मौत से नज़दीक होना सबके लिये एक जैसा है। (أَحَدَكُمُ)
मौत के क़रीब हो जाना मुत्युपत्र (वसीयत) के लिये आख़री मौक़ा है। (حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ حِينَ الْوَصِيَّةِ)
लोगों का हक़ अदा करते समय गवाह बनाना चाहिये। (شَهَادَةُ بَيْنِكُمْ)
लोगों का हक़ अदा करते समय एक गवाह काफ़ी नही है। (اثْنَانِ)
लोगों का हक़ अदा करने के लिये हर किसी पर विश्वास नही करना चाहिये। (ذَوَا عَدْلٍ)
लोगों को हक़ देते समय अगर मुसलमान न हों तो ग़ैर मुसलमान के साथ मज़बूत काम करना चाहिये। (غَيْرِكُمْ)
लोगों के हक़ का ख़्याल रखना हर जगह ज़रूरी है। इसमें जगह की कोई क़ैद नही है। (ضَرَبْتُمْ فِي الأَرْضِ)
हक़ देने से पहले हर तरह के शक और शंका को दूर कर लेना चाहिये। (إِنِ ارْتَبْتُمْ)
सौगंध खाना और खिलाना शक को दूर करने का एक तरीक़ा है। (فَيُقْسِمَانِ ِ)
सिर्फ़ अल्लाह के लफ़्ज़ (शब्द) वाली सौगंध सही और विश्वासनिय है। (بِاللّهِ)
हक़ को अदा करने के लिये मौक़े का फ़ायदा उठा लेना चाहिये। (بَعْدِ الصَّلاَةِ)
धर्म भ्रष्टता का एक कारण पैसा भी है। (ثَمَنًا)
धर्म भ्रष्टता का एक कारण रिश्तेदारों की मुहब्बत है। (ذَا قُرْبَى)
वहयी (अल्लाह की तरफ़ से आने वाले आयत के संदेश) के ज़रीये जो सौगंधनामा बनाया गया है उसमें सिर्फ़ (लोगों के) हक़ का बयान हुआ है। (لاَ نَشْتَرِي)
हक़ीक़त को छिपाना न्यायवान को फ़ासिक़ बना देता है। ( ذَوَا عَدْلٍ बन जाता है الآثِمِينَ)


فَإِنْ عُثِرَ عَلَى أَنَّهُمَا اسْتَحَقَّا إِثْمًا فَآخَرَانِ يِقُومَانُ مَقَامَهُمَا مِنَ الَّذِينَ اسْتَحَقَّ عَلَيْهِمُ الأَوْلَيَانِ فَيُقْسِمَانِ بِاللّهِ لَشَهَادَتُنَا أَحَقُّ مِن شَهَادَتِهِمَا وَمَا اعْتَدَيْنَا إِنَّا إِذًا لَّمِنَ الظَّالِمِينَ
अनुवाद:
फिर अगर पता चले कि दोनो गवाहों ने (जो मुसलमान नही थे मगर सफ़र की वजह से उन्हे गवाह बनाना पड़ा था), पाप करते हुए धोखा दिया है। (और उन्होने जो सौगंध खायी थी वह झूठी थी) तो फ़िर दूसरे दो लोगों को (जो मुसलमान हों) और मरने वाले के क़रीब हों उन्हे उनकी जगह गवाह बनाया जायेगा और उनसे सौगंध ली जायेगी कि: हमारी गवाही उन दोनों लोगों के मुक़ाबले में निसंदेह श्रेष्ठ है। और हम ज़्यादती करने वालों में से नही हैं। इसलिये कि अगर हम ऐसा करेंगें तो निसंदेह अत्याचारियों (ज़ालिमों) में से हो जायेगें।
आयत की सूक्ष्मताएं:
यह बात बता देना ज़रूरी है कि मरने वाले के वारिसों की गवाही और सौगन्ध का कारण यह है कि वह लोग पहले से उसके सामानों की, चाहे सफ़र से पहले का हो या बाद का सबकी, ख़बर रखते हैं।
आयत के संदेश:
तुम्हे इन सब बातों के पता लगाने की कोई ज़रूरत नही है, लेकिन अगर कोई बात हाथ लग जाये तो अलग बात है। (राग़िब मुफ़रेदात में लिखते हैं कि जासूसी के बग़ैर कोई बात पता लगाने को असूर कहते हैं।)

ذَلِكَ أَدْنَى أَن يَأْتُواْ بِالشَّهَادَةِ عَلَى وَجْهِهَا أَوْ يَخَافُواْ أَن تُرَدَّ أَيْمَانٌ بَعْدَ أَيْمَانِهِمْ وَاتَّقُوا اللّهَ وَاسْمَعُواْ وَاللّهُ لاَ يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِين

अनुवाद:
यह तरीक़ा हक़ीक़त से ज़्यादा नज़दीक है। इसलिये कि गवाही को अच्छी तरह से दे सकेंगें या इस बात से डरेंगें कि उनके सौगंध खाने के बाद मरने वाले वारिसों से सौगंध खिलायी जायेगी और अल्लाह से डरो (उसके आदेश) को मानो। अल्लाह निसंदेह बुरे गिरोह की मार्गदर्शन नही करता।
आयत की सूक्ष्मताएं:
यह आयत गवाही लेने और देने के कामों में सख़्ती और कठिनाई करने को बयान कर रही है। जैसा कि इससे पहली की दो आयतों में गुज़र चुका है। और नमाज़ के बाद लोगों के सामने सौगंध खाने से मालूम हो जायेगा कि उनकी यह क़समें झूठी हैं या सच्ची। इसलिये कि मुम्किन है कि अगर उनकी गवाही स्वीकार नही की गयी तो उनकी सौगंध और गवाही का विश्लास न होने के कारण समाज में उनकी हैसियत नही रह जाये।
आयत के संदेश:
ऐसे प्रोग्राम महत्व रखते है जो लोगों को उनका हक़ छिन जाने से बचाना चाहते हैं। (.....ذَلِكَ أَدْنَى أَن)
पाप से दूरी का एक कारण समाज में बदनामी से ख़ुद को बचाना है। (أَوْ يَخَافُواْ أَن تُرَدَّ أَيْمَانٌ)
ऐसे जीवन गुज़ारो कि लोगों को तुम्हारी सोच और तुम्हारी चीज़ों का पता हो ताकि झूठे बेधर्म लोग अपनी झूठी सौगंध से तुम्हारी मेहनतों को बर्बाद न कर सकें और यह जान जायें कि उनके झूठे बयान दूसरे सच्चे गिरोह के बयान से रद्द किये जा सकते हैं। (تُرَدَّ أَيْمَانٌ بَعْدَ أَيْمَانِهِمْ)
(सारी कठिनाईयों के बावजूद) तक़वा (अल्लाह का डर) ज़रूरी है।
झूठी गवाही देना फ़िस्क़ (धर्म से निकल जाना) की निशानी है। (وَاللّهُ لاَ يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ)

يَوْمَ يَجْمَعُ اللّهُ الرُّسُلَ فَيَقُولُ مَاذَا أُجِبْتُمْ قَالُواْ لاَ عِلْمَ لَنَا إِنَّكَ أَنتَ عَلاَّمُ الْغُيُوبِ
अनुवाद:
(याद करो) उस दिन को जब अल्लाह नबियों को जमा करेगा और उनसे पूछेगा: किस तरह तुम्हारी बातों का जवाब देते थे? तो वह सब कहेंगें: हम क्या कहें, तू ख़ुद ग़ैब (सबसे छुपी हुई बातें) की बातों को जानता है।
आयत की सूक्ष्मताएं:
वास्तविक ज्ञान अल्लाह के पास है और उसके अलावा जिसके पास भी इल्म है वह उसी से लिया गया है, जैसे कि ग़ैब (छुपी हुई बातें) का इल्म सिर्फ़ उसके पास है और वह जिसे चाहता देता है।
आयत के संदेश:
क़यामत में नबियों से भी सवाल किया जायेगा कि लोगों का उन के साथ कैसा सुलूक (बर्ताव) था। (مَاذَا أُجِبْتُمْ)
अल्लाह के इल्म (ज्ञान) के आगे नबियों के इल्म की कोई हैसियत नही है। (لاَ عِلْمَ لَنَا)

إِذْ قَالَ اللّهُ يَا عِيسى ابْنَ مَرْيَمَ اذْكُرْ نِعْمَتِي عَلَيْكَ وَعَلَى وَالِدَتِكَ إِذْ أَيَّدتُّكَ بِرُوحِ الْقُدُسِ تُكَلِّمُ النَّاسَ فِي الْمَهْدِ وَكَهْلاً وَإِذْ عَلَّمْتُكَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَالتَّوْرَاةَ وَالإِنجِيلَ وَإِذْ تَخْلُقُ مِنَ الطِّينِ كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ بِإِذْنِي فَتَنفُخُ فِيهَا فَتَكُونُ طَيْرًا بِإِذْنِي وَتُبْرِىءُ الأَكْمَهَ وَالأَبْرَصَ بِإِذْنِي وَإِذْ تُخْرِجُ الْمَوتَى بِإِذْنِي وَإِذْ كَفَفْتُ بَنِي إِسْرَائِيلَ عَنكَ إِذْ جِئْتَهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُواْ مِنْهُمْ إِنْ هَـذَا إِلاَّ سِحْرٌ مُّبِينٌ
अनुवाद:
(ऐ पैग़म्बर याद करो) उस समय को जब अल्लाह ने मरियम के बेटे ईसा (अ) से कहा: मेरी उन नेमतों को याद करो जो मैने तुम पर और तुम्हारी माँ पर भेजीं, उस समय को जब (रूहूल क़ुदुस) से तुम्हे मज़बूती दी जब तुमने पालने में (चमत्कार से) और बड़े होने के बाद (वहीय) के ज़रीये लोगों से बातें कीं, और उस समय को जब किताब, बोध और इंजील का तुम्हे ज्ञान दिया, और (उस समय को न भूलना) जब मेरी इजाज़त से तुम मिट्टी से पंक्षी बना कर उसमें रूह (आत्मा) फूंकते थे और वह ज़िन्दा हो जाते थे और मेरी इजाज़त से तुम पैदाइशी अंधे और सफ़ेद दाग़ वालों को सही करते थे, मुर्दों को ज़िन्दा करते थे, (और उन्हे क़ब्रों से बाहर निकालते थे) और(याद करो) उस समय को जब बनी ईसराईल के अत्याचारिक हाथों को तुमसे दूर कर दिया, उस समय जब तुम उनके लिये रौशन दलीलें लाये और काफ़िरों ने उनके (चमत्कारों के) बारे में कहा: यह खुले हुए जादू के सिवा कुछ नही है।
आयत की सूक्ष्मताएं:
- इस आयत से लेकर आख़िरी आयत तक हज़रते ईसा (अ) का वर्णन है।
- इस आयत में अल्लाह की तरफ़ से मिलने वाली तरह तरह की नेमतों और बिल्कुल शुरु में हज़रते ईसा को रूहुल क़ुदुस से मज़बूती का वर्णन हुआ है।
शायद हज़रते ईसा की माँ मरियम पर नेमतों से मुराद ईसा की पैदाईश की बशारत (ख़ुशख़बरी) और उनका फ़रिश्तों से बातें करना हो। (आले इमरान 45 से 50 إِذْ قَالَتِ الْمَلآئِكَةُ يَا مَرْيَمُ)






अज़मते काबा क़ुरआन के आईने में

ज़ैनुल आबेदीन

इस दुनिया में ख़ुदा का पहला घर ख़ान ए काबा है। तारीख़े अतीक़ भी इस बात की गवाह है कि इससे क़ब्ल कोई एक भी ऐसी इबादत गाह कायनात में मौजूद नही थी जिसे ख़ुदा का घर कहा गया हो। इस की तसदीक़ क़ुरआने मजीद भी इन अल्फ़ाज़ में करता है:
(सूर ए आले इमरान आयत 96)

तर्जुमा: बेशक पहला घर जो लोगों की इबादत के लिये मुक़र्रर किया गया था वह यही है बक्का में, जो बा बरकत और सारे जहानों के लिये मुजिबे हिदायत है।

एक तारीख़ी रिवायत के मुताबिक़ ख़ान ए काबा बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदुल अक़सा से एक हज़ार तीन सौ साल पहले तामीर हुआ है।

असरे जाहिलियत में भी तमाम अरब अपने जाहिली रस्म व रिवाज के मुताबिक़ ख़ान ए काबा का तवाफ़ और हज किया करते थे।

हज़रत इब्राहीम (अ) ने हज़रत मूसा (अ) से नौ सौ बरस पहले इस की ज़ाहिरी तामीर मुकम्मल की और बारगाहे हक़ में दुआ की। यह दुआ क़ुरआने करीम में इस तरह बयान हुई है:


(सूर ए इब्राहीम आयत 37)

परवरदिगारा, मैंने इस बे आबो गयाह वादी में अपनी औलाद को तेरे मोहतरम घर के पास ला बसाया है......।

हिजरत के अठठारवें महीने माहे शाबान सन 2 हिजरी में जंगे बद्र से एक माह पहले मुसलमानों के क़िबला बैतुल मुक़द्दस से मुन्तक़िल हो कर काबे की सिम्त हो गया। जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद के सूर ए बकरह में किया गया है।

ख़ुदा वंदे आलम का मुसलमानों पर बड़ा अहसान है कि उसने हमारा क़िबला ख़ान ए काबा क़रार दिया। चूँ कि बैतुल मुक़द्दस ऐसा क़िबला था जिस के कई दावेदार होने की वजह से कई बार काफ़िर फ़ातेहों ने उसे वीरान और नजिस किया और वहाँ के बसने वालों को कई बार ग़ुलाम बनान पड़ा और कई बार वहाँ क़त्ले आम भी जारी रहा, जो आज भी शिद्दत से हो रहा है और तारीख़ मुसलमानों के सुकूत पर महवे हैरत है।

यह एक बड़ी ताज्जुब ख़ेज़ बात है और तारीख़े आलम भी इस बात की गवाह है कि पिछले पाच हज़ार सालों में किसी ने भी ख़ान ए काबा पर अपनी ज़ाती मिल्कियत होने का दावा नही किया। यह ऐसा अनमोल शरफ़ है जो दुनिया की किसी इबादत गाह या मअबद को हासिल नही हुआ।

अरब के बुत परस्त भी उसे बैतुल्लाह ही कहा करते थे। इस्लाम से पहले भी उसकी हुरमत, हिफ़ाज़त, सियानत ख़ुदा मुतआल ने शरीफ़ नस्ल अरबों के ज़रिये फ़रमाई और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ज़रिये से मुसलमानों को क़यामत तक के लिये उसका मुहाफ़िज़ व पासबान बना दिया।

नबी करीम (स) की विदालते बा बरकत से एक महीने बीस रोज़ पहले जब यमन का बादशाह अबरहा अपनी साठ हज़ार हाथियों की मुसल्लह फ़ौज लेकर ख़ान ए काबा को ढाने की ग़रज़ से मक्के की वादियों में आया तो परवर दिगार ने अपने घर के हरीम की हिफ़ाज़त की ख़ातिर किसी इंसानी फ़ौज का सहारा नही लिया बल्कि अबाबीलों जैसे नाज़ुक अंदाम परिन्दों के ज़रिये उन हाथियों पर कंकड़ियाँ बरसा कर उन अफ़वाजे फ़ील को तहस नहस कर दिया। क़ुरआने करीम के सूर ए फ़ील में इसी वाक़ेया का ज़िक्र है।

जन्नत से ख़ास कर उतारे गये दो अहम पत्थर हजरे असवद और मक़ामे इब्राहीम, अहले आदम (अ) और दौरे इब्राहीमी से अब तक मौजूद हैं और दुनिया के सब से ज़्यादा मुक़द्दस पानी का क़दीम चश्मा ज़मज़म इसी ख़ान ए काबा के क़रीब है। इसके पानी के नेकों की शराब कहा गया है, लाखों अक़ीदत मंद मुसलमान दुनिया के गोशा व किनार से इस पानी को तबर्रुक के तौर पर ले जाते हैं।

मक्क ए मुअज़्ज़मा और फ़ज़ाएले ख़ान ए काबा में क़ुरआने हकीम की कई आयात नाज़िल हुई हैं। अल्लाह तआला ने शहरे मक्का को (उम्मुल क़ुरा) यानी बस्तियों का माँ कहा है और सूर ए अत तीन और सूर ए अल बलद में अल्लाह तआला ने इस शहरे पुर अम्न में की क़सम खाई है। इस शहर में यहाँ के शहरियों के अलावा, दूसरे तमाम लोगों को एहराम बाँधे बग़ैर दाख़िल होने की इजाज़त नही है। यह ख़ुसूसियत दुनिया के किसी और शहर को नसीब नही है। मस्जिदुल हराम की इबादत और यहाँ की हर नेकी अक़ताए आलम में की गई नेकियों से एक लाख गुना ज़्यादा बेहतर है। यह मक़ाम इस क़दर मोहतरम और पुर अम्न है कि यहाँ न सिर्फ़ ख़ूनरेज़ी मना है बल्कि न किसी जानवर का शिकार किया जा सकता है व किसी पेड़ को काटा और सबज़े और पौधे को उखाडा़ जा सकता है।

क़ुरआने पाक में उसे बैतुल हराम यानी शौकत का घर कहा गया है। ख़ान ए काबा के महल्ले वुक़ू के बारे में लिखा गया है कि यह ऐन अरशे इलाही और बैतुल मामूर के नीचे है। इल्मे जुग़राफ़िया के माहिरीन का कहना है कि काबे के महल्ले वुक़ू को हम नाफ़े ज़मीन कह सकते हैं।

क़ुरआने मजीद में काबतुल्लाह और दीगर शआयरे इलाही की ताज़ीम को क़ुलूब का तक़वा क़रार दिया गया है और इसी तरह मुतअद्दिद सूरों (सूर ए बक़रह, सूर ए इब्राहीम, सूर ए आले इमरान, सूर ए मायदा और क़सस) में ख़ान ए काबा के फ़ज़ायल बयान किये गये हैं।






उलूमे क़ुरआन का परिचय

लेखक- गुलज़ार अहमद जाफ़री
अनुवादक- सैय्यद क़मर ग़ाज़ी

क़ुरआने करीम ज्ञान पर आधारित एक आदर्श किताब है।परन्तु इसके भाव हर इंसान नही समझ सकता। जब कि क़ुरआन अपने आश्य को समझाने के लिए बार बार एलान कर रहा है कि बुद्धि से काम क्यों नही लेते ? चिंतन क्यों नही करते ? हम किस तरह समझें और किस तरह चिंतन करें क्यों कि क़ुरआन के आशय को समझना क़ुरआन के उलूम पर आधारित है। तो आइये पहले क़ुरान के उलूम से परिचित होते हैं।
उलूमे क़ुरआन की परिभाषा

वह सब उलूम जो क़ुरआन को समझने के लिए प्रस्तावना के रूप में प्रयोग किये जाते हैं उनको उलूमे क़ुरआन कहा जाता है। दूसरे शब्दों में उलूमे क़ुरआन उलूम का एक ऐसा समूह है जिसका ज्ञान हर मुफ़स्सिर और मुहक़्क़िक़ के लिए अनिवार्य है। वैसे तो उलूमे क़ुरआन स्वयं एक ज्ञान है जिसके लिए शिया व सुन्नी सम्प्रदायों में बहुत सी किताबें मौजूद हैं।

उलूमे क़रआन कोई एक इल्म नही है बल्कि कई उलूम का एक समूह है। और यह ऐसे उलूम हैं जिनका आपस में एक दूसरे के साथ कोई विशेष सम्बन्ध भी नही है। बल्कि प्रत्येक इल्म अलग अलग है।

उलूमे क़ुरआन कुछ ऐसे उप विषयों पर आधारित है जिनका जानना बहुत ज़रूरी है और इनमे से मुख्य उप विषय इस प्रकार हैं।

(1)उलूमे क़ुरआन का इतिहास
(2) क़ुरआन के नाम और क़ुरआन की विषेशताऐं
(3) क़ुरआन का अर्बी भाषा में होना
(4) वही की वास्तविकता और वही के प्रकार
(5)क़ुरआन का उतरना
(6) क़ुरआन का एकत्रित होना
(7) क़ुरआन की विभिन्न क़िराअत
(8) क़ुरआन की तहरीफ़= फेर बदल
(9) क़ुरआन का दअवा
(10) क़ुरआन का मोअजज़ा
(11) नासिख व मनसूख
(12)मोहकम व मुतशाबेह।

इन में से कुछ उप विषय ज्ञानियो व चिंतकों की दृष्टि में आधार भूत हैं इसी लिए कुछ उप विषयों को आधार बना कर इन पर अलग से किताबे लिखी गई हैं। जैसे उस्ताद शहीद मुतह्हरी ने वही और नबूवत पर एक विस्तृत किताब लिखी है।
उलूमे क़ुरआन का इतिहास

मानवता के इतिहास में कोई ऐसी किताब नही मिलती जिसकी रक्षा और व्याख्या के लिए क़ुरआन के समान अत्याधिक प्रबन्ध किये गये होँ।

क़ुरआन और उलूमे क़ुरआन के परिचय के लिए इस्लाम के प्रथम चरण में ही असहाबे रसूल, (वह लोग जो रसूल के जीवन में मुस्लमान हुए तथा रसूल के साथ रहे) ताबेईन (वह लोग जो रसूल स.के स्वर्गवास के बाद मुस्लमान हुए या पैदा हुए और रसूल के असहाब के सम्मुख जीवन यापन किया) और ज्ञानियों ने बहुत काम किया।कुछ लोगों ने क़ुरआन को हिफ़्ज़ किया तो कुछ ने इसकी तफ़सीर की।क़ुरआन की विभिन्न दृष्टिकोणो से तफ़सीर की गयी। क़ुरआन विशेषज्ञों के अनुसार हज़रत अली अलैहिस्सलाम वह प्रथम व्यक्ति है जिन्होने क़ुरआने करीम की तफ़सीर की और उलूमे क़ुरआनी की आधार शिला रखी।

सुन्नी सम्प्रदाय के प्रसिद्ध ज्ञानी व मुफ़स्सिर जलालुद्दीन सयूती लिखते हैं कि वह खलीफा जिन्होने उलूमे क़ुरआन के सम्बन्ध में सबसे अधिक जानकारी प्रदान की हज़रत अली अलैहिस्सलाम हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अलावा दूसरे असहाब ने भी उलूमे क़ुरआन पर काम किया है। जैसे अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास, अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद, उबाई इब्ने कअब इत्यादि परन्तु इन सब ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से ही यह ज्ञान प्राप्त किया।
उलूमे क़ुरआन का संकलन

उलूमे क़ुरआन को एकत्रित करने का कार्य दूसरी शताब्दी हिजरी मे ही आरम्भ हो गया था। सबसे पहले हज़रत अली अलैहिस्सलाम के शिष्य अबुल असवद दौइली ने क़ुरआन पर ऐराब(मात्राऐं) लगाये। और फिर इनके एक शिष्य याहया बिन यअमर ने इल्मे तजवीद पर एक किताब लिखी।

हसन बसरी ने क़ुरआन के नज़ूल और क़ुरआन की आयात की संख्या के सम्बन्ध में एक किताब लिखी।

अब्दुल्लाह बिन आमिर ने क़ुरआन के मक़तूअ व मूसूल को ब्यान किया।

अता बिन इबी मुस्लिम खुरासानी ने नासिख और मनसूख पर एक किताब लिखी।

अबान बिन तग़लब ने उलूमे क़िराअत और मअनी आदि के सम्बन्ध में पहली किताब लिखी।

खलील बिन अहमद फ़राहीदी ने क़ुरआन में नुक्ते लगाये।

तीसरी शाताब्दी हिजरी में याहया बिन ज़यादफ़रा ने क़ुरआन के मअनी पर एक किताब लिखी।

चौथी शताब्दी हिजरी में अबु अली कूफ़ी ने फ़ज़ाईलुल क़ुरआन पर एक किताब लिखी।

सैय्यद शरीफ़ रज़ी ने तलखीसुल क़ुरआन फ़ी मजाज़ातुल क़ुरआन पर एक किताब लिखी।

पाँचवी शताब्दी हिजरी में उलूमे क़ुरान विषय का क्षेत्र विस्तृत हुआ और इस विषय पर बहुत सी किताबें लिखी गयीं। इस शताब्दी में इब्राहीम बिन सईद जूफ़ी ने उलूमे क़ुरआन पर अलबुरहान फ़ी उलूमिल क़ुरआन नामक किताब लिखी।

छटी और सातवी शताब्दी हिजरी में इब्ने जूज़ी और सखावी ने इस विषय पर काम किया।

आठवी शताब्दी हिजरी में बदरूद्दीन मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह ज़र कशी ने अलबुरहान फ़ी उलूमिल क़ुरआन नामक एक महत्वपूर्ण किताब लिखी।

नवी शताब्दी हिजरी में जलालुद्दीन सयूती ने उलूमे क़ुरआन पर आश्चर्य जनक काम किया और एक ऐसी किताब लिखी जो उलूमे क़ुरआन की आधारिक किताब मानी जाती है। इसके बाद इस विषय पर कार्य की गति धीमी पड़ गई । वर्तमान समय में कुछ विद्वानों ने फिर से इस इल्म की तरफ़ ध्यान दिया और कुछ किताबें लिखी जो इस प्रकार हैं।

1- अलबयान फ़ी तफ़सीरिल क़ुरआन- आयतुल्लाह अबुल क़ासिम खूई

2- अत्तमहीद फ़ी उलूमिल क़ुरआन- आयतुल्लाह मारफ़त

3- हक़ाइक़- सैय्यद जाफ़र मुर्तज़ा आमुली

4- पज़ोहिशी दर तारीखे क़ुरआने करीम- डा. सैय्यद मुहम्मद बाक़िर हुज्जती

5- मबाहिस फ़ी उलूमिल क़ुरआन- डा. मजी सालेह