शिया और इस्लाम
 


शिया मज़हब की वास्तविकता



शिया 12 व्यक्तियों की इमामत में विश्वास रखते हैं जिनमें पहले इमाम हज़रत अली (अ.) हैं, और शेष 11 इमाम पैगम्बर की संतान से हैं। और शियों का विशवास है कि बारहवे इमाम जीवित हैं और परोक्ष रूप से जीवन यापन कर रहे हैं।

शिया सम्प्रदाय विशेष रूप से दो बातों पर बल देता है।

1- ज्ञान के क्षेत्र में अहलिबैत[1]के संरक्षण (विलायत) को आवश्यक मानता है

और यह पैगम्बर (स.) की बहुत सी हदीसों से सिद्ध है।

आयते ततहीर- “इन्नमा युरीदुल्लाहु लियुज़हिबा अनकुमुर्रिजसा अहला अलबैति व युताह्हिरा कुम ततहीरन।”

अनुवाद-- ऐ अहलिबैत बस अल्लाह का इरादा यह है कि तुम से हर प्रकार की बुराई को दूर रखे और तुम को इस तरह पवित्र रखे जो पवित्र रखने का हक़ है।

(सूरए अहज़ाब आयत न. 33)

शिया व सुन्नी दोनों सम्प्रदायों की हदीसों से सिद्ध है कि यह आयत पैगम्बर (स.) के अहलिबैत के सम्बन्ध में नाज़िल हुई है।

हदीसे सक़लैन- क़ालन नबी (स.) या अय्युहन्नासु इन्नी तारिकुन फ़ीकुम मा इन अख़ज़्तुम बिहि लन तज़िल्लू –किताबल्लाहि व इतरती अहला बैती।

अनुवाद--ऐ लोगो मैं तुम्हारे मध्य दो चीज़े छोड़ कर जा रहा हूँ एक अल्लाह की किताब दूसरे मेरे अहलिबैत अगर तुम इन दोनों से सम्बन्धित रहे तो कभी भी भटक नही सकते।

(कनज़ुल उम्माल 1/44, मुसनदे अहमद5/ 17,26, मुस्तदरके हाकिम[2] 3/109,148 थोड़े से फ़र्क़ के साथ)

हदीसे सफ़ीनेह-क़ालन नबी (स.) “अला इन्नः मस्ला अहलुबैती फ़ीकुम मिस्लु सफ़ीनति नूह मन रकिबाहा नजा व मन तख़ल्लफ़ा अन्हा ग़रक़ा।”

अनुवाद-- पैगम्बर (स.) ने कहा कि जानलो कि निः सन्देह मेरे अहलिबैत तुम्हारे बीच नूह की किश्ती के समान हैं। जो इस पर सवार होगा वह मुक्ति प्राप्त करेगा और जो इस पर सवार नही होगा वह डूब जायेगा।

(मुस्तदरक 3/151)

यह और इनके जैसी अन्य बहुतसी हदीसें, और बहुतसी वह हदीसें जिनका वर्णन क़ुरआन की आयतों की तफ्सीर (व्याख्या) के लिए किया गया इस बात को सिद्ध करती हैं कि पैगम्बर के अहलिबैत इंसानों के लिए हुज्जत हैं। और धर्मिक व्याख्यानों के अनुसार वह मासूम भी हैं। मासूम अर्थात वह व्यक्ति जिससे किसी भी स्थिति में किसी भी प्रकार की कोई ग़लती न हो।

शिया मज़हब पैगम्बर (स.) के अहलिबैत के स्थान की महत्ता के विश्वास में विशेष स्थान रखता है। और वह इस लिए कि शिया मज़हब ही केवल वह मज़हब है जो आइम्माए अतहार (अ.) की विलायत और हिदायत में विश्वास रखता है। और जिसने इस्लामी अहकाम (निर्देशों) का वर्णन करके और समय व स्थान की आवश्यक्ता अनुसार उनको निरन्तर अनुकूलता बनाए रखकर और इसी प्रकार इमामों को हर समय में एक इंसाने कामिल के रूप में प्रस्तुत करके अल्लाह व इंसानों के बीच अल्लाह की हिदायत के सम्बन्ध को सदैव सुरक्षित रखा है। और अल्लाह की विलायत को हमेशा मौजूद माना है।

अन्य धर्मों व इस्लाम के दूसरे मज़हबों में इस (इमामत) आस्था व विश्वास के न होने के कारण उन धर्मो या मज़हबो ने जीवन के बहुतसे क्षेत्रों पर रौशनी नही डाली है। और इन मज़ाहबों में ऐसे मार्ग दर्शकों के अभाव में जिन पर “वही” आती हो सम्स्याओं के समाधान हेतू स्वंय विचार विमर्श करना पड़ा है। और इतिहास इस बात का साक्षी है कि इंसान ने जब भी “वही” को छोड़ कर अपनी समस्याओं का समाधान करना चाहा वह सामाजिक बिखराओ व पथभ्रष्टिता का कारण बना और बर्बादी के अलावा कुछ भी हाथ नही आया। हमारे लिए यही अधिक है कि वर्तमान समय में हम संसार को सबक़ लेने की दृष्टि से देखें। सिर्फ़ शिया मज़हब ही वह मजहब है जो आइम्मा-ए-मासूमीन से सम्बन्धित होने के कारण निरन्तर “वही” के द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान करता रहा है।

हमें धर्म के सम्बन्ध में पैगम्बर (स.) के मासूम अहलिबैत की लाखों हदीसें (पवित्र कथन) प्राप्त हुई हैं। और शियों के होज़े इल्मिया(धार्मिक शिक्षण केन्द्र) कि जिनका शिलान्यास अहलिबैत (अ.) के हाथों से हुआ 1300 वर्ष से निरन्तर इन हदीसों के प्रसार, गहरे अध्ययन और प्रकाशन में व्यस्त है।

2- अहलिबैत के सियासी संरक्षण (विलायत) को आवश्यक मानता है।

शिया मज़हब की यह अवधारणा है कि पैगम्बर (स.) ने खिलाफ़त व इस्लामी समाज की इमामत बिना किसी अन्तर के हज़रत अली (अ.) और उनके बाद उनके 11 मासूम बेटों की ओर हस्तान्त्रित की है। और यह मूर्खता पूर्ण ईर्श्या का फल था कि खिलाफ़त ने दूसरा रंग ले लिया और दीने इस्लाम की खिलाफ़त वास्तविक ख़लीफ़ा के हाथों में न जा सकी।

इस दावे को पैगम्बर (स.) का एक कथन सिद्ध करता है जो कि अल्लाह के आदेश से कहा गया है।

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[1] अहलिबैत इस्लाम में हज़रत अली अलैहिस्सलाम व हज़रत अली व पैगम्बर (स.) की बेटी हज़रत फ़ातिमा की मासूम संतान को अहलिबैत कहा जाता है।

[2] अलमुस्तदरक अलस्सहीहैन इस किताब का संकलन अबु अब्दुल्लाह पुत्र मुहम्मद पुत्र हम्दवियह पुत्र हकम जो कि हाकिम नेशापुरी के नाम से प्रसिद्ध है ने किया। वह अपने समय में अहले हदीस सम्प्रदाय के इमाम थे। वह अपने ज्ञान की अधिकता के लिए प्रसिद्ध हैं। क्योंकि वह सन् 359 हिजरी में समानियों के शासन काल मेंअबि नस्र की विज़ारत के समय मे न्यायधीश के पद पर नियुक्त थे, इस लिए हाकिम(अधिकारी) के नाम से प्रसिद्ध हुए। वह सन् 321 हिजरी में नेशापुर में पैदा हुए और उनकी मृत्यु सन् 405 हिजरी में हुई। उनकी लिखी हुई किताबों में से अस्सहीहान, अल इलल, अल आमाली, फ़वाइदुश् शयूख़, आमालीयुल अशयात, तराजिमुश शयूख़, तारीखे उल्माए नेशापुर, अलमदखल इला इल्मुस्सहीह, अलमुस्तदरक अला सहीहैन हैं।