इस्लामी संस्कृति व इतिहास
 

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चिकित्सा विज्ञान भी खगोल शास्त्र की भांति अति प्राचीन ज्ञानों में से एक है जो मुसलमानों के बीच प्रचलित हुआ और जिस पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया।



एक हदीस में है कि ज्ञान के दो प्रकार हैः इल्मुल अबदान व इल्मुल अदियान अर्थात शरीर का ज्ञान और धर्म का ज्ञान, इससे इस्लाम में चिकित्सा विज्ञान के महत्व का अनुमान किया जा सकता है।



चिकित्सा विज्ञान की प्रगति में मुसलमानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



मुसलमानों को चिकित्सा विज्ञान संबंधी जो नुस्ख़े मिले वो बोक़रात और जालीनूस जैसे यूनानी हकीमों के नुस्ख़े थे



जिनका यूनानी भाषा से अरबी भाषा में अनुवाद किया गया किंतु मुस्लिम चिकित्सकों को अपने क्षेत्रों में जिन बीमारियों का सामना था



उनमें कुछ बीमारियों एसी थी जो इन्हीं क्षेत्रों से विशेष थीं जिनका उल्लेख यूनानी हकीमों के नुस्ख़ों में नहीं था।



मुस्लिम विद्वान ज़करिया राज़ी ने अपनी पुस्तक अलहावी में सात सौ जड़ी बूटियों और उनके उपचारिक गुणों का उल्लेख किया है जबकि



यूनानी विद्वान देविसकोरीदस ने अपनी पुस्तक में पांच सौ जड़ी बूटियों का ही उल्लेख किया है। चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में अलहावी एक महान रचना है।



इस पुस्तक में विभिन्न बीमारियों के बारे में बड़े विस्तार से बात की गई है। इस पुस्तक के विभिन्न भागों में जिन बीमारियों का उल्लेख किया गया है



और उनके उपचार के लिए जो नुस्ख़े सुझाए गए हैं उनकी संख्या जालीनूस, बोक़रात तथा दूसरे यूनानी विद्वानो की पुस्तकों से बहुत अधिक हैं।



इस्लामी काल में यूनानी और भारतीय विद्वानों की पुस्तकों के अनुवाद के साथ ही चिकित्सा विज्ञान में बड़ा विस्तार हुआ।



पांचवीं शताब्दी ईसवी में रोम शासन ने अपने देश से नस्तूरी ईसाइयों को बाहर निकाल दिया। नस्तूरी ईसाई वहां से ईरान आ गए और जुन्दी शापूर में अपना विज्ञान केन्द्र खोला।



उन्होंने इस नगर में चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा देना आरंभ कर दिया और यूनानी चिकित्सा शैली को भारतीय चिकित्सा शैली से मिलाकर जो पहले ही ईरान में प्रचलित थी



एक व्यापक चिकित्सा शैली तैयार कर ली। इस केन्द्र से पढ़कर निकलने वाले चिकित्सकों ने चिकित्सा विज्ञान तथा उपचार केन्द्रों के विकास में बड़ा योगदान दिया।



इस्लामी काल में चिकित्सा विज्ञान के विकास में जिन संस्थाओं ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई उनमें जुन्दी शापूर विश्वविद्यालय भी प्रमुख है।



जुन्दी शापूर में बड़े अच्छा अस्पताल और चिकित्स विश्वविद्यालय था। यहां संस्कृत और यूनानी भाषा की चिकित्सा पुस्तकों का अनुवाद किया जाता था।



जुन्शी शापूर के अस्पताल ईरान के प्राचीनतम अस्पताल हैं जो शापूर द्वितीय के शासन काल में बनाए गए थे।



यह अस्पताल ईरानी चिकित्सकों और शिक्षकों के परिश्रम से तीन शताब्दियों तक चलते रहे और इन्हें इस्लामी क्षेत्रों का सबसे बड़ा चिकित्सा केन्द्र माना जाता था।



इन केन्द्रों में विख्यात चिकित्सक शिक्षार्थियों को चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा देते थे और रोगियों का उपचार करते थे।



जुन्दी शापूर में चिकित्सा विज्ञान के विकास में कुछ परिवारों की मूल भूमिका रही। इनमें एक बख़्तशूअ परिवार था।