मजमूअऐ मक़ालाते तारीख़
 




(10) हदीसे ग़दीर गिरोहे मआरिफ़े इस्लामी




तर्जमा----- सैयद क़मर ग़ाज़ी
मुक़द्दमा

ग़दीर का नाम तो हम सब ने सुना ही है। यह एक सरज़मीन है जो मक्के और मदीने के दरमियान मक्के शहर से तक़रीबन 200 किलोमीटर के फ़ासले पर जोहफ़े के पास वाक़ेअ है। यह एक चोराहा है जहाँ पहुँच कर मुख्तलिफ़ सरज़मीनों से ताल्लुक़ रखने वाले हुज्जाजे कराम एक दूसरे से जुदा हो जाते हैं।

शुमाली सम्त का रास्ता मदीने की तरफ़ जाता है।

जनूबी सम्त का रास्ता यमन की तरफ़

मशरिक़ी सम्त का रास्ता इराक़ की तरफ़

और मग़रिबी सम्त का रास्ता मिस्र की तरफ़

आज कल यह सरज़मीन भले ही मतरूक हो चुकी हो मगर एक दिन यह सर ज़मीन तारीखे इस्लाम के एक अहम वाक़िए की गवाह थी। और यह वाक़िआ 18 ज़िलहिज्जा सन् 10 हिजरी का है जिस दिन हजरत अली अलैहिस्सलाम को रसूले अकरम (स.) के जानशीन के मंसब पर नस्ब किया गया।

अगरचे खुलफ़ा ने सियासत के तहत तारीख के इस अज़ीम वाक़िए को मिटाने की कोशिशें की और अब भी कुछ मुतास्सिब लोग इसको मिटाने या कम रंग करने की कोशिशे कर रहे हैं। लेकिन यह वाक़िआ तरीख,हदीस और अर्बी अदब में इतना रच बस गया है कि इसको मिटाया या छुपाया नही जा सकता।

आप इस किताबचे में ग़दीर के सिलसिले में ऐसी ऐसी सनदें और हवाले पायेंगे कि उन को पढ़ कर मुतहय्यर रह जायेंगे। जिस मस्अले के लिए ला तादाद दलीलें और सनदें हो वह किसी तरह अदमे तवज्जोह या पर्दापोशी का शिकार हो सकता है ?

उम्मीद है कि यह मंतक़ी तहलील और तमाम सनदें जो अहले सुन्नत की किताबों से ली गई हैं मुसलमानों की मुख्तलिफ़ जमाअतों को एक दूसरे से क़रीब करने का ज़रिया बनेगी और माज़ी में लोग जिन हक़ाइक़ से सादगी के साथ गुज़र गये हैं वह इस दौर में सबकी तवज्जोह का मरकज़ बनेंगे ख़ास तौर पर जवान नस्ल की।

हदीसे ग़दीर

हदीसे ग़दीर अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बिला फ़स्ल विलायत व खिलाफ़त के लिए एक रौशन दलील है। और मुहक़्क़ेक़ीन इसको बहुत ज़्याद अहमियत देते हैं।

लेकिन अफ़सोस है कि जो लोग आप की विलायत से पसो पेश करते हैं वह कभी तो इस हदीस की सनद को क़ाबिले क़बूल मानते हैं मगर इसकी दलालत में तरदीद करते हैं और कभी इस हदीस की सनद को ही ज़ेरे सवाल ले आते हैं।

इस हदीस की हक़ीक़त को ज़ाहिर करने के लिए ज़रूरी है कि सनद और दलालत के बारे में मोतबर हवालों के ज़रिये बात की जाये।

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ग़दीर ख़ुम का मंज़र

सन् दस हिजरी के आखिरी माह(ज़िलहिज्जा) में हज्जतुल विदा के मरासिम तमाम हुए और मुस्लमानों ने रसूले अकरम (स.) से हज के आमाल सीखे। इसी असना रसूले अकरम (स.) ने मदीने जाने की ग़रज़ से मक्के को छोड़ने का इरादा किया और क़ाफ़िले को चलने का हुक्म दिया। जब यह क़ाफ़िला जोहफ़े से तीन मील के फ़ासले पर राबिग़ नामी सर ज़मीन पर पहुँचा तो ग़दीरे खुम नामी मक़ाम पर जिब्राइले अमीन “वही” लेकर नाज़िल हुए और रसूल को इस आयत के ज़रिये खिताब किया।

“या अय्युहर रसूलु बल्लिग़ मा उनज़िला इलैका मिन रब्बिक व इन लम् तफ़अल फ़मा बल्लग़ता रिसालतहु वल्लाहु यअसिमुका मिन अन्नास”

ऐ रसूल उस पैग़ाम को पहुँचा दीजिये जो आपके परवर दिगार की जानिब से आप पर नाज़िल हो चुका है। और अगर आप ने ऐसा न किया तो गोया रिसालत का कोई काम अंजाम नही दिया। अल्लाह तुमको लोगों के शर से महफ़ूज़ रखेगा।

आयत के अंदाज़ से मालूम होता है कि अल्लाह ने एक ऐसा अज़ीम काम रसूल अकरम (स.) के सुपुर्द किया है जो पूरी रिसालत के इबलाग़ के बराबर और दुश्मनो की मायूसी का सबब है। इससे बढ़कर अज़ीम काम और क्या हो सकता है कि एक लाख से ज़्यादा लोगों के सामने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को खिलाफ़त व विसायत व जानशीन के मंसब पर नस्ब करें ?

लिहाज़ा क़ाफ़िले को रूकने का हुक्म दिया गया। इस हुक्म को सुन कर जो लोग क़ाफ़िले से आगे चल रहे थे रुक गये और जो पीछे रह गये थे वह भी आकर क़ाफ़िले से मिल गये। ज़ोहर का वक़्त था और गर्मी अपने शबाब पर थी। हालत यह थी कि कुछ लोगों ने अपनी अबा का एक हिस्सा सिर पर और दूसरा हिस्सा पैरों के नीचे दबा रक्खा था। पैगम्बर के लिए एक दरख्त पर चादर डाल कर सायबान तैयार किया गया। पैगम्बर ऊँटो के कजावों को जमा करके बनाये गये मिम्बर की बलंदी पर खड़े हुए और बलंद व रसा आवाज़ मे एक खुत्बा इरशाद फ़रमाया जिसका खुलासा यह था।

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ग़दीरे खुम में पैगम्बर का खुत्बा

“हम्दो सना अल्लाह की ज़ात से मखसूस है। हम उस पर ईमान रखते हैं उसी पर हमारा तवक्कुल है और हम उसी से मदद चाहते हैं। हम बुराई, और अपने बुरे कामों से बचने के लिए उसकी पनाह चाहते हैं। वह अल्लाह जिसके अलावा कोई दूसरा हादी व रहनुमा नही है। मैं गवाही देता हूँ कि उसके अलावा कोई माबूद नही है और मुहम्मद उसका बंदा और पैगम्बर है।

हाँ ऐ लोगो वह वक़्त क़रीब है कि मैं दावते हक़ को लब्बैक कहूँ और तुम्हारे दरमियान से चला जाऊँ। तुम भी उसकी बारगाह में जवाब दे हो और मै भी। इसके बाद फ़रमाया कि मेरे बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है? क्या मैनें तुम्हारे बारे में अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा कर दिया है ?

यह सुन कर पूरी जमीअत ने रसूले अकरम (स.) की ख़िदमात की तसदीक़ मे आवाज़ बलंद कीऔर कहा कि हम गवाही देते हैं कि आपने अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा किया और बहुत मेहनत की अल्लाह आपको इसकी बेहतरीन जज़ा दे।

पैगम्बर ने फ़रमाया कि “क्या तुम गवाही देते हो कि इस पूरी दुनिया का माबूद एक है और मुहम्मद उसका बंदा और रसूल है और जन्नत जहन्नम व आखेरत की जावेदानी ज़िन्दगी में कोई शक नही है ?

सबने कहा कि “ सही है हम गवाही देते हैं।”

इसके बाद रसूले अकरम (स.) ने फ़रमाया कि “ऐ लोगो मैं तम्हारे दरमियान दो अहम चीज़े छोड़ रहा हूँ मैं देखूँगा कि तुम मेरे बाद मेरी इन दोनो यादगारों के साथ क्या सलूक करते हो।”

उस वक़्त एक इंसान खड़ा हुआ और बलंद आवाज़ मे सवाल किया कि इन दो अहम चीज़ों से क्या मुराद है ?

पैगम्बरे अकरम (स.) ने यफ़रमाया कि “एक अल्लाह की किताब है जिसका एक सिरा अल्लाह की क़ुदरत में है और दूसरा सिरा तुम्हारे हाथों में और दूसरे मेरी इतरत और अहले बैत हैं अल्लाह ने मुझे खबर दी है कि यह हरगिज़ एक दूसरे से जुदा न होंगे।”

हाँ ऐ लोगो क़ुरआन और मेरी इतरत पर सबक़त न करना और दोनो के हुक्म की तामील में कोताही न करना, वरना हलाक हो जाओगे।

उस वक़्त हज़रत अली अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़ इतना ऊँचा उठाया कि दोनो की बग़ल की सफ़ैदी सबको नज़र आने लगी और सब लोगों से हज़रत अली (अ.) अली का तार्रुफ़ कराया।

इसके बाद फ़रमाया “मोमेनीन पर खुद उनसे ज़्यादा सज़वार कौन है ?

सब ने कहा कि “अल्लाह और उसका रसूल ज़्यादा जानते हैं।”

पैगम्बर स. ने फ़रमाया कि-

“अल्लाह मेरा मौला है और मैं मोमेनीन का मौला हूँ और मैं उनके नफ़सों पर उनसे ज़्यादा हक़्क़े तसर्रुफ़ रखता हूँ, हाँ ऐ लोगो “मनकुन्तो मौलाहु फ़हाज़ा अलीयुन मौलाहु अल्लाहुम्मावालि मन वालाहु व आदि मन आदाहु व अहिब्बा मन अहिब्बहु व अबग़िज़ मन अबग़ज़हु व अनसुर मन नसरहु व अख़ज़ुल मन ख़ज़लहु व अदरिल हक़्क़ा मआहु हैसो दारा। ”

जिस जिस का मैं मौला हूँ उस उसके यह अली मौला हैं। ऐ अल्लाह उसको दोस्त रख जो अली को दोस्त रखे और उसको दुश्मन रख जो अली को दुश्मन रखे, उस से मुहब्बत कर जो अली से मुहब्बत करे और उस पर ग़ज़बनाक हो जो अली पर ग़ज़बनाक हो, उसकी मदद कर जो अली की मदद करे और उसको रुसवा कर जो अली को रुसवा करे और हक़ को उधर मोड़ दे जिधर अली मुड़ें।”

ऊपर लिखे खुत्बे को अगर इंसाफ़ के साथ देखा जाये तो जगह जगह पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इमामत की दलीलें मौजूद हैं।(हम इस क़ौल की शरह जल्दी ही बयान करेंगे।)

हदीसे ग़दीर की जावेदानी

अल्लाह का यह हकीमाना इरादा है कि ग़दीर का तारीखी वाक़ेआ एक ज़िन्दा हक़ीक़त की सूरत मे हर ज़माने में बाक़ी रहे, लोगों के दिल इसकी तरफ़ जज़्ब होते रहें और इस्लामी कलमकार हर ज़माने में तफ़्सीर , हदीस, कलाम और तारीख की किताबों में इसके बारे में लिखते रहें, और मज़हबी खतीब इसको वाज़ो नसीहत की मजालिस में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ना क़ाबिले इंकार फ़ज़ायल की सूरत में बयान करते रहें।और फ़क़त ख़तीब ही नही बल्कि शोअरा हज़रात भी अपने अदबी ज़ौक़, फ़िक्र और इखलास के ज़रिये इस वाक़िए को चार चाँद लगायें और मुख्तलिफ़ ज़बानों में अलग अलग तरीक़ों से बेहतरीन अशआर कह कर अपनी यादगार के तौर पर छोड़ें।(मरहूम अल्लामा अमीनी ने मुख्तलिफ़ सदियों में ग़दीर के बारे में कहे गये अहम अशआर को शाइर की ज़िन्दगी के हालात के साथ मारूफ़तरीन ईस्लामी किताबों से नक़्ल करके अपनी किताब “अल ग़दीर” में जो कि 11 जिल्दों पर मुशतमल है बयान किया है।)

दूसरे अल्फ़ाज़ में यह कहा जा सकता है कि दुनिया में ऐसे तारीखी वाक़ियात बहुत कम हैं जो ग़दीर की तरह मुहद्दिसों, मुफ़स्सिरों, मुतकल्लिमों, फलसफ़ियों, खतीबों, शाइरों, मौर्रिखों और सीरत निगारों की तवज्जौह के मरकज़ बने हों।

इस हदीस के जावेदानी होने की एक इल्लत यह है कि इस वाक़िए के से मुताल्लिक़ दो आयतें क़ुराने करीम में मौजूद हैं लिहाज़ा जब तक क़ुरआन बाक़ी रहेगा यह तारीखी वाक़िया भी ज़िन्दा रहेगा।
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दिलचस्प बात यह है कि तरीख को दिक्क़ के साथ पढ़ने से यह मालूम होता है कि अठ्ठारहवी ज़िलहिज्जातुल हराम मुसलमानों के दरमियान रोज़े ईदे ग़दीर के नाम से मशहूर थी। यहाँ तक कि इब्ने ख़लकान अलमुस्ताली इब्ने अलमुस्तनसर के बारे में कहता है कि “ सन् 487 हिजरी में ईदे ग़दीरे खुम के दिन जो कि अठ्ठारह ज़िलहिज्जातुल हराम है लोगों ने उसकी बैअत की।” और अल मुसतनसिर बिल्लाह के बारे में लिखता है कि “सन् 487 हिजरी में जब ज़िलहिज्जा माह की आखरी बारह रातें बाक़ी रह गयी तो वह इस दुनिया से गया और जिस रात में वह दुनिया से गया माहे ज़िलहिज्जा की अठ्ठारवी शब थी जो कि शबे ईदे ग़दीर है।”

दिलचस्प बात यह है कि अबुरिहाने बैरूनी ने अपनी किताब आसारूल- बाक़िया में ईदे ग़दीर को उन ईदों में शुमार किया है जिनका एहतेमाम तमाम मुसलमान किया करते थे और खुशिया मनातें थे।

सिर्फ़ इब्ने खलकान और अबुरिहाने बैरूनी ने ही इस दिन को ईद का दिन नही कहा है बल्कि अहले सुन्नत के मशहूरो मारूफ़ आलिम सआलबी ने भी शबे ग़दीर को उम्मते मुसलेमाँ के दरमियान मशहूर शबों में शुमार किया है।

इस इस्लामी ईद की बुनियाद पैगम्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने में ही पड़ गई थी। क्योंकि आप ने इस दिन तमाम मुहाजिर, अंसार और अपनी अज़वाज को हुक्म दिया था कि अली (अ.) के पास जा कर उन को इमामत व विलायत के सिलसिले में मुबारक बाद दो।

ज़ैद इब्ने अरक़म कहते हैं कि अबु बकर, उमर,उस्मान,तलहा व ज़ुबैर मुहाजेरीन में से वह पहले अफ़राद थे जिन्होनें अली (अ.) के हाथ पर बैअत कर के मुबारकबाद पेश की और बैअत व मुबारक बादी का यह सिलसिला मग़रिब तक चलता रहा * * *

110 रावयाने हदीस

इस तारीखी वाक़िए की अहमियत के लिए इतना ही काफ़ी है कि इस को पैगम्बरे अकरम (स.) के 110 असहाब ने नक़्ल किया है

अलबत्ता इस जुमले का मतलब यह नही है कि सहाबा के अज़ीम गिरोह में से सिर्फ़ इन्हीं असहाब ने इस वाक़िए को बयान किया है, बल्कि इससे मुराद यह है कि अहले सुन्नत के उलमा ने जो किताबें लिखी हैं उनमें सिर्फ़ इन्हीं 110 अफ़राद का ज़िक्र मिलता है।

दूसरी सदी में जिसको ताबेआन का दौर कहा गया है इनमें से 89 अफ़राद ने इस हदीस को नक़्ल किया है।

बाद की सदीयों में भी अहले सुन्नत के 360 उलमा ने इस हदीस को अपनी किताबों में बयान किया है और उलमा के एक बड़े गिरोह ने इस हदीस की सनद और सेहत को सही तसलीम किया है।

इस गिरोह ने सिर्फ़ इस हदीस को बयान करने पर ही इक्तफ़ा नही किया बल्कि इस हदीस की सनद और इफ़ादियत के बारे में मुस्तक़िल तौर पर किताबें भी लिखी हैं।

अजीब बात यह है कि आलमे इस्लाम के सबसे बड़े मौर्रिख तबरी ने “अल विलायतु फ़ी तुरुक़ि हदीसिल ग़दीर” नामी किताब लिखी और इस हदीस को 75 तरीकों से पैगम्बर से नक़ल किया।

इब्ने उक़दह कूफ़ी ने अपने रिसाले “विलाय़त” में इस हदीस को 105 अफ़राद से नक़्ल किया है।

अबु बकर मुहम्मद बिन उमर बग़दादी जो कि जमआनी के नाम से मशहूर हैं, इस हदीस को 25 तरीक़ों से बयान किया है।

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अहले सुन्नत के वह मशहूर उलमा जिन्होनें इस हदीस को बहुतसी सनदों के साथ नक़्ल किया है

अहमद इब्ने हंबल शेबानी

इब्ने हज्रे अस्क़लानी

जज़री शाफ़ेई

अबु सईदे सजिस्तानी

अमीर मुहम्मद यमनी

निसाई

अबुल अला हमदानी

अबुल इरफ़ान हब्बान

शिया उलमा ने भी इस तारीखी वाक़िए के बारे में अहले सुन्नत की मुहिम किताबों के हवालों के साथ बहुत सी बा अरज़िश किताबें लिखी हैं। इनमें से जमेए तरीन किताब “अलग़दीर” है जो आलमे इस्लाम के मशहूर मोल्लिफ़ मरहूम अल्लामा आयतुल्लाह अमीने के कलम का शाहकार है। (इस किताबचे को लिखने के लिए इस किताब से बहुत ज़्यादा इस्तेफ़ादा किया गया है।)

बहर हाल पैगम्बरे इस्लाम (स.) ने अमीरूल मोमेनीन अली (अ.) को अपना जानशीन बनाने के बाद फ़रमाया “ कि ऐ लोगो अभी जिब्राईल मुझ पर नाज़िल हुआ और यह आयत लाया कि (( अलयौम अकमलतु लकुम दीनाकुम व अतमम्तु अलैकुम नेअमती व रज़ीतु लकुमुल इस्लामा दीना))आज मैंनें तुम्हारे दीन को कामिल कर दिया और तुम पर अपनी नेअमतों को तमाम किया और तुम्हारे लिए दीन इस्लाम को पसंद किया।”

उस वक़्त पैगम्बर ने तकबीर कही और फ़रमाया “ अल्लाह का शुक्र अदा तकरता हूँ कि उसने अपने आईन को मुकम्मल व नेअमतों को पूरा किया और मेरे बाद अली (अ.) की विसायत व जानशीनी से खुशनूद हुआ।”

इसके बाद पैगम्बरे इस्लाम (स.)मिम्बर की बलंदी से नीचे तशरीफ़ लाये और हज़रत अली (अ.) से फ़रमाया कि “ आप खेमें में लशरीफ़ ले जायें ताकि इस्लाम की बुज़ुर्ग शख्सियतें और सरदार आपकी बैअत कर के आप को मुबारक बाद अर्ज़ करें। ”

सबसे पहले शैखैन (अबुबकर व उमर) ने अली अलैहिस्सलाम को को मुबारक बाद पेश की और उनको अपना मौला तस्लीम किया।

हस्सान बिन साबित ने मौक़े से फ़ायदा उठाया और पैगम्बरे इस्लाम (स.) की इजाज़त से एक क़सीदा कहा और पैगम्बर अकरम (स.) के सामने उसको पढ़ा। यहाँ पर उस क़सीदे के सिर्फ़ दो अशार को बयान कर रहें हैं जो बहुत अहम हैं।

फ़ाक़ाला लहु क़ुम या अली फ़इन्ननी ।

रज़ीतुका मिंम बअदी इमामन व हादीयन।।

फ़मन कुन्तु मौलाहु फ़हाज़ा वलीय्युहु।

फ़कूनू लहु अतबाआ सिदक़िन मवालियन।।

यानी अली (अ.) से फ़रमाया कि उठो मैंनें आपको अपनी जानशीनी और अपने बाद लोगों की रहनुमाई के लिए मुंतखब कर लिया।

जिस जिस का मैं मौला हूँ उस उस के अली मौला हैं। तुम उनको दिल से दोस्त रखते हो बस उनकी पैरवी करो।

यह हदीस इमाम अली अलैहिस्सलाम की तमाम सहाबा पर फ़ज़ीलत व बरतरी के लिए सबसे बड़ी गवाह है।

यहाँ तक कि अमीरूल मोमेनीन ने मजलिसे शूरा-ए-खिलाफ़त में (जो कि दूसरे खलीफ़ा के मरने के बाद मुनअक़िद हुई), उसमान की खिलाफ़त के ज़माने में और अपनी खिलाफ़त के दौरान इस पर एहतेजाज किया है।

इसके अलावा हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा जैसी अज़ीम शख्सियत नें हज़रत अली अलैहिस्सलाम की वाला मक़ामी से इंकार करने वालों के सामने इसी हदीस से इस्तदलाल किया है।[

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मौला से क्या मुराद है

यहाँ पर सबसे अहम मसअला मौला के मअना की तफ़सीर है, जो कि वाज़ाहत मे अदमे तवज्जोह और लापरवाहीयो का निशाना बना हुआ है। क्योंकि इस हदीस के बारे में जो कुछ बयान किया गया है उससे इस हदीस की सनद के क़तई होने में कोई शको तरदीद बाक़ी नही रही।लिहाज़ा बहाना तरशाने वाले अफ़राद इस हदीस के मअना व मफ़हूम में शको तरदीद पैदा करने में लग गये। खासतौर पर लफ़्ज़े मौला के माअना में मगर इसमें भी कामयाब न हो सके।

सराहत के साथ कहा जा सकता है कि लफ़्ज़े मौला इस हदीस में बल्कि अक्सर मक़ामात पर एक से ज़्यादा माअना नही देता और वह “औलवियत और शायस्तगी ” है। दूसरे अलफ़ाज़ में मौला के मअना “सरपरस्ती” है। क़ुरआन में बहुतसी आयात में लफ़्ज़े मौला सरपरस्ती और औला के माअना में इस्तेमाल हुआ है।

क़ुरआने करीम में लफ़्जे मौला 18 आयात में इस्तेमाल हुआ है जिनमें से 10 मुक़ामात पर यह लफ़ज़ अल्लाह की मौलाइयत उसकी सरपरस्ती और औलवियत के मअना में इस्तेमाल हुआ है। याद रहे कि लफ़ज़े मौला बहुत कम मक़ामात पर दोस्त के मअना में इस्तेमाल हुआ है।

इस बुनियाद पर “मौला” के अव्वल मअना औवला मे शको तरदीद नही करनी चाहिए। हदीसे ग़दीर में भी लफ़्ज़े “मौला” औलवियत के मअना में इस्तेमाल हुआ है। इसके अलावा इस हदीस के साथ बहुतसे ऐसे क़राइन व शवाहिद हैं जो इस बात को साबित करते हैं कि यहाँ पर मौला से मुराद औलवियत व सरपरस्ती है।

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इस दावे की दलीलें

फ़र्ज़ करो कि लफ़्ज़े “मौला” के लुग़त में बहुत से मअना हैं, लेकिन तारीख के इस अज़ीम वाक़िए व हदीसे ग़दीर के बारे में बहुत से ऐसे क़राइन व शवाहिद मौजूद हैं जो हर तरह के शको शुबहात को दूर करके हुज्जत को तमाम करते हैं।

पहली दलील

जैसा कि हमने कहा है कि ग़दीर के तारीखी वाक़िए के दिन रसूले अकरम (स.) के शाइर हस्सान बिन साबित ने रसूले अकरम (स.) से इजाज़ लेकर आप के मज़मून को अशआर की शक्ल में ढाला। इस फ़सीह, बलीग़ व अर्बी ज़बान के रमूज़ से आशना इंसान ने लफ़ज़े “मौला” की जगह लफ़ज़े इमाम व हादी को इस्तेमाल किया और कहा कि

फ़क़ुल लहु क़ुम या अली फ़इन्ननी । ******************


(11) मौला के मअना


यहाँ पर सबसे अहम मसअला मौला के मअना की तफ़सीर है। जो कि वाज़ाहत मे अदमे तवज्जोह और लापरवाहीयो का निशाना बना हुआ है। क्योंकि इस हदीस के बारे में जो कुछ बयान किया गया है उससे इस हदीस की सनद के क़तई होने में कोई शको तरदीद बाक़ी नही रह जाती।



लिहाज़ा बहाना तरशाने वाले अफ़राद इस हदीस के मअना मफ़हूम में शको तरदीद पैदा करने में लग गये खासतौर पर लफ़्ज़े मौला के माअना में मगर इसमें भी कामयाब न हो सके।



सराहत के साथ कहा जा सकता है कि लफ़ज़े मौला इस हदीस में और बल्कि अक्सर मक़ामात पर एक से ज़्यादा माअना नही देता और वह “औलवियत और शायस्तगी ” है। दूसरे अलफ़ाज़ में मौला के मअना “सरपरस्ती” है। क़ुरआन में बहुतसी आयात में लफ़्ज़े मौला सरपरस्ती और औला के माअना में इस्तेमाल हुआ है।



क़ुरआने करीम में लफ़्जे मौला 18 आयात में इस्तेमाल है जिनमें से 10 मुक़ामात पर यह लफ़ज़ अल्लाह के लिए इस्तेमाल हुआ है। ज़ाहिर है कि अल्लाह की मौलाइयत उसकी सरपरस्ती और औलवियत के मअना में है। लफ़ज़े मौला बहुत कम मक़ामात पर दोस्त के मअना में इस्तेमाल हुआ है।



इस बुनियाद पर “मौला” के दर्ज़ाए अव्वल में औवला के मअना मे शको तरदीद नही करनी चाहिए। हदीसे ग़दीर में भी लफ़्ज़े “मौला” औलवियत के मअना में इस्तेमाल हुआ है। इसके अलावा इस हदीस के साथ बहुतसे ऐसे क़राइन व शवाहिद हैं जो इस बात को साबित करते हैं कि यहाँ पर मौला से मुराद औलवियत व सरपरस्ती है।

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(12) शिया एक आसमानी नाम है



(شيعه) शब्दार्थ कूरआन मजीद में मात्र हज़रत ईब्राहीम खलीलुर रह्मान के लिए व्यबाहर हूआ हैं जैसा कि क़ुरआन मजीद में इर्शाद हुआ हैः


(وان من شيعته لإبراهيم)





यानि शिया पैरुवाने नुह हज़रत इब्राहीम (अ) के थे, और हज़रत मुहम्मद (स0) मात्र शिया का नाम पैरुवाने व दोस्त दराने हज़रत अली (अ) के लिए उल्लेख किया हैं और उलामाएं सुन्नी ने भी इस विषय के सम्पर्क भी कहा हेः कि शिया एक गौरब नाम है जिस नाम को पैग़म्बरे अकरम (स0) ने फरमाया हैः इस सम्पर्क में ज़ाबिर इब्ने अब्दुल्लह इर्शाद फरमाया हेः कि पैग़म्बरे अकरम (स0) के पवित्र सेवा में बैठा था अचानक़ हज़रत अली (अ) प्रवेश किये आपने फ़रमाया हमारा भाई आया है. सिपास काबा घर की तरफ चेहरा करके आपने दोनों मुबारक हाथों को बुलन्द करके फरमायाः


(शफ़थ हैं उस परवरदिगार का जिसके हाथ में मुहम्मद की जान हैं, अली और पैरुवाने अली क़्यामत के दिन सफलता अर्जन करेगें) और यह गौरब अमीज़ उपाधी रसूल (स0) के यूग में हज़रत सलेमान, अबुज़र, मिक़दाद, और अम्मारे यासिर को कहा जाता था. यह सब हज़रात, हज़रत अली (अ) के वफादार पैरुकार में से थें ।