मजमूअऐ मक़ालाते तारीख़
 




(19) वह लोग जो पैग़म्बरे इस्लाम(स.)के ज़माने में मुनाफ़ेक़ीन की सफ़ में थे




और वह लोग जो पैग़म्बरे इस्लाम(स.)के ज़माने में मुनाफ़ेक़ीन की सफ़ में थे और हमेशा ऐसे काम अंजाम देते थे जिन से पैग़म्बरे इस्लाम (स.)का दिल रंजीदा होता था। या जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम(स.)के बाद अपने रास्ते को बदल दिया और ऐसे काम अंजाम दिये जो इस्लाम और मुसलमानों के नुक़्सान दे साबित हुए,ऐसे लोगों से मुहब्बत न की जाये। क़ुरआने करीम फ़रमाता है कि “ला तजिदु क़ौमन युमिनूना बिल्लाहि वअलयौमिल आख़िरि युआद्दूना मन हाद्दा अल्लाहा व रसूलहु व लव कानू आबाअहुम अव अबनाअहुम अव इख़वानहुम अव अशीरतहुम ऊलाइका कतबा फ़ी क़ुलूबिहिम अलईमाना” यानी तुम्हें कोई ऐसी क़ौम नही मिलेगी जो अल्लाह व आख़िरत पर ईमान लेआने के बाद अल्लाह व उसके रसूल की नाफ़रमानी करने वालों से मुब्बत करती हो,चाहे वह (नाफ़रमानी करने वाले)उनके बाप दादा,बेटे,भाई या ख़ानदान वाले ही क्य़ोँ न हो,यह वह लोग हैं जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान को लिख दिया है।
हाँ हमारा अक़ीदह यही है कि वह लोग जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.)को उनकी ज़िन्दगी में या शहादत के बाद अज़ीयतें पहुँचाईँ है क़ाबिले तारीफ़ नही हैं।
लेकिन यह हर गिज़ नही भूलना चाहिए कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के कुछ आसहाब ने इस्लाम की तरक़्क़ी की राह में में बहुत क़ुरबानियाँ दी हैं और वह अल्लाह की तरफ़ से मदह के हक़ दार क़रार पायें हैं। इसी तरह वह लोग जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के बाद इस दुनिया में आयें या जो क़ियामत तक पैदा होगें अगर वह पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के सच्चे असहाब की राह पर चले तो वह भी लायक़े तारीफ़ हैं। क़ुरआने करीम फ़रमाता है कि “अस्साबिक़ूना अलअव्वलूना मीन अलमुहाजीरीना व अलअनसारि व अल्ल़ज़ीना अत्तबऊ हुम बिएहसानिन रज़िया अल्लाहु अनहुम व रज़ू अनहु ” यानी मुहाजेरीन व अनसार में से पहली बार आगे बढ़ने वाले और वह लोग जिन्होंने उनकी नेकियों में उनकी पैरवी की अल्लाह उन से राज़ी हो गया और वह अल्लाह से राज़ी हो गये।
यह पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के असहाब के बारे में हमारे अक़ीदेह का निचौड़ है।
55- आइम्मा-ए-अहले बैत (अ.)का इल्म पैग़म्बर (स.)का इल्म है।
मुतावातिर रिवायात की बिना पर पैग़म्बरे इस्लाम (स.)ने क़ुरआन व अहलेबैत अलैहिमुस् सलाम के बारे में हमें जो हुक्म दिया हैं कि इन दोंनों के दामन से वाबस्ता रहना ताकि हिदायत पर रहो इस की बिना पर और इस बिना पर कि हम आइम्मा-ए- अहले बैत अलैहिमुस् सलाम को मासूम मानते हैं और उनके तमाम आमाल व अहादीस हमारे लिए संद व हुज्जत हैं ,इसी तरह उनकी तक़रीर भी (यानी उनके सामने कोई काम अंजाम दिया गया हो और उन्होंने उस से मना न किया हो) क़ुरआने करीम व पैग़म्बरे इस्लाम (स.)की सीरत के बाद हमारे लिए फ़िक़्ह का मंबा है।
और जब भी हम इस नुक्ते पर तवज्जोह करते हैं कि बहुत सी मोतेबर रिवायतों की बिना पर आइम्मा-ए- मासूमीन अलैहिमुस् सलाम ने फ़रमाया है कि हम जो कुछ बयान करते हैं सब कुछ पैग़म्बरे इस्लाम(स.)का बयान किया हुआ है जो हमारे बाप दादाओं के ज़रिये हम तक पहुँचा है। इस से यह बात ज़ाहिर हो जाती है कि इनकी रिवायतें पैग़म्बरे इस्लाम (स.)की रिवायतें हैं। और हम सब जानते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.)से नक़्ल की गई मौरिदे ऐतेमाद व सिक़ा शख़्स की रिवायतें तमाम उलमा-ए- इस्लाम के नज़दीक क़ाबिले क़बूल हैं।
इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने जाबिर से फ़रमाया है कि “या जाबिरु इन्ना लव कुन्ना नुहद्दिसुकुम बिरायना व हुवा अना लकुन्ना मीनल हासीकीना,व लाकिन्ना नुहद्दिसु कुम बिअहादीसा नकनिज़ुहा अन रसूलि अल्लाहि (स.)” यानी ऐ जाबिर अगर हम अपनी मर्ज़ी से हवा-ए- नफ़्स के तौर पर कोई हदीस तुम से बयान करें तो हलाक होने वालों में से हो जायेंगे। लेकिन हम तुम से वह हदीसें बयान करते हैं जो हम ने पैग़म्बरे इस्लाम (सल.)से ख़ज़ाने की तरह जमा की हैं।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की एक हदीस में मिलता है कि किसी आप से सवाल किया आपने उसको उसके सवाल का जवाब अता किया वह इमाम से अपने नज़रिये को बदलने के लिए कहने लगा और आप से बहस करने लगा तो इमाम ने उस से फ़रमाया कि इन वातों को छोड़ “मा अजबतुका फ़ीहि मिन शैइन फ़हुवा अन रसूलिल्लाहि ” यानी मैने जो जवाब तुझ को दिया है इस में बहस की गुँजाइश नही है क्योँ कि यह रसूलुल्लाह(स.)का बयान फ़रमाया हुआ है।
अहम व क़ाबिले तवज्जोह बात यह है कि हमारे पास हदीस की काफ़ी,तहज़ीब,इस्तबसार व मन ला यहज़ुरुहु अलफ़क़ीह बग़ैरह जैसी मोतबर किताबें मौजूद हैं। लेकिन इन किताबों के मोतबर होने का मतलब यह नही है कि जो रिवायतें इन में मौजूद हैं हम उन सब को क़बूल करते हैं। बल्कि इन रिवायतों को परखने के लिए हमारे पास इल्मे रिजाल की किताबें मौजूद है जिन में रावियों के तमाम हालात व सिलसिला-ए-सनद बयान किये गये हैं। हमारी नज़र में वही रिवायत क़ाबिले क़बूल है जिस की सनद में तमाम रावी क़ाबिले ऐतेमाद व सिक़ह हों। इस बिना पर अगर कोई रिवायत इन किताबों में भी हो और उसमें यह शर्तें न पाई जाती हों ते वह हमारे नज़दीक क़ाबिले क़बूल नही है।
इस के अलावा ऐसा भी मुमकिन है कि किसी रिवायत का सिलसिला-ए-सनद सही हो लेकिन हमारे बुज़ुर्ग उलमा व फ़क़ीहों ने शुरू से ही उस को नज़र अंदाज़ करते हुए उस से परहेज़ किया हो (शायद उस में कुछ और कमज़ोरियाँ देखी हों)हम ऐसी रिवायतों को “मोरज़ अन्हा ”कहते हैं और ऐसी रिवायतों का हमारे यहाँ कोई एतेबार नही है।
यहाँ से यह बात रौशन हो जाती है कि जो लोग हमारे अक़ीदों को सिर्फ़ इन किताबों में मौजूद किसी रिवायत या रिवायतों का सहारा ले कर समझने की कोशिश करते हैं,इस बात की तहक़ीक़ किये बिना कि इस रिवायत की सनद सही है या ग़लत,तो उनका यह तरीका-ए-कार ग़लत है।
दूसरे लफ़्ज़ों में इस्लाम के कुछ मशहूर फ़्रिक़ों में कुछ किताबें पाई जाती हैं जिनको सही के नाम से जाना जाता है,जिनके लिखने वालों ने इन में बयान रिवायतों के सही होने की ज़मानत ली है और दूसरे लोग भी उनको सही ही समझते हैं। लेकिन हमारे यहाँ मोतबर किताबों का मतलब यह हर गिज़ नही है,बल्कि यह वह किताबें है जिनके लिखने वाले मोरिदे एतेमाद व बरजस्ता शख़्सियत के मालिक थे,लेकिन इन में बयान की गई रिवायात का सही होना इल्मे रिजाल की किताबों में मज़कूर रावियों के हालात की तहक़ीक़ पर मुनहसिर है।
ऊपर बयान की गई बात से हमारे अक़ाअइद के बारे में उठने वाले बहुत से सवालों के जवाब ख़ुद मिल गये होगें। क्योँ कि इस तरह की ग़फ़लत के सबब हमारे अक़ाइद को तशख़ीस देने में बहुत सी ग़लतियाँ की जाती हैं।
बहर हाल क़ुरआने करीम की आयात,पैग़म्बरे इस्लाम (स.)की रिवायात के बाद आइम्मा-ए- मासूमीन अलैहिमुस् सलाम की अहादीस हमारी नज़र में मोतबर है इस शर्त के साथ कि इन अहादीस का इमामों से सादिर होने मोतबर तरीक़ों से साबित हो।
मसाइले मुतफ़र्रिक़
इस किताब के गुज़िश्ता हिस्सों में जो बहसें की गई हैं,वह उसूले दीन में हमारे अक़ीदों को रौशन करती है। हमारे अक़ीदों की कुछ और भी ख़ुसूसयात है जो हम इस हिस्से में बयान कर रहे हैं।
हुस्न व क़ुब्हे अक़ली का मसअला
हमारा अक़ीदह है कि इंसान की अक़्ल बहुत सी चीज़ों के हुस्न व क़ुब्ह (अच्छाई व बुराई )को समझती है। और यह उस ताक़त की बरकत से है जो अल्लाह ने इंसान को अच्छे और बुरे में तमीज़ करने के लिए अता की है। यहाँ तक की आसमानी शरीयत के नुज़ूल से पहले भी इंसान के लिए मसाइल का कुछ हिस्सा अक़्ल के ज़रिये रौशन था जैसे नेकी व अदालत की अच्छाई,ज़ुल्म व सितम की बुराई,अख़लाक़ी सिफ़ात जैसे सदाक़त,अमानत,शुजाअत,सख़ावत और इन्हीं के मिस्ल दूसरी सिफ़तों की अच्छाईयाँ,इसी तरह झूट,ख़ियानत,कंजूसी और इन्हीँ के मानिंद दूसरे ऐबों की बुराईयाँ वग़ैरह ऐसे मसाइल हैं जिन को इंसान की अक़्ल बहुत अच्छे तरीक़े से समझती है। अब रही यह बात कि अक़्ल तमाम चीज़ों के हुस्न व क़ुब्ह को समझने की सलाहियत नही रखती और इंसान की मालूमात महदूद है,तो इस के लिए अल्लाह ने दीन,आसमानी किताबों व पैग़म्बरों को भेजा ताकि वह इस काम को पूरा करें अक़्ल जिस चीज़ को दर्क करती है उसकी ताईद करे और अक़्ल जिन चीज़ों को समझने से आजिज़ है उनको रौशन करे।
अगर हम अक़्ल की ख़ुदमुखतारी को कुल्ली तौर पर मना करदें तो मस्ला-ए-तौहीद,खुदा शनासी,पैग़म्बरों की बेअसत व आसमानी अदयान का मफ़हूम की ख़त्म हो जाता है क्योँ कि अल्लाह के वुजूद और अम्बिया की दवत की हक़्क़ानियत का इसबात करना अक़्ल के ज़रिये ही मुमकिन है। ज़ाहिर है कि शरीअत के तमाम फ़रमान उसी वक़्त क़ाबिले क़बूल हैं जब यह दोनों मोजू (तौहीद व नबूवत)पहले अक़्ल के ज़रिये साबित हों जायें और इन दोनों मोज़ू को तनहा शरीअत के ज़रिये साबित करना नामुमकिन है।
अद्ले इलाही
इसी बिना पर हम अल्लाह के अद्ल के मोतक़िद हैं और कहते हैं कि यह मुहाल है कि अल्लाह अपने बन्दों पर ज़ुल्म करे,किसी दलील के बग़ैर किसी को सज़ा दे या माफ़ कर दे,अपने वादे को वफ़ा न करे,किसी गुनाहगार व ख़ताकार इंसान को अपनी तरफ़ से मंसबे नबूवत मंसूब करे और अपने मोजज़ात उसके इख़्तियार में दे।
और यह भी मुहाल है कि उस ने अपने जिन बन्दों को राहे सआदत तैय करने के लिए ख़ल्क़ किया है,उन को किसी राहनुमा या रहबर के बग़ैर छोड़ दे। क्योँ कि यह सब काम क़बीह (बुरे )हैं और अल्लाह के लिए बुरे काम अंजाम देना रवाँ नही हैं।
इंसान की आज़ादी
इसी बिना पर हमारा अक़ीदह यह है कि अल्लाह ने इंसान को आज़ाद पैदा किया है । इंसान अपने तमाम कामों को अपने इरादे व इख़्तेयार के साथ अंजाम देता हैं। अगर हम इंसान के कामों में जब्र के क़ाईल हो जायें तो बुरे लोगों को सज़ा देना उन पर ज़ुल्म,और नेक लोग़ों को इनआम देना एक बेहूदा काम शुमार होगा और यह काम अल्लाह की ज़ात से मुहाल है।
हम अपनी बात को कम करते हैं और सिर्फ़ यह कहते हैं कि हुस्न व क़ुब्हे अक़ली को क़बूल करना और इंसान की अक़्ल को ख़ुद मुख़्तार मानना बहुत से हक़ाइक़,उसूले दीन व शरीअत,नबूवते अम्बिया व आसमानी किताबों के क़बूल के लिए ज़रूरी है। लेकिन जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि इंसान की समझने की सलाहियत व मालूमात महदूद है लिहाज़ा सिर्फ़ अक़्ल के बल बूते पर उन तमाम हक़ाइक़ को समझना- जो उसकी सआदत व तकामुल से मरबूत हैं- मुमकिन नही है। इसी वजह से इंसान को तमाम हक़ाइक़ को समझने के लिए पैग़म्बरों व आसमानी किताबों की ज़रूरत है।
फ़िक़्ह का एक आधार अक़्ली दलील भी है
जो कुछ ऊपर बयान किया गया है उसकी बुनियाद पर हमारा अक़ीदह है कि दीने इस्लाम के असली मनाबे (आधारों)में से एक चीज़ अक़्ली दलील भी है। अक़्ली दलील से यहाँ पर यह मुराद है कि पहले अक़्ल किसी चीज़ को यक़ीनी तौर पर समझे फिर उसके बारे में फ़ैसला करे। मसलन फ़र्ज़ करो कि अगर किताब व सुन्नत में ज़ुल्म व ख़ियानत,झूट,क़त्ल,माल को चुराने व दूसरों के हक़ को पामाल करने के हराम होने के बारे में कोई दलील मौजूद न होती तो हम अक़्ल के ज़रिये इन कामों को हराम क़रार देते और यक़ीन करते कि आलिम व हकीम अल्लाह ने इन चीज़ों को हमारे लिए हराम क़रार दिया है और वह इन कामों को अंजाम देने पर हरगिज़ राज़ी नही है और यह हमारे लिए अल्लाह की एक हुज्जत होती।
क़ुरआने करीम ऐसी आयतों से पुर है जिन में अक़्ल व अक़्ली दलीलों की अहमियत को बयान किया गया है। जैसे- क़ुरआने करीम राहे तौहीद को तैय कराने के लिए साहिबाने अक़्ल व फ़हम को ज़मीन व आसमान में मौजूद अल्लाह की आयतों पर ग़ौर करने की दावत देता है “इन्ना फ़ी ख़ल्क़ि अस्सलावाति व अलअर्ज़ी व इख़्तिलाफ़ि अल्लैलि व अन्नहारि लआयातिन लिउलिल अलबाबि” यानी ज़मीन व आसमान की ख़िल्क़त और दिन व रात के बदल ने में साहिबाने अक़्ल के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं।
दूसरी तरफ़ क़ुरआने करीम आयाते इलाही को बयान करने का मक़सद इंसान के अक़्ल व फ़हम को बढ़ाना बता रहा है जैसे- “उनज़ुर कैफ़ा नुसर्रिफ़ु अलआयाति लअल्लाहुम यफ़क़हूना” यानी देखो हम आयात को किस तरह मुख़्तलिफ़ ताबीरों के साथ बयान करते हैं ताकि वह समझ जायें।
तीसरी तरफ़ क़ुरआने करीम तमाम इंसानों को नेकी व बदी में तमीज़ करने की दावत दे कर उन को ग़ौर व फ़िक्र की राह पर गामज़न कर रहा है। जैसे- “क़ुल हल यस्तवी अलआमा व अलबसीरो अफ़ला ततफ़क्करूना” यानी क्या अंधे व देखने वाले (नादान व दाना)बराबर हैं क्या तुम फ़िक्र नही करते ?
इसी तरह से क़ुरआने करीम ने सबसे बुरा उन नफ़्सों को कहा है जो न अपनी आँख,कान व ज़बान से काम लेते और नही अक़्ल को काम में लाते। जैसे-“इन्ना शर्रा अद्दवाब्बि इन्दा अल्लाहि अस्सुम्मु अलबुकमु अल्लज़ीना ला याक़िलूना ” [ यानी अल्लाह के नज़दीक बदतरीन लोग गूँगे बहरे और अक़्ल से काम न लेने वाले अफ़राद हैं।
और इसी तरह की बहुत सी आयतें हैं। लिहाज़ा इन सब के बावुजूद इस्लाम के उसूल व फ़रूअ को समझने में अक़्ल व फ़िक्र को नज़र अनदाज़ नही किया जा सकता।





(20) क़ौमों के ज़वाल के असबाब


ज़ीशान हैदर इलाहाबादी
मुक़द्दमा

काएनात में कोई भी हादिसा बग़ैर किसी मोहद्दिस के वुजूद में नही आ सकता, कोई भी मालूल बग़ैर इल्लत के अपना सफ़रे हयात शुरू नही कर सकता, इसी तरह उम्मतों का उरूज व ज़वाल भी बाज़ अवामिल की बिना पर ही पेश आता है। दुनिया की हर क़ौम का उरूज व ज़वाल असबाब व इलल का मरहूने मिन्नत है। अगर बनी इस्राईल कभी ख़ुदा के लिये एक पसंदीदा क़ौम थे तो सिर्फ़ इसलिये कि उन्होने उन असबाब को फ़राहम किया जो उरूज व कामयाबी का बाइस थे लेकिन बाद में यही क़ौम ज़िल्लत व ख़्वारी का शिकार भी हुई।

अगर क़ुरआन ने उनके अच्छे की बिना पर उन्हे (......................)(1) का लक़ब दिया तो उनकी बद आमालियों के सबब उनकी गर्दन में (.................) (2) का तौक़ भी डाल दिया ताकि ये बात तारीख़ में महफ़ूज़ हो जाये कि ख़ुदा के नज़दीक कोई भी क़ौम हसब व नसब की बिना पर बा अज़मत नही बनती बल्कि उसके आमाल उसको बुलंदियों की तरफ़ ले जाते हैं।

ख़ुदावंदे आलम ने क़ुरआने करीम में मुतअद्दिद अक़वाम का तज़किरा उनके उरूज व ज़वाल के हवाले से किया है जिसका वाज़ेह नमूना बनी इस्राईल, आद और समूद की क़ौमें हैं। काश मुसलमानों ने इन्ही क़ौमों के अंजाम से सबक़ लिया होता तो आज वह इस पस्ती का शिकार नही होता। आज मुसलमानों की हालत देखकर लगता ही नही कि ये क़ौम भी कभी तारीख़ में बाअज़मत रही होगी लोकिन तारीख़ी किताबों की वरक़ गरदानी की जाये तो मालूम होगा कि मुसलमान भी बाअज़मत और साहिबे उरूज थे उनकी अज़मत का परचम एक तरफ़ तुर्की में लहरा रहा था तो दूसरी तरफ़ मिस्र में फ़ातिमीयों की हुकूमत सारी दुनिया से अपनी अज़मत का क़सीदा पढ़वा रही थी मगर क्या आज मुसलमानों को देखकर लगता है कि कभी ये भी पूरी दुनिया पर हुकूमत करते थे। तारीख़ इस बात की गवाह है कि जो क़ौमें माज़ी के वाक़िआत से सबक़ नही लेतीं वह आइंदा आने वाली नस्लों के लिये इबरत का निशान बन जाती हैं ।

बाज़ लोगों का ख़्याल है कि सबसे पहले जिस इंसान ने अलल इजतिमा (मआशरा शिनासी) की तरफ़ मुतवज्जिह किया वह अहले सुन्नत के बेहतरीन मुअर्रिख़ इब्ने ख़लदून हैं अगर तअस्सुब की ऐनक हटा कर देखा जाये तो मालूम होगा कि क़ुरआन वह किताब है जिसने सबसे पहले इस इल्म की तालीम दी उसके बाद क़ुरआने नातिक़ हज़रत अली (अ) की ज़ाते गिरमी है जिसने इंसानियत को इस इल्म से रूशिनास कराया।

इल्मे मआशरा शिनासी का ये सरमाया सय्यद रज़ी (रह) की सई व कोशिश का नतीजा है जो हम तक पहुँचा है। हज़रत अली (अ) अपनी वसीयत में इमामे हसन से फ़रमाते हैं:

बेटा अगरचे मैंने गुज़िश्ता उम्मतों के साथ ज़िन्दगी बसर नही की लेकिन उनकी तारीख़ और उनके हालाते ज़िन्दगी का बग़ौर मुतालआ किया है गोया समझो कि मैं भी उन्ही क़ौमों का एक फ़र्द हूँ (3)

लिहाज़ा गुज़िश्ता उम्मतों की शिनाख़्त के मसले में हज़रत अली (अ) से बेहतर इंसान तारीख़ में मिलना मुश्किल है । इस मुख़्तसर से मक़ाले में क़ुरआने नातिक़ अली इब्ने अबी तालिब (अ) के कलिमात की रौशनी में उन असबाब को तलाश करने की कोशिश की गयी है कि जो किसी भी क़ौम को ज़वाल और पस्ती की तरफ़ ले जाते हैं इस सिलसिले में क़ुरआनी आयात को सिर्फ़ ताईद को तौर पर पेश किया गया है।

क़ौम क़ुरआन की निगाह में

क़ुरआन ने लफ़्ज़े क़ौम को कसरत के साथ इस्तिमाल किया है और अकसर मवारिद पर ये लफ़्ज़ गिरोह और जमाअत के माना में इस्तिमाल हुआ है (सूरह ए बक़रा आयत 56, सूरह ए माइदा आयत 20, सूरह ए अनआम आयत 78) मुम्किन है ये गिरोह व जमाअत आपस में नसबी रिश्ता रखते हों जैसे जनाबे मूसा की क़ौम, और मुम्किन है उनका आपस में कोई नसबी रिश्ता न हो जैसे जनाबे लूत जनाबे इब्राहीम के चचा ज़ाद भाई थे जो बाबुल से हिजरत करके फ़िलिस्तीन आये थे।

इस बहस का ख़ुलासा ये निकला कि क़ुरआन ने लफ़्ज़े क़ौम को उस गिरोह के लिये इस्तेमाल किया है जो अक़ीदे के लिहाज़ से मुत्तहिद हों चाहे उनका आपस में कोई नसबी रिश्ता हो या न हो।

क़ौम नहजुल बलाग़ा की निगाह में

ये लफ़्ज़ नहजुल बलग़ा में भी मुतआद्दिद मानों में इस्तेमाल हुआ है लेकिन ज़्यादा तर वह जमाआत के माना में इस्तिमाल हुआ है (................) (4) हमारी क़ौम का इरादा था कि नबी को क़त्ल कर दे (.....................) (5) बे शक मोहाजिरीन व अंसार की एक बड़ी जमाअत ने राहे ख़ुदा में अपनी जानें दीं।

इन दो मवारिद से ये बात वाज़ेह होती है कि मौला अली (अ) की निगाह में क़ौम उसी गिरोह को करते हैं जो किसी अक़ीदे या दीन में इश्तिराक रखते हों यानी उनकी वहदत का मरकज़ अक़ीदा हो या दीन। जिस तरफ़ ख़ुद क़ुरआन ने भी इशारा किया है। इस पूरी बहस का नतीजा ये निकला कि लफ़्ज़े क़ौम सिर्फ़ मुसलमानों से मख़्सूस नही है बल्कि हर उस जमाअत पर इसका इतलाक़ होता है जो किसी अक़ीदे या दीन के लिहाज़ से एक हों।

लिहाज़ा वह असबाब जो किसी क़ौम के ज़वाल का सबब बनते हैं वह सिर्फ़ मुसलमानों से मख़्सूस नही हैं बल्कि जिस क़ौम के अंदर भी ये असबाब पाये जायें वह क़ौम ज़वाल पज़ीर होकर रहेगी फिर चाहे वह क़ौमे बनी इस्राईल हो ख़्वाह समूद और आद हो या मुसलमान।

ज़ैल में ज़वाल के जो असबाब बयान हो रहे हैं वह तमाम क़ौमों के लिये मुशतरक हैं। लेकिन चूँकि ये असबाब क़ुरआन व नहजुल बलाग़ा में बयान हुये हैं लिहाज़ा ज़्यादा मुनासिब होगा कि वह इन असबाब से इजतिनाब करें ताकि वह एक बाआज़मत और सर बुलंद क़ौम बनकर दुनिया में ज़िन्दगी गुज़ार सकें। वह असबाब ये हैं :

ज़वाल के असबाब

1. ना फ़रमानी: ख़ुदावंदे आलम ने हर उम्मत के लिये एक हादी व रहबर का इंतेज़ाम किया है कोई भी समाज रहबर के वुजूद से ख़ाली नही है चाहे वह रहबर नेक हो या फ़सिक़ व फ़जिर (5) और जिस चीज़ से इंमाम व उम्मत के दरमियान राबता पैदा होता है उसको इताअत कहते हैं । रहबर और इमाम की ज़िम्मेदारी है कि वह क़ौम से तफ़रिक़ा और इख़्तिलाफ़ को ख़त्म करे और ये इख़्तेलाफ़ रहबर व इमाम की इताअत के ज़रिये ख़त्म हो सकता है। इसी लिये जिस क़ौम में इमाम व रहबर की इताअत नही होती उस क़ौम के ज़वाल और तनज़्ज़ुली को कोई भी नही रोक सकता है बल्कि बसा औक़ात उस क़ौम की नाफ़रमानी को देखकर ख़ुद उस क़ौम का रहबर ही अपनी क़ौम की नाबूदी और ज़वाल की पेशीनगोई करता है जैसा कि हज़रत अली (अ) ने फ़रमाया : (..................................) (6) “ख़ुदा की क़सम मेरा ख़्याल ये है कि अनक़रीब ये लोग तुमसे इक़तेदार छीन लेगें इसलिये कि वह अपने बातिल पेशवा की इताअत करते हैं जबकि तुम अपने इमामे बरहक़ की नाफ़रमानी करते हो। ”

इसी बात को मौला अली (अ) ने किसी दूसरे मक़ाम पर यूँ इरशाद फरमाया: बेशक शफ़ीक़, मेहरबान नासेह और तजरुबे कार आलिम की मुख़ालिफ़त और नाफ़रमानी हमेशा बाईसे हसरत और नदामत हुआ करती है। (7)

2. ज़ुल्म व जौर: क़ौमों की तबाही में ज़ुल्म का अहम किरदार रहा है चुनान्चे कहा जाता है कि हुकूमत की हयात कुफ़्र के साथ तो मुम्किन है लेकिन ज़ुल्म के साथ उसकी बक़ा ना मुम्किन है। अमीरल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ) की नज़र में हुकूमत के ज़वाल में सबसे अहम किरदार ज़ुल्म का है जिसकी तरफ़ मौला ने बार बार इशारा भी किया है, आप फ़रमाते हैं:

(........................) (8) “ज़ुल्म ज़ालिम को मुतज़लज़िल, नेमतों को सल्ब और उम्मतों को हलाक कर देता है। ”

क़ुरआन का साफ़ एलान है:

(............................) (9) हम किसी बस्ती को तबाह करने वाले नही हैं मगर ये कि उसके रहने वाले ज़ालिम हों।

गोया क़ुरआन की निगाह में भी क़ौमों की हलाकत का अहम सबब ज़ुल्म है और ज़ुल्म के ज़रिये हासिल होने वाली किसी भी चीज़ में दवाम नही होता इसी लिये मौला ए काएनात (अ) फ़रमाते हैं “अगर मुझे हफ़्त अक़लीम की हुकूमत सिर्फ़ इस बात पर दी जाये कि मैं चीँटी के मुंह से दाना छीन लूँ तो मैं हरगिज़ ऐसा नही कर सकता ” (10)

3. तफ़रिक़ा व इख़्तिलाफ़: इसके मुक़ाबिल जो लफ़्ज़ है वह वहदत की लफ़्ज़ है वहदत यानी सारे अफ़राद का किसी एक नुक्त ए इशतेराक पर जमा हो जाना। क़ुरआन ने शिद्दत से मुसलमानों को तफ़रिक़ा और इख़्तिलाफ़ से मना किया है और इसके आसारे शूम की तरफ़ इंसान को मुतबज्जेह किया है (.......................) (11) अल्लाह व रसूल की इताअत करो और आपस में इख़्तिलाफ़ न करो कि कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा बिगड़ जायेगी। मरहूम राग़िब इस्फ़हानी ने कल्म ए रीह को ग़लबे के माना में इस्तेमाल किया है।

गोया अगर आपस में निज़ा किया तो इसका नुक़सान यो होगा कि तुम हर मैदान में वग़लूब होते नज़र आओगे। मौला अली (अ) ने भी अपने असहाब को इसी अहम नुक्ते की तरफ़ तवज्जोह दिलाई है: (.......................) (12) “ख़ुदा की क़सम मुझे यक़ीन है कि अन्क़रीब हुकूमत तुमसे छीन ली जायेगी इसलिये कि बातिल परस्त अपने बातिल पर मुत्तहिद हैं लेकिन तुम लोग हक़ पर भी मुत्तहिद नही हो। ”

मौला के इस कलाम से ये बात वाज़ेह हो जाती है कि तफ़रिक़ा व इख़्तेलाफ़ का नुक़सान कुफ़्र व ईमान की सरहदों से मावरा है इसी लिये मौला ने फ़रमाया:

वह बातिल पर भी रहकर कामयाब हैं क्योकि वह मुत्तहिद हैं औऱ तुम लोग हक़ पर रहकर भी शिकस्त से दो चार हो क्योकि तुम लोग तफ़रिक़ा और इख़्तेलाफ़ के शिकार हो।

आप इसी नुक्ते को दूसरे ख़ुत्बे में यूँ बयान फ़रमाते हैं:

(.............................) (13) “ये लोग अपने बातिल पर जमा हैं और तुम अपने हक़ पर भी मुत्तहिद नही हो।”

स्पेन में मुसलमानो ने तक़रीबन आठ सौ साल हुकूमत की लेकिन जब उनके अंदर तफ़रक़े का मर्ज़ पैदा हो गया तो आहिस्ता आहिस्ता उनकी हुकूमत जाती रही। ज़रा सोचिये! जिस मुल्क में मुसलमानों की तूती बोलती हो आज उसी स्पेन में मुसलमान ख़ौफ़ व हिरास की ज़िन्दगी गुज़ार रहा है?!

4. तर्के जिहाद : जिहाद का तर्क करना भी क़ौमों के ज़वाल का एक अहम सबब है नहजुल बलाग़ा में मुतअद्दिद मक़ामात पर मौला ने मुसलमानो की सरज़निश सिर्फ़ इस बात पर की है कि तुमने जिहाद जैसे अज़ीम फ़रीज़े को तर्क कर दिया है जिसके चंद नमूने बतौरे शाहिद पेश कर रहे हैं:

1. (.......................) (14) “जो भी जिहाद से एराज़ करते हुये उसे तर्क करेगा ख़ुदा उसे ज़िल्लत का लिबास पहना देगा और उसको मुसीबत में मुब्तला कर देगा। ”

2. (........................) (15) मैने तुम लोगों को जिहाद के लिये आमादा किया मगर तुम लोग न उठे, हक़ की वाज़ व नसीहत की तो तुमने न सुना। अलल ऐलान और ख़ुफ़िया तौर से दावत दी लेकिन तुमने जवाब न दिया।

3. (...........................) (16) “ऐ मर्दों की शक्ल व सीरत वालों और वाक़ेअन नामर्दों मेरी दिली ख़्वाहिश थी कि मै तुमको न देखता और तुमसे मुताअर्रिफ़ न होता .... ख़ुदा तुमको ग़ारत करे। ”

4. (............................) (17) मैने इस क़ौम को ऐलानिया और मख़फ़ी तौर पर दावत दी मगर उन्होने सुस्ती और काहिली का मुज़ाहिरा किया जिसके नतीजे में दुश्मन उनकी ज़मीनों पर क़ाबिज़ होता गया।

इन ताबीरात से बख़ूबी ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मौला अली (अ) की निगाह में तर्के जिहाद कितना बड़ा जुर्म है।

5. ख़यानत: इंसान की सबसे बड़ी फ़ज़ीलत ये है कि वह अल्लाह का अमीन है (.........................) (18) “बेशक हमने अमानत को आसमान व ज़मीन और पहाड़ सबके सामने पेश किया और सबने उसके उठाने से इंकार किया और ख़ौफ़ ज़ाहिर किया, बस इंसान ने उस बोझ को उठा लिया। ”

क़ुरआने करीम ने अमानत क़ुबूल करने को एक मुसबत सिफ़त के तौर पर बयान किया है। इसके बरअकस ख़यानत एक बुरी सिफ़त है। ख़यानत का असर सिर्फ़ इंसान के अख़लाक़ पर नही पड़ता बल्कि पूरे मआशरे पर पड़ता है।

हज़रत अली (अ) अपने असहाब के बारे में फ़रमाते हैं: (....................) (19) “ये अपने मालिक की अमानत उसके हवाले कर देते हैं और तुम ख़यानत करते हो। ”

हज़रत अली (अ) बाज़ लोगों की ख़यानत के बारे में यूँ फ़रमाते हैं: (......................) (20) “अगर मैं तुम में से किसी को एक लकड़ी के प्याले का भी अमीन बनाऊँ तो डर है कि कहीं वह उसे भी लेकर भाग न जाये।”

जिस क़ौम की ख़यानत इस हद तक पहुँच जाये तो उसका ज़वाल यक़ीनी है। तारीख़ शाहिद है कि एक फ़र्द की ख़यानत पूरी क़ौम पर असर अंदाज़ होती है जिसकी वाज़ेह मिसाल अशअस बिने क़ैस है जिसने अपनी क़ौम के साथ ख़यानत की और क़िले का दरवाज़ा खोलकर पूरी क़ौम को दुश्मन फौज के हवाले कर दिया इसी बिना पर उसका लक़ब उरफ़ुन नार पड़ गया।

ये वह अहम असबाब हैं जिनकी बिना पर क़ौमों पर ज़वाल आता है इसके अलावा दूसरे असबाब भी हैं जैसे दुनिया परस्ती, फ़क़्र व तंगदस्ती और जेहालत वग़ैरा मगर इनका तज़किरा इस मुख़्तसर से मक़ाले में मुम्किन नही है।

नतीज ए बहस

1. लफ़्ज़े क़ौम का इतलाक़ ऐसी जमाअत पर होता है जो हसब, नसब में मुत्तहिद हों या उनका दीन मुशतरक हो।

2.ज़वाल के असबाब का असर हतमी है क्योकि असबाब इल्लत और ज़वाल मालूल है और इल्लत की मौजूदगी से मालूल का वुजूद यक़ीनी होता है।

3. इन असबाब के असरात किसी ख़ास क़ौम से मख़्सूस नही हैं बल्कि जिस क़ौम में भी ये असबाब पाये जायेगें उस क़ौम का ज़वाल यक़ीनी है चाहे वह क़ौम यहूदी हो या ईसाई या कोई और क़ौम !।

हवालाजात

1. सूर ए बक़रा आयत 47

2. सूर ए बक़रा आयत 61

3. नहजुल बलाग़ा नामा 31

4. नहजुल बलाग़ा बलाग़ा नामा 28 और 29

5. नहजुल बलाग़ा बलाग़ा ख़ुतबा 64

6. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 25

7. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 35

8. मीज़ानुल हिकमा जिल्द 5 पेज 595

9. सूर ए क़सस आयत 59

10. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 234

11. सूर ए अनफ़ाल आयत 46

12. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 25

13. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 27

14. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 27

15. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 97

16. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 27

17. ख़ुतबा 27 से इक़तिबास

18. सूर ए अहज़ाब आयत 72

19. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 25

20. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 35