शिया और इस्लाम
 


इंसान की कमज़ोरियाँ



पूर्ण रूप से संसार की वास्तविक्ता को जानने में इंसान के सम्मुख जहाँ एक ओर अक़ले नज़री[1] व अक़्ले अमली[2] की कमज़ोरियाँ व्याप्त हैं वही दूसरी ओर रूह(आत्मा) की कमज़ोरियाँ उसे घेरे है। जिन के कारण--

1- वह सूक्ष्मता के साथ यह नही जानता कि उसकी भलाई किन चीज़ों में है।

2- वह अपने अन्दर पाये जाने वाले एहसास पर पूर्ण रूप से विश्वास नही कर सकता।

उपरोक्त वर्णन से यह सिद्ध हो जाता है कि इंसान को “वही” की आवश्यक्ता है। और “वही” दो प्रकार से इंसान की सहायता करती है।

1- धर्म शिक्षा के द्वारा।

2- इंसाने कामिल[3] प्रस्तुत करके।

जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए अहज़ाब की आयत न. 21 में वर्णन हुआ है कि “ लक़द काना लकुम फ़ी रसूलिल्लाहि उसवतुन हसनतुन”अनुवाद--- निः सन्देह रसूल का जीवन तुम्हारे लिए एक आदर्श था।

ग- मआद अर्थात इन बातों पर विश्वास होना कि ---

1- इंसान का जीवन केवल इस संसार तक सीमित नही है। बल्कि क़ियामत(प्रलय) के दिन समस्त इंसान फिर से जीवित किये जायेंगे। और कभी न समाप्त होने वाले अपने नये जीवन को प्रारम्भ करेंगे।

पैगम्बर स. ने कहा है कि “ मा ख़ुलिक़तुम लिल फ़नाए बल ख़ुलिक़तुम लिल बक़ाए व इन्नमा तनक़ुलूना मिन दारिन इला दारिन।”(बिहार उल अनवार6/249)

अनुवाद---तुमको विनाश के लिए नही बल्कि सदैव बाक़ी रखने के लिए पैदा किया गया है। बस मृत्यु के द्वारा एक घर से दूसरे घर में परिवर्तित हो जाते हो।

बल्कि इस्लामी शिक्षाओं में संसार व परलोक के अलावा एक बरज़ख[4] नामक जीवन का भी वर्णन हुआ है जो कि संसार व परलोक के मध्य का जीवन काल है।

जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए अलमुमिनून की आयत न. 100 मे वर्णन हुआ है कि--

“व मिन वराइहिम बरज़ख़ुन इला यौमिन युबअसूना। ”

अनुवाद—और इसके बाद बरज़ख़ है जो क़ियामत के दिन तक रहेगा।

इस आधार पर इंसान का जीवन जन्म से शुरू हो कर निरन्तर चलता रहता है।

2- संसार परलोक की खेती है।

क्योंकि पैगम्बरे इस्लाम स. ने कहा है कि “अद्दुनिया मज़रअतुन आख़िरति।”

अनुवाद --- संसार परलोक की खेती है।

(अवालियुल लआली 1/267)

“मआद”जिसका सभी धर्म वर्णन करते हैं, वह इस बात को उजागर करती है कि इंसान का परलोकीय जीवन इस संसार के कार्यों पर आधारित है। यह संसार एक ऐसा स्थान है जहाँ पर इंसान अपने जीवन के मार्ग को स्वयं अपनी मर्ज़ी से चुनता है। इंसान इस संसार में अल्लाह द्वारा प्रदान किये गये अक़्ल व “वही” के पैमाने पर परख कर पवित्रता या अपवित्रता के आधार पर दिल से जिस मार्ग को चुनता है, वह मार्ग इस बात को निश्चित करता है कि उसका परलोकीय जीवन किस प्रकार का होगा।

अमीरूल मोमिनीन अ. ने कहा कि “इन्ना अलल्लाहा जअलद्दुनिया दारा अलआमालि व जअला अल आखिरता दारा अलजज़ाइ वल क़रारि।”

अनुवाद—अल्लाह ने संसार को अमल (कार्य करने) के लिए बनाया और परलोक को उन कार्यों का फल तथा अमरता प्रदान करने के लिए बनाया।

(बिहारूल अनवार32/46)

बल्कि परलोकीय जीवन इंसान के संसारिक कार्यों का ही रूप है। या (यह कहा जा सकता है कि परलोकीय जीवन में इंसान के कार्य वास्तविकता का रूप धारण कर लेंगे।)

क़ुरआने करीम के सूरए ज़लज़ला की आयत न. 7-8 में कहा गया है कि---

“फ़मन यअमल मिस्क़ाला ज़र्रतिन खैरन यरहु व मन यअमल मिस्क़ाला ज़र्रतिन शर्रन यरहु।”

अनुवाद-- जिस ने एक कण के बराबर भी कोई अच्छाई की वह उस अच्छाई को देखेगा और जिसने एक कण के बराबर कोई बुराई की है वह उस बुराई को देखेगा।

परन्तु अल्लाह की अनुकम्पा व दया इंसान के अच्छे कार्यों को उसका दस गुना करके दिखा सकती है।

जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए अल अनाम की आयत न. 160 में वर्णन होता है कि---

“ मन जाआ बिल हसनति फ़लहु अशरु अमसालिहा।”

अनुवाद-- जो अच्छा कार्य करेगा उसको उस कार्य का दस गुना फल मिलेगा।


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[1] अक़ले नजरी से अभिप्राय इंसान के अन्दर पायी जाने वह शक्ति है जिसकी सहायता से इंसान जानकारी प्राप्त कर सकता है।

[2] अक़्ले अमली से अभिप्राय इंसान के अन्दर पायी जाने वाली वह शक्ति है जिसकी सहायता से इंसान अच्छे व बुरे कार्यों को समझ सकता है और इस शक्ति को अपना मार्ग दर्शक बना सकता है।

[3] धर्म मासूम नबियों व खास वलियों को मानवता के सम्मुख एक आदर्श के रूप में परिचित कराता है। ताकि इंसान इन आदर्शों से सम्पर्क करके पहले इंसान के सही गुणों को समझे और बाद में उन आदर्शों से इस सम्बंध में सहायता ले कि शरियत की शिक्षाओं को अपने संसारिक जीवन में किस प्रकार लागू किया जाये। और मासूम उन विशेष व्यक्तियों को कहते हैं जो न जान बूझ कर ग़लती करते हैं और न ही न जानने के आधार पर पर कोई ग़लत काम करते हैं। ( इनको ही इंसाने कामिल कहा जाता है)

[4] बरज़ख़ का जीवन इंसान की मृत्यु से शुरू होता है और इस जीवन की अन्तिम सीमा क़ियामत है। कुछ रिवायतों में बरज़ख़ को सपने से उपमा दी गयी है। बरज़ख़ मे पवित्र आत्माऐं आराम से रहती हैं और बुरी आत्माऐं कष्ट में रहती हैं। और यह क़ियामत का छोटा रूप है।