मजमूअऐ मक़ालाते इमामे महदी(अ){1}
 


(1) जन्म के समय से हज़रत इमाम अस्करी (अ. स.) की शहादत तक


हज़रत इमाम महदी (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ) की ज़न्दगी का यह ज़माना बहुत से महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर आधारित है जिन में से कुछ की तरफ यहाँ पर इशारा किया जाता है

इमाम महदी (अ. स.) से शिओं का परिचय

चूँकि हज़रत इमाम महदी (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ) का जन्म बहुत ही गुप्त रूप से हुआ था, इस वजह से यह डर था कि शिया आखरी इमाम की पहचान में ग़लत फ़हमी या भटकाव का शिकार हो सकतें हैं। इस लिए हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) की यह ज़िम्मेदारी थी कि वह बुज़ुर्ग और भरोसेमंद शिया लोगों को अपने बेटे के जन्म के बारे में बतायें और उनकी पहचान करायें ताकि वह इमाम महदी (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ) के जन्म की खबर को अहलेबैत (अ. स.) के शियों तक पहुँचा दें। इस सूरत में इमाम की शिनाख्त और पहचान भी हो जायेगी और उनके सामने कोई खतरा भी नहीं आयेगा।

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) के एक खास शिया, अहमद इब्ने इस्हाक़ कहते हैं कि :

मैं एक बार हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) के पास गया। मैं उन से यह सवाल पूछना चाहता था कि आपके बाद इमाम कौन होगा ? लेकिन मेरे कहने से पहले ही इमाम (अ. स.) ने फरमाया : ऐ अहमद ! बेशक ख़ुदा वन्दे आलम ने जिस वक़्त से हज़रत आदम (अ. स.) को पैदा किया उस वक़्त से आज तक ज़मीन को कभी भी अपनी हुज्जत से खाली नहीं रखा और यह सिलसिला कयामत तक जारी रहेगा। अल्लाह अपनी हुज्जत के ज़रिये ज़मीन से बलाओं को दूर करता है और उसी के वजूद की बरकत से)रहमत की बारिश करता रहता है।

मैं ने अर्ज़ किया ऐ अल्लाह के रसूल के बेटे आपके बाद आपका जानशीन व इमाम कौन है ?

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) फौरन अपने घर के अन्दर तशरीफ़ ले गए और एक तीन साल के बच्चे को अपनी गोद में ले कर वापस आये। उस बच्चे की सूरत चौदहवीं रात के चाँद की तरह चमक रही थी। इमाम (अ. स.) ने फरमाया : ऐ अहमद बिन इस्हाक़ ! अगर तुम ख़ुदा वन्दे आलम और उसकी हुज्जतों के नज़दीक़ मोहतरम व आदरनीय न होते तो मैं अपको अपने इस बेटे को कभी न दिखाता। बेशक इस का नाम और कुन्नियत, पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का नाम और कुन्नियत है और यह वही है जो ज़मीन को अदल व इन्साफ़ से भर देगा जिस तरह वह इस से पहले ज़ुल्म व सितम से भरी होगी।

मैं ने अर्ज़ किया : ऐ मेरे मौला व आक़ा क्या कोई ऐसी निशानी है जिस से मेरे दिल को सकून हो जाये ?

इस मौक़े पर उस बच्चे ने अपनी ज़बान को खोला और बेहतरीन अरबी में इस तरह बात की:

”اٴنَا بَقِیَّةُ اللهِ فِی اٴرْضِہِ وَ المُنتَقِمُ مِنْ اٴعْدَائِہِ۔۔۔“

मैं ज़मीन पर बक़ीयतुल्लाह हूँ और अल्लाह के दुश्मनों से बदला लेने वाला हूँ। ऐ अहमद इब्ने इस्हाक़ ! तुम ने अपनी आँखों से सब कुछ देख लिया है अतः अब किसी निशानी की ज़रुरत नहीं है।

अहमद इब्ने इस्हाक़ कहते हैं कि : मैं (यह बात सुनने के बाद) खुशी खुशी हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) के मकान से बाहर आ गया...

इसी तरह मोहम्द इब्ने उस्मान और कुछ बुज़ुर्ग शिया नक्ल करते हैं कि :

हम चालीस लोग मिल कर हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) की खिदमत में गये। हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) ने अपने बेटे की ज़ियारत कराई और फरमाया : मेरे बाद यही बच्चा, मेरा जानशीन और तुम्हारा इमाम होगा। तुम लोग इसकी इताअत (आज्ञा पालन) करना, और मेरे बाद अपने दीन में बिखर न जाना वर्ना हलाक़ हो जाओगे और (जान लो कि) आज के बाद तुम इन को नहीं देख पाओगे...।

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि जन्म के बाद बच्चे का अक़ीका सुन्नत है और इसकी बहुत ताकीद भी की गई है। दीन के इस हुक्म के बारे में कहा गया है कि भेड़ बकरी ज़िब्ह कर के कुछ मोमेनीन को खाना खिलाये, इस की बरकत से बच्चे की उम्र लंबी होती है। अतः हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) ने अपने इस बेटे ( हज़रत इमाम महदी (अ. स).) के लिए अक़ीक़ा किया.. ताकि नबी (स.) की इस इबेहतरीन सुन्नत पर अमल करते हुए बहुत से शियों को बारहवें इमाम के जन्म से अवगत करायें।
मुहम्मद इब्ने इब्राहीम कहते हैं कि :

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ. स.) ने ्क़ीक़े में ज़िब्ह की गई भेड़ अपने एक शिया के पास भेजी और फरमाया : यह मेरे बेटे (मुहम्मद) के अक़ीक़े का गोश्त है....

कमालुद्दीन, जिल्द न. 2, बाब 38, पेज न. 80,

. मोहम्मद इब्ने उसमान इमाम मेहदी (अ0 स.) की ग़ैबते सोगरा के दूसरे नाएबे खास थे, ग़ैबत की बहस में उन की ज़िन्दगी के हालात बयान किये जायेंगे।

कमालुद्दीन जिल्द न. 2, बाब 43, हदीस 2, पेज न. 162
कमालुद्दीन जिल्द न. 2, बाब 42
कमालुद्दीन जिल्द न. 2, बाब 43, हदीस 2 पेज न. 158

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(2) इमाम महदी नबूअत के आईने में:-




अल्लामा तबरसी बहवाल-ए- हज़रात मासूमीन (अ0) तहरीर फ़रमाते है कि इमाम महदी(अ0) में बहुत से अम्बिया के हालात व कैफ़ियात नज़र आते हैं और जिन मुखतलिफ़ वाक़ियात से अम्बिया को दो चार होना पड़ा, वह तमाम वाक़ियात आपकी ज़ात सतूदा सिफ़ात में दिखाई देते हैं। मिसाल के लिए हज़रत नूह (अ0) हज़रत इब्राहीम(अ0) हज़रत मूसा(अ0) हज़रत ईसा(अ0) हज़रत अय्यूब(अ0) हज़रत यूनुस(अ0) हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स0) को ले लीजिये और उनके हालात पर ग़ौर कीजिये, आपको हज़रत नूह की तवील ज़न्दगी नसीब होगी हज़रत इब्राहीम की तरह आप की विलादत छिपाई गई और लोगों से किनारा कश हो कर रूपोश होना पडा। हज़रत मूसा(अ0) की तरह हुज्जत के ज़मान से उठ जाने का खौफ़ ला हक़ हुआ और उन्ही की विलादत की तरह आपकी विलादत भी पोशीदा रखी गई और उन्ही के मानने वालों की तरह आपके मानने वालों को ग़ैबत के बाद सताया गया। हज़रत ईसा(अ0) की तरह आपके बारे में लोगों ने इख्तेलाफ़ किया। हज़रत अय्यूब(अ0) की तरह तमाम इम्तेहानात के बाद आपकी फ़र्ज व कशाइश होगी। हज़रत यूसुफ़(अ0) की तरह अवाम व ख़वास से आपकी ग़ैबत होगी। हज़रत यूनुस की रतह ग़ैबत के बाद आपका ज़हूर होगा। यानी जिस तरह वह अपनी क़ौम से ग़ायब हो कर बुढापे के बावजूद नौजवान थे। उसी तरह आपका जब ज़हूर होगा तो आप चालीस साल के जवान होंगे और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स0) की तरह आप साहिबे सैफ़ होंगे।

(आलम अल वरा सफ़ा 264 तबा बम्बई 1312 हजरी)

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(3) तीन साल कि उम्र में हुज्जतुल्लाह होने का दावा



तारीख़ व सिरत की किताबों से मालूम होता है कि आप की परवरिश का काम जनाबे जिबराईल अलैहिस्सलाम के सुपुर्द था और वही आपकी परवरिश करते थे। ज़ाहिर है कि जो बच्चा विलादत के वक़्त कलाम कर चुका हो और जिसकी परवरिश जिबराईल जैसे मुक़र्ब फ़रिशते के सुपुर्द हो, वह यक़ीनन दुनिया में चन्द दिन ग़ुज़र जाने के बाद, बहर सूरत इस सलाहियत का मालिक हो सकता है कि अपनी ज़बान से हुज्जतुल्लाह होने का दावा कर सके।

अल्लामा अरदबेली लिखते है कि इब्ने इसहाक़ और साद अल अशकरी एक दिन हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उन्होने ख़्याल किया कि आज इमाम से यह दरयाफ़्त करेंगे कि आप के बाद हुज्जतुल्लाह फ़ी अल अर्ज कौन होंगे ? जब इमाम अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई तो इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि ऐ अहमद ! तुम जो दिल में ले कर आये हो, मै उसका जवाब तुम्हें देता हूँ, यह फ़रमा कर आप अपने मक़ाम से उठे और अन्दर जाकर इस हालत में वापस आये कि आप के कँधे पर एक निहायत ख़ूबसूरत बच्चा था, जिस की उम्र तीन साल की थी। आपने फ़रमाया ऐ अहमद! मेरे बाद हुज्जते ख़ुदा यह होगा। इसका नाम मुहम्मद और इसकी कुन्नियत अबुल क़ासिम है और यह ख़िज़्र कि तरह ज़िन्दा रहेगा और ज़ुलक़रनैन की तरह सारी दुनिया पर हुकूमत करेगा। अहमद इब्ने इसहाक़ ने कहा मौला! कोई ऐसी अलामत बता दीजिये जिससे दिल को इतमिनाने कामिल हो जाए। आपने महदी की तरफ़ मुतवज्जेह हो कर फ़रमाया, बेटा इसका तुम जवाब दो ! इमाम महदी अलैहिस्सलाम ने कमसिनी के बावजूद बाज़बाने फ़सीह फ़रमाया- ?अना हुज्जतुल्लाह व बक़ियतुल्लाह? यानी मै ही ख़ुदा की हुज्जत और हुक्मे ख़ुदा से बाक़ी रहने वाला हूँ। एक वह दिन आयेगा जिस में मै ख़ुदा के दुश्मनों से बदला लूँगा। यह सुन कर अहमद ख़ुश व मसरूर हो गए।

(कशफ़ुल ग़ुम्मा सफ़ा 138)

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(4) 307, हिजरी में आपका हजरे असवद नसब करना



अल्लामा अरबी लिखते हैं कि ज़मानए नियाबत में बाद हुसैन बिन रौह अबुल क़ासिम, क़ौलाया हज के इरादे से बग़दाद गये और वह मक्के मोअज़्जमा पहुँच कर हज करने का फ़ैसला किये हुए थे। लेकिन वह बग़दाद पहुँच कर सख़्त अलील हो गये इसी दौरान में आपने सुना कि क़रामता ने हजरे असवद को निकाल लिया है और वह उसे कूछ दुरुस्त करके अय्यामे हज में फिर नसब करेंगें। किताबों में चूँकि पढ़ चुके थे कि हजरे असवद सिर्फ़ इमामे ज़माना ही नस्ब कर सकता है। जैसा कि पहले हज़रत मुहम्मद (स0) ने नस्ब किया था। फिर ज़माना-ए-हज में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ0) ने नस्ब किया था। इसी बिना पर उन्होंने अपने एक करम फ़रमा “इब्ने हश्शाम” के ज़रिये से एक ख़त इरसाल किया और उसे कह दिया की जो हजरे असवद नस्ब करे उसे यह ख़त दे देना। नस्बे हजर की लोग सई कर रहे थे लेकिन वह अपनी जगह पर क़रार नही लेता था कि इतने में एक ख़ूब सूरत नौजवान एक तरफ़ से सामने आया और उसने उसे नस्ब कर दिया और वह अपनी जगह पर मुसतक़र हो गया। जब वह वहां से रवाना हुआ तो इब्ने हश्शाम उनके पीछे हो लिये। रास्ते में उन्होंने पलट कर कहा ऐ इब्ने हश्शाम, तू जाफ़र बिन मुहम्मद का ख़त मुझे दे दे। देख उस में उसने मुझे से सवाल किया है कि वह कब तक ज़िन्दा रहेगा। यह कह कर वह नज़रों से ग़ाएब हो गये।

इब्ने हश्शाम ने सारा वाक़ेया बग़दाद पहुँच कर क़ौलिया से बयान कर दिया। ग़र्ज़ कि वह तीस साल के बाद वफ़ात पा गये। (कशफ़ुल ग़ुम्मा, सफ़ा 133)

इसी क़िस्म के कई वाक़ेयात किताबे मज़कूर में मौजूद हैं। अल्लामा इब्दुर रहमान मुल्ला जामी रक़म तराज़ हैं कि इस्माईल बिन हसन हर कुली जो नवाही-ए- हिल्ला में मुक़ीम था उसकी रान पर एक ज़ख़्म नमूदार हो गया था। जो हर ज़माना-ए-बहार में उबल आता था। जिस के इलाज से तमाम दुनिया के हकीम आजिज़ और क़ासिर हो गये थे। वह एक दिन अपने बेटे शमसुद्दीन को हमराह ले कर रज़ी उद्दीन अली बिन ताऊस की ख़िदमत में गया। उन्होंने पहले तो बडी सई की लेकिन कोई कार न हुआ। हर तबीब यह कहता था कि यह फ़ोडा “रगे एकहल” पर है, आगर इसे नशतर दिया जाए तो जान का ख़तरा है इस लिए इसका इलाज न मुमकिन है। इस्माईल का बयान है “चून अज़ अतिब्बा मायूस शुदम अज़ीमते मशहद शरीफ़े सरमन राए करदम” जब मैं तमाम एतबार से मायूस हो गया तो सामरा के सरदाब के क़रीब गया, और वहाँ पर हज़रत साहिबे अम्र को मुतावज्जेह किया एक शब दरिया-ए-दजला से ग़ुस्ल कर के वापस आ रहा था कि चार सवार नज़र आये, उनमें से एक ने मेरे ज़ख़्म के क़रीब हाथ फ़ेरा और वह बिल्कुल अच्छा हो गया मैं अभी अपनी सेहत पर ताज्जुब ही कर रहा था कि इनमें से एक सवार ने जो सफ़ैद रीश (सफ़ैद बाल) था कहा कि ताज्जुब क्या है। तुझे शिफ़ा देने वाले इमाम महदी (अ0) हैं। यह सुन कर मैंने उनके क़दमों को बोसा दिया और वह लोग नज़रों से ग़ायब हो गये।

(शवाहेदुन नुबुव्वत, सफ़ा 214 व कशफ़ुल ग़ुम्मा, सफ़ा 132)

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(5) जनाबे आदम अलैहिस्सलाम से शबाहत



1- अल्लाह ने आदम अलैहिस्सलाम को पूरी ज़मीन पर अपनी ख़लीफ़ा बनाया और उनको ज़मीन का वारिस बनाया उनके बारे में क़ुरआने करीम में आया है اني جاعل في الارض خليفة यानी मैं ज़मी?पर ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ। [1] अल्लाह ने हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम को भी ज़मीन का वारिस और ज़मीन पर अपना ख़लीफ़ा बनाया है। कुरआने करीम की आयत है कि وعد الله الذين آمنوا منکم و عملوا الصلحات ليستخلفنهم في الارض अल्लाह ने वादा किया है कि तुम में से जो ईमान लाये और नेक अमल अंजाम दिये हम उनको ज़मीन पर ज़रूर ख़लीफ़ा बनायेंगे। हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इस आयत की तफ़्सीर में फ़रमाया कि इस आयत में जो यह कहा गया है कि (तुम में से जो ) इससे मुराद क़ाइम व उनके असहाब है। वह ज़हूर के वक़्त मक्के में अपने चेहरे पर हाथ फेरते हुए कहेंगे कि उस अल्लाह का शुक्र है जिसने हमसे किये हुए वादे को पूरा किया और ज़मीन को हमारी विरासत में दे दिया। [2]

2- हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से रिवायत है कि अल्लाह ने आदम को तमाम असमा की तालीम दी। क़ाइम को वह भी सिखाया गया जो आदम को बताया गया था और उसके अलावा भी बहुत कुछ बताया गया। क्योंकि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने इस्मे आज़म के पच्चीस हरूफ़ सीखे थे और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने 72000 सीखे थे। जो चीज़े पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को दी गईं थी वह उनके वसियों को भी दी गई है और उनमें हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम भी हैं। सिक्कतुल इस्लाम शेख़ कुलैनी (अ.र) ने हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की एक सही हदीस नक़्ल फ़रमाई है जिसमें आपने बयान फ़रमाया कि जो इल्म हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को दिया गया था, उसको वापस नही लिया गया। कोई आलिम ऐसा नही है जिसने अपने इल्म को विरासत के तौर पर न छोड़ा हो। ज़मीन आलिम के बग़ैर बाक़ी नही रह सकती।[3]
3- हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने ज़मीन को अल्लाह की इबादत से ज़िन्दा किया क्योंकि जिन्न उसको कुफ़्र व बग़ावत के ज़रिये मुर्दा बना चुके थे। इसी तरह हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम भी ज़मीन को अल्लाह के दीन, इबादत और अदालत के ज़रिये ज़िन्दा करेंगे, जबकि वह कुफ़्र, ज़ुल्म व गुनाहों की वजह से बे जान हो चुकी होगी। बिहारुल अनवार में यह रिवायत मौजूद है कि हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने क़ुरआने करीम की इस आयत يحي الارض بعد موتها यानी ज़मीन को उसकी मौत के बाद ज़िन्दा करेगा। [4], की तफ़्सीर में फ़रमाया कि अल्लाह हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़रियें ज़मीन को उसकी मौत के बाद ज़िन्दा करेगा। यहाँ पर ज़मीन की मौत से मुराद उस पर काफ़िरों का बढ़ जाना है, क्योकि काफ़िर हक़डीक़त में मुर्दा है। [5] वसाइलुश शिया में हज़रत इमाम मूसा इब्ने ज़ाफ़र अलैहिमा अस्सलाम की रिवायत नक़्ल हुई है कि يحي الارض بعد موتها यानी ज़मीन को उसकी मौत के बाद ज़िन्दा करेगा। इसका मतलब यह नही कि वह बारिश से ज़मीन को ज़िन्दा करेगा बल्कि मतलब यह है कि अल्लाह कुउछ ऐसे लोगों को चुनेगा जो अदालत को ज़िन्दा करेंगे। और ज़मीन अदालत के ज़िन्दा होने से ज़िन्दा होगी। बहे शक अगर ज़मीन पर एक हद्द जारी हो जाये तो वह वहल चालीस दिन की बारिश से ज़्यादा बेहतर है। [6] वसाइलुश शिया में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की यह हदीस भी मौजूद है कि इमामे आदिल का एक घंटे का वजूद, सत्तर साल की इबादत से बेहतर है और ज़मीन पर अल्लाह के लिए एक हद का जारी होना, चालीस दिन की बारिश से बेहतर है।
[1] सूरः बक़रः आयत न. 30
[2] तफ़्सीर अलबुरहान जिल्द न. 3 पेज न. 146 सूरः ए ज़ुमर आयत न. 74
[3] काफ़ी जिल्द न. 1 पेज न. 223
[4] सूरः ए रूम आयत न. 19
[5] बिहारुल ्नवार जिल्द न. 51 पेज न. 58
[6] वसाइलुश शिया जिल्द न. 18 पेज न. 308


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(6) आपके अलक़ाब





आपके अलक़ाब महदी, हुज्जतुल्लाह, ख़लफ़ुस्सालेह, साहिबुल अस्र व साहिबुल अम्र, साहिबुज़्ज़मान, अलक़ाइम, अलबाक़ी और अलमुन्तज़र हैं। मुलाहेज़ा हो तज़केर -ए- ख़वासुल उम्मत सफ़ा 204, रौज़तुश शोहदा सफ़ा 439 कशफ़ुल ग़ुम्मा सफ़ा 131 सवाइक़े मुहर्रिक़ा सफ़ा 124 मतालेबुल सुवल सफ़ा 294, आला-मुल वरा सफ़ा 24)


हज़रत दानियाल नबी ने हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम की विलादत से 1420 साल पहले आप का लक़ब मुन्तजिर क़रार दिया है। मुलाहेज़ा हो किताब दानियाल बाब 12 आयत 12। अल्लामा इब्ने हजरे मक्की अल मुन्तज़र की शरह करते हुए लिखते है कि उन्हें मुन्तज़र (यानी जिसका इन्तेज़ार किया जाये) इस लिए कहते है कि वह सरदाब में ग़ायब हो गए हैं और यह मालूम नही होता कि कहाँ चले गए। ( मतलब यह है कि लोग उनका इन्तेज़ार कर रहें हैं।) शेख़ उल इराक़ैन अल्लामा शेख अब्दुर रसा तहरीर फ़रमाते है कि आपको मुन्तज़र इस लिए कहते है कि आप की ग़ैबत की वजह से आपके मुख़लिस आपका इन्तेज़ार कर रहें हैं। ( अनवारुल हुसैनिया जिल्द 2 सफ़ा 57 तबा बम्बई)




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(7) अदालते इमाम महदी अलैहिस्सलाम




हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़हूर के बाद जिस अदालत का वादा किया गया है, वह इतने बड़े पैमाने पर है कि दुनिया की हुकूमतें ऐसी अदालत क़ायम करने में सामर्थ नही है।

अदालत, ज़ुल्म के मुक़ाबिले में बोला जाने वाला लफ़्ज़ है। लिहाज़ा अदालत को समझने के लिए ज़ुल्म को समझना ज़रूरी है। इस्लामी रिवायतों में ज़ुल्म को तीन हिस्सों में बाँटा गया है। 1- ख़ुदा पर ज़ुल्म अर्थात कुफ़्र व शिर्क। 2- अपने ऊपर ज़ुल्म अर्थात गुनाह। 3- दूसरों पर ज़ुल्म अर्थात अत्याचार।

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम ज़हूर के बाद ज़ुल्म को ख़त्म करके अद्ल को फैलायेंगे लिहाज़ा ऊपर बयान किये गये तीनों ही क्षेत्रों में अदालत पैदा की जायेगी।

हम इस लेख में इमाम महदी अलैहिस्सलाम की अदालत के विभिन्न पहलुओं का वर्णन रिवायतों के आधार पर इस प्रकार कर सकते हैं।
1- इंसान व ख़ुदा के राब्ते में अदालत

कुछ रिवायतों में मिलता है कि सबसे पहला ज़ुल्म कुफ़्र व शिर्क है, जब हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम की अदालत कायम होगी तो इस तरह का ज़ुल्म दुनिया से मिट जायेगा। इस बारे में अबु बसीर की रिवायत है कि मैं अबा अब्दिल्लाह अलैहिस्सलाम से सवाल किया कि क़ुरआने करीम की इस आयत " वह जिसने अपने रसूलों को हिदायत व सही दीन के साथ भेजा ताकि वह दीन को पूरे दीन को ज़ाहिर करें चाहे यह बात मुशरिकों को अच्छी न लगे। " [1] का क्या मतलब है ? हज़रत ने जवाब दिया कि अल्लाह की क़सम अभी इस आयत की तावील नाज़िल नही हुई है। मैं ने कहा कि मैं आप पर क़ुरबान, यह बता दीजिये कि कब नाज़िल होगी ? इमाम ने जवाब दिया कि जब अल्लाह की मर्ज़ी से क़ाइम क़ियाम करेगें। बस जब वह क़ियाम करेंगे तो कोई काफ़िर व मुशरिक बक़ी नही रहेगा, उन लोगों को अलावा जो उनके क़ियाम से ख़ुश न हों। यहाँ तक कि अगर कोई कोफ़िर या मुशरिक पत्थर के अन्दर भी होगा तो पत्थर आवाज़ देगा कि ऐ मोमिन काफ़िर या मुशरिक मेरे अन्दर छुपा है, उसे क़त्ल कर दो। बस अल्लाह उसे ज़ाहिर करेगा और वह मोमिन उसे क़त्ल कर डालेगा।

इस आयत के बारे में एक रिवायत और है जो इस बात पर दलालत करती है कि जब हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का ज़हूर होगा तो कुफ़्र व शिर्क का नामो निशानमिट जायेगा और पूरी दुनिया में दीने हक़ का बोल बाला होगा। [2]
2- इन्सान की अपने साथ अदालत

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम जब ज़हूर करेंगे तो हर तरह के ज़ुल्म को ख़त्म करके अदालत क़ायम करेंगे। वह उस ज़ुल्म को भी ख़त्म करेंगे जो इंसान अपने ऊपर करता है।

रिवायत में मिलता है कि अल्लाह हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़रिये उम्मत को वुसअत देगा और वह बन्दों के दिलों को इबादत से भर देगा और उनकी अदालत को फैला देगा। अल्लाह इमाम के ज़रिये झूठ को ख़त्म करेगा और लडाई झगड़े वाली जानवरों जैसी ज़िन्दगी को ख़त्म करके तुम्हारी गर्दन से ग़ुलामी व ज़िल्लत की तौक़ को निकाल देगा।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की एक रिवायत में आया है कि हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़हूर के ज़माने में अदालत इंसान के अन्दर भी फैल जायेगी और सब लोग सही व सच्ची ज़िन्दगी की तरफ़ पलट जायेंगे।

वह ज़मीन को अद्ल व इन्साफ़ से भर देंगे पूरी दुनिया उनके सामने झुक जायेगी. तमाम काफ़िर ईमान ले आयेंगे बुरे लोग अच्छाई को अपना लेंगे और उनकी हुकूमतमें दानवर भी एक दूसरे के साथ मेल जोल से रहेंगे।
3- दूसरे इंसानों के साथ अदालत

हज़रत इमाम रिज़ा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि अल्लाह क़ाइम के ज़रिये हर तरह की बुराई को दूर और हर तरह के ज़ुल्म को ख़त्म कर देगा ....जब वह क़ियाम करेंगे तो ज़मीन अल्लाह के नूर से रौशन हो जायेगी, वह लोगों के बीच अद्ल की तराज़ू को गाड़ देंगे फिर कोई किसी पर ज़ुल्म नही करेगा।
हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़रिये होने वाले अन्य न्याय

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़हूर के बाद जब उनकी हुकूमत स्थापितत होगी तो पूरे इंसानी समाज़ में न्याय स्थापित होगा और इंसानी ज़िन्दगी को कोई भी पहलु न्याय से ख़ाली नही रहेगा। आपके समय में स्थापित होने वाले कुछ न्यायों का वर्णन रिवायतों में इस प्रकार हुआ है।
शिक्षा व सभ्यता सम्बन्धी अदालत

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के समय में शिक्षिक व सास्कृतिक विकास का सबको समान अधिकार होगा,चाहे वह किसी भी रंग व नस्ल के हों। उनकी हुकूमत के दौरान अज्ञानता, मूर्खता व कम अक़्ली का ख़ात्मा हो जायेगा और हर इंसान अपनी सामर्थ्य के अनुसार पढ़ा लिखा होगा। इस बारे में हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की एक हदीस है कि जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा तो अल्लाह उसके हाथ को बन्दों के सारों पर फिरवायेगा जिससे उनकी अक़्ल बढ़ जायेगी।

एक अन्य हदीस में मिलता है कि उनकी हुकूमत के दौरान तुम्हारे अन्दर इतनी हिकमत पैदा हो जायेगी कि घर में बैठ हुई औरतें भी अल्लाह की किताब और पैग़म्बर (स.) की रविश से मुजतहिदों की तरह अपने मसाइल को हल करेंगी।
फैसलों समबन्धी न्याय

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम की हकूमत में समस्त फ़ैसले न्याय पूर्वक होंगे और उनमें किसी भी तरह की कोई ग़लती नही होगी और इस तरह समाज़ में ज़ुल्म को रोका जायेगा।

इस सम्बन्ध में बहुत सी रिवायतें मौजूद हैं जिनमें से हम यहाँ सिर्फ़ कुछ का तरफ़ ही इशारा कर रहे हैं।

हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि जब क़ाइमें आले मुहम्मद क़ियाम करेगें तोलोगों के बीच हज़रत दाऊद की तरह फ़ैसले करेगे, उन्हें किसी सबूत या गवाह की ज़रूरत नही होगी क्योंकि अल्लाह उन पर सब बातों का इल्हाम करेगा और वह अपने इल्म से फैसला करेंगे। वह हर हर क़ौम को उस चीज़ के बारे में बतायेंगे जो उन्होंने छुपाई होगी।
आर्थिक न्याय

समाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण आधार आर्थिक न्याय है। यह कहना ग़लत न होगा कि इंसानी समाज़ में विभिन्न इन्क़ेलाब आये हैं वह किसी न किसी तरह आर्थिक व्यवस्था से सम्बन्धित रहे हैं। अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इंसान ने आर्थिक न्याय के लिए जितनी अधिक कोशिश की है,उसे इस सम्बन्ध में उतनी ही कम सफ़लता मिली है। कुछ सीमित समय को छोड़ कर ज़मीन पर आर्थिक अन्याय का व्याप्त रहा है।

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम की हुकूमत जो कि ज़मीन पर आखिरी हुकूमत होगी, उसमें आर्थिक न्याय को वरीयता दी जायेगी। इस सम्बन्ध में बहुत सी हदीसें मिलती हैं जैसे

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फ़रमाया कि महदी मेरी उम्मत से है.... मेरी उम्मत उनके समय में (चाहे व नेक हों या बद) ऐसी ख़ुशहाली में होगी कि उससे पहले ऐसी खुशहाली उन्हें कभी नसीब न हुई होगी। आसमान से खूब बारिशें होंगी और ज़मान से बहुत चीज़े उपजेंगी। उस समय में मालो दौलत फ़सलों के बिखरे हुए ढेर की तरह होगी। जब कोई इंसान उनके पास मदद माँगने के लिए आयेगा तो वह जितना उठा सकेगा उसके कपड़े में बाँध देंगे।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम उनके ज़माने के आर्थिक न्याय को इस तरह बयान करते हैं कि वह माल व दौलत को अल्लाह की मख़लूक़ के दरमियान अदालत के साथ बाँटेगे चाहे वह लोग नेक हों या बुरे।
[1] सूरः ए तौबा आयत न. 33
[2] बिहारुल अनवार जिल्द न .51 पेज न. 58 व 60

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(8) अगर इमामे ज़मान (अज) तशरीफ़ लाये तो...



मक़द्दमा –
इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हज़रत के मिलाद के दिन नज़दीक है ज़रूरी है कि हम उन हज़रत का ज़िक्र करें, वह ज़िक्र जो तरबियत करने वाला हो। मरहूम अल्लामा मजलिसी ने इमाम महदी (अज.) के बारे में एक हदीस नक़्ल की है।


हदीस


जिस वक़्त हज़रते हुज्जत (अज.) जहूर करेंगे तो वह अदालत के साथ हुकुमत करेंगे और कोई किसी दूसरे पर ज़ुल्म नही कर सकेगा, और उनकी वजह से तमाम रास्ते पुर अमन होंगे, ज़मीन लोगों के फ़ायदे के लिए अपनी बरकात को ज़ाहिर कर देगी, हर काम को उसके अहल के सपुर्द कर दिया जायेगा और इस्लाम के अलावा कोई दूसरा दीन बाक़ी नही रहेगा और तमाम अफ़राद इस्लाम की तरफ़ मुलतफ़ित हो जायेंगे।[1]


हदीस की तशरीह


इस हदीस में हज़रत के बारे में सात नुक्ते बयान हुए हैं।


1-2 आदिलाना हुकुमत व ज़ुल्मो जौर का ख़ात्मा


“इज़ा क़ामा अलक़ाइमु हकमा बिलअदलि व इरतफ़ाअ फ़ी अय्यामिहि अलजौर” अद्ल के मुक़ाबिल में ज़ुल्म आता है जौर नही, और जौर क़िस्त के मुक़ाबिल में आता है। अद्ल और क़िस्त के दरमियान यह फ़र्क़ है कि अदालत यानी किसी दूसरे का हक़ न छीना जाये। और क़िस्त यानी लोगों के बीच में किसी क़िस्म की तबईज़( भेद-भाव) न रखी जाये। बस अपने नफ़ेअ के लिए किसी के हक़ को छीनना ज़ुल्म है और किसी का हक़ दूसरे को दे देना जौर है। मिसाल के तौर पर अगर ज़ैद से उसका घर अपने इस्तेमाल के लिए छीन लूँ तो यह ज़ुल्म है। और अगर ज़ैद का घर उससे छीन कर किसी दूसरे को दे दूँ तो यह जौर है। इसके मुक़ाबिल में यह बात आती है कि मैं अपने इस्तेमाल के लिए ज़ैद का मकान न छीनू यह अद्ल है। और उससे छीन कर किसी दूसरे को न दूँ यह क़िस्त है। बस इस तरह क़िस्त अदमे तबईज़ व अद्ल अदमे ज़ुल्म है।


3- रास्तों का पुर अमन होना


“व अमनत बिहि अलसुबुल” उनके ज़रिये तमाम रास्ते पुर अमन बन जायेंगे।


4- शकूफ़ाई तबीअत


“व अख़रजत अलअरज़ु बरकातिहा” ज़मीन अपनी बरकतों को ज़ाहिर कर देगी। चाहे वह बरकतें ख़ेती बाड़ी से मुताल्लिक़ हों, या कान से या फिर दूसरी ताक़ते जो अब तक हमसे छुपी हुई हैं।


5- हर काम उसके अहल के सपुर्द कर दिया जायेगा


“व रुद्दा कुल्ला हक़्क़िन इला अहलिहि ” कामों को उनके अहल अफ़राद के सपुर्द कर दिया जायेगा। हमारे ज़माने के बर ख़िलाफ़ कि आज बहुतसे काम ना अहलों के हाथों में हैं क्योंकि ताल्लुक़ात क़ानून पर ग़ालिब आ गये हैं।


6- हाकमियते दीने इस्लाम


“ व लम यबक़ा अहला दीना हत्ता यज़हरुल इस्लाम ” कोई दीन बाक़ी नही रहेगा और तमाम अदयान एक दीन में बदल जायेंगे। और वह दीन इस्लाम होगा।


7- इस्लाम से क़ल्बी लगाव होगा


“व युअतरिफ़ु बिलईमान ” इसके दो माअना हैं। या तो इस तरफ़ इशारा है कि तमाम अफ़राद मकतबे अहले बैत के ताबे हो जायेंगे या फ़िर इस तरफ़ इशारा है कि जिस तरह ज़ाहिर में ईमानदार होंगे इसी तरह बातिन में भी मोमिन होंगे।


इस्लाम और ईमान का फ़र्क़ रिवायात में बयान हुआ है। कुछ रिवात कहती हैं कि इस्लाम यह है कि अगर एक शख़्स इसका इज़हार करे तो उसकी जान महफ़ूज़ और उसका ज़बिहा हलाल है। और ईमान वह चीज़ है जो रोज़े क़ियामत निजात का ज़रिया है। कुछ रिवायतों में मिलता है कि इस्लाम मस्जिदुल हराम की मानिंद और ईमान काबे की मानिंद है। यह भी अहतेमाल पाया जाता है कि यह इबारत उस आयत की तरफ़ इशारा कर रही हो जिसमें फ़रमाया गया है कि “ क़ालत अल एराब आमन्ना”[2]


वह अहम काम जिनको हज़रत अन्जाम देंगे रिवायात की रू से उनका ख़ुलासा चार नुक्तो में हो सकता है।


1-इस्लाहे अक़्ल


“मा अला ज़हरिल अर्ज़े बैतु हिजरिन व मुदरिन अल्ला अदख़लाहु अल्लाहु कलिमतल इस्लाम।”[3] यानी ज़मीन पर ग़रीबों और अमीरों के तमाम कच्चे पक्के मकानों मे ला अलाहा अल्लल्लाह की आवाज़ गूँजेगी और शिर्क का ख़ात्मा हो जायेगा।


1- तकामुले अक़्ल


इल्मा व अक़्ली बेदारी पैदा हो जायेगी इस बारे मे मरहीम अल्लामा मजलिसी इस तरह कहते हैं किः इज़ा क़ामा क़ाइमुना वज़ाअ यदाहु अला रऊसिल इबाद फ़जमाअ बिहा उक़ूलिहिम व कमिलत बिहा अहलामिहिम। शायद उनका नज़रिया यह हो कि लोग उमकी तरबियत के तहत आजायेंगे और इस तरह उनकी अक़्लो फ़िक्र कामिल हो जायेगी।[4]


2- अद्लो इंसाफ़


बहुतसी रिवायात मे बयान हुआ है किः यमला उल अर्ज़ा अदलन व क़िसतन कमा मलिअत ज़पलमन व जौरन।[5] यानी ज़मीन अद्लो इंसाफ़ से इसी तरह भर जायेगी जिस तरह ज़ुल्मो जौर से भरी होगी।


3-अख़लाक़ की इस्लाह


इस्लामी अक़दार को ज़िन्दा और अख़लाक़ी फ़साद को ख़त्म करना। जैसा कि अखिरी ज़माने की अलामात के बारे में रिवायात में मिलता है। कुछ रिवायात में है कि क़ाइम के क़याम से पहले बदअख़लाक़िया जैसे ज़िना, चोरी, रिशवत ख़ोरी, कम तौलना, शराब ख़ौरी, लोगों को बोगुनाह क़त्ल करना वग़ैरह ज़्यादा हो जायेंगी। और इसके माअना यह हैं कि हज़रत महदी (अज.) क़याम करेंगे ताकि इन बुराईयों का ख़ात्मा करें। यानी अक़दार के निज़ाम का ख़ात्मा हो जायेगा और हज़रत महदी (अज.) अक़दार के इस निज़ाम को फ़िर से ज़िन्दा करेंगे।


हज़रत महदी (अज.) के पास पूरी फ़ौज, नासिर और मददगार हैं जैसा कि ज़ियारते ऐले यासीन में है। व जाअलनी मिन शियतिहि व इतबाअहि व अनसारिहि यानी हमको उनका शिया, ताबे और नासिर क़रार दे। कुछ रिवायात में है कि वल मुजाहिदीना बैना यदैयहि। जो यह चाहते हैं कि हज़रत के मददगार बने उनको चाहिए कि इन चार नुकात पर काम करे। और अगर कोई इनमें से एक भी काम अंजाम नही देता और दुआ करता है कि मैं उनके नासिरों में से हूँ। तो याद रख़ो यह दुआ क़बूल होने वाली नही है।


अगर रूहानी लोग इस प्रोग्राम को ले कर चलें तो तरबीयत की एक बड़ी किलास वजूद में आयेगी। तवस्सुल अपनी जगह पर एक अच्छा काम है लेकिन सिर्फ़ तवस्सुल के ज़रिए उनका शिया और ताबेअ नही बना जा सकता। बल्कि इसके लिए ज़रूरी है कि तौहीद ख़ालिस हो और दिलो जान व समाज से शिर्क दूर हो। हमें चाहिए कि अपने घरों में, पड़ोसियों में और आम लोगों के दरमियान अद्लो इंसाफ़ को क़ाइम करें, अख़लाक़ी अक़दार को ज़िन्दा रख़ें। अगर हज़रत के क़याम के मक़सद को अच्छी तरह बयान किया जाये तो यह काम समाज के रुख़ को बदल देगा। इन बुनियादी कामों के बग़ैर हज़रत के नासिरों की सफ़ों में जगह नही मिल सकती। कितना अच्छा हो अगर हज़रत की विलादत के अय्याम में कोई ऐसा काम किया जाये जिस से अवाम हज़रत के अहदाफ़ो मक़ासिद की तरफ़ मुतवज्जेह हों और उनकी राह को इख़तियार करें। और यह भी जानलो कि कुछ लोग इस फ़िक्र में हैं कि हज़रत महदी (अज.) के जश्न को गाने बजाने के ज़रिये बेराह रवी की नज़र करके खाक में मिलादें। कभी कभी दुशमन अपने मक़सद तक पहुँचने के लिए इन्ही मज़हबी तक़ारीब का सहारा लेता है जैसे मस्जिदे ज़रार कि दुश्मन मस्जिद का सहारा लेकर मस्जिद की अस्ल को ही खत्म कर देना चाहते थे। क्योंकि दुशमन इन मज़हबी अक़दार को ख़त्म कर देना चाहते हैं इस लिए ज़रूरी है कि इन मज़हबी तक़ारीब को सही तौर पर अंजाम दिया जाये ताकि इनकी तमन्ना पूरी न हो सके। उम्मीद है कि खुदा हमारी इस दुआ को हमारे हक़ में क़बूल करेगा।


अल्लाहुम्मा इजअलनी मिन आवानिहि व अनसारिहि व अतबाइहि व शियतिहि व मुजाहीदीना बैना यदैयहि।


[1] बिहारुल अनवार जिल्द 53/338


[2] सूरए हुजरात आयत न. 14


[3] तफ़्सीरे क़रतबी जिल्द 12/338


[4] बिहारुल अनवार जिल्द 52/327


[5] बिहारुल अनवार जिल्द 14/33