मजमूअऐ मक़ालाते तारीख़
 




(13) शिया सम्प्रदाय किस प्रकार वजूद मे आया



हज़रत अली अलैहिस्सलाम के चाहने वाले हज़रत अली अलैहिस्सलाम के उस स्थान को दृष्टि मे रखते हुए जो उनको पैगम्बर, सहाबा व मुसलमानो के निकट प्राप्त था यह अवश्यक मानते थे कि पैगम्बर के बाद खिलाफ़त हज़रत अली अलैहिस्सलाम का हक़ है। पैगम्बर की बीमारी के दिनो को छोड़ कर उस समय की ज़ाहिरी अवस्था से भी ऐसा ही प्रतीत होता था।

परन्तु जब हज़रत पैगम्बर के स्वर्गवास के समय अहलिबैत और कुछ सहाबा उनके ग़म(शौक) मे विलाप कर रहे थे और उनके दफ़्न के इन्तिज़ाम मे लगे थे। ठीक उसी समय एक गिरोह ने अहलिबैत व हज़रत पैगम्बर के सम्बन्धियों से मशवरा किये बिना अपने आप को मुस्लमानो का शुभ चिंतक दर्शाते हुए शिघ्रता पूर्वक खलीफ़ा(पैगम्बर का उत्तराधिकारी) का चुनाव कर लिया। और हज़रत अली अलैहिस्सलाम व उनके अनुयाईयों को एक तरफ़ छोड़ दिया।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम व उनके साथीगण जैसे इब्ने अब्बास, ज़ुबैर ,सलमान, अबूज़र,मिक़दाद और अम्मार आदि ने पैगम्बर को दफ़्न करने के बाद इस गिरोह के इस कार्य पर आपत्ति व्यक्त की। परन्तु उनको यह जवाब दिया गया कि हमने जो कुछ किया मुस्लमानों की भलाई इसी कार्य मे थी।

इस घटना का यह प्रभाव पड़ा कि इस्लामी समाज अल्प संख्यक (हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुयायी) व बहुसंख्यक (खिलाफ़त अनुयायी) दो समुदायों मे विभाजित हो गया।और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुयायी इसी दिन से समाज मे “शिया-ए-अली” के नाम से पहचाने जाने लगे।परन्तु खलीफ़ा व उनके सहयोगियों ने अपनी सियासत के अनुसार यह प्रयास किया कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुयायी इस नाम से न पहचानें जायें और समाज अल्प संख्यक व बहुसंख्यक दो भागो मे विभाजित न हों। समाज को इस विभाजन से रोकने से उनका तात्पर्य यह था कि वह यह दर्शाना चाहते थे कि खिलाफ़त को सामुहिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है। इसी कारण वह खिलाफ़त पर आपत्ति व्यक्त करने वालों को बैअत तथा मुस्लमानो का विरोधी कहते थे। और कभी कभी तो इस खिलाफ़त पर अपत्ति व्यक्त करने वालों को इससे भी अधिक बुरे नामो से प्रसिद्ध करने की चेष्टा करते थे।

अतः शिया लोग प्रथम दिन से ही समकालीन शासन की सियासत का निशाना बने। वह आपत्ति व्यक्त करने के अलावा कुछ नही कर सकते थे। और हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने भी उस समय इस्लाम और मुस्लमानों की भलाई को ध्यान मे रखते हुए जंग को उचित नही समझा।परन्तु इस खिलाफ़त पर आपत्ति व्यक्त करने वाले समूह के लोगों केवल हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम को ही हज़रत पैगम्बर का जानशीन (उत्तराधिकारी) मानते थे और खिलाफ़त को उनका हक़(अधिकार) समझते हुए इल्मी व मानवी क्षेत्र मे उनसे ही सम्पर्क करते थे।तथा लोगों के मध्य प्रचार करते थे कि इल्मी व मानवी क्षेत्र मे केवल उन्ही से सम्पर्क स्थापित किया जाये। वह अक़ीदे की दृष्टि से कभी भी बहुसंख्यकों के आधीन नही हुए। (उपरोक्त लेख अल्लामा तबातबाई की किताब शिया दर इस्लाम से चुन कर अनुवाद किया गया है।)

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(14) सवाल जवाब




सवाल- आयते ततहीर किस सूरे में है



जवाब – सूर -ए- अहज़ाब आयत न. 33



सवाल- आयते विलायत किस सूरे में है ?



जवाब- सूर -ए- मायदा आयत न. 55



सवाल- ياا يها الرسول بلغ ما انزل اليك من ربك किस सूरे की आयत है?



जवाब- सूर-ए- मायदा आयत न. 67



सवाल—आयते मुबाहेला किस सूरे में है?



जवाब- सूर-ए- आलि इमरान आयत न. 61



सवाल- يا ايها الذين امنوا اطيعوا الله و اطيعوا الرسول و اولي الامر منكم किस सूरे की आयत है?



जवाब- सूर-ए- निसा आयत न. 54



सवाल- तक़वे और सच्चों की पैरवी का हुक्म किस सूरे में दिया गया है?



जवाब- सूर-ए –तौबा आयत न.119



सवाल- अहले ज़िक्र से सवाल पूछने का हुक्म किस सूरे में है?



जवाब- सूर-ए- नहल आयत न.43



सवाल- ونريد ان نمن علي الذيناستضعفوا في الارض و نجعلهم ائمة و نجعلهم الوارثين किस सूरे की आयत है?



जवाब- सूर -ए- क़िसस आयत न. 5



सवाल- नबी पर सलवात भेजने का हुक्म किस आयत में है?



जवाब- सूर-ए- अहज़ाब की आयत न.56 में।



सवाल- قل لا أسئلكم عليه اجرا الا المودة في القربي इस आयत का तर्जमा क्या?



जवाब- ऐ रसूल आप कह दीजिये कि मैं रिसालत का कोई अज्र नही चाहता मगर यह कि मेरे क़राबतदारों से मुहब्बत करो।



सवाल- वाजिब सजदों वाली आयतें किन किन सूरों में हैं और कौन कौनसी आयते है ?



जवाब-



1. सूर -ए- सजदा आयत न.15

2. सूर -ए- फ़ुस्सेलत आयत न.38

3. सूर -ए- नज्म आयत न.62

4. सूर -ए- अलक़ आयत न.19



सवाल- क्या आयते सजदा को जनाबत की हालत में पढ़ सकते हैं?



जवाब- नही, जनाबत की हालत में आयते सजदा को पढ़ना हराम है।



सवाल- क्या क़ुरआन में तहरीफ़ हुई है?



जवाब- नही, क़ुरआन में तहरीफ़ नही हुई है।



सवाल- दीन के कामिल होने का ऐलान किस आयत में हुआ है?



जवाब- सूर-ए- मायदा आयत न. 3



सवाल- सूर-ए- दहर किन की मदह में नाज़िल हुआ?



जवाब- सूर-ए- दहर अहलेबैत की मदह में नाज़िल हुआ।



सवाल- क़ुरआन के किस सूरे में सबसे ज़्यादा आयतें हैं ?



जवाब- सूर-ए-बक़रा में 286 आयतें।



सवाल- क़ुरआन का सबसे छोटा सूरा कौनसा है?



जवाब- सूर-ए- कौसर तीन आयतें।



सवाल- क़ुरआन मे रसूल के किस दुश्मन की नाम लेकर बुराई की गई है?



जवाब- अबुलहब की।



सवाल- कुरआन में कुल कितने सूरे हैं ?



जवाब- कुरआन में 114 सूरे हैं।



सवाल- सबसे पहले किस सूरे की आयतें नाज़िल हुईं ?



जवाब- सूर-ए- अलक़ की पहली सात आयतें।



सवाल- मक्की सूरे किन सूरों को कहा जाता है ?



जवाब- जो सूरे हिजरत से पहले नाज़िल हुए उनको मक्की कहा जाता है चाहे वह किसी भी मक़ाम पर नाज़िल हुए हो।



सवाल- मदनी सूरे किन सूरों को कहा जाता है?



जवाब- जो सूरे हिजरत के बाद नाज़िल हुए उनको मदनी कहा जाता है चाहे, फ़तहे मक्का के मौक़े पर मक्के में ही नाज़िल हुए हो।



सवाल- ग़दीर के मैदान में कौनसी आयतें नाज़िल हुईं ?



जवाब- सूर-ए- मायदा की आयतन.3 और 67



सवाल- सबसे पहली वही कब नाज़िल हुई ?



जवाब- 27 रजब को।



सवाल- क़ुरआन पर ज़ेर ज़बर पेश किसने लगाये?



जवाब- हज़रत अली अलैहिस्सलाम के शागिर्द अबु असवद दौइली ने।



सवाल- अबु असवद दौइली ने ज़ेर, ज़बर और पेश को किस तरह लिखा?



जवाब- ज़बर के लिए लाल रंग का एक नुक़्ता हर्फ़ के ऊपर, ज़ेर के लिए लाल रंग का एक नुक़्ता हर्फ़ के नीचे और पेश के लिए लाल रंग का एक नुक़्ता हर्फ़ के आगे।



सवाल- क़ुरआन के हर्फ़ों पर नुक़्ते किस ने लगाये ?



जवाब- अबु असवद दौइली के शागिर्द याहिया बिन यामुर और नस्र बिन आसिम ने।



सवाल- क़ुरान में नुक़्तों की शक्ल में मौजूद ज़ेर, ज़बर पेश को मौजूदा सूरत किसने दी?



जवाब- ख़लील बिन अहमद फ़राहीदी ने।

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(15) सहाबा अक़्ल व तारीख़ की दावरी में।





हमारा अक़ीदह है कि पैग़म्बरे इस्लाम के असहाब में बहुत से लोग बड़े फ़िदाकार बुज़ुर्ग मर्तबा व बाशख़्सियत थे। क़ुरआने करीम व इस्लामी रिवायतों में उनकी फ़ज़ीलतो का ज़िक्र मौजूद हैं।लेकिन इस का मतलब यह नही है कि पैग़म्बर इस्लाम (स.)के तमाम साथियों को मासूम मान लिया जाये और उनके तमाम आमाल को सही तस्लीम कर लिया जाये। क्योँ कि क़ुरआने करीम ने बहुत सी आयतों में (जैसे सूरए बराअत की आयतें,सूरए नूर व सूरए मुनाफ़ेक़ून की आयतें) मुनाफ़ेक़ीन के बारे में बाते की हैं जबकि यह मुनाफ़ेक़ीन ज़ाहेरन पैग़म्बर इस्लाम(स.)के असहाब ही शुमार होते थे जबकि क़ुरआने करीम ने उनकी बहुत मज़म्मत की है। कुछ असहाब ऐसे थे जिन्होने पैग़म्बरे इस्लाम के बाद मुस्लमानों के दरमियान जंग की आग को भड़काया,इमामे वक़्त व ख़लीफ़ा से अपनी बैअत को तोड़ा और हज़ारों मुसलमानों का खून बहाया। क्या इन सब के बावुजूद भी हम सब सहाबा को हर तरह से पाक व मुनज़्जह मान सकते हैं ?



दूसरे अलफ़ाज़ में जंग करने वाले दोनों गिरोहों को किस तरह पाक मान जा सकता है(मसलन जंगे जमल व जंगे सिफ़्फ़ीन के दोनों गिरोहों को पाक नही माना जा सकता) क्योँ कि यह तज़ाद है और यह हमारे नज़दीक क़ाबिले क़बूल नही है। वह लोग जो इस की तौजीह में “इज्तेहाद” को मोज़ू बनाते हैं और उस पर तकिया करते हुए कहते हैं कि दोनों गिरोहों में से एक हक़ पर था और दूसरा ग़लती पर लेकिन चूँकि दोनों ने अपने अपने इज्तेहाद से काम लिया लिहाज़ा अल्लाह के नज़दीक दोनो माज़ूर ही नही बल्कि सवाब के हक़दार हैं,हम इस क़ौल को तसलीम नही करते।



इज्तेहाद को बहाना बना कर पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के जानशीन से बैअत तोड़ कर,आतिशे जंग को भड़का कर बेगुनाहों का खून किस तरह बहाया जा सकता है। अगर इन तमाम ख़ूँरेज़ियों की इज्तेहाद के ज़रिये तौजीह की जा सकती है तो फ़िर कौनसा काम बचता है जिसकी तौजीह नही हो सकती।



हम वाज़ेह तौर पर कहते हैं कि हमारा अक़ीदह यह है कि तमाम इंसान यहाँ तक कि पैग़म्बरे इस्लाम (सल.)के असहाब भी अपने आमाल के तहत हैं और क़ुरआने करीम की कसौटी “इन्ना अकरमा कुम इन्दा अल्लाहि अतक़ा कुम”(यानी तुम में अल्लाह के नज़दीक वह गरामी है जो तक़वे में ज़्यादा है।)उन पर भी सादिक़ आती है। लिहाज़ा हमें उनका मक़ाम उनके आमाल के मुताबिक़ तैय करना चाहिए और इस तरह हमें मंतक़ी तौर पर उन के बारे में कोई फ़ैसला करना चाहिए। लिहाज़ा हमें कहना चाहिए कि वह लोग जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के ज़माने में मुख़लिस असहाब की सफ़ में थे और पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के बाद भी इस्लाम की हिफ़ाज़त की कोशिश करते रहे और क़ुरआन के साथ किये गये अपने पैमान को वफ़ा करते रहे उन्हें अच्छा मान ना चाहिए और उनकी इज़्ज़त करनी चाहिए। और वह लोग जो पैग़म्बरे इस्लाम(स.)के ज़माने में मुनाफ़ेक़ीन की सफ़ में थे और हमेशा ऐसे काम अंजाम देते थे जिन से पैग़म्बरे इस्लाम (स.)का दिल रंजीदा होता था। या जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम(स.)के बाद अपने रास्ते को बदल दिया और ऐसे काम अंजाम दिये जो इस्लाम और मुसलमानों के नुक़्सान दे साबित हुए,ऐसे लोगों से मुहब्बत न की जाये। क़ुरआने करीम फ़रमाता है कि “ला तजिदु क़ौमन युमिनूना बिल्लाहि वअलयौमिल आख़िरि युआद्दूना मन हाद्दा अल्लाहा व रसूलहु व लव कानू आबाअहुम अव अबनाअहुम अव इख़वानहुम अव अशीरतहुम ऊलाइका कतबा फ़ी क़ुलूबिहिम अलईमाना”[137] यानी तुम्हें कोई ऐसी क़ौम नही मिलेगी जो अल्लाह व आख़िरत पर ईमान लेआने के बाद अल्लाह व उसके रसूल की नाफ़रमानी करने वालों से मुब्बत करती हो,चाहे वह (नाफ़रमानी करने वाले)उनके बाप दादा,बेटे,भाई या ख़ानदान वाले ही क्य़ोँ न हो,यह वह लोग हैं जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान को लिख दिया है।



हाँ हमारा अक़ीदह यही है कि वह लोग जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.)को उनकी ज़िन्दगी में या शहादत के बाद अज़ीयतें पहुँचाईँ है क़ाबिले तारीफ़ नही हैं।



लेकिन यह हर गिज़ नही भूलना चाहिए कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के कुछ आसहाब ने इस्लाम की तरक़्क़ी की राह में में बहुत क़ुरबानियाँ दी हैं और वह अल्लाह की तरफ़ से मदह के हक़ दार क़रार पायें हैं। इसी तरह वह लोग जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के बाद इस दुनिया में आयें या जो क़ियामत तक पैदा होगें अगर वह पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के सच्चे असहाब की राह पर चले तो वह भी लायक़े तारीफ़ हैं। क़ुरआने करीम फ़रमाता है कि “अस्साबिक़ूना अलअव्वलूना मीन अलमुहाजीरीना व अलअनसारि व अल्ल़ज़ीना अत्तबऊ हुम बिएहसानिन रज़िया अल्लाहु अनहुम व रज़ू अनहु ” यानी मुहाजेरीन व अनसार में से पहली बार आगे बढ़ने वाले और वह लोग जिन्होंने उनकी नेकियों में उनकी पैरवी की अल्लाह उन से राज़ी हो गया और वह अल्लाह से राज़ी हो गये।


यह पैग़म्बरे इस्लाम (स.)के असहाब के बारे में हमारे अक़ीदेह का निचौड़ है।

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(16) पैग़म्बरे इस्लाम की निष्ठावान पत्नी हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा




पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी की सार्वजनिक घोषणा के दस वर्ष बाद पैग़म्बरे इस्लाम स की पत्ती हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने संसार से विदा ली। यह दिन पैग़म्बरे इस्लाम स और हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के संयुक्त जीवन का अंतिम बिंदु था।

हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के निधन से पैग़म्बरे इस्लाम शोक व दुख के अथाह सागर में डूब गए। पैग़म्बरे इस्लाम स पर दुखा का यह पहाड़ उनके चाचा हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम के निधन के स्वर्गवास के कुछ थोड़े से अंतराल के बाद टूट पड़ा। इन दो प्रियतम हस्तियों के वियोग से पैग़म्बरे इस्लाम की आत्मा इतनी दुखी हुई कि उन्होंने इस वर्ष को शोकवर्ष का नाम दे दिया। हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के निधन पर पैग़म्बरे इस्लाम स बहुत रोए और उन्होंने कहाः ख़दीजा के जैसा कहां कोई मिल सकता है कि उन्होंने उस समय मेरी पुष्टि की जब लोग मुझे झुठला रहे थे। ईश्वरीय धर्म के मामलों में उन्होंने मेरी सहायता की और सहायता के लिए अपनी संपत्ति पेश कर दी।
हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा का संबंध क़ुरैश क़बीले के एक प्रतिष्ठित परिवार से था। पैग़म्बरे इस्लाम स की पैग़म्बरी की घोषणा से पूर्व वह हज़रत इब्राहीम के एकेश्वरवादी धर्म की अनुयायी थीं। जनकल्याण की भावना के नाते समाज में हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा को बड़ी ख्याति प्राप्त थी। उनकी पास बहुत दौलत थी और उन्हें हेजाज़ के बड़े व्यापारियों में गिना जाता था।

हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के दूरदर्शी व सूझबूझ वाली महिला थीं। उन्हें आध्यात्मिक विषयों से विशेष रूचि थी और वह आसमानी ग्रंथों की शिक्षाओं से परिचित थीं। इसी लिए उन्हें पहले से ही अंतिम ईश्वरीय पैग़म्बर के आगमन की प्रतीक्षा थी और वह इस बारे में अपने चचेरे भाई वरक़ा बिन नूफ़िल और अन्य जानकार लोगों से पूछती रहती थीं। संयोग यह हुआ कि वह हज़रत मोहम्मद स से उनकी पैग़म्बरी की घोषणा के कई वर्ष पूर्व ही उनसे परिचित हो गईं। उन्होंने एक व्यापारिक यात्रा में अपने काफ़िले का नेतृत्व हज़रत मोहम्मद स को सौंप दिया जो लोगों के बीच अपनी सच्चाई और ईमानदारी के लिए विशेष ख्याति रखते थे। इस यात्रा ने हज़रत मोहम्मद स के शिष्टाचारिक व गुणों से हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा को भलीभांति अवगत करा दिया। हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा को आभास हुआ कि हज़रत मोहम्मद स बड़े पवित्र व महान व्यक्तित्व के स्वामी तथा दूसरों से श्रेष्ठ हैं। मानवीय मूल्यों का पालन करते हैं और उनकी आत्मा बड़ी महान विशेषताओं से सुसज्जित है। हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा को पता था कि हज़रत मोहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम वंचितों के सहायक और लोगों के अधिकारों के रक्षक हैं। वह हज़रत मोहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की ईमानदारी, सुंदर व्यवहार, सच्चाई, सरल स्वभाव और महानता का प्रशंसक बन गईं।


हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा का यह भी पता था कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के साथ उनका जीवन पवित्रता और आध्यमिकता के मार्ग पर आगे बढ़ेगा। हज़रत मोहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के प्रति हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा का झुकाव और उनसे विवाह पर अज्ञानता के काल के लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया दिखाई। कारण यह था कि उस समय सामाजिक संबंधों का आधार विदित भौतिक संसाधन थे जबकि हज़रत मोहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पास धन दौलत नहीं थी। यही कारण था कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से विवाह के कारण कुछ महिलाओं ने हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा की बुराई करना आरंभ कर दिया और उन पर व्यंग किया कि तुमने धन दौलत की स्वामी होने के बावजूद एक ग़रीब से विवाह किया।

व्यंग के इन बाणों के उत्तर में हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने कहा कि क्या तुम्हारे बीच कोई हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के समान है। क्या हेजाज़ की धरती पर इन शिष्टाचारिक गुणों से सुसज्जित किसी व्यक्ति से तुम लोग परिचित हो। मैंने इन गुणों के आधार पर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से विवाह किया है। उस समय का हठी समाज हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के इन तर्कों को समझने की क्षमता नहीं रखता था। इसी लिए क़ुरैश क़बीले के महिलाएं उनसे अप्रसन्न ही रहीं। जब पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी की घोषणा हुई तो क़ुरैश की महिलाओं के व्यवहार की कठोरता और रूखापन और बढ़ गया। इसी लिए जब हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को जन्म दिया तो यह महिलाएं सहायता के लिए नहीं आईं। इन बातों से हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा को बड़ा दुख पहुंचा किंतु ईश्वरीय धर्म की भरपूर सहायता करने पर हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा की ईश्वर ने अनेक अवसरों पर सहायता की और उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा।

बहुत अधिक धन और उच्च सामाजिक स्थान की स्वामी होने के बावजूद हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से बड़े आदर के साथ पेश आतीं और उनका बड़ा सम्मान करती थीं। उनके व्यवहार में घमंड की हल्की सी भी कोई झलक नहीं थी। हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा को पता था कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को ईश्वर की उपासना से बड़ा गहरा लगाव है इसी लिए वह इस बात का बड़ा ध्यान रखती थीं कि पैग़म्बरे इस्लाम को उपासना का भरपूर समय मिले और वह निश्चिंत होकर ईश्वर का स्मरण करें।

पैग़म्बरी की घोषणा से पूर्व हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम नूर पर्वत की ऊंचाई पर स्थित हेरा नामक गुफा में हर महीने के कई बार जाते थे और वहां चिंतन एवं उपासना करते थे। हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा को अपने पति की इस पवित्र भावना की जानकारी थी इसी लिए वह बड़ी ख़ुशी से उन्हें विदा करती थीं और उनके साथ हज़रत अली अलैहिस्सलाम को भेजती थीं और कभी स्वयं भी साथ जाती थीं। पैग़म्बरी की घोषणा के बाद जब पैग़म्बरे इस्लाम के बहुत से नातेदारों ने उनका साथ छोड़ दिया था हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा पूरी निष्ठा के साथ ईमान लाईं और पैग़म्बरे इस्लाम के समर्थन का स्थायी संकल्प किया। हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा केवल ज़बान से ईमान नहीं लाईं बल्कि उन्हों अपनी पूरी संपत्ति पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले कर दी ताकि वह उसे इस्लाम धर्म के लिए प्रयोग करें। जब शोबे अबू तालिब नामक पहाड़ी स्थान पर शत्रुओं ने मुसलमानों की आर्थिक नाकाबंदी कर दी थी उस समय हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा की आर्थिक और वैचारिक सहायता व सहयोग पूर्णतः स्पष्ट था। नाकाबंदी समाप्त हो जाने के बाद भी हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के धन से मुसलमानों की सहायता जारी रही। हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने भी कहा कि शोबे अबू तालिब की नाकाबंदी के समय हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा की दौलत से मेरी बड़ी सहायता हुई।

पैग़म्बरे इस्लाम के साथ अपने वैवाहिक जीवन में हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने बड़े ही धैर्य व संयम से काम लिया क्योंकि उन्हें उस मार्ग की सच्चाई पर पूरा विश्वास था जिसे अंतिम ईश्वरीय दूत के रूप में पैग़म्बरे इस्लाम ने मानवता के कल्याण के लिए चुना था। पैग़म्बरी की घोषणा से पूर्व और उसके बाद जीवन के हर चरण में हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा हज़रत मोहम्मद स पर न्योछावर होती रहती थीं। वह अपने व्यवहार से पैग़म्बरे इस्लाम का दुख बांटती थीं। वह मानवता के इस महान शिक्षक की सलाहकार की भूमिका निभाती रहीं।

विख्यात मुस्लिम इतिहासकार इब्न हश्शाम लिखते हैं
हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान लाईं उनकी बात की पुष्टि की और उनका समर्थन किया। ईश्वर उनके माध्यम से पैग़म्बरे इस्लाम को शांति प्रदान करता था। पैग़म्बरे इस्लाम को जब भी कोई चिंताजनक समाचार मिलता ईश्वर हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के माध्यम से उनका दुख कम करता था। ईश्वार की कृपा हो हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा पर।
इतिहास में आया है कि एक दिन मक्के के अनेकश्वरवादियों ने पत्थर मार मार कर पैग़म्बरे इस्लाम को घायल कर दिया और हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के घर तक उनका पीछा किया और फिर घर पर भी पत्थर फेंके। इसी बीच हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा घर से बाहर निकलीं और उन्होंने कहा कि क्या तुम लोगों को अपने क़बीले की सम्मानीय महिला के घर पर पत्थराव करते हुए लज्जा नहीं आती। यह सुनकर अनेकेश्वरवादी लज्जित हुए और वह वहां से हट गए। इसके बाद हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लाल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के घावों को साफ़ किया और उस पर मरहम रखा।

इसी अवसर पर पैग़म्बरे इस्लाम ने ईश्वर का सलाम हज़रत ख़दीजा को पहुंचाया और उनके लिए स्वर्ग में एक महल बनाए जाने की शुभसूचना दी। जब मुसलमानों की आर्थिक नाकाबंदी की गई थी तब हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने बड़ा दुखा उठाया। वह हमेंशा धन दौलत में रहीं किंतु इस अवसर पर उन्हें भूख और प्यास में दिन रात बिताने पड़। इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा वह इसी नाकाबंदी के कारण बीमार हुईं और उसी बीमारी में उनका स्वर्गवास हो गया।
जीवन के अंतिम क्षणों में हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने यह वाक्य कहे थेः हे ईश्वर के दूत मैं ने उस तरह आपकी सेवा नहीं की जैसी मुझे करनी चाहिए थी मुझे क्षमा कीजिए मैं आपकी प्रसन्नता कि सिवा कुछ नहीं चाहती।

इस प्रकार पहली मुसलमान महिला ने अंतिम ईश्वरीय दूत के साथ गौरवपूर्ण समय बिताने के पश्चात ६५ वर्ष की आयु में संसार से विदा ली

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