अमर शौर्यगाथा
 

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वहब बिन अब्दुल्लाह अपनी माता व पत्नी के साथ कर्बला पहुंचते हैं।



उनकी पत्नी रोते हुए उन्हें रणक्षेत्र में जाने से रोकती हैं किन्तु उनकी मां उन्हें प्रेरित करते हुए कहती हैः मेरे बेटे! किस बात की प्रतीक्षा में हो!



उठो और पैग़म्बरे इस्लाम के परिवार की रक्षा करो! वहब श्रद्धा और भौतिकता के बीच जारी द्वंद्व के बीच घोड़े पर सवार होकर रणक्षेत्र की ओर बढ़ते हैं।



उनकी मां अपने जिगर के टुकड़े के शौर्य को देखती हैं और जब वहब के दोनों हाथ कट जाते हैं तो दौड़ कर आगे बढ़ती हैं और कहती हैः मेने बेटे! उठो!



जब तक हो सके पैग़म्बरे इस्लाम के परिवार की रक्षा करो! इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम निकट होकर कहते हैः हे मा! अपने ख़ैमे की ओर पलट जाइये। ईश्वर आपको पारितोषिक दे।



इस प्रकार उदारता के पवित्र फूलों की सुगंध कर्बला के मरुस्थल में फैल जाती है और इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से अमर शौर्यगाथा लिख जाती है।



कर्बला का मैदान है। जो साथी रणक्षेत्र की ओर बढ़ते और शहीद हो जाते वह इमाम हुसैन के मन पर अपनी जुदाई के गहरे दुख की छाप छोड़ जाते हैं।



अब बनी हाशिम से पहला व्यक्ति रणक्षेत्र में जाने की अनुमति मांगता है। एक सुंदर युवा जिसकी दृष्टि इमाम हुसैन के मन में पैग़म्बरे इस्लाम की याद ताज़ा कर देती थी।



यह युवा अली अकबर हैं जो इमाम हुसैन के पुत्र हैं। इमाम हुसैन उनके सुंदर व खिले चेहरे को देखते हैं और अपना हाथ आकाश की ओर उठाते हुए कहते हैः हे ईश्वर!



मैं तेरे प्रेम में वो सब कुछ न्योछावर करने आया हूं जो मेरे पास है। प्रभुवर! साक्षी रहना मैं उस युवा को उन लोगों की ओर भेज रहा हूं जो तेरे पैग़म्बर से सबसे अधिक मिलता है।



मुझे जब भी पैग़म्बर की याद आती तो उसे देख लेता था।



वह युवा जाने के लिए व्याकुल है किन्तु पिता किस दिल से उसे जाने की अनुमति दे। हज़रत अली अकबर तेज़ी से रणक्षेत्र में जाते हैं और कहते हैः मैं अली, अली के पुत्र हुसैन का बेटा हूं।



ईश्वर की सौगंध यह तुच्छ व्यक्ति यज़ीद हम पर शासन के लिए योग्य नहीं है। किन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कान बहरे हो हैं जो वास्तविकता को नहीं समझ पा रहे हैं।



कोई स्वंय से यह नहीं पूछता कि किससे युद्ध कर रहे हैं? क्या यह युवा, पैग़म्बरे इस्लाम के हृदय की धड़कन नहीं है।