ख़ुत्बात
 
239- आपका इरशादे गिरामी
(इसमें आले मोहम्मद अलैहिस्सलाम का ज़िक्र किया गया है)


यह लोग इल्म की ज़िन्दगी और जेहालत की मौत हैं। इनका हिल्म उनके इल्म से और इनका ज़ाहिर इनके बातिन से और इनकी ख़मोशी उनके कलाम से बाख़बर करती है। यह न हक़ की मुख़ालेफ़त करते हैं और न हक़ के बारे में कोई इख़्तेलाफ़ करते हैं। यह इस्लाम के सुतून और हिफ़ाज़त के मराकज़ हैं। उन्हीं के ज़रिये हक़ अपने मरकज़ की तरफ़ वापस आया है और बातिल अपनी जगह से उखड़ गया है और इसकी ज़बान जड़ से कट गई है। उन्होंने दीन को इस तरह पहचाना है जो समझो और निगरानी का नतीजा है। सिर्फ़ सुनने और रिवायत का नतीजा नहीं है। इसलिये के (यू ंतो) इल्म की रिवायत करने वाले बहुत हैं और (मगर) इसका ख़याल रखने वाले बहुत कम हैं।


(((-इब्ने अबी अलहदीद ने इ समक़ाम पर ख़ुद अबू मूसा अशअरी की ज़बान से यह हदीस नक़ल की है के सरकारे दो आलम (स0) ने फ़रमाया के जिस तरह बनी इसराईल में दो गुमराह हकम थे उसी तरह इस उम्मत में भी होंगे। तो लोगों ने अबू मूसा से कहा के कहीं आप ऐसे न हो जाएं, उसने कहा यह नामुमकिन है,, और इसके बाद जब वक़्त आया तो तमए दुनिया ने ऐसा ही बना दिया जिसकी ख़बर सरकारे दो आल (स0) ने दी थी।
हैरत की बात है के हकमीन के बारे में रिवायत ख़ुद अबू मूसा ने बयान की है और जो आपके सिलसिले में रिवायत ख़ुद उम्मुल मोमेनीन आइशा ने नक़्ल की है, लेकिन इसके बावजूद न उस रिवायत का कोई असर अबू मूसा पर हुआ और न इस रिवायत का कोई असर हज़रत आइशा पर।
इस सूरतेहाल को क्या कहा जाए और उसे क्या नाम दिया जाए, इन्सान का ज़ेहन सही ताबीर से आजिज़ है, और ‘‘नातक़ा सर ब गरीबां है इसे क्या कहिये।’’
सरकारे दो आलम (स0) ने एक तरफ़ नमाज़ को इस्लाम का सुतून क़रार दिया है और दूसरी तरफ़ अहलेबैत (अ0) के बारे में फ़रमाया है के जो मुझ पर और इन पर सलवात न पढ़े उसकी नमाज़ बातिल और बेकार है, जिसका खुला हुआ मतलब यह है के नमाज़ इस्लाम का सुतून है और मोहब्बते अहलेबैत (अ0) नमाज़ का सुतूने अकबर है। नमाज़ नहीं है तो इस्लाम नहीं है और अहलेबैत (अ0) नहीं हैं तो नमाज़ नहीं है-)))