अमर शौर्यगाथा
 

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रेगिस्तान में सरपट दौड़ रहे थे और उनकी टापों से उठने वाली धूल से आकाश पर बादल से बन गये थे।



करबला की धरती ने इससे पहले इतने लोगों को एकत्रित होते हुए नहीं देखा था। दिन के हर कुछ घंटों बाद ताज़ा दम सेना इस धरती पर भेजी जा रही थी।



उमर इब्ने साद अबी वक़्क़ास चार हज़ार सैनिकों के साथ करबला में प्रविष्ट होता है और इमाम हुसैन से कहता है कि वे यज़ीद के आज्ञा पालन को स्वीकार करें।



कुछ ही घंटों बाद शिम्र ज़िल जौशन मुरादी के नेतृत्व में भारी संख्या में ताज़ा दम सैनिक करबला में प्रवेश करते हैं। शिम्र सिर से पैर तक लोहे और फ़ैलाद में डूबा हुआ घोड़े से नीचे उतरता है।



निर्दयता और हृदय की कठोरता उसकी आंखों में साफ़ तौर पर दिखाई दे रही थी। वह बड़े ही घमंड से कूफ़े के राज्यपाल ओबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद का पत्र उमरे साद के हवाले करता है।



पत्र में लिखा था कि हे साद के पुत्र मैंने तुम्हें इस लिए नहीं भेजा था कि हुसैन के साथ नर्म व्यवहार करो,



यदि हुसैन नहीं मानते हैं तो उन पर और उनके साथियों पर आक्रमण कर दो और उनको मार डालो तथा उनके शवों को घोड़ों की टापों से कुचल दो।



तुम यह काम कर दोगे तो मैं तुम्हें बेहतरीन पारितोषिक दूंगा किन्तु यदि तुम यह कार्य नहीं कर सकते तो सेना का नेतृत्व शिम्र के हवाले कर दो।



उमरे साद ने शिम्र की ओर मुंह करके कहा कि धिक्कार हो तुझ पर लानत करे तूने अपनी चाल चल ही दी।



शिम्र ने ऊंची आवाज़ में चिल्लाकर कहा कि जब तक यज़ीद का आदेश पूरा न कर लूंगा चैन से नहीं बैठूंगा।



अंततः मोहर्रम की छठी तारीख़ तक 20 हज़ार से अधिक सशस्त्र सैनिक पैग़म्बरे इस्लाम के जिगर के टुकड़े और स्वर्ग के युवाओं के सरदार हज़रत हमाम हुसैन से युद्ध करने करबला आ गये।