मजमूअऐ मक़ालाते तारीख़
 




(4) ग़दीर और वहदते इस्लामी(2)



2. इल्मी गुफ़्तुगू, इत्तेहाद का रास्ता हमवार करती है

इस्लामी उम्मत के दरमियान सबसे बड़ा इख्तिलाफ़ इमामत व रहबरी को मसअला है चुनाँचे शहरिस्तानी कहते हैं: इस्लामी उम्मत के दरमियान सबसे बड़ा इख्तिलाफ़ इमामत का मसअला है, क्योकि इस्लाम के किसी भी मसअले में इमामत के मसले की तरह तलवार नही उठाई गयी है।
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लिहाज़ा हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि मुसलमानों के इत्तेहाद के लिये कोशिश करे, लेकिन इसके मायना यह नही हैं कि ख़ालिस इल्मी और बिला ताअस्सुब गुफ़्तुगू भी न की जाये , क्यो कि इस तरह की बहस व गुफ़्तुगू मुसलमानो के इत्तेहाद पर असर अंदाज़ होती है, जब मुसलमानो का कोई एक फिरक़ा दूसरे फ़िरक़े के हक़ीक़ी अक़ायद को समझ जाता है और यह समझ लेता है कि इस फ़िरक़े के अक़ायद क़ुरआन व सुन्नत और अक़्ल से मुस्तनद है तो फिर एक दुसरे में बुग़्ज़ व हसद कम हो जाता है, कीना व दुश्मनी का एक अज़ीम हिस्सा इस वजह से होता है कि मुसलमान एक दुसरे के अक़ायद से बेख़बर हैं या उनको बिला दलील मानते हैं, अगर शियों की तरफ़ बदा के अक़ीदों की वजह से कुफ़्र की निसबत दी जाती है और तक़ैय्ये को निफ़ाक़ क़रार दिया जाता है तो इसकी वजह यह है कि दूसरे इस अक़ीदे और अमल से बाखबर नही हैं, जिस में कुछ तो हमारी भी कमी होती है कि हमने अपने अक़ायद को सही तौर पर पेश नही किया है, इमामत का मसअला भी इस मौज़ू से अलग नही है कि अगर अगर अहले सुन्नत इमामत के मसअले में शिया असना अशरी ऐतेक़ाद और उसके शरायत को ग़ुलू कहते हैं तो इसकी वजह भी यह है कि हमने इल्मी और सही तौर से इमामत के मसअले को नहै पहचनवाया और जब हमने अच्छा किरदार अदा किया तो हमें कामयाबी भी मिली और मुसलमानों के दरमियान इत्तेहाद बरक़रार भी रहा। चुनाँचे इसके चंद नमूने यहाँ बयान किये जाते हैं। (अलमेलल वन नेहल जिल्द 1 पेज 24)

(अ) हक़ की तरफ़ रग़बत

1. शेख महमूद शलतूत, अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के साबिक़ सद्र, शिया फ़िक्ह और अहले बैत (अ) की मरजईयत के बारे में काफ़ी तहक़ीक़ और मुतालआ के बाद फ़िक्ह जाफ़री को मोतबर मान लेते हैं और फिक़्ह जाफ़री पर अमल करने का फ़तवा दे देते हैं, चुनाँचे मौसूफ़ फ़रमाते हैं: मज़हबे जाफ़री जो शिया असरी अशरी के नाम से मशहूर है। उस पर अमल करना अहले बैत के दूसरे मज़ाहिब की तरह शरई तौर पर जायज़ है, लिहाज़ा मुसलमानों के लिये मुनासिब है कि इस मज़हब को पहचानें और बाज़ फ़िरकों के बेज़ा ताअस्सुब से निजात हासिल करें।
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इस्लामुना, राफिई पेज 59, मजल्लए रिसालतुल इस्लाम तारीख़ 13 रबीउल अव्वल 1378 हिजरी क़ाहिरा।

2. शेख़ अज़हर डाक्टर मुहम्मद फ़ख्खा़म भी शेख़ शलतूत के फ़तवे पर तक़रीज़ लिखते हुए उनके नज़रिये की ताईद करते हैं, चुनाँचे मौसूफ़ कहते हैं: मैं शेख महमूद शलतूत और उनके अख़लाक़, वसीअ ईल्म, अरबी ज़बान, तफ़सीर क़ुरआन और फ़िक़्ह व उसूल में महारत पर रश्क करता हूँ, मौसूफ़ ने शिया इमामिया की पैरवी करने का फ़तवा दिया है, मुझे ज़रा भी इस बात में शक नही है कि उनके फ़तवे की बुनियाद मज़बूत है और मेरी अक़ीदा भी यही है।
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फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया पेज 64

इसी तरह मौसूफ़ कहते हैं: ख़ुदा वंदे आलम रहमत नाज़िल करे शेख शलतूत पर कि उन्होने इस हक़ीकत पर तवज्जो की और दिलेरी के साथ साफ़ साफ़ फ़तवा दिया और अपने जावेदाना बना लिया, उन्होने शिया इमामिया मज़हब की पैरवी करने का फ़तवा दिया, क्योकि यह मज़हब फ़िक्ही और इस्लामी मज़हब है क़ुरआन व सुन्नत और मज़बूत दलाइल पर कायम है।
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3. शेख मुहम्मद ग़ज़ाली कहते हैं: मैं इस बात का अक़ीदा रखता हूँ कि उस्तादे कबीर शेख महमूद शलतूत ने मुसलमानों को क़रीब करने के सिलसिले में एक बहुत तूलानी रास्ता तय किया है... उनका अमल दर हक़ीक़त उन ख़्यालात की तकज़ीब है जो बाज़ मग़रिबी मुवर्रेख़ीन अपने ज़हनों में समाये हुए हैं, चुनाँचे वह इस ख़्याल में थे कि मुसलमानों के दरमियान जो बुग़्ज़ व कीना और दुश्मनी पाई जाती है उसके पेशे नज़र उनको वहदत तक पहुचने और एक परचम के नीचे जमा होने पहले और मुतफ़र्रिक़ और एक दूसरे से जुदा करके नीस्त व नाबूद कर दिया जाये लेकिन मेरी नज़र में यह फ़तवा पहला क़दम और इब्तेदाए राह है। ()

() देफ़ा अनिल अक़ीदा वश शरीया पेज 257

4. अब्दुल रहमान नज्जार क़ाहिरा मसाजिद कमेटी के सद्र कहते हैं: ''हम भी शेख शलतूत के फ़तवे का ऐहतेराम करते हुए उसी के मुताबिक़ फ़तवे देते हैं और लोगों को सिर्फ़ मज़हब में मुन्हसिर होने से डराते हैं, शेख शलतूत मुजतहिद और इमाम हैं, उनकी राय ऐने हक़ है फिर हम क्यो अपनी नज़र और फ़तवों में किसी खास मज़हब पर इक्तिफ़ा करें, हालाँकि वह सब मुजतहिद थे?''।
() फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया पेज 66

5. उस्ताद अहमद बुक, जो शेख शलतूत और अबू ज़हरा के उस्ताद थे, कहते हैं: "शिया इसना अशरी सबके सब मुसलमान हैं और ख़ुदा, रसूल, क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम(स) पर नाज़िल होने वाली तमाम चीज़ों पर ईमान रखते हैं, उनके यहाँ क़दीम और असरे हाज़िर में जय्यिद फ़ुक़हा और इल्म व फ़न में माहिर उलामा पाये गये हैं, उन लोगों के अफ़कार अमीक़ और इल्म वसीअ होता था, उनके तालिफ़ात लाखों की तादाद में मौजूद हैं और बहुत ज़्यादा किताबें मेरे इल्म में हैं।"
() तारिख़ित तशरीई इस्लामी।

6. शेख मुहम्मद अबू ज़हरा भी लिखते हैं: इस बात में कोई शक नही है कि शिया एक इस्लामी फ़िरक़ा है.... अपने अक़वाल में क़ुरआने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम (स) से मंसूब अहादीस से तमस्सुक करते हैं, वह अपने सुन्नी पड़ोसियों से दोस्ती रखते हैं और एक दूसरे से नफ़रत नही करते। () तारिखुल मज़ाहिबिल इस्लामिया पेज 39

7. उस्ताद महमूद सरतावी (मिसरी मुफ़्ती) कहते हैं: ''मैं वही बात कहता हूँ जो हमारे सलफ़े सालेह कहते रहे हैं, मैं कहता हूँ कि शिया इसना अशरी हमारे दीनी भाई हैं और हम पर हक़े बरादरी रखते हैंऔर हम भी उन पर हक़े बरादरी रखते हैं।'' () मजल्ल ए रिसाल ए सक़लैन नंबर 2 साले अव्वल 1413 हिजरी पेज 252

8. नीज़ उस्ताद अब्दुल फ़त्ताह अब्दिल मक़सूद कहते हैं: ''मेरे अक़ीदे के मुताबिक़ तंहा मज़हब जो इस्लाम का रौशन आईना है जो शख्स इस्लाम को देखना चाहता है वह शिया अक़ायद व आमाल को देखे, इस बात पर तारीख गवाह है कि शियों ने इस्लामी अक़ायद के दिफ़ा में बहुत ज़्यादा ख़िदमात अंजाम दी हैं।''() फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया।

9. डाक्टर हामिद हनफ़ी दाऊद, क़ाहिरा दानिशकदे में अदबियात अरब के उस्ताद कहते हैं :''हम क़ारेईन केराम के लिये यह बात वाज़ेह कर देना चाहते हैं कि अगरचे सुफ़यानी मुन्हरेफ़ीन ने गुमान किया है कि शिईयत एक जाली और नक़ली मज़हब है या ख़ुराफ़ात व इसराईलियात से भरा हुआ है या अब्दुल्लाह इब्ने सबा तारीख़ की दूसरी ख़्याली शख्सियतों से मंसूब है लेकिन ऐसा नही है बल्कि शिईयत आज की नई इल्मी रविश में इस चीज़ के बरअक्स है जो उन्होने गुमान किया है, शिया सबसे पहला वह मज़हब है जिसने मन्क़ूल व माक़ूल पर खास तवज्जो की है और इस्लामी मज़ाहिब के दरमियान उस राह का इंतेखाब किया है कि जिसका उफ़ुक़ वसीअ है और अगर मंक़ूल व माक़ूल में शियों का इम्तियाज़ न होता तो फिर इज्तेहाद में दोबारा रूह नही फूँकी जा सकती थी और मौक़ा व महल से अपने को मुताबिक़ नही किया जा सकता था और वह भी इस तरह से कि इस्लामा शरीयत की भी कोई मुख़ालिफ़त न हो।''() नज़रात फ़िल कुतुबिल ख़ालिदा पेज 32

इसी तरह मौसूफ़ ने किताब अब्दुल्लाह बिन सबा पर तक़कीज़ लिखते हुए कहा: ''इस्लामा तारीख को 13 सदिया गुज़रने वाली हैं और हमेशा शियों के खिलाफ़ फ़तवे सादिर होते हुए देखा गया है, ऐसे फ़तवे जिस में हवाए नफ़्स का शायबा पाया जाता था और यह बुरा तरीक़ा इस्लामी फ़िरकों के दरमियान इख़्तिलाफ़ और तफरक़े का बाइस बना, इस तरह इस फ़िरक़े बुज़ुर्ग उलामा की तालिमात से दीगर उलामा ए इस्लाम महरूम हो गये, जिस तरह उनके नज़रियाती नमूनों और उनके और उनके मिज़ाज़ के फवायद से महरूम रह गये, दर हक़ीक़त इस तरह से इल्म व दानिश का बहुत बड़ा नुक़सान हुआ है और सबसे ज़्यादा नुक़सान शियों की तरफ़ ख़ुराफ़ात की निस्बत देने से हुआ है जबकि वह ख़ुराफ़ात शियों के यहाँ नही पाये जाते और शिया हज़रात उनसे बरी हैं और यही आप हज़रात के लिये काफ़ी है कि इमाम जाफर सादिक (अ) (मुतवल्लिद 148 हिजरी) शिया फ़िक्ह के परचमदार और सुन्नियों के दो इमामों के उस्ताद हैं, अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित (मुतवल्लिद 150 हिजरी) और अबू अब्दिल्लाह मालिक बिन अनस (मुतवल्लिद 179 हिजरी) इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के शागिर्द हैं, इसी वजह से अबू हनीफ़ा यह कहते हुए नज़र आते हैं: ''लौलस सनतान ल हलकन नोमान'' अगर वह दो साल न होते तो नोमान (अबू हनीफ़ा) हलाक हो जाते, उन दो सालों से मुराद वह दो साल हैं जिन में इमाम सादिक़ (अ) के वसीअ इल्म से फ़ैज़ हासिल किया है, इसी तरह अनस बिन मालिक कहते हैं: मैने किसी इमाम सादिक़ (अ) से ज़्यादा फ़क़ीह नही देखा। () अब्दुल्लाह बिन सबा जिल्द 1 पेज 13

10. डाक्टर अब्दुल्लाह कयाली हलब की मशहूर व मारूफ़ शख्सियात अल्लामा अमीनी अलैहिर्रहमह को एक ख़त में तहरीर करते हैं: ''आलमे इस्लाम इस तरह की तहक़ीक़ात का हमेशा मोहताज रहा है, क्योकि रसूले आज़म (स) की वफ़ात के बाद मुसलमानों के के दरमियान इख्तिलाफ़ हो गया जिसके नतीजे में बनी हाशिम अपने हक़ से महरूम कर दिये गये? नीज़ इस बात की ज़रूरत है कि मुसलमानों को पस्ती और तनज़्ज़ुली में ले जाने वाले असबाब और वुजूहात की गुफ़्तुगू की जाये, आज मुसलमानों का यह क्या हाल है? क्या यह मुम्कन है कि मुसलमानों के हाथ से खोये हुए इल्म व दानिश को अस्ल तारीख़ की तरफ़ रुजू करते हुए दोबारा हासिल किया जा सकता है।'' () अल ग़दीर जिल्द 4 पेज 4 से 5

11. उस्ताद अबुल वफ़ा ग़नीमी तफ़ताज़ानी (अल अज़हर कालेज में इस्लामी फ़लसफ़े के मुद्दर्रिस) कहते है: ''दुनिया में मग़रिब व मशरि़क़ के क़दीमी और असरे हाज़िर में बहस करने वाले शियों के खिलाफ़ बहुत सी गलत बातों के मुरतकिब हुए हैं जो किसी भी मन्क़ूला दलील के मुताबिक़ नही है, अवामुन नास ने भी उन ग़लत बातों को एक हाथ से दूसरे हाथ तक पहुचाया बग़ैर इसके उनके सही या गलत होने के बारे में किसी मोतबर आलिम से सवाल करें और हमेशा शियों पर तोहमतों की बौछार की, शियों की निस्बत ना इंसाफ़ी रवा रखने वाले असबाब व ऐलल में शियों के मनाबे व माखज़ से ला इल्मी है और उन पर लगाई जाने वाली तोहमतों पर सिर्फ़ शिया दुश्मन मोवल्लिफ़ीन की किताबों को देखा है।'' () मा रिजालिल फ़िक्र फ़िल क़ाहिरा पेज 40


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(5) 18 ज़िल हिज्जा को ईद क्यों?


अली अब्बास हमीदी

बाज़ हज़रात की आदत हर बात में सवाल ईजाद करना होती है मगर कभी कभी कुछ ऐसे सवाल भी होते हैं जो इंसान को रौशनी में लाकर अंधेरों से छुटकारा दिला देते हैं। ऐसे सवालों का ताल्लुक़ अक़ीदे से होता है उन्ही में से एक सवाल यह भी है कि हम 18 ज़िल हिज्जा की तारीख़ में ईद क्यों मनाते हैं? यह सवाल अपनों और बेगानों दोनों ही के लिये हिदायत का सबब बन सकता है। 18 ज़िल हिज्जा की तारीख़ में ग़दीर की तारीख़ी और ऐतेक़ादी हक़ीक़त अपनी जगह मगर फ़लसफ़ ए ईद ख़ुद एक मुस्तक़िल मौज़ू है जिस पर गुफ़तुगू की जानी चाहिये।

ईद का ताल्लुक़ ख़ुशी और मसर्रत से है और ग़दीर का ताल्लुक़ इस्लाम से। इस जुमले से कम से कम यह बात तो वाज़ेह हो जाती है कि ग़दीर के दिन ईद मनाने का सवाल फ़क़त मुसलमानों ही में पैदा होता है गै़र मुस्लिमों को इस से कोई सरोकार नही। अगरचे एक ऐतेबार से यहूदियों, ईसाईयों और पारसियों को 18 ज़िल हिज्जा की तारीख़ में मुसलमानों के साथ ईद मनाने का हक़ हासिल हो जाता है वह इस लिये कि जिस वजह से मुसलमानों को इस दिन ईद मनानी चाहिये वही वजह उन के यहाँ भी मौजूद है और वह यह कि क़मरी सन् हिजरी के महीनों को जब रूमी, हिन्दी, ईसवी और फ़ारसी महीनों से तत्बीक़ दी जाती है तो 18 ज़िल हिज्जा सन् 10 हिजरी की मुबारक तारीख़ उन के लिये ख़ुशी का रोज़ बन जाती है। पारसियों की बड़ी ईद यानी नौरोज़ 10 हिजरी में 18 ज़िल हिज्जा ही के रोज़ थी और इसी तारीख़ में हज़रत मूसा (अ) ने फ़िरऔन के जादूगरों पर कामयाबी हासिल की और इसी तारीख़ में उन्होने जनाबे यूशा (अ) को अपना वसी बनाया। हज़रत इब्राहीम (अ) के लिये आग भी उसी रोज़ गुलज़ार बनी थी और इत्तेफ़ाक़ की बात तो यह भी है कि एक ऐहतेमाल के मुताबिक़ हज़रत इब्राहीम (अ) को ग़दीर ही के मक़ाम पर आग में डाला गया था। हज़रत ईसा (अ) ने उसी तारीख़ में जनाबे शमऊन (अ) को अपनी वसी और जानशीन बनाया। हज़रत सुलेमान (अ) ने भी उसी तारीख़ में तमाम लोगों के दरमियान जनाबे आसिफ़ बिन बरख़िया (अ) के लिये अपने ख़िलाफ़त और जानशीनी का ऐलान फ़रमाया। तारीख़ इस दिन को हज़रत शीस (अ) और हज़रत इदरीस (अ) के दिन से भी याद करती है। आसमान वालों में यह तारीख़ अहदे मअहूद और ज़मीन वालों में मीसाक़े मअख़ूज़ के नाम से याद की जाती है।

यहाँ तक कोई बात साबित हो या न हो लेकिन यह बात ज़रुर साबित हो जाती है कि अगर दुनिया वाले मिल जुल कर किसी एक दिन ख़ुशी मनाना चाहें तो 18 ज़िल हिज्जा की तारीख़ अपने दामन में वह वुसअत रखती है कि सारी कायनात उस दिन को ईद का उनवान दे सकती है अगर तमाम अदयान इस दिन को अपने अपने अक़ीदों के साथ ईद का रंग दें दें तो पूरे आलम में तमाम इंसान एक साथ ख़ुशी मना कर इंसानियत के हसीन चेहरे पर मसर्रत के नुक़ूश वाज़ेह तौर पर मुलाहेज़ा कर सकते हैं।

अगर दीगर अदयान के पैरों हमारी इस दावत पर लब्बैक न कहें और वह इसी बात को अपनी अकसरियत या किसी और दलील के तहत अपनी किसी मज़हबी ईद की तारीख़ से तत्बीक़ करें तो इख़्तेलाफ़ की सूरत का अपनी जगह बाक़ी रहना अक़्ली अम्र है मगर तमाम ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद रसूलल्लाह पढ़ने वालों इस दिन मिल कर ईद मनानें में कोई क़बाहत नही होनी चाहिये। अगर वह यह कहें कि मुसलमान तो ईदे फ़ित्र, ईदे क़ुरबान और जुमें की शक्ल में एक साथ ईद मनाते हैं तो फिर इस की क्या ज़रुरत है कि 18 ज़िल हिज्जा को मिल कर एक नई ईद मनाई जाये? तो इस के जवाब में हम यह कहेगें कि यह तमाम ईदें मुसलमानों की मुत्तफ़क़ अलैह ईदें हैं मगर यह ईदें बस किसी एक मुनासिबत की याद से मुतल्लिक़ हैं लेकिन 18 ज़िल हिज्जा बहुत सी यादों की अमीन है। उस दिन में गुज़िश्ता अंबिया ने ईद मनाई है अल्लाह की तरफ़ से गुज़िश्ता उम्मतों में यह दस्तूर रहा है कि हर नबी की बेसत और उसके वसी की ख़िलाफ़त के ऐलान के रोज़ ख़ुशी मनाई जाये और ईद के जश्न का ऐहतेमाम किया जाये। 27 रजब ईदे ऐलाने बेसते ख़त्मुल मुरसलीन और 18 ज़िल हिज्जा ईदे ऐलाने विलायते अमीरुल मोमिनीन (अ) का ख़ूबसूरत दिन है इसी लिये इस्लाम ने इस दिन को ईदे अकबर के लक़्ब से सरफ़राज़ फ़रमाया है और मुसलमानों के लिये आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्ललाहो अलैहे वा आलिही वसल्लम ने अपनी उम्मत के लोगों के दरमियान इसी तारीख़ में अक़दे उख़ूव्वत पढ़ा था लिहाज़ा आज फिर मुसलमानों को इस दिन एक साथ जमा हो कर सीग़ ए उख़ूव्वत पढ़ कर ईद मनाना चाहिये।

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(6) मारेकए बद्र व ओहद और शोहदा ए करबला


मुशाहिद आलम

ख़ुदा की जानिब से एक मोमिने कामिल के लिये बेहतरीन तोहफ़ा और हदिया मौत के अलावा कुछ और नही हो सकता है। लेकिन अगर उस की सूरत बदल जाये, बिस्तर के बजाए मैदान और राहे ख़ुदा में जंग व जिहाद करता हुआ कोई मुजाहिद मौत को गले लगा ले तो उसे दीनी सक़ाफ़त और अहले बैत (अ) के बुलंद व बाला फ़रहंग में सुर्ख़ मौत से ताबीर किया जाता है।

जहाँ मुजाहिद ख़ुद अपने ही ख़ून में ग़लताँ, मुलाक़ाते परवरदिगार के लिये दौड़ता है, बल्कि फ़रहंगे अहले बैत (अ) में शहादत, बसीरत व आगाही के साथ मौत के इंतेख़ाब का नाम है। ऐसे में मौत मुजाहिद राहे ख़ुदा का तआक़ुब नही करती, बल्कि ख़ुद मुजाहिद मौत का पीछा करता है।

वह मारेकए बद्र व ओहद हो या मारेकए करबला, दोनो जगह एक मुजाहिद सोच समझ कर मौत की तरफ़ बढ़ता हुआ नज़र आता है। इस लिये कि जब इमामे मासूम (अ), हाकिमे आदिल उम्मत को जिहाद के लिये बुलाए तो हर बा बसीरत के लिये दुनिया बे लुत्फ़ हो जाती है और वह बे सबराना सदाए हक़ को लब्बैक कहता है। मदीने का वह नव दामाद, जिस ने सिर्फ़ एक रात अपनी नव अरुस के साथ गुज़ारी, जब उस की बसीरत की आँख़ें खुल गयीं तो वह एक रात की बियाही दुल्हन को ख़ैर बाद कह कर मैदाने बद्र में पहुच कर अरुसे शहादत को गले लगा लेता है। यहाँ तक कि हुज़ूरे अकरम (स) बशारत देते हैं कि इस नव दामाद को कोई और नही बल्कि फ़रिश्ते ग़ुस्ल देते हैं और उस जवान को ग़सीलुल मलाएका का ख़िताब मिलत है। सच तो यह है कि बद्र व ओहद के बा ईमान सूरमा न होते तो इस्लाम की पुश्त मज़बूत न होती और अगर उन्ही जज़्बात से सरशार नवास ए रसूल (स) हुसैन बिन अली अलैहिमस सलाम के पाए रकाब में मुजाहेदिने करबला वक़्त के इमामे आदिल और पेशवा के पीछे पीछे हरकत न करते तो बद्र से क़वी व मज़बूत बन कर उभरने वाला इस्लाम फिर शाम के कुफ़्र व निफ़ाक़ आलूद लश्कर के मुक़ाबले में सुस्त व ज़ईफ़ हो जाता। लिहाज़ा करबला के मुजाहिदीन ने अपने वक़्त के इमाम की आवाज़ पर यूँ लब्बैक कही कि दश्ते नैनवा में आते हुए कुफ़्र व ज़लालत के नुमाईदों में हलचल मच गई।

इधर जवारे हुसैनी में मौजूद एक एक सिपाही अपनी अपनी जगह उसी शान व शौकत के साथ मैदाने नबर्द में जाने के लिये बेताब था, जिस तरह नबी ए अकरम (स) की क़यादत में शोहदा ए बद्र पेश क़दमी कर रहे थे।

मगर इस फ़र्क़ के साथ कि वहाँ सब शहीद न हुए, बल्कि कुछ मुजाहिदीन बच भी गये और सिपाह सालारे इस्लाम (यानी सरवरे कायनात (स)) महफ़ूज़ रहे मगर करबला वह मारेक ए हक़ व बातिल है, जहाँ हर मुजाहिद अपने इमाम के हाथों पर बैअत करने के बाद दुनिया से बेगाना हो गया और सभी असहाब को मरगे गुल रंग (शहादत) को गले लगाने का शौक़ उन के वुजूद में लबरेज़ हो गया, यहाँ कि बुढ़े, जवान, नौजवान, बच्चे सब के सब इस अज़्म व इरादे पर मुसम्मम हो गये, न तो मुजाहिदीन को दुनिया की हवस है व क़ायद में बाक़ी रहने की तमन्ना, इस की वजह यह है कि बद्र में क़ायद व सिपाह सालार का बाक़ी रहना बस हिकमत के मुताबिक़ था और मारेक ए करबला में क़ायद व रहबर यानी इमाम हुसैन (अ) का शहीद हो जाना ही इस्लाम के हक़ में मुफ़ीद था। इस लिये सरकारे सैयदुश शोहदा ने मुख़्तलिफ़ ख़ुतबों में अपने साथियों से ख़िताब करके फ़रमाया: मौत बनी आदम के गले का हार है, जिस तरह दुल्हन अपने गले में हार डालती है।

और फिर फ़रमाया ............................. सुबहे आशूर अपने असहाब से हज़रत सैयदुश शोहदा यूँ गोया हुए:

ऐ करीम लोगो, सब्र से काम लो, इस लिये कि मौत तुम्हारे लिये एक पुल है, जिस से तुम सख़्तियों और मुसीबतों से उबूप कर के ख़ुदा की वसीअ व अरीज़ जन्नत और उस की दायमी नेमत के हक़दार होने वाले हो।

सच तो यह है कि करबला वालों ने शहादत को फिर से ज़िन्दा कर के उस के मफ़हूम से दुनिया वालों को रु शनास करा दिया। लिहाज़ा हमारा सलाम हो उन मुक़द्दस व पाकीज़ा अज़्म व हौसले पर।

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(7) काबा का इफ़्तेखार और कर्बला की मंज़िलत


अल्लाह ने काबे की निसबत अपनी तरफ़ दी है इसलिये वह उसका घर कहा जाता है हालाँकि यह इज़ाफ़त ऐज़ाज़ी व इज़ाफ़ी है इसलिये कि अल्लाह का कोई मकान नही है और उसे मकान की ज़रूरत भी नही है। लेकिन फिर भी उसने उस इलाक़े को ज़मीन की गहराईयों से लेकर आसमान की बुलंदियों तक के लिये शराफ़त अता की है और उसे अपने नाम से मनसूब किया है।

काबा, अज़मत व शराफ़त की उस मंज़िल पर पहुँच गया कि अल्लाह ने उसको मोहतरम क़रार दिया है और उसकी ज़ियारत करने वालों को हुक्म दिया है कि शहरे मक्का और उस घर में दाख़िले के लिये अपने कपड़ों को उतार कर फेक दो और एहराम (हज के मख़सूस कपड़े) के साथ दुनिया की बहुत सी जायज़ लज़्ज़तों को छोड़ कर इसमें दाख़िल हो जाओ। एक दिन काबे ने दूसरी ज़मीनों से कहा: मैं तुमसे ज़्यादा बेहतर हूँ। इस तरह उसने अपनी बेहतरी का ज़िक्र किया है। हदीस में आया है कि अल्लाह ने काबा से कहा: ख़ामोश हो जाओ, तुम से ज़्यादा बेहतर और बा फ़ज़ीलत कर्बला है। (1)

अल्लाह ने काबा को अपना घर क़रार दिया है। लेकिन कर्बला क्या है? कर्बला में क्या ख़ुसूसियत है ? दूसरी ज़मीनों ने कर्बला से कहा: तुम्हारी क्या राय है कर्बला ने कहा: यह ख़ूबी मेरे अल्लाह ने मुझे दी है वर्ना मैं ख़ुद कुछ नही हूँ।

काबा की ‘मैं’ और कर्बला के जवाब का मक़सद ढ़ूढ़ना चाहिये। यह बात इसलिये बयान हुई है कि ताकि मक़ामे अमल में ख़ुद को कुछ नही समझना चाहिये और इस राह में जो भी काम अँजाम दें उसको अल्लाह की इनायत समझना चाहिये।

अगर मजलिस करने में कामयाब होते हैं तो इमाम हुसैन (अ) के लिये काम अँजाम देना चाहिये और इस राह में थकान महसूस नही करनी चाहिये, अज़ादारी मे शिरकत करके कहना चाहिये अल हम्दुलिल्लाह कि अल्लाह ने हमें तौफ़ीक़ दी। अल हम्दुलिल्लाह कि इमाम हुसैन ने हम पर लुत्फ़ किया। अल्लाह की तौफ़ीक़ हुई जो हमने इमाम हुसैन (अ) की राह में यह थकन बर्दाश्त की।



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(1) यही मज़मून मतलब के इख़्तेलाफ़ के साथ मुख़तलिफ़ किताबों में ज़िक्र हुआ है जैसे कामिलुज़ ज़ियारात पेज 455 हदीस 690.

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