अली अलैहिस्सलाम से मुतअल्लिक़ मक़ालात
 
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(1) हज़रत अली अलैहिस्सलाम का जीवन परिचय


बिस्मिल्ला हिर्रहमा निर्रहीम
हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम का जीवन परिचय व चारित्रिक विशेषताऐं
नाम व अलक़ाब (उपाधियाँ)
आपका नाम अली व आपके अलक़ाब अमीरुल मोमेनीन, हैदर, कर्रार, कुल्ले ईमान, सिद्दीक़,फ़ारूक़, अत्यादि हैं।

माता पिता
आपके पिता हज़रतअबुतालिब पुत्र हज़रत अब्दुल मुत्तलिब व आपकी माता आदरनीय फ़तिमा पुत्री हज़रतअसद थीं।

जन्म तिथि व जन्म स्थान
आप का जन्म रजब मास की 13वी तारीख को हिजरत से 23वर्ष पूर्व मक्का शहर के विश्व विख्यात व अतिपवित्र स्थान काबे मे हुआ था। आप अपने माता पिता के चौथे पुत्र थे।

पालन पोषण

आप (6) वर्ष की आयु तक अपने माता पिता के साथ रहे। बाद मे आदरनीय पैगम्बर हज़रतअली को अपने घर ले गये।इस प्रकार सात वर्षों तक हज़रतअली पैगम्बर की देखरेख मे प्रशिक्षित हुए। हज़रतअली ने अपने एक प्रवचन मे कहा कि मैं पैगम्बर के पीछे पीछे इस तरह चलता था जैसे ऊँटनी का बच्चा अपनी माँ के पीछे चलता है। पैगम्बर प्रत्येक दिन मुझे एक सद्व्यवहार सिखाते व उसका अनुसरन करने को कहते थे।
हज़र तअली सर्वप्रथम मुसलमान के रूप मे

जब आदरनीय मुहम्मद (स0)ने अपने पैगमबर होने की घोषणा की तो हज़रतअली वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने आपके पैगम्बर होने को स्वीकार किया तथा आप पर ईमान लाए।

महान् सहाबी इब्ने अब्बास ने कहा कि अली वह प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने पैगम्बर के साथ नमाज़ पढ़ी। वह कहते हैं कि सोमवार को आदरनीय मुहम्मद ने अपने पैगम्बर होने की घोषणा की तथा मंगलवार से हज़रतअली ने उन पीछे नमाज़ पढ़ना आरम्भ कर दिया था।

हज़रत अली पैगम्बर के उत्तराधिकारी के रूप मे

हज़रत पैगम्बर ने अपने स्वर्गवास से तीन मास पूर्व हज से लौटते समय ग़दीरे ख़ुम नामक स्थान पर अल्लाह के आदेश से सन् 10 हिजरी मे ज़िलहिज्जा मास की 18वी तिथि को हज़रतअली को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। परन्तु आदरनीय पैगम्बर के स्वर्ग वास के बाद कुछ लोगों ने षड़यन्त्र रचकर इस पदको स्वंय ग्रहण कर लिया। प्रथम,द्वितीय व तृतीय खलीफ़ाओं के देहान्त के बाद जनता जागरूक हुई। तथा उन्होने 25 वर्ष के अन्तराल के बाद पैगम्बर के वास्तविक उत्तराधिकारी के हाथों पर बैअत की। इस प्रकार हज़रतअली ने ख़िलाफ़त पद को सुशोभित किया।
हज़रत अली द्वारा किये गये सुधार

अपने पाँच वर्षीय शासन काल मे विभिन्न युद्धों, विद्रोहों, षड़यन्त्रों, कठिनाईयों व समाज मे फैली विमुख्ताओं का सामना करते हुए हज़रतअली ने तीन क्षेत्रो मे सुधार किये जो निम्ण लिखित हैं।
अधिकारिक सुधार

उन्होने अधिकारिक क्षेत्र मे सुधार करके जनता को समान अधिकार प्रदान किये। शासन की ओर से दी जाने वाली धनराशी के वितरण मे व्याप्त भेद भाव को समाप्त करके समानता को स्थापित किया। उन्होंने कहा कि निर्बल व्यक्ति मेरे समीप हज़रतहैं मैं उनको उनके अधिकार दिलाऊँगा।व अत्याचारी व्यक्ति मेरे सम्मुख नीच है मैं उनसे दूसरों के अधिकारों को छीनूँगा।
आर्थिक सुधार

हज़रतअली ने आर्थिक क्षेत्र मे यह सुधार किया कि जो सार्वजनिक सम्पत्तियां तीसरे ख़लीफ़ा ने समाज के कुछ विशेष व्यक्तियों को दे दी थीं उनसे उनको वापिस लिया। तथा जनता को अपनी नीतियों से अवगत कराते हुए कहा कि मैं तुम मे से एक हूँ जो वस्तुऐं मेरे पास हैं वह आपके पास भी हैं। जो कर्तव्य आप लोगों के हैं वह मेरे भी हैं। (अर्थात मैं आप लोगों से भिन्न नही हूँ न आपसे कम कार्य करता हूँ न आप से अधिक सम्पत्ति रखता हूँ)
प्रशासनिक सुधार

हज़रतअली (अ0) ने प्रशासनिक क्षेत्र मे सुधार हेतू दो उपाये किये।

(1) तीसरे ख़लीफ़ा द्वारा नियुक्त किये गये गवर्नरो को निलम्बित किया।

(2) भ्रष्ट अधिकारियों को पदमुक्त करके उनके स्थान पर ईमानदार व्यक्तियों को नियुक्त किया।
इमाम अली व राजकोष

इमाम अली राजकोष का विशेष ध्यान रखते थे, वह किसी को भी उसके हक़ से अधिक नही देते थे। वह राजकोष को सार्वजनिक सम्पत्ति मानते थे। तथा राजकोष के धन को अपने नीजी कार्यो मे व्यय करने को जनता के घरों मे चोरी करने के समान मानते थे। एक बार आप रात्री के समय राजकोष के कार्यों मे वयस्त थे। उसी समय आपका एक मित्र भेंट के लिए आया जब वह बैठ गया और बातें करने लगा तो आपने जलते हुए चिराग़ (दिआ) को बुझा दिया। और अंधेरे मे बैठकर बाते करने लगे। आपके मित्र ने चिराग़ बुझाने का कारण पूछा तो आपने उत्तर दिया कि यह चिराग़ राजकोष का है।और आपसे बातचीत मेरा व्यक्तिगत कार्य है अतः इसको मैं अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए प्रयोग नही कर सकता। क्योंकि ऐसा करना समस्त जनता के साथ विश्वासघात है।

हज़रत इमाम अली की शहादत (स्वर्गवास)
हज़रत इमाम अली सन् 40 हिजरी के रमज़ान मास की 19वी तिथि को जब सुबह की नमाज़ पढ़ने के लिए गये तो सजदा करते समय अब्दुर्रहमान पुत्र मुलजिम ने आपके ऊपर तलवार से हमला किया जिससे आप का सर बहुत अधिक घायल हो गया तथा दो दिन पश्चात रमज़ान मास की 21वी रात्री मे नमाज़े सुबह से पूर्व आपने इस संसार को त्याग दिया।

समाधि

आपकी शहादत के समय स्थिति बहुत भयंकर थी। चारो ओर शत्रुता व्याप्त थी तथा यह भय था कि शत्रु कब्र खोदकर लाश को निकाल सकते हैँ। अतः इस लिए आपको बहुत ही गुप्त रूप से दफ़्न कर दिया गया।एक लम्बे समय तक आपके परिवार व घनिष्ठ मित्रों के अतिरिक्त कोई भी आपकी समाधि से परिचित नही था। परन्तु एक लम्बे अन्तराल के बाद अब्बासी ख़लीफ़ा हारून रशीद के समय मे यह भेद खुल गया कि इमाम अली की समाधि नजफ़ नामक स्थान पर है। बाद मे आपके अनुयाईयों ने आपकी समाधि का विशाल व वैभवपूर्ण निर्माण कराया। वर्तमान समय मे प्रति वर्ष लाखों दर्शनार्थी आपकी समाधि पर जाकर सलाम करते हैं।
।।अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिंव वा आलिमुहम्मद।।

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(2)मौलूदे काबा




वसीये रसूल, ज़ोजे बतूल, इमामे अव्वल, पिदरे आइम्मा, मौलूदे काबा हज़रत अली अलैहिस्सलाम की तारीख़े विलादत बा सआदत, तेरह रजब के मौक़े पर हम शियायाने अहलेबैत अलैहिमु अस्सलाम और तमाम मुसलमानों को मुबारकबाद पेश करते हैं। हमें उम्मीद है कि एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब तक़वे व अदालत के मुजस्समे, आज़ादी के अलमबरदार इमाम अली अलैहिस्सलाम की तमन्नाएं, आपके अज़ीम बेटे हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़रिये पूरी होंगी, उस वक़्त इंसान इमाम अली अलैहिस्सलाम के ज़रिये बयान किये गये कमालात के मतलब को अच्छी समझेगा।

चूँकि इस अज़ीम शख़्सियत के किरदार को एक मक़ाले में बयान करना ना मुमकिन है, लिहाज़ा इस पुर मसर्रत मौक़े हम सिर्फ़ ख़ाना -ए- काबा में आपकी विलादत के वाक़िये को मौलूदे काबा के उनवान से इस मक़ाले में आप हज़रात की ख़िदमत में पेश कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि हमारी यह कोशिश रब्बे काबा की बारगाह में क़बूल होगी।

हमारे ज़हन और ज़मीर में बहुत से ऐसे सवाल छुपे हुए है जो किसी मुनासिब वक़्त और मौके पर ही ज़ाहिर होते हैं। उन्हीं सवालों में से एक यह है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम काबे में क्यों पैदा हुए ? जब हज के मौक़े पर मस्जिदुल हराम में दाख़िल होने पर ख़ाना -ए- काबा को देखते है और उसके गिर्द तवाफ़ करते हैं तो दिल व दिमाग में यह सवाल उभरता है कि क्या हज़रत अली अलैहिस्सलाम हक़ीक़तन काबे में पैदा हुए हैं या यह सिर्फ़ ख़तीबों व शाइरों के ज़हन की उपज है ? अगर आपकी विलादत का वाक़िया सच है तो आपकी विलादत काबे में किस तरह हुई ? क्या शियों व सुन्नियों की पुरानी किताबों में इस वाकिये का ज़िक्र मिलता है ? यह मक़ाला इसी सवाल का जवाब है।
शेख सदूक़ का नज़रिया

शेख़ सदूक़ ने अपनी तीन किताबों में मुत्तसिल सनद के साथ सईद बिन जुबैर से नक़्ल किया है कि उन्होने कहा कि मैने यज़ीद बिन क़ानब को यह कहते सुना कि मैं अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब और बनी अब्दुल उज़्ज़ा के कुछ लोगों के साथ ख़ाना-ए- काबा के सामने बैठा हुआ था कि अचानक फ़ातिमा बिन्ते असद (मादरे हज़रत अली अलैहिस्सलाम) ख़ाना-ए-काबा की तरफ़ आईं। वह नौ माह के हमल से थीं और उनके दर्दे ज़ेह हो रहा था। उन्होंने अपने हाथों को दुआ के लिए उठाया और कहा कि ऐ अल्लाह ! मैं तुझ पर, तेरे नबियों पर और तेरी तरफ़ से नाज़िल होने वाली किताबों पर ईमान रखती हूँ। मैं अपने जद इब्राहीम अलैहिस्सलाम की बातों की तसदीक़ करती हूँ और यह भी तसदीक़ करती हूँ कि इस मुक़द्दस घर की बुनियाद उन्होंने रखी है। बस इस घर की बुनियाद रखने वाले के वास्ते से और इस बच्चे के वास्ते से जो मेरे शिकम है, मेरे लिए इस पैदाइश को आसान फ़रमा।

यज़ीद बिन क़ानब कहता है कि हमने देखा कि ख़ाना -ए- काबा में पुश्त की तरफ़ दरार पैदा हुई। फ़ातिमा बिन्ते असद उसमें दाख़िल होकर हमारी नज़रों से छुप गईं और दीवार फिर से आपस में मिल गई। हमने इस वाक़िये की हक़ीक़त जानने के लिए ख़ाना-ए- काबा का ताला खोलना चाहा, मगर वह न खुल सका, तब हमने समझा कि यह अम्रे इलाही है।

चार दिन के बाद फ़ातिमा बिन्ते असद अली को गोद में लिए हुए ख़ाना-ए-काबा से बाहर आईं और कहा कि मुझे पिछली तमाम औरतों पर फ़ज़ीलत दी गई है। क्योंकि आसिया बिन्ते मज़ाहिम (फ़िरऔन की बीवी) ने अल्लाह की इबादत छुप कर वहाँ की जहाँ उसे पसंद नही है (मगर यह कि ऐसी जगह सिर्फ़ मजबूरी की हालत में इबादत की जाये।) मरियम बिन्ते इमरान (मादरे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम) ने ख़जूर के पेड़ को हिलाया ताकि उससे ताज़ी खजूरें खा सकें। लेकिन मैं वोह हूँ जो बैतुल्लाह में दाखिल हुई और जन्नत के फल और खाने खाये। जब मैंने बाहर आना चाहा तो हातिफ़ ने मुझसे कहा कि ऐ फ़ातिमा ! अपने इस बच्चे का नाम अली रखना। क्योंकि वह अली है और ख़ुदा-ए अलीयो आला फ़रमाता है कि मैंने इसका नाम अपने नाम से मुश्तक़ किया है, इसे अपने एहतेराम से एहतेराम दिया है और अपने इल्मे ग़ैब से आगाह किया है। यह बच्चा वह है जो मेरे घर से बुतों को बाहर निकालेगा, मेरे घर की छत से अज़ान कहेगा और मेरी तक़दीस व तमजीद करेगा। ख़ुशनसीब हैं वह लोग जो इससे मुहब्बत करते हुए इसकी इताअत करें और बदबख़्त हैं वह लोग जो इससे दुश्मनी रखे और गुनाह करें।
शेख़ तूसी का नज़रिया

शेख तूसी ने अपनी आमाली में मुत्तसिल सनद के साथ इब्ने शाज़ान से नक़्ल किया है कि उन्होंने कहा कि इब्राहीम बिन अली ने अपनी सनद के साथ इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से और उन्होंने अपने आबा व अजदाद के हवाले से नक़्ल किया है कि अब्बास बिन मुत्तलिब व यज़ीद बिन क़ानब कुछ बनी हाशिम व बनी अब्दुल उज़्ज़ा के के साथ ख़ाना-ए- काबा के पास बैठे हुए थे। अचानक फ़ातिमा बिन्ते असद (मादरे हज़रत अली अलैहिस्सलाम) ख़ाना-ए काबा की तरफ़ आईं। वह नौ महीने की हामेला थीं और उन्हें दर्दे ज़ेह उठ रहा था। वह ख़ाना-ए- काबा के बराबर में खड़ी हुईं और आसमान की तरफ़ रुख़ करके कहा कि ऐ अल्ला! मैं तुझ पर, तेरे नबियों पर और तेरी तरफ़ से नाज़िल होने वाली तमाम किताबों पर ईमान रखती हूँ। मैं अपने जद इब्राहीम अलैहिस्सलाम के कलाम की और इस बात की तसदीक़ करती हूँ कि इस घर की बुनियाद उन्होंने रखी। बस इस घर, इसके मेमार और इस बच्चे के वास्ते से जो मेरे शिकम में है और मुझसे बाते करता है, जो कलाम के ज़रिये मेरा अनीस है और जिसके बारे में मुझे यक़ीन है कि यह तेरी निशानियों में से एक है, इस पैदाइश को मेरे लिए आसान फ़रमा।

अब्बास बिन अबदुल मुत्तलिब और यज़ीद बिन क़ानब कहते हैं कि जब फ़ातिमा बिन्ते असद ने यह दुआ की तो ख़ाना-ए- काबा की पुश्त की दीवार फ़टी और फ़ातिमा बिन्ते असद उसमें दाख़िल हो कर हमारी नज़रों से गायब हो गईं और दीवार फिर से आपस में मिल गई। हमने काबे के दरवाज़े को खोलने की कोशिश की ताकि हमारी कुछ औरतें उनके पास जायें, लेकिन दर न खुल सका, उस वक़्त हमने समझा कि यह अम्रे इलाही है। फ़ातिमा तीन दिन तक ख़ाना-ए-काबा में रहीं। यह बात इतनी मशहूर हुई कि मक्के के तमाम मर्द व औरत गली कूचों में हर जगह इसी के बारे में बात चीत करते नज़र आते थे। तीन दिन बाद दीवार फिर उसी जगह से फ़टी और फ़ातिमा बिन्ते असद अली अलैहिस्सलाम को गोद में लिए हुए बाहर तशरीफ़ लाईं और आपने फ़रमाया कि

ऐ लोगो! अल्लाह ने अपनी मख़लूक़ात में से मुझे चुन लिया है और गुज़िश्ता तमाम औरतों पर मुझे फज़ीलत दी है। पिछले ज़माने में अल्लाह ने आसिया बिन्ते मज़ाहिम को चुना और उन्होंने छुप कर, उसकी उस जगह (फ़िरऔन के घर में) इबादत की जहाँ पर मजबूरी की हालत के अलावा उसे अपनी इबादत पसंद नही है। उसने मरियम बिन्ते इमरान को चुना और उन पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की विलादत को आसान किया। उन्होंने बयाबान में खजूर के सूखे दरख़्त को हिलाया और उससे उनके लिए ताज़ी ख़जूरी टपकीं। उनके बाद अल्लाह ने मुझे चुना और उन दोनों व तमाम ग़ुज़िश्ता औरतों पर मुझे फ़ज़ीलत दी क्योंकि मेनें ख़ाना-ए- ख़ुदा में बच्चे को जन्म दिया, तीन दिन तक वहाँ रही और जन्नत के फल व खाने खाती रही। जब मैंनें बच्चे को लेकर वहाँ से निकलना चाहा तो हातिफ़े ग़ैबी ने आवाज़ दी, ऐ फ़ातिमा ! मैं अलीयो आला हूँ। इस बच्चे का नाम अली रखना। मैंने इसे अपनी क़ुदरत, इज़्ज़त और अदालत के साथ पैदा किया है। मैंने इसका नाम अपने नाम से मुश्तक़ किया है और अपने एहतेराम से इसे एहतेराम दिया है। मैंने इसे इख़्तियार दिये हैं और अपने इल्मे ग़ैब से भी आगाह किया है। मेरे घर में पैदा होने वाला यह बच्चा सबसे पहले मेरे घर की छत से अज़ान कहेगा, बुतों को बाहर निकाल फेंकेगा, मेरी अज़मत, मज्द और तौहीद का क़ायल होगा। यह मेरे पैग़म्बर व हबीब, मुहम्मद के बाद उनका वसी है। ख़ुश नसीब हैं वोह लोग जो इससे मुहब्बत करते हुए इसकी मदद करे और धिक्कार है ऐसे लोगों पर जो इसकी नाफ़रमानी करते हुए इसके हक़ से इंकार कर दे।
नुक्ता

कुछ किताबों में यह सराहत के साथ मिलता है कि हमने देखा कि काबा पुश्त की तरफ़ से ख़िला और फ़ातिमा बिन्ते असद उसमें दाख़िल हो गईं। इससे यह सवाल पैदा होता है कि पुश्ते काबा कहाँ है ?

बहुतसी रिवायतों में वजहे काबा (काबे के फ़्रंट) का ज़िक्र हुआ है और इससे मुराद वह हिस्सा है जिसमें काबे का दरवाज़ा लगा हुआ है और बराबर में मक़ामें इब्राहीम अलैहिस्सलाम है। लिहाज़ा इस बुनियाद पर पुश्ते काबा वह मक़ाम है जो रुक्ने यमानी व रुक्ने ग़रबी के बीच वाक़े है।

जब सैलाब से ख़ाना-ए-काबा की इमारत को नुक़्सान पहुंचा तो क़ुरैश ने उसे गिरा कर नई तामीर की थी। इससे कुछ लोगों के ज़हन में यह बात पैदा हो सकती है कि शायद अली अलैहिस्सलाम की विलादत ख़ाना-ए-काबा में उस वक़्त हुई हो जब उसकी दीवारें मौजूद नही थी, लिहाज़ा यह उनके लिए कोई फ़ज़ीलत की बात नही है। लेकिन यह शुबाह सही नही है।
क्योंकि
इब्ने मग़ाज़ली का नज़रिया

ऊपर हम दो शिया उलमा का नज़रिया बयान कर चुके हैं। अब हम यहाँ पाँचवीं सदी के सुन्नी आलिम इब्ने मग़ाज़ली का नज़रिया बयान कर रहे हैं।

इब्ने मग़ाज़ली मुत्तसिल सनद के साथ मूसा बिन जाफ़र से वह अपने बाबा इमाम सादिक़ से वह अपने बाबा इमाम मुहम्मद बाक़िर से और उन्होंने अपने बाबा इमाम सज्जाद अलैहिमु अस्सलाम से नक़्ल किया है कि आपने फ़रमाया कि मैं और मेरे बाबा इमाम (हुसैन अलैहिस्सलाम) जद्दे बुज़ुर्गवार (पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ) की क़ब्र की ज़ियारत के लिए गये थे। वहाँ पर बहुतसी औरतें जमा थीं, उनमें से एक हमारे पास आई। मैंने उससे पूछा ख़ुदा तुझ पर रहमत करे ! तू कौन है ?

उसने कहा मैं ज़ैदा बिन्ते क़रीबा बिन अजलान क़बीला-ए बनी साएदा से हूँ।

मैंने उससे कहा कि क्या तू कुछ कहना चाहती है?

उसने जवाब दिया हाँ! ख़ुदा की क़सम मेरी माँ उम्मे अमारा बिन्ते इबादा बिन नज़ला बिन मालिक बिन अजलाने साइदी ने मुझसे नक़्ल किया है कि मैं कुछ अरब औरतों के साथ बैठी हुई थी कि अबूतालिब ग़मगीन हालत में हमारे पास आये। मैने उनसे पूछा कि ऐ अबूतालिब! आपके क्या हाल है ? अबूतालिब ने मुझसे कहा कि फ़ातिमा बिन्ते असद दर्दे ज़ेह से तड़प रही हैं। यह कह कर उन्होने अपना हाथ माथे पर रखा ही था कि अचानक मुहम्मद (स.) वहाँ पर तशरीफ़ लाये और पूछा कि चचा आपके क्या हाल हैं ? अबूतालिब ने जवाब दिया कि फ़ातिमा बिन्ते असद दर्दे ज़ेह से परेशान हैं। पैग़म्बर (स.) ने अबूतालिब का हाथ पकड़ा और वह दोनो फ़ातिमा बिन्ते असद के साथ काबे पहुँचे। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने उन्हें काबे के दरवाज़े के पास बैठाया और कहा कि अल्लाह के नाम से बैठ जाओ।

फ़ातिमा बिन्ते असद ने काबे के दरवाज़े पर नाफ़ कटे हुए एक बच्चे को जन्म दिया। उस जैसा ख़ूबसूरत बच्चा मैंने आज तक नही देखा। अबूतालिब ने उस बच्चे का नाम अली रखा और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) उन्हें घर लेकर आये।

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने उम्मे अमारा की इस रिवायत को सुनने के बाद कहा कि मैंने इतनी अच्छी बात कभी नही सुनी।

इब्ने मग़ाज़ली की इस रिवायत में ऊपर बयान की गई दोनों शिया रिवायतों से फ़र्क़ पाया जाता है, लेकिन यह रिवायत हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत पर दलालत करती है।
दूसरे आलिमों का नज़रिया

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के सिलसिले में हम अब तक आपके सामने तीन तफ़सीली रिवायतें बयान कर चुके हैं। इन रिवायतों के अलावा बहुत से शिया व सुन्नी उलमा ने मुख़तसर तौर पर भी इस रिवायत को बयान किया है। यानी काबे में विलादत को तो बयान किया है मगर उसके जुज़ियात को बयान नही किया है।

अल्लामा अमीनी (मरहूम) ने अपनी किताब अल-ग़दीर में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के वाक़िये को अहले सुन्नत की 16 और शियों की 50 अहम किताबों के हवाले से नक़्ल किया है। दूसरी सदी हिजरी से किताब लिखे जाने तक के 41 शाइरों के नाम लिखे हैं जिन्होंने इस वाक़िये को नज़्म किया है और कुछ के शेर भी नक़्ल किये हैं।

अल्लामा मज़लिसी (मरहूम) ने बिहारुल अनवार में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के वाकिये को 18 शिया किताबों से नक़्ल किया है।

आयतुल्लाहिल उज़मा मरअशी नजफ़ी (मरहूम) ने एहक़ाक़ुल हक़ की शरह की सातवीं जिल्द में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की काबे में विलादत के वाक़िये को अहले सुन्नत की 12 किताबों के हवालों से नक़्ल किया है।

और सतरहवीं जिल्द में इस वाक़िये को अहले सुन्नत की 21 किताबों से नक़्ल किया है। इसके बाद अल्लामा आक़ा महदी साहिब क़िबला की किताब अली वल काबा के हवाले से अहले सुन्नत के उन 83 उलमा के नाम लिखे है, जिन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विलादत को काबे में तस्लीम किया है।

नोटः शिया व सुन्नी किताबों की तादाद में इख़्तेलाफ़ का सबब यह है कि कुछ उलमा का बहुत ज़्यादा तहक़ीक़ का इरादा नही था। बस उनके पास जितनी किताबें थीं या उन्होंने जितनी किताबों में पढ़ा था उन्ही के नाम लिखे हैं। या इमकानात कमी की वजह से वह तमाम किताबों को नही देख सके। कुछ उलमा का पूरी तहक़ीक़ का इरादा था और उनके पास इमकानात भी मौजूद थे, लिहाज़ा उन्होने ज़्यादा किताबों के हवालों से लिखा। चूँकि आज वसाइल और किताबें मौजूद है लिहाज़ा अगर अब कोई इस बारे में तहक़ीक़ करना चाहे तो उसे ऐसी बहुतसी किताबें और उलमा मिल जायेंगे जिन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विलादत को काबे में तस्लीम किया है।