इस्लामी संस्कृति व इतिहास
 

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पिछले में हमने मैकेनिक के विषय में मुसलमान बुद्धिजीवियों के आविष्कारों और उपलब्धियों की ओर संकेत किया था और हमने आपको बताया था कि



मुसलमान बुद्धिजीवियों विशेषकर जज़री ने संसार और इस्लामी जगत की सेवा में बहुत सी महत्त्वपूर्ण रचनाएं प्रस्तुत की हैं।



इन मुसलमान बुद्धिजीवियों ने पानी से चलने वाली घड़ी और गहरे कुओं से पानी निकालने वाले यंत्र और इसी प्रकार बहुत से उपकरणों का आविष्कार किया।



इस कार्यक्रम में हम मुसलमान बुद्धिजीवियों के आविष्कारों के बारे में चर्चा करेंगे। कृपया हमारे साथ रहिए।



तीसरी हिजरी शताब्दी में इस्लामी जगत में मिकेनिक्स या यंत्र विज्ञान या यंत्र विद्या को ख्याति प्राप्त हुई और यह ख्याति सातवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में अपनी चरम सीमा पर पहुंच गयी।



मुसलमान इंजीनियरों ने मिकेनिकल या यांत्रिक उपकरणों का निर्माण करके बहुत बड़ी बड़ी सफलताएं अर्जित की हैं।



वह अपने पास मौजूद पदार्थों के अपनी आवश्यकता के अनुसार टुकड़े काटते थे और उसके बाद उन्हें अपनी इच्छानुसार रूप देते और एक दूसरे से जोड़ते थे।



प्राचीन समय के ये इन्जीनियर उपकरणों के निर्माण के लिए, धातुओं, साधारण धातुओं, सोना, चांदी, लकड़ी, शिशा, चमड़ा और इसी प्रकार सन, रूई और रेशम की रस्सियों और दूसरे अन्य पदार्थों का प्रयोग करते थे।



मुसलमान वैज्ञानिक जिन चीज़ों का प्रयोग करते थे उनमें से सबसे प्रचलित लकड़ी और तांबे की चादर थी।



वह पाइप और तैरने वाले तथा गतिशील उपकरणों के निर्माण के लिए तांबे की शीट का प्रयोग करते थे।



मुसलमान बुद्धिजीवी कभी ताबें और कभी लोहे से तारों का निर्माण करते थे।



वह ज़ंजीर का निर्माण करने के लिए तार का प्रयोग करते थे और इसी प्रकार वह तांबे या लकड़ी से बड़ी चरख़ी, और घिर्री आदि बनाते थे।



मुसलमानों विशेषकर इस्लामी सभ्यता के केन्द्रीय क्षेत्र की समस्याओं में से एक की समस्याओं में से एक सूखे और पानी की कमी थी।



कुछ देशों में सौम्य ढलान की योजना बनाकर लंबी दूरी तय करके गहराई से धरती की सतह पर पानी पहुंचाया जाता था किन्तु कुछ अन्य क्षेत्रों में निवासियों को पानी को ऊपर लाने में बड़ी कठिनाईयों का सामना था।



मैकेनिकस के क्षेत्र में जज़री और बनू मूसा जैसे मुसलमान इंजीनियरों की उपलब्धियों में से एक गहराई से पानी को ऊपर लाने के विभिन्न यंत्रों का निर्माण और उसकी डिज़ाइनिंग करना था जिसे नाऊरा अर्थात रहट कहा जाता था।



गहराई से ऊपर की ओर पानी खींचने वाले यंत्र नाऊरा के नमूने कुछ इस्लामी देशों में इस समय भी पाये जाते हैं।



बनू मूसा का परिवार पहला मुसलमान मिकैनिक परिवार है जिनके माध्यम से इस्लामी जगत में मिकेनिक्स को ख्याति प्राप्त हुई।



बनू मूसा की पुस्तक "अलहेयल" मिकेनिक्स के संबंध में वह पहली पुस्तक है जो इस्लामी जगत में बाक़ी रह गयी है।



इस पुस्तक में मिकेनिक्स के सौ यंत्रों का विवरण दिया गया है कि जिनमें से अधिकांश द्रव यांत्रिकी की विशेषता से लाभ उठाकर आटोमैटिक तौर पर चलते हैं।



बनू मूसा ने जिन चीज़ों का निर्माण किया उनमें से एक फ़व्वारा है जिससे, पानी निकलते समय अनेक रूप धारण कर लेता है।



इसी प्रकार उन्होंने एक ऐसे दीप का निर्माण किया जिसकी लौ स्वयं ही कम और ज़्यादा होती है।



समुद्रों और नदियों की सतह को खोदने के लिए एक प्रकार के यांत्रिकी फावड़े का निर्माण और कुएं से प्रदूषित हवा को बाहर निकालने



के लिए एक प्रकार के एकज़ास्ट फ़ैन का निर्माण भी बनू मूसा भाइयों के आविष्कारों में से है।



उन्होंने विभिन्न प्रकार के लीवर क्रेंक शोफ़्ट, विभिन्न प्रकार की शंकुआकार टोटियों और घिर्रियों का निर्माण भी किया है।



[अबुल फ़त्ह अब्दुर्रहमान ख़ाज़नी ]



अबुल फ़त्ह अब्दुर्रहमान ख़ाज़नी