अमर शौर्यगाथा
 

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इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सपरिवार मक्का पहुंचने का समाचार बड़ी तेज़ी से नगर में फैल गया। मक्का वासी बड़े-बड़े गुट बनाकर इमाम हुसैन से मिलने के लिए जाने लगे।



वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चेहरे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के दर्शन कर लेते थे और उनकी बातों में



पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की वाणी की मिठास का आभास करते थे।



लोग यह सुनकर कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद की बैअत करने से इंकार कर दिया है, उनकी ओर और अधिक आकर्षित होते थे।



क्योंकि लोग जानते थे कि यज़ीद एक भ्रष्ट शासक है और ईश्वरीय धर्म और शिक्षाओं से उसका कोई नाता नहीं है।



उधर कूफ़े से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास निरंतर पत्र चले आ रहे थे। कूफ़े के लोग सुलैमान बिन सुरद के घर में एकत्रित हुए।



सुलैमान ने सबसे वचन लिया कि वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सहायता पर दृढ़ संकल्पित रहेंगे।



वहां एकत्रित लोगों ने वचन दिया कि हम हुसैन बिन अली की, जो इमाम हैं और इमाम के पुत्र हैं, हर प्रकार से सहायता करेंगे।



इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम आरंभ में पत्रों का उत्तर नहीं दिया किंतु पत्रों की संख्या हज़ारों तक पहुंच गई।



इन पत्रों में लोग यज़ीद के अत्याचारों और भ्रष्टाचार की शिकायत करते और उनसे कुछ करने का अनुरोध करते थे।



इस स्थिति को देखकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस बात का आभास करते हैं कि लोगों की सहायता करना अनिवार्य है।



सबसे पहले उन्होंने अपने चचेरे भाई मुस्लिम बिन अक़ील को अपना प्रतिनिधि बनाकर कूफ़ा भेजा ताकि स्थिति का ठीक प्रकार से मूल्यांकन किया जा सके।



कूफ़े में अट्ठारह हज़ार लोग मुस्लिम बिन अक़ील के हाथ पर बैअत करते हैं।