इस्लामी संस्कृति व इतिहास
 

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मध्ययुगीन शताब्दी में नूरूल मनाज़िर नामक पुस्तक के लैटिन भाषा में अनुवाद ने पश्चिम में प्रकाश और भौतिक विज्ञान पर बहुत अधिक प्रभाव डाला है



किन्तु इब्ने हैसम से पूर्व इस्लामी जगत में प्रकाश के ज्ञान का पतन हो रहा था, यहां तक कि ख़्वाजा नसीरूद्दीन तूसी जैसे महान विद्वान उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों से अवगत नहीं थे।



सातवीं सहास्त्राब्दी में एक बार फिर प्रकाश के ज्ञान पर ध्यान दिया जाने लगा और क़ुतुबुद्दीन शीराज़ी ने इस ज्ञान को "क़ौसो क़ज़ह" के नाम से ईरान में प्रचलित किया।



वर्तमान समय में प्रकाश के विषय में पश्चिम की प्रगति, मुसलमान वैज्ञानिकों विशेषकर इब्ने हैसम के प्रयासों से बहुत सीमा तक प्रभावित रही है।



इसीलिए पश्चिम में इब्ने हैसम को प्रकाश के पितामह की उपाधि दी गयी है।



कुछ लेखकों का यह मानना है कि पश्चिम विशेषकर आक्सफ़ोर्ड मत में प्रकाश के संबंध में होने वाली चर्चाओं में जो आंदोलन असित्त्व में आया है व



ह इब्ने हैसम के प्रकाश संबंधी दृष्टिकोणों से पश्चिम के अवगत होने का परिणाम है।



इस बिन्दु में भी कोई संदेह नहीं है कि ब्रिटेन के प्रसिद्ध दर्शन शास्त्री रोजर बेकन पूर्ण रूप से इब्ने हैसम से प्रभावित थे।



इस्लामी सभ्यता में मैकेनिक्स या यंत्र विज्ञान और भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में हर चीज़ से पहले इस विज्ञान की उपलब्धियों और तकनीक पर मुसलमानों की दृष्टि थी जो



इसको हर ज्ञान से अलग करती है। वास्तव में यदि हम यह चाहते हैं कि मुसलमान बुद्धिजीवियों की वैज्ञानिक उपलब्धियों से अधिक से अधिक



अवगत हों तो हमें यंत्र और भौतिक विज्ञान के विषयों में उनके प्रयासों का भी अध्ययन करना चाहिए।