शिया और इस्लाम
 


हदीसे मंज़िलत



मुहम्मद इस्माईल बुख़ारी ने अपनी किताब सही बुखारी में पैगम्बर (स.) की इस हदीस का वर्णन किया है कि “इन्ना रसूलल्लाह (स.) ख़रजा इला ग़ज़वति तबूकिन व ख़रजा अन्नासु मअहु फ़क़ाला लहु अलीयुन अख़रजु मअक ? फ़क़ाला ला फ़बका अलीयुन फ़क़ाला लहु रसूलुल्लाहि (स.) अमा तरज़ा अन तकूनु मिन्नी बिमनज़लति हारूना मिन मूसा इल्ला इन्नहु ला नबीया बअदी ? इन्नहु ला यमबग़ी अन यज़हबा इल्ला व अन्ता ख़लीफ़ती।”

अनुवाद-- पैगम्बर(स.) तबूक नामक धर्म युद्ध के लिए निकले और उनके साथ अन्य लोग भी निकले , पैगम्बर(स.) से अली (अ.) ने कहा कि क्या मैं आपके साथ

चलूँ ? पैगम्बर ने कहा कि नही। (यह सुनकर) अली अ. रोने लगे तब पैगम्बर(स.) ने अली (अ.) से कहा कि क्या तुम इस बात से राज़ी नही हो कि तुमको मेरे समीप वही स्थान प्राप्त है जो स्थान हारून को मूसा के समीप प्राप्त था, इसके अलावा कि मेरे बाद कोई नबी नही है। बस जिस तरह हारून मूसा के साथ नही गये और उनके ख़लीफ़ा बन कर रहे इसी प्रकार आप भी मेरे ख़लीफ़ा के रूप में यहाँ पर रहें।

(सही बुख़ारी[1] 5/ बाबि फ़ज़ाइलि असहाबुन्नबी 24/ बाबि मनाक़िबि अली , सही मुस्लिम[2] बाबि फ़ज़ाइलि अली 120,121)

हदीसे ग़दीर अहमद ने ज़ैद पुत्र अरक़म के हवाले से उल्लेख किया है कि उसने कहा कि “नज़लना माअर रसूलिल्लाह (स.) बिवादिन युक़ालु लहु वादियि ख़ुम, फ़अमरा बिस्सलाति फ़सल्लाहा बिहुजैर क़ाला फ़ख़तबना व ज़ल्ला लिरसूलिल्लाहि (स.) बिसूबिन अला शजरतिन समरतिन मिन अश्शम्सि फ़क़ाला अलस्तुम तअलमूना अवा लस्तुम तशहदूना अन्नी अवला बिकुल्लि मुमिनिन मिन नफ़सिहि ? क़ालू बला क़ाला फ़मन कुन्तु मौलाहु फ़अलीयुन मौलाहु अल्लाहुम्मा वालि मन वालाहु व आदि मन आदाहु।”

अनुवाद--हम रसुलूल्लाह के साथ एक स्थान पर पहुँचे जिसे ख़ुम कहा जाता था। रसूलुल्लाह (स.) ने नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया और हमने गर्मी में नमाज़ पढ़ी । वह कहता है कि इसके बाद रसूल ने एक ख़ुत्बा (भाषण) दिया और रसूलुल्लाह को धूप से बचाने के लिए एक पेड़ पर कपड़ा डाल कर साया किया गया। बस रसूलुल्लाह ने कहा कि क्या तुम नही जानते क्या तुम गवाही देते हो कि मैं मोमिनीन पर उनसे ज़्यादा अधिकार रखता हूँ ?सबने उत्तर दिया कि हाँ (आप सब पर उनसे अधिक अधिकार रखते हैं) रसूल (स.) ने कहा कि जिस जिस का मैं मौला[3] हूँ उस उस के अली मौला हैं। ऐ अल्लाह तू उसको मित्र रख जो अली को मित्र रखे और तू उससे शत्रुता रख जो अली से शत्रुता रखे। (मुसनदे अहमद 4/372, सवाइक़ुल मुहर्रिक़ह[4]

43,44, मुस्तदरके हाकिम 3/109)

यह जानना आवश्यक है कि ग़दीरे ख़ुम की घटना आयते बलाग़ के नाज़िल होने के बाद घटित हुई। इस आयत में अल्लाह ने कहा है कि “या अय्युहर रसूलु बल्लिग़ मा उनज़िला इलैका मिन रब्बिका व इन लम तफ़अल फ़मा बल्लग़ता रिसालतहु वल्लाहु यअसिमुका मिन अन्नासि इन्ना अल्लाहा ला यहदि अल क़ौमल काफ़ीरीना।”

(सूरए माइदह आयत न.67)

अनुवाद -- ऐ पैगम्बर आप उस संदेश की घोषणा कर दीजिये जो आपके अल्लाह की ओर से आप पर उतारा जा चुका है। और यदि आपने ऐसा न किया तो यह इसके समान है कि आपने अपनी पैगम्बरी का कोई संदेश नही पहुँचाया।

और जब अली अलैहिस्सलाम की मौलाइयत की घोषणा कर दी तो आयते इकमाले दीन नाज़िल हुई जिसमें अल्लाह ने कहा कि “अल यौमा यइसल लज़ीना कफ़रू मिन दीनिकुम फ़ला तख़शव हुम व इख़शवनि अल यौमा अकमलतु लकुम दीनाकुम व अतमम्तु अलैकुम नेअमती व रज़ीतु लकुम अल इस्लामा दीनन।”

(सूरए माय़दह आयत 3)

अनुवाद -- आज के दिन काफ़िर तुम्हारे दीन से मायूस हो गये अतः तुम उनसे न डरो और मुझ से डरो। आज मैने तुम्हारे दीन का पूर्ण कर दिया, और अपनी नेअमतों को भी पूरा कर दिया। और तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को पसंदीदा बना दिया।

उपरोक्त वर्णन जो इतिहास, बुद्धि, आयत व सुन्नी सम्प्रदाय की रिवायतों के आधार पर हुआ है यह एक सारांश है। अपितु इस सम्बन्ध में बहुत अधिक साक्ष्य मौजूद हैं।

इस्लाम धर्म के सभी सम्प्रदाय इस सम्बन्ध में उलझे हुए कि यह कैसे सम्भव है कि पैगम्बर ने अपने बाद के लिए उम्मत की इमामत की समस्या को हल न किया हो, जबकि वह उम्मत की ओर से सदैव चिंतित रहते थे ?

यह एक छोटासा संकेत कि “यह बात असम्भव है” इस बात के महत्व को बढ़ाता है कि पैगम्बर ने खलीफ़ा की नियुक्ति की है और उम्मत को बग़ैर इमाम के नही छोड़ा है।

उपरोक्त वर्णन से यह सिद्ध हो जाता है कि शियत वास्तव में एक ऐसी विचारधारा है जो अपने अन्दर निरन्तरा लिए हुए है और इसके मार्ग दर्शक पैगम्बर (स.) हैं। दूसरे शब्दों में शियत इस्लाम का एक ऐसा व्याख्यान है जो पैगम्बर द्वारा प्रशिक्षित लोगों (अहलिबैत) के द्वारा हम को प्राप्त हुआ है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम नें अपने शियों को लिखे गये एक पत्र में यह लिखा है कि “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम मिन अब्दिल्लाहि अली अमीरिल मुमिनीन इला शीअतिहि मिनल मुमिनीना व हुवा इस्मुन शर्रफ़हु अल्लाहु फ़ी अल किताबि फ़इन्नहु यक़ूलु “व इन्ना मिन शीअतिहि लिइब्राहीमा ” व अन्तुम शीअतिन नबीय्यी मुहम्दिन... इस्मुन ग़ैरु मुख़तस्सिन व अमरुन ग़ैरु मुबतदइन।”

(मुस्तदरक नहजुल बलाग़ह2/29)

अर्थात मेरा अनुसरण पैगम्बर का अनुसरण है, क्योकि पैगम्बर ने मुझे अपना उत्तराधिकारी बनाया है। शिया शब्द केवल मेरे कुछ साथियों जैसे अबुज़र, मिक़दाद, सलमान व अम्मार से विशेष नही है। बल्कि यह शिया शब्द हर उस व्यक्ति पर सत्य आता है जो मुहम्मद (स.) और उनके उत्तराधिकारी पर ईमान रखता है।

सक़ीफ़ेह की घटना के कारण आइम्मा-ए अतहार (अहलिबैत) की विलायत प्रत्यक्ष रूप से क्रियान्वित न हो सकी। और अफ़सोस है कि क्योँकि बनी उमैय्यह व बनी अब्बास को यह भय था कि कहीँ ऐसा न हो कि अहले बैत का वर्चस्प स्थापित हो जाये इस लिए अहलिबैत की इल्मी मरजीअत की ओर से भी लापरवाही की गई। अर्थात ज्ञान के क्षेत्र में भी इनसे सम्पर्क स्थापित नही किया गया। यहाँ तक कि शियों के इमामों (पैगम्बर के अहलिबैत) ने एक प्रकार से अपना पूरा जीवन तक़िय्यह में व्यतीत किया और सब शहीद हुए।

आज शिया सम्प्रदाय की प्रार्थना यह है कि जैसे कि हम सब जानते हैं कि खिलाफ़त के मामले में जो कुछ भी हुआ, जैसे भी हुआ, वह आज समाप्त हो चुका है। अब यह चाहिए कि कम से कम अहलिबैत अलैहिमुस्सलाम की इल्मी मरजिअत को जीवित रखा जाये और उनके इल्म को प्रसारित किया जाये। हमारा विश्वास है कि इस्लामी समाज, बहुतसी समस्याओं से केवल इस लिए उन्मुख है क्योँकि वह अहलिबैत अलैहिमुस्सलाम के इल्म से वंचित है। अगर इस्लाम उस नक़्शे पर चलता जो पैगम्बरे इस्लाम (स.) ने बनाया था तो आज पूरा संसार इस्लामी हिदायत (मार्ग दर्शन) से लाभान्वित हो रहा होता।

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[1] - सही बुखारी सुन्नी सम्प्रदाय की छः सही कहलाई जाने वाली किताबों में से एक है। और इन किताबों में भी यह सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस किताब के संकलन कर्ता अबु अब्दुल्लाह मुहम्मद पुत्र अबिल हसन इस्माईल बुख़ारी हैं। वह सन् 194 हिजरी में पैदा हुए और सन् 256 हिजरी में उनका देहान्त हुआ।

[2] सही मुस्लिम भी सुन्नी सम्प्रदाय की छः सही कहलाई जाने वाली किताबों में सम्मलित है। इस किताब के संकलनकर्ता ङाफ़िज़ व मुहद्दिस अबुल हसन मुस्लिम पुत्र हज्जाज पुत्र मुस्लिम क़शीरी नेशापुरी हैं। उनका जन्म सन् 206 हिजरी में नेशापुर में हुआ तथा मृत्यु भी सन् 261 हिजरी में नेशापुर में ही हुई।

[3] मौला अर्थात हाकिम, संरक्षक या शासक।

[4] सवाइक़ुल मुहर्रिक़ा के लेखक सुलिमान पुत्र खौजह इब्राहीम क़बलान हुसैनी हनफ़ी नक़्शबन्दी क़न्दूज़ी हैं। वह बलख़ के विद्वानों में से हैं। उनका जन्म सन् 1220 हिजरी में हुआ और सन् 1270 हिजरी में क़ुसतुनतुनिया में उनका देहान्त हो गया। उनकी दूसरी प्रसिद्ध किताब यनाबिउल मवद्दत है।