अमर शौर्यगाथा
 

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अगला दिन आ गया। इब्ने साद के सैनिकों को जल्दी मची है कि समय के सर्वोत्तम एवं पवित्र क़ुरआन के सबसे बड़े ज्ञानी व्यक्ति को शहीद करके अपने काम का पारितोषिक लें।



शत्रु का एक सैनिक हुर बिन यज़ीद रियाही अविश्वसनीय दृष्टि से इधर- उधर देख रहा है। हुर बहुत व्याकुल व परेशान है उसे एक क्षण के लिए भी चैन नहीं है।



वह गहन सोच में है। उसे आशा थी कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथ मामला बात चीत से सुलझ जायेगा परंतु स्थिति अब युद्ध तक आ पहुंची है।



संदेह समाप्त हो गया है वह ख़तरनाक दो राहे पर खड़ा है।



एक ओर सत्य व न्याय के ध्वजवाहक और पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हैं



जो लोगों को मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए बुला रहे हैं जबकि दूसरी ओर धोखा देने वाला आकर्षक सांसारिक जीवन उसके समक्ष है



जिसे प्राप्त करने के लिए उसे पवित्रतम लोगों के विरुद्ध तलवार चलानी पड़ेगी तथा वास्तविकता की उपेक्षा करनी होगी।



उसका हृदय धड़क रहा है वह चिंतित है वह जल्दी से कूफा के सेनापति उमर बिन साद के पास जाता और कहता है हे उमर क्या तू वास्तव में हुसैन से युद्ध करेगा? उमर बिन साद कहता है



हां ईश्वर की सौगन्ध ऐसा युद्ध करूंगा जिसका कम से कम परिमाण यह होगा कि उसमें हाथ और सिर काटे जायेंगे। यह सुनकर हुर कांप उठा उसके चेहरे का रंग परिवर्तित हो गया।



उसके पास जो व्यक्ति था वह कहता है हे हुर तुम्हें क्या हो रहा है? मैंने अब तक तुमको इतना परेशान नहीं देखा था। मैं तुमको सदैव दूसरों से अधिक बहादुर समझता था।



हुर ने उत्तर दिया स्वर्ग और नरक में से हमें एक को चुनना होगा। यहां पर उसके जीवन की सबसे संवेदनशील घड़ी आ पहुंची थी।



हुर अचानक उठता है और चिल्ला कर बोलता है ईश्वर की सौगन्ध स्वर्ग के अतिरिक्त किसी और चीज़ का चयन नहीं करूंगा। चाहे मुझे टुकड़े-२ कर दें और आग में जला दें।



कुछ क्षणों के बाद कूफे का निडर, साहसी और बहादुर व्यक्ति सिर झुकाये धीरे-धीरे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के तंबू की ओर बढ़ता है



जबकि वह अपनी ढाल को उल्टा किये हुए था और अपने सजल नेत्रों से यह वाक्य कह रहा था" मैं आपकी ओर आ रहा हूं आशा है कि मेरा प्रायश्चित स्वीकार कर लेंगे।



हे ईश्वर मैंने तेरे चाहने वालों और तेरे पैग़म्बर के परिजनों को भयभीत किया , उनका दिल दुखाया है मेरे इस महापाप को क्षमा कर दे" यज़ीद की राक्षसी



सेना से मुंह मोड़ चुका सैनिक सिर झुकाये इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सेवा में पहुंच कर कहता है" हे पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र! मेरा प्राण आप पर न्योछावर हो जाये।



मैं हुर हूं वही जिसने आपका रास्ता रोका। ईश्वर की सौगन्ध मुझे विश्वास नहीं था कि शत्रु आपके साथ इस प्रकार का व्यवहार करेंगे।



अब मैं अपने किये पर पछता रहा हूं शर्मिन्दा हूं मैं आप के मार्ग में अपना प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार हूं क्या ईश्वर मेरा प्रायश्चित स्वीकार करेगा?



इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम प्रेम व कृपा के साथ उत्तर देते हैं हां ईश्वर प्रायश्चित स्वीकार करने वाला है।



ईश्वर अपनी दया-दृष्टि से तुम्हें क्षमा करेगा और वह तुम्हें अपनी दया प्रदान करेगा।



उस समय हुर कहता है" आप मुझे रणक्षेत्र में जाने की अनुमति दें ताकि रणक्षेत्र में जाने वाला मैं पहला व्यक्ति हो जाऊं।



इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उसे स्वतंत्र व्यक्ति कहा और रणक्षेत्र में जाने की अनुमति दे दी।



हुर अवर्णीय साहस व उत्साह के साथ यज़ीद की राक्षसी सेना से युद्ध करता है और अपने जीवन की अंतिम सांस तक इमाम हुसैन तथा उनके साथियों की ओर से लड़ते है।



अंततः हुर शहीद होकर परलोक सिधार जाते हैं।