मजमूअऐ मक़ालाते तारीख़
 




(3) ग़दीर और वहदते इस्लामी(1)



असरे हाज़िर में बाज़ लोग ग़दीर और हज़रते अली अलैहिस्सलाम की इमामत की गुफ़्तुगू (चूँकि इसको बहुत ज़माना गुज़र चुका है) को बेफ़ायदा बल्कि नुक़सानदेह समझते हैं, क्योकि यह एक तारीखी वाक़ेया है जिसको सदियाँ गुज़र चुकी हैं। यह गुफ़्तुगू करना कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्ललाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) का जानशीन कौन था और है? हज़रत अली इब्ले अबी तालिब या अबू बक्र? आज इसका कोई फ़ायदा नही है बल्कि बाज़ अवक़ात इस सिलसिले में गुफ़तुगू के नताइज में फ़ितना ब फ़साद बरपा होता है, उसके अलावा कोई फ़ायदा नही है। दूसरे अल्फ़ाज़ में यूँ कहा जाये: इस ज़माने में इस्लामी फ़िरक़ों के दरमियान वहदत की वाज़ेह ज़रूरत है तो फिर इस तरह की इख़्तेलाफ़ी गुफ़्तुगू क्यों की जाती है?.....

हम ख़ुदा वन्दे आलम के लुत्फ़ व करम से असरे हाज़िर में "इमामत" के आसार व फ़वायद के लिये चंद चीज़ों को बयान करते हैं:

1. वहदत की ह़कीक़त

चूँकि ऐतेराज़ करने वाले लफ़्ज़े वहदत पर बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं लिहाज़ा पहले इस लफ़्ज़ की हक़ीक़त को वाज़ेह करना ज़रूरी है।

आम तौर पर दो इस्तेलाहें हमारे यहाँ पाई जाती हैं जिन पर ग़ौर व फ़िक्र करना ज़रूरी है और उनमें एक दूसरे पर क़ुर्बान नही करना चाहिये, उनमें से एक वहदत और उम्मते इस्लामिया के इत्तेहाद को महफ़ूज़ रखना है और दूसरी चीज़ अस्ले इस्लाम की हिफ़ाज़त है।

इस हक़ीक़त में कोई शक नही है कि हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि दीने हनीफ़ (हक़ीक़ी दीन) को हिफ़्ज़ और उसको फैलाने की कोशिश करे, लिहाज़ा यह सभी की अहम ज़िम्मेदारी है।

इसी तरह चूँकि मुसलमानों के बहुत से मुशतरक दुश्मन हैं जो चाहते हैं इस्लाम और मुसलमानों को नीस्त व नाबूद कर दें लिहाज़ा हमें चाहिये कि सब मुत्तहिद होकर इस्लाम के अरकान और मुसलमानों की हिफ़ाज़त की कोशिश करें, लेकिन इसके यह मायना नही है कि दूसरी ज़िम्मेदारियों को पशे पुश्त डाल दें और इस्लाम के मुसल्लम हक़ायक़ को बयान न किया जाये। लिहाज़ा वहदत और इत्तेहाद के मसले को असली हदफ़ क़रार नही देना चाहिये और शरीयत के हक़ायक़ को इत्तेहाद पर क़ुर्बान नही करना चाहिये, बल्कि उसके बर ख़िलाफ़ अगर इस्लाम ने मुसलमानों के दरमियान ताकीद की है तो इसकी वजह भी दीने इस्लाम की हिफ़ाज़त बयान की है, अब यह कैसे मुम्किन है कि किसी की नज़र में बहदत का मसअला इतना अहम दिखाई दे कि बाज़ दीनी मुसल्लमात और मज़हब के अरकान को तर्क कर दे या बेजा और फुज़ूल की ताविलात की जाये।

इस ह़कीक़त पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) की सीरत और तारीख़ बेहतरीन गवाह है, आँ हज़रत (स) अगरचे यह जानते थे कि बनी उमय्या हज़रत अली (अ) और बनी हाशिम के मुख़ालिफ़ हैं और बहुत से लोग हज़रत अली (अ) की विलायत और हुक्मरानी को क़बूल नही करेगें और आपकी इमामत के कभी भी कबूल नही करेगें, लेकिन इस वजह से आँ हज़रत (स) ने हक़ व हक़ीक़त को बयान करने से गुरेज़ नही किया। ऐसा नही है कि हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत को बयान किया हो, बल्कि अपनी बेसत के 23 साल में जैसे भी मुमकिन हुआ हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत को असहाब के सामने बयान किया जबकि आँ हज़रत (स) इस बात पर यक़ीन रखते थे कि यह लोग मेरी वफ़ात के बाद इस मसअले पर इख़्तिलाफ़ करेगें, बल्कि यह इख़्तिलाफ़ हज़रत इमामे ज़माना (अ) के ज़हूर तक बाक़ी और जारी रहेगा। आँ हज़रत (स) ने इन तमाम चीज़ों के बावजूद भी हक़ को बयान किया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) हालाकि जानते थे कि हज़रत अली (अ) के इमामत को मसअले पर क़यामत तक इख़्तिलाफ़ रहेगा फिर भी आँ हज़रत (स) ने इस तरह हज़रत अली (अ) की इमामत की ताकीद फरमाई यहाँ तक कि रोज़े ग़दीर शक व शुब्हे को दूर करने के लिये हज़रत अली (अ) के हाथों को उठा कर उनको अपना जानशीन मुक़र्रर किया और आपकी विलायत पर ताकीद फरमायी।

क़ारेईने केराम, यहाँ तक की बातों से यह बात बिल्कुल वाज़ेह हो जाती है कि हक़ व हक़ीक़त को बयान करना अस्ल है और कभी भी इसको नज़र अंदाज़ नही करना चाहिये। यहाँ तक कि अगर हमें मालूम हो कि इसको बयान करने की वजह से मुसलमानों की सफ़ों में इख्तिलाफ़ हो जायेगा और मुसलमानों के दरमियान दो गिरोह हो जायेगें, लेकिन इसके यह मायने नही हैं कि मुसलमान एक दूसरे के दुश्मन हो जायें और एक दूसरे को नीस्त व नाबूद करने की फ़िक्र में लग जायें, बल्कि अपना मुद्दआ बयान करने के साथ साथ एक दूसरे की बातों को भी बर्दाश्त करने का भी हौसला रखें और बेहतरीन गुफ़तार की पैरवी करने की दावत दें, लेकिन इस हाल में मुश्तरक दुश्मन से ग़ाफ़िल न हों।

हज़रत इमाम हुसैन (अ) का क़याम हमारे मुद्दआ पर बेहतरीन गवाह है, क्योकि इमाम हुसैन (अ) हाला कि जानते थे कि मेरे क़याम से मुसलमानों के दो गिरोह में इख्तिलाफ़ होगा। लेकिन इस सूरत में भी मुसलमानों के इत्तेहाद की वजह से अम्र बिल मारूफ़ व नहयी अनिल मुन्कर जैसे अहम उसूल से ग़ाफ़िल नही हुए।

हज़रत अली (अ) की सीरत भी इसी मतलब की तरफ़ इशारा करती है, क्यो कि बाज़ लोगों के नज़रिये के मुताबिक़ हज़रत अली (अ) तलहा व ज़ुबैर और मुआविया को बेजा ओहदा देकर जंगे जमल व जंगे सिफ़्फ़ीन को रोक सकते थे और इस काम के ज़रिये मुसलमानों के दरमीयान होने वाले इख्तिलाफ़ की रोक थाम कर सकते थे। जिसके नतीजे में हज़ारों लोगों की जान बच जाती। लेकिन हज़रत अली (अ) ने उसूले इस्लाम, हक़ व हक़ीक़त से और शरीयते इस्लामिया की हिफ़ाज़त के लिये उन हक़ायक़ से चश्म पोशी नही की।

लिहाज़ा वहदत की हक़ीक़त (या दूसरे लफ़्ज़ों में इत्तेहाद) के मायना यह हैं कि अपने मुसल्लम अक़ायद को महफ़ूज़ रखते हुए मुश्तरक दुश्मन के मुक़ाबले में हम आवाज़ रहें और दुश्मन से ग़फ़लत न बरतें। इसके यह मायना नही है कि ख़ालिस इल्मी गुफ़्तुगू और ताअस्सुब से ख़ाली बहस से भी परहेज़ करें, क्यो कि यह तमाम चीज़ें दर हक़ीक़त शरीयते इस्लामिया की हिफ़ाज़त के लिये हैं।

इसी वजह से जब जंगे सिफ़्फीन में हज़रत अली (अ) से नमाज़ के वक्त के बारे में सवाल किया गया और उस सवाल के बाद कि इस जंग के मौक़े पर क्या यह नमाज़ को वक्त है? तो इमाम अली (अ) ने फ़रमाया: क्या हम नमाज़ के अलावा किसी दूसरी चीज़ के लिये जंग कर रहे हैं? लिहाज़ा कभी भी हदफ़ को वसीले और ज़रिये पर क़ुर्बान न किया जाये।

शेख मुहम्मद आशूर, अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के सिक्रेटॅरी और अंदीश ए तक़रीबे मज़ाहिब कमेटी के सद्र एक बेहतरीन और मंतीक़ी गुफ़्तुगू में कहते हैं: इस्लामी मज़ाहिब के दरमीयान गुफ़्तुगू के नज़िरये का मक़सद यह नही है कि तमाम मज़हबों को एक कर दिया या किसी एक फ़िरकें से दूसरे फ़िरक़े की तरफ़ रग़बत दिलाई जाये, अगर यह मायना किये जायें तो फिर क़ुरबत का नज़रिया बेफ़ायदा हो जायेगा। क़ुरबत का नजरिया इल्मी गुफ़्तुगू की बुनियाद पर होना चाहिये ताकि इस इल्मी असलहे के ज़रिये ख़ुराफ़ात से जंग की जा सके और हर मज़हब व फ़िरक़े के उलामा और दानिशवर अपनी इल्मी गुफ़्तुगू में अपने इल्म को दूसरों के सामने पेश करें। ताकि इंसान चैन व सुकून के माहौल में हक़ीक़त से आगाह हो जाये और आसानी से किसी नतीजे पर पहुच जाये। (बाज़ ख़्वानी अंदेश ए तक़रीब, इसकंदरी पेज 32)

हर मज़हब के मानने वालों की मुश्तरक चीज़ों पर निगाह के ज़रिये आलमी मुआशरे में ज़िन्दगी करने वाले फ़िरक़ों के दरमियान तआवुन और हम दर्दी पैदा हो जायेगी और इख्तिलाफ़ी चीज़ों पर एक इल्मी व तहक़ीक़ाती नज़र से हक़ व हक़ीकत तक पहुचने के लिये गुफ़्तगू व तहक़ीक़ को रास्ता हमवार हो जायेगा। चुनाँचे अहले बैत (अ) की विलायत से तमस्सुक के शेआर के साथ साथ शहादतैन के के इक़रार के फ़वायद और फ़िकही लवाज़िमात के नफ़ी नही की जा सकती, जिस तरह वहदते इस्लामी के उनवान के तहत या ताअस्सुब के ख़ातमे के नारे के ज़रिये ईमानी उसूल और उसके फ़वायद और बरकतों से चश्म पोशी नही की जा सकती।

ताअस्सुब की नफ़ी के मायना हक़ायक़ से पीछे हट जाना नही है, बल्कि इल्मी और तहक़ीक़ाती उसूल पर ऐतेक़ादी बुनियाद को क़ायम करना है(चाहे तहक़ीक़ के सिलसिले में हो या गुफ़्तुगू और बहस से मुताल्लिक़ हो) जिसके नतीज में फ़िक्री निज़ाम और मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों के दरमियान एक दुसरे से ताअल्लुक़ात, उलफ़त और हुस्ने ख़ुल्क की बुनियाद क़ायम हों।



2. हक़ीकी इमाम पर ही वहदत मुमकिन है

इस्लाम ने मुसलमानों के दरमियान बहदत व इत्तेहाद पर ज़ोर दिया है जैसा कि क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

1. आयत (सूरह आले इमरान आयत 103) तर्जुमा (और अल्लाह की नेमत को याद करो कि तुम आपस में दुश्मन थे और उसने तुम्हारे दिलों में उलफ़त पैदा कर दी तो तुम उसकी नेमत से भाई भाई बन गये।)

2. आयत (सूरह आले इमरान 105) तर्जुमा (और ख़बर दार उन लोगों की तरह न हो जाओ जिन्होने तफ़रक़ा पैदा किया और वाज़ेह निशानियों के आ जाने के बाद भी इख्तिलाफ़ किया कि उनके लिये अज़ाबे अज़ीम है।

3. आयत (सूरह हुजरात आयत 10) तर्जुमा (बेशक मोमिनीन आपस में भाई भाई हैं।)

4. आयत (सूरह अनआम आयत 159) तर्जुमा (जिन लोगों मे अपने दीन में तफ़रक़ा पैदा किया और टुकड़े टुकड़े हो गये उनसे आप को कोई ताअल्लुक नही है।)

5. आयत (सूरह आले इमरान आयत 103 ) तर्जुमा (और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहो और आपस में तफ़रक़ा पैदा न करो।)

6. आयत (सूरह अनफ़ाल आयत 99)

तर्जुमा (और आपस में इख्तिलाफ़ न करो कि कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा बिगड़ जायेगी।)

7. आयत (सूरह अँबिया आयत 92) तर्जुमा (बेशक यह तुम्हारा दीन एक ही दीन इस्लाम है और मैं तुम सब का परवर दिगार हूँ लिहाज़ा मेरी इबादत करो।)

इस्लामी वहदत और इत्तेहाद के मसअले पर इतनी ताकीद के बावजूद इस नुक्ते से ग़ाफ़िल नही होना चाहिये कि वहदत के लिये एक महवर होना चाहिये या दूसरे अलफ़ाज़ में वहदत और इत्तेहाद तक पहुचने के लिये एक रास्ता होना ज़रूरी है लिहाज़ा वहदत पर ज़ोर देना उसके लिये कोई महवर और रास्ता मुअय्यन किये बग़ैर बेहूदा और बेफ़ायदा है।

कभी भी क़ुरआने सामित तने तन्हा वहदत के लिये महवर नही हो सकता। क्योकि हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) के फ़रमान के मुताबिक़ क़ुरआन में बहुत सी वुजूह मौजूद हैं जिन में हर एक वुजूह को एक लफ़्ज़ पर हम्ल किया जा सकता है, इस वजह से हम देखते हैं कि क़ुरआने करीम आसमानी किताबों को इमाम से ताबीर करता है जैसा कि इरशाद होता है:

आयत (सूरह हूद आयत 17) तर्जुमा (और उसके पहले मूसा की किताब गवाही दे रही है जो क़ौम के लिये पेशवा और इमाम और रहमत थी।)

इसी तरह ख़ुदा वन्दे आलम सुहुफ़े इब्राहीम व मूसा का ज़िक्र करता है, चुनाँचे इरशाद होता है:

आयत (सूरह आला आयत 19) तर्जुमा (इब्राहीम के सहीफ़ों में भी और मूसा के सहीफ़ो में भी।)

लेकिन सिर्फ़ इसी चीज़ पर इक्तिफ़ा नही की बल्कि जनाबे इब्राहीम (अ) का इमामे नातिक़ के उनवान से तआरुफ़ कराया है और इरशाद फ़रमाता है:

आयत (सूरह बक़रा आयत 124) तर्जुमा (और उस वक्त को याद करो जब ख़ुदा ने चंद कलिमात के ज़रिये इब्राहीम का इम्तेहान लिया और उन्होने पूरा कर दिया और उसने कहा कि हम तुम को लोगों का इमाम और क़ायद बना रहे हैं, उन्होने अर्ज़ की कि मेरी ज़ुर्रियत? इरशाद हुआ यह ओहद ए इमामत ज़ालिमीन तक नही जायेगा।)

कारेईने केराम, यहा तक कि गुफ़तुगू से यह बात वाजे़ह हो जाती है कि इमामे सामित जो आसमानी किताबें हैं काफ़ी नही हैं बल्कि उसके साथ साथ इमामे नातिक़ की भी ज़रूरत है जो इख्तिलाफ़ की सूरत में हक़ व हक़ीक़त को बयान करे या दूसरे अलफ़ाज़ में यूँ कहा जाये कि हक़ और इस्लामा वहदत का महवर क़रार पाये।

आयते शरीफ़ा ऐतेसाम () से भी यह नुक्ता बिल्कुल रौशन है, क्यो कि आयत मुसलमानों को हुक्म देती है कि ख़ुदा वंदे आलम की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो, यानी जो चीज़ तुम को यक़ीनी तौर पर ख़ुदा वंदे आलम तक पहुचा दे वह हक़ीक़ी इमाम और इमामे मासूम के अलावा कोई नही है, इस्लामी वहदत के सिलसिले में अहम क़ायदा यह है कि इस इत्तेहाद व वहदत का नतीजा वह हक़ीक़त है जो माहेरीन की दक़ीक़ बहस व तहक़ीक़ के बाद कश्फ़ व रौशन हो।

आयत सूरह आले इमरान आयत 103 तर्जुमा (और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहो और आपस में तफ़रक़ा पैदा न करो।)

वहदत का नतीजा हक़ायक़ से दस्त बरदार होना नही है बल्कि हक़ीक़त की राह में वहदत होना चाहिये, आयते ऐतेसाम, इस्लामा उम्मत में वहदत व इत्तेहाद का मेयार मुअय्यन करते हुए इस अहम राज़ से पर्दा उठा देती है कि उम्मत उस वक्त तक मुत्तहिद नही हो सकती जब तक ..... (अल्लाह की रस्सी) से तमस्सुक न कर लिया जाये और अल्लाह की रस्सी से तमस्सुक उम्मत को तफ़रक़े, फ़ितना व फ़साद और बदबख़्ती की तारीक वादी से निजात देता है।

क़ाबिले तवज्जो नुक्ता यह है कि वहदत के महवर को हब्ल (रस्सी) से ताबीर किया गया है। जिससे रौशन हो जाता है कि रस्सी के दो सिरे होते हैं जिसके एक तरफ़ उम्मत और दूसरी तरफ़ ख़ुदा वंदे आलम है जो ज़मीन व आसमान और इंसान व ग़ैब के दरमियान वास्ता है लिहाज़ा इस इत्तेहाद के वहदत व क़ुत्ब का दायरा आलमे ग़ैब और मलाकूते आला से मुत्तसिल हो ताकि आलमे शुहूद व आलमें ग़ैब से राब्ता बर क़रार कर सके। यहा से यह नतीजा वाज़ेह हो जाता है कि वहदत व इत्तेहाद की कश्ती, हक़ व हक़ीक़त के साहिल पर चले न कि हवा व हवस के साहिल पर, हमारी नज़र में हक़ व हक़ीक़त पर इत्तेहाद होना चाहिये न कि हवा व हवस पर इत्तेफ़ाक़।

इस बेना पर हक़ीक़त उस वाक़ेईयत को कहते हैं जिसका उम्मत के किसी इत्तेफ़ाक़ या इख्तिलाफ़ से ताअल्लुक़ न हो। यह तो उम्मत की ज़िम्मेदारी है कि वह हक़ीक़त को तलाश करे और सभी उसकी पैरवी करें। यानी इस हक़ीक़त को हासिल कर के उस पर मुत्तहिद हो जायें। लिहाज़ा हक़ीक़त उम्म्त के किसी इत्तेफ़ाक का नतीजा नही है कि अगर किसी चीज़ पर मुत्तहिद हो जाये तो वही हक़ हो जाये और अगर किसी चीज़ से मुह मोड़ ले तो वह बातिल बन जाये। जिस तरह से सैयदुश शुहादा हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने बड़ी शुजाअत के साथ इत्तेहाद को दरहम बरहम कर दिया और यज़ीद के ख़िलाफ़ क़याम किया और फ़रमाया:

हदीस (बिहारुल अनवार जिल्द 44 पेज 329)

मैं अपने जद की उम्मत की इस्लाह के लिये निकल रहा हूँ, मैं अम्र बिल मारूफ़ और नहयी अनिल मुन्कर करना चाहता हूँ।

अगर उम्मत का इत्तेफ़ाक़ ही हक़ व हक़ीक़त का मेयार हो तो फिर इस्लाह की कोई ज़रूरत नही थी। इस्लाह व अम्र बिल मारुफ़ व नहयी अनिल मुन्कर इस बात पर मज़बूत दलील है कि हक़ व हक़ीक़त लोगों के जमा होने से हासिल नही होती बल्कि ख़ुदो लोगों को हक़ व हक़ीक़त के सामने सरे तसलीम को खम करना चाहिये और ख़ुद को उससे मुताबिक़त देना चाहिये, आयते शरीफ़ा ऐतेसाम के ज़ैल में बयान होने वाली रिवायात के मुतालये से भी यह नतीजा हासिल होता है कि अल्लाह की रस्सी वही आईम्मा अलैहिमुस्सलाम है जो इंसान को यक़ीनी तौर पर ख़ुदा वंदे आलम तक पहुचा देते हैं।

इब्ने हजर हैसमी (आयते ऐतेसाम) को उन आयात की रदीफ़ में शुमार करते हैं जो अहले बैत (अ) की शान में नाज़िल हुई हैं। () इसी तरह हदीसे सक़लैन को आयते ऐतेसाम की तफ़सीर क़रार दी जा सकती है। क्योकि इस हदीस में पैग़म्बरे अकरम (स) ने मोमिनीन को हुक्म दिया है कि इन दो ग़रान क़्रद्र गौहरों से तमस्सुक करो जो क़ुरआन व इतरत हैं ताकि हक़ व हक़ीक़त तक पहुच जाओ और कभी गुमराह न हो। (सवायक़े मोहरिक़ा पेज 90)

अबू जाफ़र तबरी आयते ऐतेसाम की तफ़सीर में कहते हैं कि ऐतेसाम का मतलब तमस्सुक करना है, क्योकि रस्सी के ज़रिये इंसान अपने मक़सद तक पहुच सकता है। () इसके अलावा हदीसे सक़लैन की बाज़ तहरीरों में लफ़्ज़ें ऐतेसाम इस्तेमाल हुआ है, नमूने के तौर पर इब्ने अबी शैबा हदीसे सक़लैन को इस तरह नक़्ल करते हैं कि पैग़म्बर अकरम (स) ने फ़रमाया: जामे उल बयान जिल्द 4 पेज 21

हदीस (अल मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा)

इसी वजह से मुफ़स्सेरीन और मुहद्देसीन ने हदीसे सक़लैन को आयते ऐतेसाम के ज़ैल में ज़िक्र किया है।

हाकिम हसक़ानी अपनी सनद के साथ रसूले अकरम (स) से नक़्ल करते हैं:

हदीस (शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 168)

जो शख़्स चाहे इस निजात की कश्ती पर सवार हो और मज़बूत रस्सी से मुतमस्सिक हो और अल्लाह की रस्सी से तमस्सुक करे तो उसे चाहिये कि हज़रत अली (अ) की विलायत को क़बूल करे और उनके हिदायत करने बेटों की इक्तेदा करे।

नतीज़ा यह हुआ कि आयते शरीफ़ा और उसकी तफ़सीर में बयान होनी वाली रिवायात से यह मालूम होता है कि अहले बैत (अ) उम्मते इस्लामिया की वहदत व इत्तेहाद का मरकज़ हैं और उन हज़रात की इमामत व विलायत की बहस दर हक़ीक़त उस वहदत के महवर की गुफ़्तुगू है जिस पर क़ुरआने करीम और रिवायात ने ज़ोर दिया है जैसा कि दूसरी रिवायात भी इस हक़ीक़त पर ताकीद करती हैं।

हाकिम नैशा पुरी अपनी सनद के साथ इब्ने अब्बास से नक़्ल करते हैं कि रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया:

सितारे अहले ज़मीन को ग़र्क़ होने से बचाते हैं और मेरे अहले बैत मेरी उम्मत को इख्तिलाफ़ का शिकार होने से बचाते हैं, पस अगर अरब का कोई क़बीला उनकी मुख़ालिफ़त करता है तो ख़ुद उनके दरमियान इख्तिलाफ़ हो जायेगा और उसका शुमार शैतानी गिरोह में होगा।

नीज़ मौसूफ़ अपनी सनद के ज़रिये जनाबे अबू ज़र से नक़्ल करते हैं कि जनाबे अबू ज़र ख़ानए काबा के पास खड़े हुए और अपने हाथों से ख़ानए काबा के दर को पकड़ कर लोगों को ख़िताब करते हुए फ़रमाया:

ऐ लोगो, जो मुझ को जानता है वह जानता है और जो नही जानता है वह पहचान ले मैं अबू ज़र हूँ, मैंने रसूले अकरम (स) को यह कहते सुना है:

हदीस (मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 151)

ऐ लोगों, आगाह हो जाओ कि तुम में मेरे अहले बैत की मिसाल नूह की कश्ती जैसी है जो उसमें सवार हो गया वह निजात पा गया और जिसने उससे रूगरदानी की वह ग़र्क़ हो गया।

और फिर मौसूफ़ उन दोनो हदीसों को सहीय शुमार करते हैं।
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