ख़ुत्बात
 
236-आपका इरशादे गिरामी
(इसमें पैग़म्बर (स0) की हिजरत के बाद अपनी कैफ़ियत और फिर उन तक पहुंचने तक की हालत का तज़किरा किया है)


मैं रसूलल्लाह (स0) के रास्ते पर रवाना हुआ और आपके ज़िक्र के ख़ुतूत पर क़दम रखता हुआ मक़ामे अर्ज तक पहुंच गया।
सय्यद रज़ी - यह टुकड़ा एक तवील कलाम का जुज़ है और (फाता ज़िक्रा) ऐसा कलाम है जिसमें मुन्तहा दरजे का इख़्तेसार और फ़साहत मलहूज़ रखी गई है। इससे मुराद यह है के इब्तेदाए सफ़र से लेकर यहाँ तक के मैं इस मुक़ामे अरज तक पहुंचा बराबर आप (अ0) की इत्तेलाआत मुझे पहुंच रही थीं। आप (अ0) ने इस मतलब को इस अजीब व ग़रीब कनाया में अदा किया है।