अमर शौर्यगाथा
 

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हज़रत अली अकबर अत्यधिक प्यास से बेहाल होने के बावजूद पूरी वीरता से लड़ रहे थे।



वे शत्रु के बहुत से सिपाहियों को मौत के घाट उतार रहे थे।



अंततः वह भी एक कायर द्वारा पीछे से घोपे गए ख़जर से भूमि पर गिर पड़ते हैं और शहीद हो जाते हैं।



अभी इमाम हुसैन के हृदय से अली अकबर का दुख कम भी न हुआ था कि वे अपने सामने प्रिय भाई हज़रत अब्बास को पाते हैं।



इमाम हुसैन हज़रत अब्बास को संबोधित करते हुए कहते हैः अब्बास! यदि तुम्हें खो दिया तो मेरी सेना बिखर जाएगी।



हज़रत अब्बास की वीरता और इमाम हुसैन से उनकी श्रद्धा उन्हें हर क्षण ईश्वर के मार्ग में बलिदान के लिए प्रोत्साहित कर रही थी।



वे सोच रहे थे कि इतनी लंबी अवधि तक किस प्रकार धैर्य किए रहे। वे कैसे किसी को अपने भाई व सरदार इमाम हुसैन का अपमान करने देते।



अब्बास एक बुद्धिमान और शूरवीर का नाम है। यह जागरुक व परिज्ञान से समृद्ध पुरुष, इमाम हुसैन की छोटी सी सेना का कमांडर है और अब तक अपनी अद्वितीय वीरता से सत्य के रक्त में डूबे हुए ध्वज को ऊपर उठाए हुए हैं।



जिस समय इमाम हुसैन हज़रत अब्बास को रणक्षेत्र में जाने की अनुमति देते हैं वह इमाम हुसैन के अनुरोध पर उस नहर की ओर बढते हैं



जो शत्रु के नियंत्रण में है ताकि कारवां के प्यासे बच्चे और महिलाओं के लिए पानी ले आयें।