अमर शौर्यगाथा
 

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कर्बला की घटना श्रद्धा और बलिदान की प्रदर्शनी है। बलिदान की चरम सीमा है। कर्बला का मरुस्थल बहत्तर जागरुक व दूरदर्शी हस्तियों के साथ महाशौर्यगाथा की रचना के लिए तैयार है।



वे ऐसे वीर हैं जिनकी ईश्वर पर अटूट आस्था और न्यायप्रेम की हर ओर चर्चा है।



यह लोग दृढ़ता व ईश्वर पर आस्था की अमर शौर्यगाथा की रचना कर रहे हैं।



उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद का कमांडर उमर इब्ने साद, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ख़ैमे की ओर पहला तीर फेंकता है और अपने सिपाहियों से कहता है कि वे कूफ़े के



शासक उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद के सामने इस बात की गवाही दें कि उसी ने युद्ध आरंभ किया था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कम संख्या में साथी जो हर चिंता से स्वतंत्र थे,



एक के बाद एक रणक्षेत्र की ओर जाते हैं और वीरता व बलिदान का अद्वितीय नमूना पेश करते हैं। इन्हीं वीरों में आबिस बिन शबीब शाकिरी भी हैं।



वह इमाम हुसनै अलैहिस्सलाम के निकट आते हैं और कहते हैः ईश्वर की सौगंध आज पूरी सृष्टि में मेरे निकट आपसे अधिक कोई प्रिय नहीं है।



हे सदाचारियों के सरदार के पुत्र! गवाह रहिये कि मैंने आप और आपके नाना के धर्म के लिए पूरी निष्ठा के साथ अपनी जान हथेली पर रखी है।



इमाम हुसैन एक दयालु पिता की भांति आबिस बिन शबीब शाकेरी से व्यवहार करते हैं। आबिस रणक्षेत्र में जाते हैं और शत्रु को ललकारते हैं।



उमर इब्ने साद के सिपाहियों में से एक आबिस इबने शबीब शाकेरी को पहचानता था, वह चिल्ला कर कहता है जिसका अपने जीवन से जी भर गया हो वह उनसे लड़ने जाए।



मैंने युद्धों में आबिस की वीरता देखी है। वह वीरों का वीर है। यह सुनकर उमर इबने साद चिंतित हो जाता है और आदेश देता है कि बड़ी संख्या में सिपाही आबिस को घेर कर उन पर पत्थर फेंके।