मजमूअऐ मक़ालाते तारीख़
 




(17) हज़रत ख़दीजा (स) बुज़ुर्गों की ज़बानी


अगर हम बुज़ुर्गाने इस्लाम के अक़वाल हज़रत ख़दीजा (स) के बारे में नक़्ल करने की कोशिश करें तो यह बात इस किताब की गुंजाईश से बाहर है। अलबत्ता बाज़ असहाबे सीरत और सवानेहे निगारों के अक़वाल की तरफ़ इशारा करना ज़रुरी है।



1. इब्ने हेशाम अपनी मशहूर किताब अस सीरतुन नबविया में लिखते हैं कि हज़रत ख़दीजा (स) सिलसिल ए नसब में सबसे आली, शराफ़त में सबसे शरीफ़, माल व दौलत के ऐतेबार से दूसरों से ज़्यादा दौलत मंद, क़ुरैश की औरतों में सबसे ज़्यादा अमानतदार, हुस्ने ख़ुल्क़ में सबसे ज़्यादा ख़ुश अख़लाक़, इफ़्फ़त व करामत में सबसे ज़्यादा अफ़ीफ़ थीं, लिहाज़ा शराफ़त की उन बुलंदियों की मालिका हैं। जहाँ तक दूसरों की रसाई नही।

2.
अहले सुन्नत के उलामा ए रेजाल में से ज़हबी लिखते हैं कि हज़रत ख़दीजा (स) जन्नत की ख़्वातीन की सरदार, अक़ील ए क़ुरैश, क़बील ए असद की फ़र्द, निहायत जलीलुल क़द्र, दीनदार, पाक दामन व बुज़ुर्ग शख़्सियत की हामिल थीं और कमाल की आख़िरी मंज़िल पर फ़ायज़ थीं।

3. इब्ने हजरे असक़लानी लिखते हैं कि हज़रत ख़दीजा (स) ने बेसत के आग़ाज़ में ही पैग़म्बरे इस्लाम (स) की रिसालत की गवाही देकर दुनिया वालों के लिये अपने सबाते क़दम, यक़ीने कामिल, अक़्ल सलीम और अज़मे रासिख़ को नमूना क़रार दिया है।

4. सुहैली इस सिलसिले में लिखते हैं कि हज़रत ख़दीजा (स) ख़्वातीने क़ुरैश की सरदार थी। दौरे जाहिलियत व इस्लाम दोनों में आपको ताहिरा के लक़ब से याद किया जाता था।


हज़रत ख़दीजा (स) तारीख़ के अदवार में



पूरी तारीख़ में तारीख़ लिखने वाले (इतिहासकार) ज़ोर ज़बरदस्ती और चापलूसी का शिकार रहे हैं। इसी वजह से तारीख़ के मुसल्लम हक़ायक़ तहरीफ़ से दोचार हुए और इस तरह उन्होने अपना असली रुप खो दिया या अब अगर कोई मुहक़्क़िक़ तारीख़ की असली हक़ीक़त को बयान करने की कोशिश करे तो सब के लिये ताज्जुब का मक़ाम बन जाता है। दौरे हाज़िर में एक मुहक़्क़िक़ ने क़ातेअ (मज़बूत) दलीलों के ज़रिये ग़ारे सौर में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के साथी, अब्दुल्लाह बिन ओरैयकज़ बिन बकर को साबित किया है। उसने हक़ीक़त को यूँ बयान किया है कि मुआविया के दौर में पैसे के लालच में दास्ताने ग़ार को जअल किया गया है और अब्दुल्लाह की जगह दूसरे शख़्स का नाम लिख दिया गया है।[4] उसने साबित किया है कि इस जुमले को ....... मुआविया के मानने वालों ने जअल किया है। लिहाज़ा अगर क़ुरैश की दोशिज़ा, हज़रत ख़दीजा (स) को चालीस साला ख़ातून और साहिबे औलाद बताया जाये तो ताज्जुब नही करना चाहिये। इसी तरह अगर हज़रत अली (अ) को बक़िया ख़ुलफ़ा की शक्ल में सियासी रक़ीब बनाया जाये तो भी ताज्जुब का मक़ाम नही है बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने हज़रत अली (अ) की ख़ुसूसियात को शुमार करते हुए फ़रमाया है कि ऐ अली, आप ऐसी तीन ख़ुसूसियात के मालिक हैं जो दूसरे किसी के पास नही है, यहाँ तक कि मैं भी उन से महरुम हूँ।


1. तुम्हे मुझ जैसा ससुर मिला है जिससे में महरुम हूँ।

2. तुम्हे फ़ातेमा जैसी हम रुतबा बीवी मिली है जिससे मैं महरुम हूँ।

3. हसन व हुसैन (अ) जैसे बेटे तुम्हारे सुल्ब से हैं जिससे मैं महरुम हूँ।[6]



अब अगर पैग़म्बरे इस्लाम (स) के यहाँ फ़ातेमा (स) के अलावा कोई और बेटी तो उसका शौहर भी अली (अ) के मानिन्द होता जबकि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने ख़ुद इस बात की नहयी की है। मुहद्देसीन (हदीसकारों) के मुताबिक़ हज़रत ख़दीजा (स) की शादी जब पैग़म्बरे इस्लाम (स) से हुई तो आप कुँवारी थीं, बाज़ का हम यहाँ पर ज़िक्र लाज़िम समझते हैं:



1. सैयद मुर्तज़ा अलमुल हुदा ने अपनी किताब अश शाफ़ी फ़िल इमामह में इस बात का ज़िक्र किया है।

2.
शेख़ तूसी ने अपनी किताब तलख़ीशुश शाफ़ी में इसे लिखा है।

3. बलाज़री ने अपनी किताब अनसाबुल अशराफ़ में इस का तज़किरा किया है।[7]

4. अबुल क़ासिम कूफ़ी ने अपनी किताब अलइसतेग़ासा फ़ी बदइस सलासा में इसे लिखा है। बहुत से इतिहासकारों और हदीसकारों ने इस बात को इन किताबों से नक़्ल किया है[8] और इस नुक्ते पर ताकीद की है कि हज़रत ख़दीजा (स) की उमरे मुबारक शादी के वक़्त 25 या 28 साल थी और वह क़ुँवारी थी। ज़ैनब, रुक़य्या और उम्मे कुलसूम हज़रत ख़दीजा की बहन हाला की बेटियाँ थी जो आप की सर परस्ती और किफ़ालत में ज़िन्दगी बसर कर रही थीं। इब्ने अब्बास से बहुत से इतिहासकारों और हदीसकारों ने नक़्ल किया है कि हज़रत ख़दीजा (स) की शादी जब पैग़म्बरे अकरम (स) से हुई तो उस वक़्त आप की उम्र 28 साल थी।


अख़तब ख़्वारिज़्म ने सिलसिल ए सनद को बयान करते हुए मुहम्मद बिन इसलाक़ से नक़्ल किया है कि हज़रत ख़दीजा (स) की उम्र पैग़म्बरे इस्लाम (स) से शादी के वक़्त 28 साल थी। बाज़ इतिहासकार और जीवनी लेखकों के मुताबिक़ हज़रत ख़दीजा (स) की उमरे मुबारक, पैग़म्बरे अकरम (स) से शादी के वक़्त 25 या 28 साल थी। मरहूम आयतुल्लाह शिराज़ी लिखते हैं कि हज़रत ख़दीजा (स) दोशिज़ा (कुँवारी) थीं और हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा (स) से अक़्द के शौक़ में तमाम अशराफ़े क़ुरैश को ना में जबाव दे चुकी थी।[11]


दौरे हाज़िर के मुहक़्क़ेकीन में से अल्लामा दख़ील ने इस बात की ताईद करते हुए बयान किया है कि हज़रत ख़दीजा (स) के दोशिज़ा (कुँवारी) होने की ताईद किताब अल अनवार वल बिदअ ने भी की है वह लिखते हैं कि रुक़य्या व ज़ैनब हज़रत ख़दीजा (स) की बहन हाला की बेटियाँ थीं।[12]


मरहूम अल्लामा मोहसिन अमीन आमुली ने भी अपनी किताब आयानुश शिया में वाज़ेह तारीख़ी दलीलों के ज़रिये से साबित किया है कि ज़ैनब व रुक़य्या पैग़म्बरे इस्लाम (स) की बेटियाँ नही थीं। दौरे हाज़िर के मुहक़्क़िक़ जनाब जाफ़र मुर्तज़ा आमुली ने मुतअद्दिद शवाहिद से साबित किया है कि हज़रत ख़दीजा (स) पैग़म्बरे अकरम (स) के साथ शादी से क़ब्ल दोशिया (कुँवारी) थीं। हैरत अंगेज़ बात यह है कि वह मुजरिम हाथ जिन्होने हज़रत ख़दीजा (स) के लिये जाली फ़रज़ंद और शौहर बनाने की कोशिश की वहीं दूसरे अफ़राद के लिये जो किसी तरह की कोई फ़ज़ीलत नही रखते हैं उन के लिये तहरीफ़ व मन घढ़त फ़ज़ालय में वहाँ तक पहुच गये कि तमाम हुस्न व जमाल को उन के लिये जअल करके उन्हे कल्लिम्नी या हुमैरा की मंज़िल तक पहुचा दिया जबकि इतिहासकारों ने इब्ने अब्बास के जुमले को जो उन्होने जंगे जमल में आयशा से मुख़ातब हो कर फ़रमाया था। जिसे तारीख़ ने इस तरह लिखा है कि ''लसता बे अजमलेहिन्ना''। पैग़म्बरे इस्लाम (स) की अज़वाज (बीवियाँ) में तुम सबसे बेहतर व हसीन व जमील न थीं और वसी ए पैग़म्बर (स) के ख़िलाफ़ ग़ज़ब की आग भड़का कर जंग के लिये आमादा हो गई हो।

सारे इतिहासकारों की नज़र में हज़रत ख़दीजा (स) हिजाज़ की सबसे हसीन मलिका थीं, हज़रत इमाम हसन (अ) मज़हरे जमाल होने के बावजूद अपने आप को अहले बैत (अ) में हज़रत ख़दीजा (स) की शबीह समझते थे। नफ़्से ज़किय्या के वालिदे माजिद हज़रत अब्दुल्लाह से सवाल किया गया कि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) दंदाने (दाँत) मुबारक ख़ूबसूरत और चमकदार क्यों थे? आपके दाँतों की चमक से लोग आपके गिरविदा बन जाते थे। अब्दुल्लाह ने जवाब दिया कि इस की वजह मालूम नही लेकिन हज़रत ख़दीजा (स) के बारे में जानता हूँ कि वह ऐसे हुस्न की मालिका थीं और हज़रत ज़हरा (स) ने उसको अपनी वालिदा से विरासत में हासिल किया था।[14]




सबसे पहली मुस्लिम ख़ातून

हर दौर में अब तक सैंकड़ों की तादाद में ख़्वातीन दीने इस्लाम से मुशर्रफ़ होकर फ़ज़ायल व मनाक़िब के बाब खोलने में कामयाब हुई हैं और जहाने इस्लाम के लिये बाइसे इफ़्तेख़ार बनी हैं लेकिन हज़रत ख़दीजा (स) का नाम सरे फेहरिस्त, सबसे पहली ख़ातून के उनवान से तारीख़ के सफ़हात पर सुनहरे क़लम से लिखा नज़र आता है। बेसते पैग़म्बरे इस्लाम (स) से क़ब्ल हज़रत ख़दीजा (स) अपने जद्दे बुज़ुर्गवार हज़रत इब्राहीम (अ) के दीन की पैरव थीं दूसरे लफ़्ज़ों में कहा जा सकता है कि दीने हनीफ़ की पैरों थीं। पैग़म्बरे इस्लाम (स) की बेसत के पहले दिन आपने आपके दीन के सामने तसलीम होने का ऐलान कर दिया जैसा कि एक हदीस में मिलता है कि मर्दों में सबसे पहले पैग़म्बरे इस्लाम (स) पर ईमान लाने वाले हज़रत अली (अ) और औरतों में हज़रत खदीजा (स) थीं। एक मरतबा एक यहूदी आलिम ने अमीने क़ुरैश (पैग़म्बर (स)) को हज़रत ख़दीजा (स) के घर देखा तो हज़रत खदीजा (स) से अर्ज़ करने लगा कि ऐ ख़दीजा, यह वही पैग़म्बरे मौऊद है जिसकी ख़ुसूसियात को मैंने तौरेत में पढ़ा है कि क़ुरैश की ख़्वातीन की सरदार उससे शादी करेगी। शायद यह शरफ़ आपको नसीब हो।

शाम के एक तिजारती सफ़र में पैग़म्बरे इस्लाम (स) से मुतअद्दिद गै़र मामूली उमूर मुशाहेदे में आए। उस की एक एक ख़बर हज़रत ख़दीजा (स) के ख़िदमत में पहुचाई गई जिसके नतीजे में आप पैग़म्बर (स) पर फ़िदा हो गई।[18] हज़रत खदीजा (स) के चचाज़ाद भाई वरक़ा बिन नौफ़ल ने भी इस काम में आपकी रहनुमाई की और कहने लगें कि ख़ुदा की क़सम वह ऐसा नबी है जिसकी बेसत के हम सब मुन्तज़िर हैं। वरक़ा बिन नौफ़ल ऐसी शख़्सियत थीं जो बुत परस्ती से बर सरे पैकार रही। और हज़रत ख़दीजा (स) के लिये पैग़म्बरे इस्लाम (स) की मुहब्बत का बाइस बनी। जब पैग़म्बर अकरम (स) ग़ारे हिरा से बेसत के पहले दिन मंसबे रिसालत के साथ आ रहे थे तो ख़्वातीन क़ुरैश की सरदार हज़रत ख़दीजा (स) आपके इस्तिक़बाल में बढ़ीं और अर्ज़ करने लगीं कि यह नूर कैसा है जो आपकी पेशानी ए मुबारक पर नज़र आ रहा है? आप (स) ने फ़रमाया कि यह नूर नबुव्वत का है। फिर पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अरकाने इस्लाम हज़रत ख़दीजा (स) के ख़िदमत में बयान किये तो हज़रत ख़दीजा (स) बे साख़्ता कहने लगीं: ''आमनतो व सद्दक़तो व रज़ियतो व सल्लमतो'' मैं ईमान ले आई आपके नबी होने की तसदीक़ कर रही हूँ, इस्लाम के आईन से राज़ी हूँ और उसके सामने तसलीम हूँ।

[1] . ज़हबी, सीर ए आलामुन नुबला जिल्द 2 पेज 109

[2] . इब्ने हजर, फ़तहुल बारी जिल्द 7 पेज 134

[3] . सुहैली, अर रौज़ुल अन्फ़ जिल्द 1 पेज 215

[4] . नजाह ताई, यारे ग़ार पेज 61, नजाह ताई साहिबुल ग़ार पेज 79

[5] . नजाह ताई, सीरतुल इमाम अमीरिल मोमिनीन जिल्द 7 पेज 173


[6] . काज़ी शूसतरी, अहक़ाक़ुल हक़ जिल्द 5 पेज 74

[7] . बलाज़री, अनसाबुल अशराफ जिल्द1 पेज 98

[8] . शहरे इब्ने आशोब मनाक़िबे आले अबी तालिब जिल्द 1 पेज 160, अल्लामा मजलिसी, बिहारुल अनवार जिल्द 22 पेज 191, रियाहिनुश शरीयह जिल्द 2 पेज 269

[9] . इब्ने सअद, अत तबक़ातुल कुबरा जिल्द 8 पेज 17, ज़हबी सीरए आलामुन नुबला जिल्द 2 पेज 111

[10] . बलाज़री, अनसाबुल अशराफ़ जिल्द 1 पेज 108, दयार बकरी, तारीख़ुल ख़मीस जिल्द 2 पेज 264, इब्ने कसीर, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 2 पेज 295, हलबी, अनसानुस उयून जिल्द 1 पेज 140

[11] . सैयद मुहम्मद शीराज़ी, उम्माहातुल मोमिनीन पेज 90

[12] . अल्लामा मुहम्मद अली दख़ील, उम्मुल मोमिनीन ख़दीजा (स) बिनते ख़ुवैलद पेज 11

[13] . आमोली, बनातुन नबी अम रबायबोह पेज 75

[14] . तबरी, दलायलुल इमामह पेज 151

[15] . आयशा बिन्तुश शाती, मौसूआतो आलिन नबी (स) पेज 230

[16] . शेख़ तूसी, अल अमाली, पेज 259, मजलिस 10 हदीस 467

[17] . अल्लामा मजलिसी, बिहारुल अनवार जिल्द 16 पेज 20

[18] . अल्लामा मजलिसी, बिहारुल अनवार जिल्द 16 पेज 35, 50

[19] . दख़ील, उम्मुल मोमिनीन ख़दीजा (स) पेज 41

[20] . इब्ने हेशाम, अस सीरतुन नबविया जिल्द 1 पेज 222

[21] . अल्लामा मजलिसी, बिहारुल अनवार जिल्द 16 पेज 21

[22] . अल्लामा मजलिसी, बिहारुल अनवार जिल्द 18 पेज 232


(18) मुहाफ़िज़ इमामत हज़रत जै़नबे कुबरा सलामुल्लाह अलैहा

सैयद हैदर अब्बास रिज़वी

इमाम यानी ज़मीन पर ख़ुदा का ख़लीफ़ा, सारे मौजूदात की हयात और पूरी कायनात का सुकून वुजूदे इमाम से बर क़रार है। वह ज़ैनब (स) जो ख़ानदाने इमामत में पली हो और मकतबे अली (अ) में तरबीयत पाई हो, वह इमामत की बुलंदी और मंसब की अज़मत से ख़ूब वाक़िफ़ और इमाम के बारे में अपने फ़रायज़ से कमा हक़्क़हू बा ख़बर है। इन बातों पर तारीख़ गवाह है। आप अपने वालिद हज़रत अली (अ) की ज़िन्दगी में कतए नज़र इस से कि आप अली (अ) की बेटी हैं, बाप के अहकाम व दस्तूर पर अमल करना अपना फ़र्ज़ समझती थीं बल्कि इमाम हसन (अ) के ज़माने में आप की यही रविश और तरीक़ ए कार था और तारीख़े करबला में हज़रत ज़ैनब (स) ने अपने भाई जो हामिले मंसबे इमामत थे। किस तरह उन की इताअत की है यह बिल्कुल वाज़ेह है। भाई की शहादत के बाद मंसबे इमामत भाई की यादगार हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) को मिला और हज़रत ज़ैनब उस मौक़े पर बच्चों और हरमे हुसैनी की सर परस्त भी हैं। हज़रत सज्जाद (अ) आप के इमाम और पेशवा हैं। हज़रत ज़ैनब इमाम की इज़ाज़त के बग़ैर कोई काम अंजाम नही देतीं। अब आप की ज़िम्मेदारी पहले से ज़्यादा संगीन और मुश्किल है। अब हज़रत ज़ैनब इमाम की हिफ़ाज़त की भी ज़िम्मेदार हैं और इसी तरह इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) को मौत से निजात दिलाने में ज़ैनबे कुबरा (स) की जाफ़ेशानी मक़ातिल में मौजूद है।

करबला के ख़ूनीन क़याम का मरहला इमाम हुसैन (अ) की शहादत पर ख़त्म हो गया। अब करबला के सहरा में इमाम हुसैन (अ) और उन के आईज़्ज़ा व अक़रबा के बदन टुकड़े टुकड़े पड़े हैं। ख़ैमों में आग लगा दी गई है ग़मज़दा और शिकस्ता दिल औरतों और बच्चों को खु़दा के अलावा किसी से तवक़्क़ों नही है, अगर कुछ सहारा है तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) से हैं।

शिमरे लईन अपनी पियादा फ़ौज के साथ आया और आने के बाद वह चाह रहा था कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) को शहीद कर दे कि इतने में हज़रत ज़ैनब (स) ने बढ़ कर कहा कि यह मेरे दम से ज़िन्दा है, पहले मुझे क़त्ल करो, उस के बाद इन्हे क़त्ल करना। अज़्मे हज़रत ज़ैनब (स) देख कर शिम्र को अपना इरादा बदलना पड़ा।
(नफ़सुल महमूम पेज 379)

गयारहवी मुहर्रम को तमाम असीरों को ऊटों की नंगी पीठ पर सवार किया गया और उस क़ाफ़िले को मक़तल की तरफ़ ले जाने लगे। जब क़ाफ़िला क़त्लगाह में पहुचा तो सवारियों ने बे इख़्तियार ख़ुद को ज़मीने करबला पर गिरा दिया। जैनब (स) ने लाशे हुसैन (अ) पर पहुच कर इस दर्द भरे अंदाज़ में गिरया व नाला किया कि दोस्त व दुश्मन सब मुँह फेर कर रोने लगे। उसके बावजूद हज़रत ज़ैनब (स) अपने फ़रायज़ से ग़ाफ़िल नही रहीं। एक मर्तबा जनाबे ज़ैनब (स) की नज़र इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) पर पड़ी तो आप इमाम सज्जाद (अ) के पास आयीं और फ़रमाया कि मैं आप को किस हालत में देख रही हूँ?। कहीं ऐसा न हो कि रूह कफ़से उन्सुरी से परवाज़ कर जाये। इमाम (अ) ने आवाज़ दी: ऐ फ़ूफ़ी जान, मैं क्यूँ कर बेताब न हूँ जब कि मैं अपने बाबा, भाईयों, चचाओं और चचाज़ाद भाईयों को ख़ाक़ व खून में ग़लताँ ज़मीन पर पड़ा देख रहा हूँ। उन्हे न किसी ने कफ़न दिया है और न ही दफ़्न किया है, क्या यह मुसलमान नही है?।
(दमउस सुजूम पेज 210)

जनाबे ज़ैनब (स) करबला के मैदान में शहीदों की लाशों के दरमियान इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) से एक रिवायत बयान करती हैं कि ऐ मेरे भतीजे, इसी जगह जहाँ तुम अपने बाबा हुसैन (अ) की लाश को बे कफ़न देख रहे हो। यह भी एक दिन दफ़्न होगें और इसी मक़ाम पर इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र का तवाफ़ होगा।
(हमास ए हुसैनी जिल्द 1 पेज 335)

जनाबे ज़ैनब (स) की पेशिनगोई, जो आप के जद की पेशिनगोई थी वह पूरी हुई। आज भी मरक़दे इमाम हुसैन (अ) हुर्रियत पसंद और अदालत ख़्वाह इंसानों का मताफ़ और मलाएका के नुज़ूल का मक़ाम है।

जनाबे ज़ैनब (स) को इस लुटे हुए क़ाफ़िले की सर परस्ती करते हुए अपने भतीजे की हिफ़ाज़त का ख़्याल रखना ज़रूरी है और यही ज़ैनब (स) की सब से अहम ज़िम्मेदारी है। जब यह क़ाफ़िला कुफ़े पहुचा तो कुफ़ा तमाशाईयों से पूर था, कूफ़े के बाज़ार में जनाबे ज़ैनब (स) ने इस तरह ख़ुतबा दिया कि सब के अफ़कार में एक अज़ीम इंक़ेलाब पैदा कर दिया। तारीख़ की बाज़ किताबों में नक़्ल हुआ है कि हज़रत ज़ैनब (स) के बाद जनाबे उम्मे कुलसूम (स) ने भी अपने ख़ुतबे में कुफ़े वालों की सरज़निश की।
(मुनतहल आमाल जिल्द 1 पेज 486)

जब असीरों को इब्ने ज़ियाद लईन के दरबार में लाया गया तो सानी ए ज़हरा (स) एक गोशे में बैठ जाती हैं और अहले बैते अतहार की दूसरी औरतें आप के गिर्द जमा हो जाती हैं। इब्ने ज़ियाद मलऊन पूछता है कि यह औरत कौन है जो अपनी कनीज़ों के साथ एक गोशे में बैठी है? हज़रत ज़ैनब (स) ने कोई जवाब व दिया। इब्ने ज़ियाद लईन ने दो तीन बार यही सवाल दोहराया। असीरों में से किसी ने कहा यह रसूल (स) की नवासी, फ़ातेमा ज़हरा (स) की लाडली हज़रत ज़ैनबे उलिया मक़ाम (स) हैं। इब्ने ज़ियाद ने जनाबे ज़ैनब (स) को सताना शुरु किया और मुख़ातब हो कर कहने लगा कि ख़ुदा का शुक्र है कि जिसने तुम्हे रुसवा किया औक तुम्हारे मर्दों और वारिसों को क़त्ल कर के यह साबित कर दिया कि जो कुछ तुम ने कहा वह झूट था। हज़रत ज़ैनब (स) ने इब्ने ज़ियाद लईन के सामने ऐसा फ़सीह व बलीग़ ख़ुतबा दिया कि रावी कहता है कि उस ख़ुतबे से इब्ने ज़ियादा पानी पानी हो गया।

अली (अ) की बेटी ने जुरअत व शुजाअत के साथ अपने ख़ुतबे से इब्ने ज़ियाद के रुसवा कर दिया और अहले बैते रसूल पर रवा रखे जाने वाले मज़ालिम से पर्दा उठा दिया।

जब इब्ने ज़ियाद जनाबे ज़ैनब (स) के मुसकित जवाब से हक्का बक्का रह गया तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) की तरफ़ देखते हुए कहता है कि तुम कौन हो? इमाम (अ) ने जवाब दिया कि मैं अली बिन हुसैन हूँ। इब्ने ज़ियाद कहता है कि क्या ख़ुदा ने अली बिन हुसैन को क़त्ल नही किया। इमाम (अ) ख़ामोश रहे। क्यों नही बोलते कि मेरे भाई अली को लोगों ने शहीद कर दिया है, इब्ने ज़ियाद मलऊन ने दोहराते हुए कहा, नही उसे ख़ुदा ने क़त्ल किया है। इमाम (अ) ने ज़ालिम के जवाब में सूर ए ज़ोमर की 42 वी आयत आयत पढ़ी।

इस जवाब को सुन कर इब्ने ज़ियाद लईन आपे से बाहर हो गया और जल्लाद को हुक्म दिया कि इसे ले जा कर क़त्ल कर दो। जनाबे ज़ैनब (स) ने भतीजे के गले में बाहें डाल दीं और कहा पहले मुझे क़त्ल करो। उस के बाद मेरे भाई की यादगार के क़त्ल का इरादा करना। (ख़सायसे ज़ैनबिया पेज 284)

जनाबे ज़ैनब (स) की रविश से यह बात समझ में आती है कि हज़रत ज़ैनब (स) इमाम (अ) की जान की हिफ़ाज़त के सिलसिले ही में कोशाँ थीं। क्या जनाबे ज़ैनब का यह शुजाआना और आलिमाना क़दम उन का इत्तेबा करने वालों के लिये बेहतरीन दर्स नही है? क्या आदमी को अपने विलायत व इमामत जैसे बेहतरीन अक़दार पर ख़ुद को क़ुर्बान नही कर देना चाहिये? क्या राहे ख़ुदा में रंज उठाने वालों और ईसार गरों के हज़रत ज़ैनब (स) को नमून ए अमल क़रार नही देना चाहिये? दर हक़ीक़त हमें राहे खुदा, राहे विलायत व इमामत में उन्ही की तरह हर क़िस्म की मशक़्क़त व मुसीबत बर्दाश्त करने के लिये ख़ुद को तैयार रखना चाहिये ता कि तारीख़ में हमेशा सर बुलंद रहें।