शिया और इस्लाम
 


संसार की एकता व उद्देश्यपूर्णता बुद्धिमत्ता पर आधारित



आसमानी धर्मों के “तौहीदी दृष्टिकोण” के अनुसार यह संसार एक इरादे से उतपन्न हुआ है और उसी के द्वारा संचालित हो रहा है। उस (अल्लाह) के इरादे से जो ज्ञानी, बुद्धिमान, सत्य व भलाई चाहने वाला है। इसी आधार पर इस संसार के समस्त अंशों में एकता विद्यमान है। इसी एकता के अनुकरण के कारण इस संसार का कोई भी अंश अल्लाह से सम्बंध स्थापित किये बिना इस संसार के अन्य अंशों को नही जान सकता। और क्योंकि इस संसार में एक अख़लाक़ी निज़ाम[1](व्यवस्था) व्याप्त है। अतः इंसान के अच्छे व बुरे कार्य उसके संसारिक व परलोकीय जीवन पर प्रभाव डालते हैं।

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[1] सभी आसमानी धर्मों का एक सामुहिक संदेश यह है कि इस संसार में जो व्यवस्था व्याप्त है वह एक अख़लाक़ी व्यवस्था है। जिसका अर्थ यह है कि वह प्रत्येक कार्य जो इंसानस्वतंत्रा के साथ अपनी मर्ज़ी सेकरता है उसका फल आवश्य है।अगर अच्छा कार्य करेगा तो उसको अच्छा फल दिया जायेगा और अगर बुरे कार्य करेगा तो उसको दण्ड दिया जायेगा। अल्लाह के न्याय से कोई भी नही बच सकता। और अल्लाह की अनुकम्पा सब पर समान व न्यायपूर्वक है।