अमर शौर्यगाथा
 

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रात हो गयी थी। पूरे मरुस्थल में रहस्यमई मौन छाया हुआ था। शत्रु की सेना की कौतूहल भरी आवाज़ आ रही थी।



हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथियों ने अपने तंबुओं को एक दूसरे के तंबुओं से निकट किया और खाई खोदकर शत्रु के रास्ते को बंद कर दिया।



इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम नमाज़ के बाद अपने साथियों के मध्य खड़े हुए। उन सब पर गहरी दृष्टि डाली। उस समय आपकी आवाज़ ने रात में छाये मौन को तोड़ दिया।



हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा मैंने तुमसे बेहतर साथी और अपने परिवार से बेहतर व उत्तम परिवार नहीं देखा।



फिर आपने कहा" तुम लोगों ने मेरी आज्ञापालन का जो वचन दिया है मैं उसकी अनदेखी करता हूं और तुम लोगों की गर्दन से उसकी ज़िम्मेदारी हटा लेता हूं।



अब मैं तुम सबको इस बात की अनुमति देता हूं कि तुम जिस रास्ते से आये हैं उसी रास्ते से वापस चले जाओ। रात के अंधेरे से, जो हर जगह फैला हुआ है,



लाभ उठाओ और यहां से दूर चले जाओ। जो सैनिक एकत्रित हुए हैं वे केवल मेरे ख़ून के प्यासे हैं।



वे बहादुर, जिनकी संख्या कम और महत्व एवं मूल्य बहुत अधिक था, पहाड़ की भांति डट गये।



हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भाई हज़रत अब्बास सबसे पहले उठे और बोले ईश्वर ऐसा दिन न लाये कि हम आपको अकेले छोड़ दें और अपने नगर लौट जायें।



उनके बाद मुस्लिम बिन औसजा खड़े हुए और बोले हे पैग़म्बरे इस्लाम के नाती हम आपको छोड़ दें जबकि शत्रु चारों ओर से आपको घेरे हुए हैं ऐसी स्थिति में हम ईश्वर को क्या उत्तर देंगे?



हम तब तक आपकी रक्षा करेंगे और शत्रुओं से लड़ेंगे जब तक आपके साथ शहीद न हो जायें" मुस्लिम बिन औसजा के बाद साद बिन अब्दुल्लाह हनफी खड़े हुए और बोले हे



पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हम आपको अकेले नहीं छोड़ेंगे ताकि ईश्वर यह जान ले कि उसके पैग़म्बर के बाद हमने आपकी सहायता करके उनके धर्म की सहायता की है"



इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के एक अन्य साथी ज़ुहैर बिन क़ैन ने कहा " ईश्वर की सौगन्ध हम चाहते हैं कि हमारी हत्या कर दी जाये उसके पश्चात हमें पुनः



जीवित किया जाये फिर हमारी हत्या कर दी जाये यहां तक कि हज़ार बार हमारी हत्या की जाये ताकि हम आप को शहीद होने से बचा सकें।



इन युवाओं और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से विपत्ति दूर रहे।



हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के तेरह वर्ष के बेटे हज़रत क़ासिम इमाम हुसैन के पास खड़े होकर बोले हे चाचा क्या मैं भी इस मार्ग में शहीद हूंगा?



हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सिर झुका कर बोले" हे बेटे मैं जानना चाहता हूं कि मृत्यु तुम्हारे निकट कैसी है?



हज़रत क़ासिम ने उत्तर दिया हे चाचा अत्याचार को मिटाने और ईश्वर की धर्म की रक्षा के मार्ग में आने वाली मृत्यु मेरे निकट मधु से भी अधिक मीठी है।



उस समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ठंडी सांस ली और कहा हां बेटे तुम भी शहीद होगे।



हज़रत क़ासिम उठे और प्रसन्न व दृढ़ संकल्पित चेहरे के साथ हथियार तैयार करने में जुट गये और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने रात के उस अंधेरे में अपने वफादार साथियों के लिए दुआ की।



उस समय आपने शत्रु के तंबुओं की ओर देखकर पवित्र क़ुरआन की यह आयत पढ़ी "काफिर व नास्तिक यह न समझें कि यदि उन्हें अवसर दिया गया है तो



यह उनके हित में है हम उन्हें ढील व अवसर देते हैं ताकि वे अपने पापों को अधिक कर लें और उनके लिए अपमानजनक दंड है।



ऐसा नहीं था कि जिस तरह तुम लोग थे ईश्वर ने उसी तरह मोमिनों को उनके हाल पर छोड़ दिया है बल्कि ऐसा इसलिए था कि ईश्वर पवित्र को अपवित्र से अलग करे।