मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ
 
मक़ालाते क़ुरआन का मजमूआ






आयत के संदेश:1

काबा (अल्लाह का घर) जानवर तक के लिये अम्न व अमान की जगह होनी चाहिये। (لاَ تَقْتُلُواْ الصَّيْدَ)
जानते बुझते हुए बुरे काम का इरादा करना उस पर अमल करने से ज़्यादा खतरनाक है। (مُّتَعَمِّدًا)
सज़ा भी इंसाफ़ से मिलनी चाहिये। (فَجَزَاء مِّثْلُ مَا قَتَلَ)
सज़ा, भूखतान, जुर्माना सब कुछ रत्ती पाई सही बयान होना चाहिये। (يَحْكُمُ بِهِ ذَوَا عَدْلٍ)
मुजरिम का हाथ कई तरह के भुकतान (क़ुर्बानी, भिखारी को खाना खिलाना, रोज़ा) के लिये खुला हुआ है। और उसकी माली व जिस्मानी हैसियत का ख़्याल रखा गया है।
काबा में पाप करने का भुकतान भी काबा में ही रखा गया है। (بَالِغَ الْكَعْبَةِ)
अल्लाह की तरफ़ से भुकतान इंसान को सुधारने और उसके घमंड को तोड़ने के लिये रखा गया है। (وَبَالَ أَمْرِهِ)
क़ानून जारी करना, उसको बाक़ायदा पहुचाने के बाद की मंज़िल है। (عَفَا اللّهُ عَمَّا سَلَف)
पाप बार बार करने से उसकी सज़ा बढ़ती जाती है। (وَمَنْ عَادَ.....)

أُحِلَّ لَكُمْ صَيْدُ الْبَحْرِ وَطَعَامُهُ مَتَاعًا لَّكُمْ وَلِلسَّيَّارَةِ وَحُرِّمَ عَلَيْكُمْ صَيْدُ الْبَرِّ مَا دُمْتُمْ حُرُمًا وَاتَّقُواْ اللّهَ الَّذِيَ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
अनुवाद:
दरियाई जानवर का शिकार और उनका खाना तुम्हारे लिये हलाल (जाएज़) किया गया है। (यह शिकार और खाना) तुम्हारे और क़ाफ़िले वाले के लिये रास्ते का खाना है, लेकिन जब तक ऐहराम (हज का वस्त्र) में हो तब तक जंगली शिकार तुम्हारे लिये हराम है। और उस अल्लाह से डरो जिस की तरफ़ तुम्हे लौट कर जाना है।

आयत की सूक्ष्मताएं:
इस आयत के अनुसार, ऐहराम की हालत में शिकार करना और उसका प्रयोग करना हलाल है, लेकिन जंगली जानवरों का शिकार करना भी हराम है और उसका प्रयोग करना भी। (तफ़सीरे मजमऊल बयान और दूसरी फ़िक़्ह (मसाएल) की किताबें)

आयत के संदेश:
ऐहराम में होने वालों के लिये सारे रास्ते बंद नही हैं। (أُحِلَّ لَكُمْ صَيْدُ ......حُرِّمَ)
दरिया से मिलने वाली चीज़ें सिर्फ़ दरिया के नज़दीक वालों के लिये नही हैं। (وَلِلسَّيَّارَةِ)
दरिया के पास वालों का दरिया से फ़ायदा उठाने का ज़्यादा हक़ है। (لَّكُمْ وَلِلسَّيَّارَةِ)
हमेशा किसी चीज़ का हलाल या हराम होना ख़ुद उसकी वजह से नही होता बल्कि कभी ज़माने और जगह के हालात की वजह होता है।और कभी अल्लाह के आदेश में इतिहास और भूगोल से भी असर पड़ता है। (مَا دُمْتُمْ حُرُمًا)
क़यामत पर ईमान रखना तक़वे (अल्लाह के डर) की वजह से है। (وَاتَّقُواْ اللّهَ الَّذِيَ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ)
इबादती व राजनितिक प्रोग्रामों की भीड़ को जानवरों और पेड़, पौधों.... के नष्ट का कारण नही बनना चाहिये।

جَعَلَ اللّهُ الْكَعْبَةَ الْبَيْتَ الْحَرَامَ قِيَامًا لِّلنَّاسِ وَالشَّهْرَ الْحَرَامَ وَالْهَدْيَ وَالْقَلاَئِدَ ذَلِكَ لِتَعْلَمُواْ أَنَّ اللّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ وَأَنَّ اللّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
अनुवाद:
अल्लाह ने काबे को (जो पवित्र घर है) लोगों के लिये मज़बूती का ज़रीया बनाया है और इसी तरह हराम महीने (वह महीने जिन में जंग हराम की गयी है), बेनिशान क़ुर्बानियाँ और निशान वाली क़ुर्बानियों को तुम्हारी मज़बूती का ज़रीया बनाया गया है। यह सब इसलिये हैं कि तुम जान लो कि अल्लाह जो कुछ ज़मीनों और आसमानों में है, सब जानता है। और निसंदेह अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है।
आयत की सूक्ष्मताएं:
क़याम, मज़बूती का ज़रीया है। जैसै: तम्बू की मज़बूती के लिये लगायी जाने वाली लकड़ी। (मुफ़रेदाते राग़िब)
इमाम सादिक़ (अ) कहते हैं कि हराम (पवित्र) घर इसलिये कहा जाता है कि चुँकि काफ़िरों (नास्तिक़ों) का उसमें प्रवेश करना मना है। (तफ़सीरे नुरुस सक़लैन)
कामों की मज़बूती और पायदारी के लिये कुछ चीज़ों की ज़रूरत होती है:
(1) केन्द्र(सेंटर)
(2) अम्नीयत (सुरक्षा)
(3) खाना
अल्लाह ने इन तीनों चीज़ों को काबे और अपने पवित्र घर में क़रार दिया है जो केन्द्र भी है और जहाँ किसी को किसी तरह के झगड़े फ़साद का कोई हक़ नही है और इसी तरह से क़ुर्बानियाँ भी खाने का ज़रीया और मुसलमानों के कामों के लिये है।
(هَدْيَ) बेनिशान क़ुरबानी को कहते हैं और (قَلاَئِدَ) निशान वाली क़ुर्बानी को कहते हैं।
हराम महीने यह है: रजब, ज़िक़ादा, ज़िलहिज्जा, मुहर्रम, इन महीनों में जंग करने से मना किया गया है।
बगैर किसी साज़ व सामान और विभिन्नता (काला, गोरा, अरब, ग़ैर अरब, मालिक, ग़ुलाम, अमीर, ग़रीब,) और बिना किसी बहसी बहसा और लड़ाई के लाखों लोगों का उस पवित्र स्थान पर जमा हो जाना इस्लाम की बड़ी विशेषता है।और अगर हज की बरकतें जैसे हज पर जाते हुए एक दूसरे से अपनी ग़लतियों को हलाल करवाना, आप का सबसे मिलने जाना और सबको आप से मिलने और रुख़सत करने आना, वहाँ भीड़ की वजह से व्यापार में चार चाँद लग जाना, वहाँ जाकर या जाने की वजह से अपना सारा ख़ुम्स व ज़कात अदा करना, इस्लाम की शिक्षा का ज्ञान होना और भिन्न भिन्न की क़ौम और उम्मत से मिलना, तौहीद के सबसे पुराने सेन्टर (केन्द्र) पर बग़ैर किसी साज़ व सामान के होना, सबसे साथ मिलकर दुआ करना और रोना, नबियों के गुज़रने की जगहों से गुज़रना, अरफ़ात और मशअर के सहरा में तौबा करना और क़यामत को याद करना, राजनितिक तौर पर ताक़त दिखाना और काफिरों से नफ़रत ज़ाहिर करना इसके अलावा और दूसरी सारी बातों पर नज़र करें तो समझ में आता है कि हज का प्रोग्राम अल्लाह के बेइन्तेहा इल्म की वजह से रखना मुमकिन हुआ है। जिसे दुनिया की सारी चीज़ों की ख़बर है। वर्ना कोई सीमीत ज्ञान रखने वाला ऐसी इबादत का आदेश नही दे सकता।
आयत के संदेश:
काबा (अल्लाह का घर) सबके लिये है। (لِّلنَّاسِ)
हज मुसलमानो की मज़बूती और पायदारी का ज़रीया है। (قِيَامًا لِّلنَّاسِ)
धार्मिक कामों को अंजाम देने के लिये भीड़, एकता, इबादत, पवित्रता और क़दासत, और अमनियत की ज़रूरत होती है और क़ुर्बानियाँ खाने की ज़रूरत को पूरी करने के लिये हैं।
काबा जो पवित्र और पाक घर है। मामूली पत्थरों से बना हुआ है। यह इस बात की निशानी है कि इसका आदर धार्मिक स्थान होने की वजह से है। (सुन्दरता या क़ीमती होने की वजह से नही)
क़ानून बनाने का हक़ उसको है जो दुनिया की सारी बातों को जानता हो।(اللّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ)
अल्लाह के आदेश का सोत्र उसका असीमीत ज्ञान है। इसलिये अगर कोई आदेश तुम्हारी समझ में न आये तो उसे बेकार न समझो क्योकि अल्लाह के इल्म में है। (ذَلِكَ لِتَعْلَمُواْ)
अल्लाह के कुछ क़ानूनों की वजह बाद के ज़मानों में समझ में आयेगी। (لِتَعْلَمُوا)
इबादतगाह (पूजा स्थल) और क़ुरबानगाह (बली चढ़ाने का स्थान) दोनो अल्लाह के धर्म को मज़बूत करने के लिये हैं।

اعْلَمُواْ أَنَّ اللّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ وَأَنَّ اللّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ 98 مَّا عَلَى الرَّسُولِ إِلاَّ الْبَلاَغُ وَاللّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ
अनुवाद:
जान लो कि बेशक अल्लाह कठोर सज़ा देने वाला भी है, क्षमा करने वाला और दयालू भी।
पैग़म्बर (दूत) का काम सिर्फ़ (अल्लाह का आदेश, आयत के संदेश) पहुचा देना है और निसंदेह अल्लाह जो तुम खुले आम या छुप कर करते हो सब जानता है।
आयत के संदेश:
धमकी के साथ साथ ईनाम का ऐलान भी होना चाहिये। (شَدِيدُ الْعِقَابِ وَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
अपने कामों के तुम ख़ुद उत्तरदायी हो, पैग़म्बर (स) तुम पर ज़ोर ज़बरदस्ती नही करेंगें, उनका काम सिर्फ़ अल्लाह का आयत के संदेश तुम तक पहुचा देना है। ( مَّا عَلَى الرَّسُولِ إِلاَّ الْبَلاَغُ)
चुँकि अल्लाह को हर चीज़ का इल्म है इसलिये उसे तुम्हारे ज़ाहिर करने और छुपाने से कोई फ़र्क़ नही पड़ता। (يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ)
तुम्हारे स्वीकार करने या अस्वीकार करने से पैग़म्बर पर कोई असर पड़ने वाला नही है। (مَّا عَلَى الرَّسُولِ إِلاَّ الْبَلاَغُ)
एक दूसरी आयत में इस तरह आया है। (فان تولوا فانما عليك البلاغ)

قُل لاَّ يَسْتَوِي الْخَبِيثُ وَالطَّيِّبُ وَلَوْ أَعْجَبَكَ كَثْرَةُ الْخَبِيثِ فَاتَّقُواْ اللّهَ يَا أُوْلِي الأَلْبَابِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
अनुवाद:
(ऐ पैग़म्बर लोगों से कह दीजिए) अच्छे और बुरे बराबर नही हो सकते, चाहे बुरों की ज़्यादा संख्या पर तुम्हे आश्चर्य ही क्यो न हो, इसलिये ऐ अक़्ल वालो अल्लाह से डरो, ताकि सफल हो सको।
आयत की सूक्ष्मताएं:
इंसान के अच्छे बुरे में, उसका काम, माल, कमाई, खाना पीना और उसकी दूसरी बहुत चीज़े शामिल हैं।
आयत के संदेश:
क़ीमती चीज़ का मेयार उसके सही और ग़लत होने की वजह से है न कि उसकी कमी और ज़्यादती (संख्या) की वजह से।
अकसरीयत और संख्या की ज़्यादती इंसान को धोखा दे देती है इससे होशियार रहने की ज़रूरत है। (أَعْجَبَكَ كَثْرَةُ)
(अगर ज़लील नही होना है तो किसी गिरोह से मिल जाओ) क़ुरआनी नारा नही है। इस लिये ऐसा ज़रूरी नही है।
अक़्ल वाले और समझदार लोग वह हैं जो हक़ को मानते हैं, गिरोह को नही।
अल्लाह से न डरना बेअक़्ल होने की निशानी है। (فَاتَّقُواْ اللّهَ يَا أُوْلِي الأَلْبَابِ)

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ لاَ تَسْأَلُواْ عَنْ أَشْيَاء إِن تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ وَإِن تَسْأَلُواْ عَنْهَا حِينَ يُنَزَّلُ الْقُرْآنُ تُبْدَ لَكُمْ عَفَا اللّهُ عَنْهَا وَاللّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ 101 قَدْ سَأَلَهَا قَوْمٌ مِّن قَبْلِكُمْ ثُمَّ أَصْبَحُواْ بِهَا كَافِرِينَ
अनुवाद:
ऐ ईमान वालो, ऐसी चीज़ों के बारे में जिनके मालूम होने से तुम्हे दुख होगा, सवाल न करो। हाँ अगर क़ुरआन के नाज़िल होने के समय उसके बारे में पूछोगे तो तुम्हारे लिये साफ़ हो जायेगा। अल्लाह ने तुम्हारे बेजा सवालों पर तुम्हे माफ़ कर दिया, निसंदेह अल्लाह माफ़ करने वाला और बर्दाश्त करने वाला है।
(इस तरह के सवाल) पिछली क़ौमों में से भी किया करते थे। (क्योकि अमल करने और उनको बर्दाशत करने की उनमें ताक़त नही थी) इस लिये उनका इंकार करते थे और कुफ़्र करते थे।
आयत की सूक्ष्मताएं:
पैग़म्बर (स) लोगों को हज के बारे में बता रहे थे कि किसी ने सवाल किया: क्या हज सारी जीवन में एक बार अनिवार्य (फ़र्ज़, ज़रूरी है या हर साल ज़रूरी है? आपने जवाब नही दिया, पूछने वाले ने कई बार पूछा तो आपने उससे कहा तुम्हे इतनी बेक़रारी क्यो है? मैं अगर कहूँ कि हर साल ज़रूरी है तो तुम्हारे लिये सख़्त हो जायेगा। मैं जिस चीज़ को ख़ुद से न बताऊ उसके बारे में सवाल न करो, इससे पहले वाली क़ौमों की हलाकत की एक वजह यह थी कि वह लोग बेजा सवाल करते थे।
अगर नही जानता है तो उसके जानने वालों से पूछे (فسةلوا اهل الذكر ان كنتم لا تعلمون) मगर कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके ज़ाहिर होने से किसी इंसान या पूरे समाज को नुक़सान हो सकता है। जैसे, दूसरों की बुराईयों के बारे में सवाल करना या मौत का समय मालूम हो जाना या फ़ौज के राज़ों का मालूम हो जाना।
आयत के संदेश:
हर इल्म का न जानना ज़रूरी है और न ही फ़ायदेमंद, इसलिये ऐसा इल्म हासिल करना चाहिये जिससे फ़ायदा हो। (لاَ تَسْأَلُواْ)
ऐसी ख़ुफ़िया बातों के चक्कर में नही रहना चाहिये जो ग़ुस्सा, बुराई, मुश्किल और समाज में गड़बड़ी फैलने का कारण हो।
ऐसी बातों के कुछ नमूने:
· उत्तरदायी लोगों को कुछ ऐसी बातें मालूम होतीं हैं जिन्हे उन्हे लोगों को नही बताना चाहिये।
· ख़बरें और ख़ुफ़िया बातों को एक साथ और सिलसिलावार होना चाहिये।
· कुछ ऐसी बातें होतीं हैं जिन्हे अख़बारों और मैगज़िनों में नही छपना चाहिये। क्योकि उससे लोगों को नुक़सान पहुच सकता है। (ऐसी बातों की समझदारी से कटिंग कर देना चाहिये। إِن تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ)
· तक़य्या (किसी वजह से मजबूरी में सच्चाई छिपाने को कहते है) की तरह कुछ मौक़े पर चेहरों, राज़ों और अपने अक़ीदे को छिपाने की ज़रूरत है और ऐसे सवालों का जवाब नही देना चाहिये। (إِن تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ)
· सच्चाई अच्छी चीज़ है मगर हर जगह सच बोलना सही नही है।
· अध्यापकों और भाषँण देने वालों को सुनने वालों के हिसाब से बात करनी चाहिये।
· इ· ंसान को हक़ नही है कि लोगों या समाज के ऐसे राज़ों को जिसके दुश्मन के हाथ लगने से नुक़सान पहुच सकता है, फ़ाश करे। जैसे, फ़ौज की संख्या या फ़ौज़ी कामों की रिपोट, ऐसे काम जिनका प्लान बन रहा हो, दस्ती (हाथ की लिखी) किताबें, खनिक पदार्थ व ...।
· डाक्टरों को भी मरीज़ को उसकी ख़तरनाक बीमारी की ख़बर नही देना चाहिये।

مَا جَعَلَ اللّهُ مِن بَحِيرَةٍ وَلاَ سَآئِبَةٍ وَلاَ وَصِيلَةٍ وَلاَ حَامٍ وَلَـكِنَّ الَّذِينَ كَفَرُواْ يَفْتَرُونَ عَلَى اللّهِ الْكَذِبَ وَأَكْثَرُهُمْ لاَ يَعْقِلُونَ
तर्जुमे से पहले
यह बात बता देना ज़रूरी है कि अरबों की यह आदत थी कि ऐसे जानवरों को जो कई बार बच्चे जन चुके हों या जुड़वाँ बच्चे जन चुके हों या दसियों बार किसी जानवर को बियाहने के लिये प्रयोग किया जा चुका हो या बीमार के सही होने के लिये उस जानवर की नज़्र की गयी हो या इसी तरह सफ़र से मुसाफिर के सही सालिम लौट आने के लिये उसकी नज़्र की गयी हो तो उस जानवर को ग़ुलाम की तरह आज़ाद कर दिया जाता था। और निशानी के तौर पर उसके कान में सूराख़ कर दिया जाता था। ताकि लोग समझ जायें कि यह आज़ाद किया हुआ है और तब उस समय न उससे सामान ठोने का काम लिया जा सकता था न ही उसका गोश्त खाया जा सकता था। यह आयत बयान करती है कि यह बकवास काम है और जानवर के काम करने, बच्चे पैदा करने, बियाहने के लिये प्रयोग होने से या हर ऐसा काम जो उससे फ़ायदे के लिये लिया जाता है उसके हराम (नाजाएज़) होने का कारण नही बन सकता। इन बातों के बाद अब अनुवाद: शुरू करते हैं और शब्दों का अर्थ राग़िब की डिक्शनरी से बयान करते हैं।


अनुवाद:
अल्लाह ने कभी भी किसीبَحِيرَةٍ (कानकटा जानवर) या سَآئِبَةٍ (ऐसा जानवर जिसे ज़्यादा सफ़र और बच्चे जनने की वजह से आज़ाद कर दिया गया हो) या وَصِيلَةٍ (ऐसा जानवर जिसने ज़ुड़वाँ बच्चा जना हो) या حَامٍ (ऐसा जानवर जिसे दसियों बार बियाहने के लिये प्रयोग किया जा चुका हो), के गोश्त के खाने या उसे प्रयोग करने के लिये मना नही किया है। (और इन लोगों का मना करना जाहिलीयत के ज़माने की बकवास में से एक है।) लेकिन काफ़िर अल्लाह पर झूट बाँधते हैं क्योकि उनमें से अकसर बेअक़्ल हैं।

आयत के संदेश और नुक्ते
धर्म को बकवास और बिदअतों (ऐसी चीज़े जो धर्म में दाख़िल कर दी गयी हैं) से पाक करना चाहिये....। (مَا جَعَلَ)
जब तक अल्लाह की तरफ़ से किसी जानवर के हराम (नाजाएज़) होने के बारे में आदेश न आ जाये। अस्ल यह है कि सब हलाल (जाएज़) हैं। (مَا جَعَلَ)
माल को बर्बाद करना और जानवर को ऐसे ही छोड़ देना हराम है।
(जानवरों को ऐसे ही छोड़ देना जाएज़ नही है तो फ़िर इंसान को ऐसे ही छोड़ देना कैसे जाएज़ हो सकता है।)
धर्म में बिदअत (अपनी तरफ़ से कोई चीज़ बढ़ा देना) क़ुफ़्र (अल्लाह का इंकार कर देना) है। (وَلَـكِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا)
अल्लाह के आदेशों में ही भलाई और सलाह है। और ख़ुराफ़ात जिहालत और बेअक़्ली की वजह से है। (لاَ يَعْقِلُونَ)
अल्लाह से नज़दीक होने के लिये सही और अक़्ली रास्ता चुनना चाहिये। हर नज़्र और हर रास्ता से अल्लाह से नज़दीक नही हुआ जा सकता।
(जाहिलीयत के ज़माने में लोग यह समझते थे कि इस तरह जानवरों को आज़ाद छोड़ देने से अल्लाह या मूर्तियों के नज़दीक हो जायेगें। जानवरों का इस तरह का आदर ख़ास कर गाय के बारे में आज भी हिन्दुस्तान जैसे देशों में देखा जा सकता है।)

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْاْ إِلَى مَا أَنزَلَ اللّهُ وَإِلَى الرَّسُولِ قَالُواْ حَسْبُنَا مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ آبَاءنَا أَوَلَوْ كَانَ آبَاؤُهُمْ لاَ يَعْلَمُونَ شَيْئًا وَلاَ يَهْتَدُونَ
अनुवाद:
जब भी उनसे कहा जाता है: जो कुछ अल्लाह की तरफ़ से नाज़िल हुआ है और पैग़म्बर (दूत) ने पहुचाया है उसकी तरफ़ आओ तो वह कहते हैं कि हमने जैसा अपने बाप दादा को करते पाया वही हमारे लिये सही है। हालाँकि उनके बाप दादा कुछ नही जानते थे(और धर्म भ्रष्ट थे) (वह उनके रास्ते पर चलते हैं?)
आयत के संदेश:
अस्ल इस्लामी सभ्यता है न कि बाप दादा की सभ्यताएँ। (مَا أَنزَلَ اللّه)
ख़ुराफ़ात मानने वाले दलीलो को सुनने पर भी तैयार नही होते। (قَالُواْ حَسْبُنَا)
न पिछली बातों को बुनियाद बनाया जा सकता है न नई बातों को बल्कि इल्म और मार्गदर्शन पर अमल करना अस्ल बुनियाद है। (لاَ يَعْلَمُونَ وَلاَ يَهْتَدُونَ)
पिछले लोगों का मान सम्मान ठीक है मगर उनकी जाहिलीयत वाली बातों को मानना सही नही है।
आँख बंद करके किसी के रास्ते पर चलना बेअक़्ली की निशानी है। (इससे पहले आयत में لاَ يَعْقِلُون َ आया है और यहाँ पर उनके बाप दादा जो करते थे वही करना)
आँख बंद करके जाहिल के रास्ते पर चलने से मना किया गया है। (لاَ يَعْلَمُونَ)
हक़ को स्वीकार करने वाले जाहिल से कोई ख़तरा नही है। ख़तरा उस वक़्त है जब जाहिल मार्गदर्शन को स्वीकार न करें। (لاَ يَعْلَمُونَ وَلاَ يَهْتَدُونَ)
आँख बंद करके किसी की बात मानना सबके ऊपर आने वाली बला है। (इससे पहली आयत में وَأَكْثَرُهُمْ और इस आयत में قَالُواْ आया है)
अपने मन् (ज़मीर) से फ़ैसला कराओ। (أَوَلَوْ كَانَ آبَاؤُهُمْ)
सिर्फ़ क़ुरआन काफ़ी नही है। पैग़म्बर (स) की सुन्नत (काम), सीरत (जीवन) और हुकूमत भी अमल का मेयार है। (تَعَالَوْاْ إِلَى مَا أَنزَلَ اللّهُ وَإِلَى الرَّسُولِ)