अमर शौर्यगाथा
 

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यज़ीद बहुत जल्दी स्थिति को भांप लेता है। वह उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद को जो बड़ा निर्दयी व क्रूर और मक्कार व्यक्ति था, कूफ़े का शासन संभालने के लिए भेजता है।



उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद की क्रूरता कारण बनती है कि कूफ़े पर भय का वातावरण छा जाए। नगर की स्थिति बिल्कुल बदल गई और लोग अपना वचन तोड़ने के बारे में सोचने लगे।



लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के वफ़ादार और साहसी प्रतिनिधि मुस्लिम इब्ने अक़ील का साथ छोड़ दिया और वो अकेले रह गए यहां तक कि उन्हें शहीद कर दिया गया।



भोर का समय एक अन्य सूर्योदय की प्रतीक्षा में था। संसार पर सन्नाटा छाया हुआ था, मानो किसी आने वाले तूफ़ान से पहले का मौन छाया हुआ हो।



हुसैन अलैहिस्सलाम एक अनोखी शौर्यगाथा रचने के विचार में डूबे हुए थे।



वो हज को उमरे से बदलकर मक्का से रवाना होने वाले थे क्योंकि उन्होंने ईश्वरीय आदेश को व्यवहारिक बनाने के लिए मुसलमानों को एक अत्याचारी और



अयोग्य शासक से मुक्ति दिलाने का संकल्प किया था। कूफ़े के मार्ग में वो लोगों से कहते थेः हे लोगो! पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि जो कोई



अत्याचारी शासक के बारे में यह जान ले कि वो ईश्वर द्वारा वर्जित किए गए कार्यों को वैध समझता है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की परम्परा के



विरुद्ध व्यवहार करता है तथा लोगों में पाप और अत्याचार का प्रचलन करता है और इसके बाद भी वह व्यक्ति शब्दों और अपने



व्यवहार से उस अत्याचारी शासक से संघर्ष न करे तो उसे याद रखना चाहिए कि ईश्वर उसे उस स्थान पर पहुंच देगा जिसके वो योग्य है।



अर्थात दुर्भाग्यपूर्ण अंजाम उसकी प्रतीक्षा में है।



ज़ुहैर इब्ने क़ैन जो रास्ते में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कारवां में शामिल हुए थे, अपने स्थान से उठे और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को विश्वास दिलाया कि उनके



श्रद्धालु सांसारिक जीवन पर अपने इमाम की सहायता को प्राथमिकता देते हैं।