अमर शौर्यगाथा
 

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वह अपनी अदम्य वीरता से शत्रु की घेराबंदी को तोड़ते हुए नहर के किनारे पहुंचते हैं।



उनके होंठ कई दिन की प्यास और प्रचंड गर्मी से सूखे हुए हैं।



चुल्लू में स्वच्छ पानी को उठाकर मुंह के निकट लाते हैं और तुरंत ही उसे फेंक देते हैं। उनका पुरुषार्थ इस बात की अनुमति नहीं देता कि



वह इमाम हुसैन के प्यासे बच्चों से पहले अपनी प्यास बुझा लें। खैमे की ओर बढते हैं किन्तु शत्रु की निर्दयी सेना उनका मार्ग रोक लेती है



और उन्हें जान से मारने की धमकी देती है। हज़रत अब्बास शत्रु के जवाब में कहते हैं कि मैं मौत से भयभीत नहीं हूं मैं अली का पुत्र हूं।



जान लो कि जिसे ईश्वर पर विश्वास होता है वह मौत से नहीं डरता। हज़रत अब्बास और शत्रु के सैनिको के बीच भीषण युद्ध होता है इस दौरान शत्रु अपनी घेराबंदी को और कड़ा कर देता है।



एक शत्रु घात लगाकर हज़रत अब्बास का दाहिना हाथ शरीर से अलग कर देता है।



उस समय हज़रत अब्बास कहते हैं कि यदि तुमने मेरा दाहिना हाथ काट डाला है फिर भी मैं अपने धर्म का पालन नहीं छोड़ूगां। अचानक शत्रु हज़रत अब्बास का बांया हाथ भी काट देता है



उसके बाद फिर हज़रत अब्बास के शरीर पर बड़ी तेज़ी से तलवार के वार होने लगते हैं।



अंततः वीरता और पुरुषार्थ के प्रतीक हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम परलोक सिधार जाते हैं।