मजमूअऐ मक़ालाते इमामे महदी(अ)(2)
 

(1)हुकूमत के नतीजे


आप ने देखा होगा कि जो लोग अपनी हुकूमत बनाकर ताक़त को अपने हाथ में लेना चाहते हैं, वह पहले अपनी हुकूमत के उद्देश्यों का वर्णन नकरते हैं। कभी कभी तो ऐसा होता है कि वह उन उद्देश्यों तक पहुँचने के लिए अपनी योजनाओं को भी लोगों के सामने पेश कर देते हैं। लेकिन वह हुकूमत व ताक़त प्राप्त करने के बाद कुछ समय बीतने पर अपने उन उद्देश्यों में नाकाम रह जाते हैं या कभी अपने किये हुए वादों से मुकर जाते हैं, या अपने उद्देश्यों को बिल्कुल ही भूल जाते हैं।

लेकिन पहले से निश्चित उन उद्देश्यों को प्राप्त न करने की वजह यह होती है कि वह उद्देश्य असली नहीं होते, या इसकी दूसरी वजह यह हो सकती है कि उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हुकूमत के पास कोई सही व संपूर्ण योजना नहीं होती और बहुत से स्थानों पर इस नाकामी की वजह क़ानून बनाने वालों की अयोग्यता होती है।

हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के उद्देश्य ऐसे वास्तविक व आधारभूत हैं कि उनकी जड़ें इंसानों के दिल व दिमाग की गहराईयों में मौजूद हैं और उन तक पहुँचने की सभी तमन्ना रखते हैं। उन उद्देश्यों की प्राप्ती के लिए जो योजनाएं हैं वह कुरआने क़रीम और अहलेबैत (अ. स.) की सुन्नत व शिक्षाओं पर आधारित है, अतः हर डिपारटमेन्ट में उसके लागू होने की ज़मानत मौजूद होगी, इस लिए इस महान इन्क़ेलाब के नतीजे बहुत ज़्यादा अच्छे होंगे। इस पूरे विवरण का एक वाक्य में इस तरह खुलासा किया जा सकता है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत का नतीजा यह होगा कि इंसान की वह तमाम भौतिक व आध्यात्मिक ज़रुरतें पूरी हो जायेंगी, जिन को ख़ुदा वन्दे आलम ने इंसान के वजूद में अमानत रखा है।

हम यहाँ पर रिवायतों के आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के कुछ नतीजों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं।
न्याय का विस्तार

अनेकों रिवायतों में मिलता है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के इन्क़ेलाब व हुकूमत के नतीजों में सब से महत्वपूर्ण चीज़ दुनिया में अदल व इन्साफ़ का आम होना है। इसके बारे में उनकी हुकूमत के उद्देश्यों के अन्तर्गत उल्लेक हो चुका है। हम यहाँ पर उस हिस्से में वर्णित चीज़ों के अलावा इस चीज़ को बढ़ाते हैं कि क़ाइमे आले मुहम्मद (स.) की हुकूमत में समाज की हर सतह पर न्याय आम हो जायेगा और अदालत समाज की रगों में रच बस जायेगी। कोई भी ऐसा छोटा या बड़ा गिरोह नहीं होगा जिसमें न्याय स्थापित न हो, आपस में समस्त इंसानों का राब्ता उसी न्याय के आधार पर होगा।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) ने इस बारे में फरमाया :

अल्लाह की क़सम लोगों के घरों में न्याय को इस तरह पहुँचा दिया जायेगा जिस तरह उन घरों में सर्दी और गर्मी पहुँचती है।[1]

समाज का सबसे छोटा विभाग यानी इंसान का घर न्याय का केन्द्र बन जायेगा और घर के सब सदस्य एक दूसरे से न्यायपूर्वक व्यवहार करेंगे। इससे इस बात की पुष्टी होती है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की न्याय व समानता पर आधारित विश्वव्यापी हुकूमत ताक़त और क़ानून के बल बूते पर नही, बल्कि कुरआन की उस तरबियत पर आधारित होगी जो न्याय व भलाी का हुक्म देती है। [2] उसी से लोगों की तरबियत की जायेगी और ऐसे बेहतरीन माहौल में सभी लोग अपने इंसानी और इलाही कर्तव्यों को पूरा करते हुए दूसरों के अधिकारों का एहतेराम करेंगे,चाहे सामने वाला किसी ओहदे पर भी न हो।

महदवी समाज में न्याय, कुरआन और हुकूमत के आधार पर एक असली सामाजिक स्तंभ के रूप में लागू होगा और कुछ गिने चुने स्वार्थी और कुरआने करीम व अहले बैत (अ. स.) की शिक्षाओं से दूर लोगों के अलावा कोई भी उसका उलंघन नही करेगा। न्याय व समानता पर आधारित हुकूमत ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई करेगी और उनको फलने फूलने का मौक़ा नहीं दिया जायेगा। ऐसे लोगों पर विशेष रूप से हुकूमत के विभागों में शामिल होने पर रोक लगा दी जायेगी।

जी हाँ ! ऐसा विस्तृत और आम न्याय हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत का नतीजा होगा। उसके लागू होने से हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के इन्केलाब का सबसे बड़ा मक़सद पूरा हो जायेगा और दुनिया न्याय व समानता से भर जायेगी और ज़ुल्म व सितम समाज के हर हिस्से से मिट जायेंगे, यहाँ तक कि घरेलू ज़िन्दगी में भी एक दूसरे के संबंधों में इसका नाम व निशान बाक़ी नहीं रहेगा।
ईमान, अख़लाक़ और फिक्र का विकास

प्रियः पाठकों ! हम ने उपरोक्त यह उल्लेख किया है कि समाज में न्याय के आम हो जाने से समाज में रहने वालों की सही तरबियत होगी और समाज में कुरआन व अहलेबैत (अ.स.) की तहज़ीब व सभ्यता फैल जायेगी। अइम्मा ए मासूमीन (अ. स.) की रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के ज़माने में ईमान, अख़लाक़ और फिक्र के विकसित होने व उनके फलने फूलने का सविस्तार वर्णन किया गया है।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ. स.) ने फरमाया :

जब हमारे क़ाइम आले मुहम्मद ज़हूर करेंगे तो वह अपना दस्ते करम ख़ुदा के बन्दों के सरों पर रखेंगे उसकी बर्क़त से उनकी अक़्ल अपने क़माल पर पहुँच जायेगी। [3].

और जब इंसान की अक़्ल कमाल पर पहुँच जाती है तो तमाम खूबिया और नेकियां ख़ुद बखुद उसमें पैदा होने लगती हैं, क्योंकि अक़्ल इंसान के लिए आन्तरिक पैग़म्बर है और अगर जिस्म व रूह के मुल्क पर इसकी हुकूमत हो जाये तो फिर इंसान को फिक्र, नेकी, सुधार और ख़ुदा की बन्दगी का अच्छा व कल्याणकारी रास्ता मिल जायेगा।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) से सवाल हुआ कि अक़्ल क्या है ?

उन्होंने फरमाया :

अक़्ल एक ऐसी हक़ीक़त है जिसके ज़रिये ख़ुदा की इबादत की जाती है और उसी की रहनुमाई से जन्नत मिलती है। [4]

जी हाँ ! वर्तमान समाज में हम देखते हैं कि इमाम और उनकी हुकूमत के बग़ैर अक़्ल पर इच्छाओं का अधिपत्य व ग़लबा है। विभिन्न गिरोहों और पार्टियों पर उनकी इच्छाएं हुकूमत कर रही है जिसके नतीजे में दूसरों के हक़ूक पामाल हो रहें है और इलाही इक्दार को भुलाया जा रहा है। लेकिन ज़हूर के ज़माने में, अल्लाह की हुज्जत, की हुकूमत की छत्र छाया में अक़्ल हुक्म करने वाली होगी और जब इंसान की अक़्ल कमाल की मंज़िल पर पहुँच जायेगी तो फिर नेकियों और अच्छाइयों के अलावा कोई हुक्म नहीं करेगी।
एकता और मुहब्बत

अनेकों रिवायतों में मिलता है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की विश्वव्यापी हुकूमत में ज़िन्दगी बसर करने वाले लोग एकता व मुहब्बत के बंधन में बँधे होंगे और उनकी हुकूमत में मोमिनों के दिलों में ईर्श्या व दुशमनी के लिए कोई जगह न होगी।

हज़रत अली (अ. स.) ने फरमाया :

وَ لَو قَد قَامَ قَائِمُنَا۔۔۔ لَذَہَبَتِ الشَّحْنَاءُ مِن قُلُوبِ العِبَادِ۔۔۔“

जब हमारा क़ाइम क़fयाम करेगा तो ख़ुदा के बंदो के दिलों में ीर्ष्या और दुशमनी नहीं रहेगी।

उस ज़माने में ईर्ष्या और दुशमनी के लिए कोई बहाना बाक़ी नहीं रहेगा, क्योंकि वह ज़माना न्याय व समानता का ऐसा दौर होगा जिसमें किसा का कोई हक़ पामाल नहीं होगा। वह ज़माना अक़्लमंदी और ग़ौर व फिक्र का ज़माना होगा, अक़्ल के ख़िलाफ़ काम करने और इच्छाओं के अनुसरण का नहीं। [5] इस लिए ईर्ष्या और दुशमनी के लिए कोई बहाना नहीं रहेगा और लोगों के दिलों में मुहब्बत पैदा हो जायेगी, जबकि उससे पहले लोगों में दुश्मनी मौजूद होगी। उस ज़माने में सभी लोग कुरआनी भाीचारे की तरफ़ पलट जायेंगे...[6]... और आपस में दो भाइयों की तरह मुहब्बत के साथ रहेंगे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के सुनहरे युग की तारीफ़ करते हुए फरमाते हैं कि

“उस ज़माने में ख़ुदा वन्दे आलम परेशान और घबराये हुए लोगों में एकता और मुहब्बत पैदा कर देगा।”[7]

और अगर उस काम में ख़ुदा की मदद होगी तो फिर कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि वह एकता व मुहब्बत इतनी बढ़ जाये कि इस दुनिया में, जो भौतिक कशमकश में अपनी चरम सीमा को पहुँच चुकी है, उस का अंदाज़ा लगाना मुशकिल हो जाये।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) ने फरमाया :

जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा तो सच्ची दोस्ती और वास्तविक एकता इस हद तक होगी कि ज़रुरतमंद अपने ईमानी भाई की जेब से अपनी ज़रुरत के अनुसार पैसा निकाल लेगा और उसका दीनी भाई उसे नहीं रोकेगा। [8]
जिस्म और रूह की सलामती

आज कल इंसानों की सबसे बड़ी और लाइलाज मुश्किल ख़तरनाक बिमारियाँ हैं जो विभिन्न चीज़ो की वजह से पैदा हो रही हैं जैसे हमारे रहने के वातावरण का प्रदूषित होना, रासायनिक और एटमिक शस्त्रों का इस्तेमाल, इंसानों के आपस में अनैतिक संबंध, पेड़ों को काटना, समुन्द्रों के पानी को प्रदूषित करना आदि। इसी तरह की दूसरी चीज़ें भी विभिन्न ख़तरनाक बिमारियों को जन्म दे रही हैं जैसे कोढ़, प्लेग, फ़ालिज, दिल और दिमाग़ का दौरा आदि बहुत सी बिमारियां जिनका आज के ज़माने में कोई इलाज नहीं है, हमारी मुश्किलें हैं। जिस्मानी बिमारियों के अलावा रुही और सैकोलोजिकल बिमारियां भी हैं जिनकी वजह से दुनिया भर में इंसान की ज़िन्दगी बद मज़ा और नाकाबिले बर्दाश्त हो गई है, लेकिन यह सब दुनिया और इंसानों पर ग़लत चीज़ों के इस्तेमाल की वजह से हैं।

हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के ज़माने में, जो कि अदल व इन्साफ़ और नेकियों का ज़माना होगा और ताल्लुकात बरादरी और बराबरी की बुनियादों पर होंगे, इंसान की जिस्मानी और सैकोलोजिकल बिमारियों का खात्मा हो जायेगा और इंसान की जिस्मानी व रुहानी ताकत ताज्जुब की हद तक बढ़ जायेगी।

हज़रत इमाम सादिक (अ. स.) ने फ़रमाया :

जब हज़रत इमाम महदी (अ. स.) क़ियाम करेंगे तो ख़ुदा वन्दे आलम मोमिनों से बिमारियों को दूर कर देगा और उन्हें सेहत व तन्दुरुस्ती प्रदान करेगा।[9]

क्योंकि उनकी हुकूमत में इल्म व ज्ञान की बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी होगी इस लिए कोई लाइलाज बिमारी बाक़ी नहीं रहेगी। चिकित्साशास्त्र में बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी होगी, और हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की बरकत से बहुत से बीमारों को सेहत मिल जायेगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ. स.) ने फरमाया :

जो इंसान हम अहलेबैत के क़ाइम का ज़माना देखेगा तो अगर उसको कोई बिमारी हो जायेगी तो ठीक हो जायेगा और अगर कमज़ोरी का शिकार हो जायेगा तो सेहत मन्द और ताक़त वर हो जायेगा...[10]
बहुत ज़्यादा खैर व बरकत

क़ाइमे आले मुहम्मद हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत का एक बड़ा फ़ायदा यह होगा कि उस ज़माने में खैर व बरकत इतनी होगी कि इतिहास में उसकी मिसाल नहीं मिलेगी। उनकी हुकूमत की बहार में हर जगह हरा भरा और ख़ुशियों का माहौल होगा। आसमान से पानी बरसेगा और ज़मीन में अच्छी फसलें पैदा होंगी। हर तरफ ख़ुदा की बरकत बिखरी हुई नज़र आयेगी।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) ने फरमाया :

ख़ुदा वन्दे आलम हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की वजह से ज़मीन व आसमान से बरकतों की बारिश करेगा और उनके ज़माने में आसमान से बारिशें होंगी और ज़मीन में अच्छी फसलें होंगी।[11]

हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में कोई ज़मीन बंजर नहीं मिलेगी और हर जगह हरयाली होगी।

यह महान व बेमिसाल परिवर्तन इस वजह से होगा कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के ज़माने में तक़वे, पाकीज़गी और ईमान के फूल खिलने लगेंगे, समाज के तमाम लोग इलाही तरबियत के तहत अपने संबंधों को इस्लामी और इलाही मर्यादाओं के साँचे में ढाल लेंगे। अतः ख़ुदा वन्दे आलम ने ऐसी हालत के लिए पहले ही वादा किया है कि ऐसे पाक व पाक़ीज़ा माहौल को खैर व बरकत से भर दूँगा।

इस बारे में कुरआने मजीद में इस प्रकार वर्णन हुआ है :

[12] وَلَوْ اٴَنَّ اٴَہْلَ الْقُرَی آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَیْہِمْ بَرَکَاتٍ مِنْ السَّمَاءِ وَالْاٴَرْضِ۔۔۔

और अगर बस्ती वाले ईमान ले आते और परहेज़गार बन जाते तो हम उनके लिए ज़मीन व आसमान से बरकतों के दरवाज़े खोल देते।
ग़रीबी व फ़क़ीरी का अंत

जिस वक़्त हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के लिए ज़मीन के सारे खज़ाने ज़ाहिर हो जायेंगे और ज़मीन व आसमान से लगातार बरकतें नाज़िल होंगी और मुसलमानों का बैतुलमाल (राजकीय धनकोष) अदालत की बुनियाद पर वितरित होगा तो फिर ग़रीबी व फ़क़ीरी का कोई वजूद नहीं रहेगा और उनकी हुकूमत में हर इंसान ग़रीबी के दलदल से आज़ाद हो जायेगा। [13]

उनकी हुकूमत के ज़माने में आर्थिक संबंध समानता व भाईचारे की बुनियाद पर होंगे और स्वार्थता की जगह अपने दीनी भाीयों से हमदर्दी का जज़बा पैदा हो जायेगा। उस ज़माने में सभी लोग आपस में एक दूसरे को घर के एक मेंमबर के रूप में देखेंगे और सबको अपना तस्व्वुर करेंगे और मोहब्बत व हमदर्दी की खुशबू हर जगह फैली हुई होगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ. स.) ने फरमाया :

हज़रत इमाम महदी (अ. स.) साल में दो बार लोगों को बख्श दिया करेंगे, और महीने में दो बार उनको रोज़ी व जीविका दिया करेंगे। वह इस काम से लोगों के बीच समानता स्थापित करेंगे। उस ज़माने में लोग ऐसे इतने मालदार हो जायेंगे कि कोई ज़कात लेने वाला ज़रूरतमंद नहीं मिल पायेगा।[14]

विभिन्न रिवायतों से यह नतीजा निकलता है कि लोगों में ग़ुरबत के एहसास के न होने की वजह यह होगी कि उनके यहाँ क़नाअत का एहसास पाया जाता होगा। दूसरे शब्दों में यूँ कहा जाये कि इस से पहले कि कोई उनको माल व दौलत दे, ख़ुद उनके अन्दर का ज़रूरत न होने का एहसास पैदा हो जायेगा। उन्हें जो कुछ ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने फज़्ल व करम से दिया होगा वह उस पर राज़ी रहेंगे, इस लिए वह दूसरों के माल की तरफ़ आँख भी नहीं उठायेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत की तारीफ़ करते हुए फरमाया :

ख़ुदा वन्दे आलम अपने बन्दों के दिलों में बेनियाज़ी (ज़रूरत न होना) का एहसास पैदा कर देगा।[15]

जबकि ज़हूर से पहले इंसान में स्वार्थता, माल व दौलत जमा करने और ग़रीबों पर खर्च न करने की आदत होगी।

ख़ुलासा यह है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में इंसान आन्तरिक व बाह्य दोनों रूपों से बेनियाज़ हो जायेगा, क्योंकि एक तरफ़ तो उन्हें बहुत सी दौलत न्यायपूर्वक विभाजन से मिल जायेगी और दूसरी तरफ इंसानों के दिल में कनाअत व निरीहता पैदा हो जायेगी।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने मोमिनों पर हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की बख़्शिश के बारे में बयान करते हुए फरमाया :

ख़ुदा वन्दे आलम मेरी उम्मत को बेनियाज़ कर देगा और अदालते महदवी सब पर इस तरह लागू होगी कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) हुक्म फरमायेंगे कि मुनादी यह ऐलान कर दे कि कौन है जिस को माल की ज़रुरत है ? लेकिन उस ऐलान को सुन कर एक इंसान के अलावा कोई आगे क़दम नहीं बढाएगा।

उस वक़्त इमाम (अ. स.) उससे फरमायेंगे : खज़ानेदार (मालखाने का इन्चार्ज) के पास जाओ और उससे कहना कि इमाम महदी (अ. स.) की तऱफ़ से तुम्हारे लिए यह हुक्म है कि मुझे कुछ माल व दौलत दे दो। यह सुन कर खज़ानेदार उससे कहेगा कि अपनी चादर फैलाओ और उसकी चादर को भर दिया जायेगा। जब वह उस चादर को कमर पर लाद कर चलेगा तो पछता कर कहेगा : उम्मते मुहम्मदी (स.) में सिर्फ़ मैं ही इतना लालची हूँ। इसके बाद वह माल वापस करने के लिए जायेगा, लेकिन उससे वह माल वापस नहीं लिया जायेगा और उससे कहा जायेगा कि हम जो कुछ दे देते हैं वह वापस नहीं लेते। [16]
इस्लाम की हुकूमत और कुफ्र का ख़ात्मा

कुरआने करीम ने तीन जगहों पर वादा किया है कि ख़ुदा वन्दे आलम इस्लाम को पूरी दुनिया पर ग़ालिब करेगा।

ھُوَ الَّذِی اٴَرْسَلَ رَسُولَہُ بِالْہُدَی وَدِینِ الْحَقِّ لِیُظْہِرَہُ عَلَی الدِّینِ کُلِّہِ وَلَوْ کَرِہَ الْمُشْرِکُونَ۔[17

वह ख़ुदा वह है जिसने अपने रसूल को हिदायत और दीने हक़ के साथ भेजा ताकि अपने दीन को तमाम धर्मों पर ग़ालिब बनाये चाहे मुशरेकिन को कितना ही नागवार क्यों न हो।

जबकि इस हक़ीक़त में कोई शक नही है कि अल्लाह का वादा पूरा होकर रहता है, वह कभी भी वादा ख़िलाफ़ी नही करता, जैसे क़ुराने करीम में फ़रमाया है :

[18] ۔۔۔ اِنَّ اللهَ لَا یُخْلِفُ الْمِیْعَادِ

बेशक अल्लाह वादे के खिलाफ अमल नहीं करता।

लेकिन यह बात रौशन है कि लगातार कोशिश के बावजूद भी पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और अल्लाह के वली (अ. स.) अब तक ऐसी मुबारक तारीख नहीं देख पाए हैं। [19]

अतः तमाम मुसलमान ऐसे दीन का इन्तेज़ार कर रहे हैं। यह एक ऐसी हक़ीक़ी तम्न्ना है जो अइम्मा मासूमीन (अ. स.) के कलाम में मौजूद है।

इसी लिए उस वली ए ख़ुदा की हुकूमत में (”اشھد ان لا الہ الا الله“ ) का नारा बुलन्द होगा जो तौहीद का परचम है और ”اشھد ان محمد رسول الله“ की आवाज़ जो इस्लाम का अलम है हर जगह लहराता हुआ नज़र आयेगा और किसी भी जगह कुफ़्र व शिर्क का वजूद बाकी न रहेगा।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ. स.) ने निम्न लिखित आयत की व्याख्या में फरमायाः

[20] وَقَاتِلُوہُمْ حَتَّی لاَتَکُونَ فِتْنَةٌ وَیَکُونَ الدِّینُ کُلُّہُ لِلَّہِ

और तुम लोग उन कुफ्फार से जिहाद करो यहाँ तक कि फित्ने का वजूद बाक़ी न रहे।

इस आयत की तावील अभी तक नहीं हुई है और जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा और जो इंसान उनके ज़माने को पायेगा वह इसकी तावील को अपनी आँखों से देखेगा।

बेशक उस ज़माने में दीने मोहम्मदी (स.) वहाँ तक पहुँच जायेगा, जहाँ तक रात का अँधेरा पहुँचता है और पूरी दुनिया में फैल जायेगा। उस वक़्त ज़मीन से शिर्क का नाम व निशान मिट जायेगा, जैसे कि ख़ुदा वन्दे आलम में वादा फरमाया है।[21]

लेकिन पूरी दुनिया में इस्लाम का फैलाव, इस्लाम की सच्चाी व वास्तविक्ता की वजह से होगा। क्योंकि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के ज़माने में इस्लाम की सच्चाई बहुत स्पष्ट हो जायेगी और इस्लाम सभी को अपनी तरफ आकर्षित कर लेगा और सिर्फ वही लोग बाकी बचेंगे जो ईर्ष्या व दुश्मनी के शिकार होंगे। उस वक़्त हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की न्याय फैलाने वाली तलवार उनके सामने आयेगी और यही ख़ुदा वन्दे आलम का बदला होगा।

इस बारे का आखरी नुक्ता यह है कि अक़ीदे की यह एकता (यानी सभी का मुसलमान हो जाना) हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के ज़माने में पेश आयेगी और यह मौक़ा विश्वव्यापी समाज की स्थापना के लिए बहुत उचित होगा। उस वक़्त पूरी दुनिया अकीदे में इसी एकता और एकेश्वरवाद के क़ानून को क़बूल करेगी और उसकी छत्र छाया में अपने व्यक्तिगत और सामाजिक संबंध इसी एक अक़ीदे से प्राप्त होने वाली कसौटी के आधार पर व्यवस्थित करेंगे। इस वर्णन के अनुसार एक अक़ीदे व एक दीन के झंडे के नीचे जमा होना उस वक़्त की एक वास्तविक ज़रुरत होगी जो हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में पूरी होगी।
शाँती व सुरक्षा

हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में जब ज़िन्दगी के हर पहलु में अच्छाइयाँ और नेकियां आम हो जायेंगी तो शांति व सुरक्षा प्राप्त होगी जो इलाही नेमतों में से एक बड़ी नेमत है और इंसान की सब से बड़ी तमन्ना है।

जिस वक़्त तमाम इंसान एक अकीदा होकर इस्लाम की पैरवी करेंगे और समाज के बीच उच्च अख़लाक़ी मर्यादाएं लागू होंगी और अदालत हर इंसान पर हाकिम होगी तो फिर ज़िन्दगी के किसी भी हिस्से में अशाँति और खौफ व दहशत के लिए कोई जगह बाक़ी नहीं रहेगी। जिस समाज में हर इंसान को उसका हक़ मिल रहा होगा तो फिर वह किसी दूसरे पर ज़ुल्म व सितम और इंसानी व इलाही अधिकारों को पामाल नहीं करेगा, और अगर कोई ऐसा करेगा तो उसके साथ सख्त कार्रवाई की जायेगी। इस लिए उस ज़माने में हर तरफ़ शाँति और सकून रहेगा।

हज़रत अली (अ. स.) ने फरमाया :

हमारे ज़रिये और हमारी हुकूमत के ज़रिये एक सख्त ज़माना गुज़रा है और जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा तो दिलों से दुशमनी और ईर्ष्या निकल जायेगी। पशुओं में भी आपस में एकता होगी, उस ज़माने में ऐसा चैन सकून स्थापित होगा कि औरतें अपने ज़ेवर पहन कर इराक़ से शाम तक का सफर करेंगी....लेकिन उन के दिल में किसी तरह का कोई डर नहीं होगा...[22]

प्रियः पाठकों ! हम चूँकि अन्याय लालच और ईर्ष्या व दुश्मनी के ज़माने में ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं इस लिए हमारे लिए उस हरी भरी व ख़ुशियों पर आधारित दुनिया का तसव्वुर बहुत मुशकिल है। लेकिन जैसे कि हमने उल्लेख किया अगर हम अपनी बुराइयों और गुनाहों के कारणों के बारे में गौर व फिक्र करें और यह तसव्वुर करें कि तमाम बुराइयां हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में खत्म हो जायेंगी तो हमें मालूम हो जायेगा कि समाज में शाँति व सुरक्षा स्थापित होने का अल्लाह का वादा यक़ीनी है।

ख़ुदा वन्दे आलम कुरआने मजीद में फरमाता है कि

[23] وَعَدَ اللهُ الَّذِینَ آمَنُوا مِنْکُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَیَسْتَخْلِفَنَّہُم فِی الْاٴَرْضِ کَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِینَ مِنْ قَبْلِہِمْ وَلَیُمَکِّنَنَّ لَہُمْ دِینَہُمْ الَّذِی ارْتَضَی لَہُمْ وَلَیُبَدِّلَنَّہُمْ مِنْ بَعْدِ خَوْفِہِمْ اٴَمْنًا۔۔۔

तुम में से जिन्होने ईमान लाने के बाद नेक काम किये अल्लाह ने उनसे वादा किया है कि उन्हें ज़मीन पर उसी तरह खलीफा बनाएगा जिस तरह पहले वालों को बनाया है और उनके लिए उस दीन को ग़ालिब बनायेगा जिसे उनके लिए पसन्द किया है और उनके खौफ़ को अमन से बदल देगा।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) ने इसकी तफ़्सीर करते हुए फरमाया :

यह आयत हज़रत इमाम क़ाइम (अ. स.) और उनके असहाब के बारे में नाज़िल हुई है...[24]
इल्म की तरक्की

हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के ज़माने में इस्लामी और इंसानी उलूम के बहुत से राज़ खुल जायेंगे और इंसान का इल्म बहुत तेज़ी से तरक़्क़ी करेगा।

हज़रत इमाम सादिक (अ. स.) ने फरमाया :

इल्म के 27 हर्फ हैं, और जो कुछ भी तमाम नबी (अ. स.) लेकर आये हैं वह सिर्फ तीन हर्फ़ हैं, जबकि जनता उनमें से दो हर्फो के भी नहीं जानती, जिस वक़्त हमारे क़ाइम का ज़हूर होगा तो वह उन बाक़ी 25 हरफ़ों के इल्म की भी लोगों को तालीम देंगे और उन दो हरफो को भी उनमें मिला देंगे जिसके बाद तमाम 27 हर्फ़ का इल्म नशर फरमायेंगे...[25]

ज़ाहिर सी बात है कि इंसान इल्म के हर पहलु में तरक़्क़ी करेगा, अनेकों रिवायतों में होने वाले इशारों से मालूम होता है कि उस ज़माने औद्योगिक ज्ञान आज के ज़माने से कहीं ज़्यादा होगा।[26]

जैसे कि इस वक़्त का उद्योग शताब्दियों पहले उद्योगों से बहुत ज़्यादा फर्क रखता है।

प्रियः पाठकों! हम यहाँ पर इस बारे में बयान होने वाली कुछ रिवायतों की तरफ़ इशारा करते हैं।

हज़रत इमाम सादिक (अ. स.) ने हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत की कैफियत के बारे में फरमाया :

क़ाइम आले मुहम्मद (स.) की हुकूमत के ज़माने में पूरब में रहने वाला मोमिन अपने पश्चिम में रहने वाले भाई को देखता होगा…[27]

इसी तरह इमाम (अ. स.) ने फरमाया :

जिस वक़्त हम अहलेबैत (अ. स.) का क़ाइम ज़हूर करेगा तो ख़ुदा वन्दे आलम हमारे शियों की आँखो और कानों की ताक़त बढ़ा देगा इस तरह से हज़रत इमाम महदी (अ. स.) चार फर्सख़ (22 किलो मीटर) के फासले से अपने शियों से बात चीत करेंगे और वह उनकी बातों को सुनेंगे और उनको देखते भी होंगे हाँलाकि वह अपनी जगह पर खड़े होंगे। [28]

हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में हुक्म सादिर करने वाले के रूप में इमाम के लोगों के हालात से बाखबर होने के बारे में रिवायतों कहती है कि

अगर कोई इंसान अपने घर में बात करेगा तो उसे इस चीज़ का खौफ़ होगा कि कहीं उसके घर की दिवारें उसकी बातों को (इमाम अ. स.) तक न पहुँचा दें। [29]

आज कल की तकनीकी तरक़्क़ी के मद्दे नजर इन रिवायतों को समझना आसान है लेकिन यह बात स्पष्ट नहीं है कि क्या यही साधन और अधिक तरक़्क़ी के साथ इस्तेमाल किये जायेंगे या कोई इस से ज़्यादा अच्छी तकनीक इस्तेमाल की जायेगी।


[1] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 52, पेज न. 362

[2] . कुरआने मजीद में वर्णन होता है (ان ا لله یامر بالعدل و الاحسان) यानी बेशक खुदा वन्दे आलम नेकी और अदालत का हुक्म देता है। (सूरः ए नहल आयत न. 90)

[3] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 52, हदीस न. 71, पेज न. 336

[4] . उसूले काफी, जिल्द न. 1, हदीस न. 3, पेज न. 58

[5] . इस से पहले दो हिस्लों में इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में अदालत और अक्ली कमाल के बारे में बात हो चुकी है।

[6] . सूरः ए हुजरात की आयत न. नम्बर 10 की तरफ़ इशारा है जहां इर्शाद होता है (इन्नमल मोमिनूना इखवत) मोमिनीन आपस में एक दूसरे के भाई हैं।

[7] . कमालुद्दीन, जिल्द 2, बाब 55, हदीस 7, पेज 548 ।

[8] . बिहार उल अनवार, जिल्द 52, हदीस 164, पेज 372 ।

[9] बिहार उल अनवार, जिल्द न. 2, हदीस न. 138, पेज न. 364

[10] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 52, हदीस न. 67, पेज न. 335

[11] . ग़ैबते तूसी हदीस न. 149, पेज न. 188

[12] . सूरः ए अअराफ़, आयत न. 96

[13] . देखिये मुन्तखब उल असर, फसल न. 7, बाब न. 403, पेज न. 589 से 593 तक।

[14] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 52, हदीस न. 212, पेज न. 390

[15] . बिहार उल अनवार, जिल्द 51, पेज 84 ।

[16] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 51, पेज न. 93

[17] सूरः ए तौबा, आयत न. 33 सूरः ए फ़त्ह, आयत न. 28, सूरः ए सफ़ आयत न. 9

[18] . सूरः ए आले इमरान, आयत न. 9

[19] . यह बात सिर्फ़ दावे की हद तक नहीं है बल्कि एक ऐतिहासिक हक़ीक़त है और शिया सुन्नी मुफ़स्सिरों ने इस सिलसिलें में गुफतगू की है जैसे फखरे राज़ी ने (तफ़्सीरे कबीर की जिल्द न. 16, पेज न. 40 में और क़ुर्तबी नें तफ्सीरे क़ुरतबी की जिल्द न. 8, पेज न. 121 में और अल्लामा तबरिसी ने मजमा उल बयान की जिल्द न. 5, पेज न. 35 में)।

[20] . सूरः ए अन्फ़ाल, आयत न. 39

[21] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 51, पेज न. 55

[22] . ख़िसाल, शेख सदूक, जिल्द न. 2, पेज न. 55

[23] . सूरः ए नूर, आयत न. 55

[24] . ग़ैबते नोमानी, हदीस न. 35, पेज न. 240

[25] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 52, पेज न. 326 ।

[26] . मुम्किन है कि इस रिवायात में मोजज़े की तरफ़ इशारा हो।

[27] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 52, पेज न. 391 ।

[28] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 52, पेज न. 336 ।

[29] . बिहार उल अनवार, जिल्द न. 52, पेज न. 390 ।