ख़ुत्बात
 
235-आपका इरशादे गिरामी
(रसूलल्लाह (स0) को ग़ुस्ल कफ़न देते वक़्त फ़रमाया )


या रसूलल्लाह (स0)! मेरे माँ बाप आप (स0) पर क़ुरबान हों। आप (स0) के रेहलत फ़रमा जाने से नबूवत, ख़ुदाई एहकाम और आसमानी ख़बरों का सिलसिला क़ता हो गया जो किसी और (नबी) के इन्तेक़ाल से क़ता नहीं हुआ था (आप (स0) ने) इस मुसीबत में अपने अहलेबैत (अ0) को मख़सूस किया यहाँ तक के आप (अ0) ने दूसरों के ग़मों से तसल्ली दे दी और (इस ग़म को) आम भी कर दिया के सब लोग आप (अ0) के (सोग में) बराबर के ‘ारीक हैं। अगर आप (अ0) ने सब्र का हुक्म और नाला व फ़रियाद से रोका न होता तो हम आप (अ0) के ग़म में आंसुओं का ज़ख़ीरा ख़त्म कर देते और यह दर्द मन्नत पज़ीद दरमाँ न होता और यह ग़म व हुज़्न साथ न छोड़ता। (फिर भी यह) गिरया व बुका और अन्दोह व हुज़्न आपकी मुसीबत के मुक़ाबले में कम होता, लेकिन मौत ऐसी चीज़ है के जिसका पलटाना इख़्तेयार में नहीं है और न इसका दूर करना बस में है, मेरे माँ-बाप आप (अ0) पर निसार हों हमें भी अपने परवरदिगार के पास याद कीजियेगा और हमारा ख़याल रखियेगा।