अमर शौर्यगाथा
 

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आबिस की वीरता सबको आश्चर्यचकित कर देती है। कुछ समय पश्चात आबिस भालों और पत्थरों से घायल होकर शहीद हो जाते हैं।



कुछ लोग आबिस के चारों ओर इकट्ठा हो जाते हैं और स्वंय को उनका हत्यारा दर्शाना चाहते हैं। इबने साद कहता हैः आपस में झगड़ो नहीं!



तुममें से कोई भी अकेले आबिस को नहीं मार सकता था। पूरी सेना उन्हें मारने में भागीदार है।



इस बीच एक वीर तेज़ी से इमाम हुसैन के निकट आता है और उन्हें सलाम करते हुए कहता हैः मेरे मां बाप आप पर न्योछावर हो जाएं। मैं हाशिम बिन अतबा हूं।



यदि मेरे चचेरे भाई उमर इबने साद ने आप और आपके नाना के आज्ञापालन का वचन तोड़ा है, किंतु मैं जान हथेली पर रख कर आपकी सहायता को आया हूं।



इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उस पर कृपा दृष्टि डालते हैं। उसकी सराहना करते हुए उसके लिए दुआ करते हैं।



हाशिम रणक्षेत्र में जाते हैं और ललकारते हुए कहते हैं कि मैं अपने चचेरे भाई उमर इब्ने साद के सिवा किसी से नहीं लड़ूंगा।



हे उमर! तुम क्यों धर्म के मार्गदर्शक की हत्या पर उतारू हो। वह मार्गदर्शक जो पैग़म्बर का पुत्र है।



विचित्र बात यह है कि फ़ुरात का पानी पैग़म्बरे इस्लाम के परिवार को छोड़ सबके लिए है।



उमर इबने साद इस बहाने से कि वह अपने चचेरे भाई से नहीं लड़ सकता, रणक्षेत्र में जाने से बचता है और अपनी सेना के शमआन नामक एक बड़े लड़ाकू को भेजता है।



जब हाशिम बिन अतबा उसका अंत कर देते हैं तो एक हज़ार घुड़सवार हाशिम को घेर लेते हैं और उन्हें शहीद कर देते हैं।